भारतीय अर्थव्यवस्था

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प्राचीन काल से अब तक भारत के आर्थिक कार्यकलापों और आर्थिक नीतियों पर कहे गये सद्वाक्य।

स्वतंत्रता-पूर्व
  • मेगास्थनीज ने कहा है कि भारत के लोग न तो पैसा व्याज पर देते हैं न ही उधार लेना जानते हैं। किसी का अहित करना या किसी से अहित होना भारतीय सिद्धान्तों के विपरीत है। इसलिये वे लोग न तो संविदा (कॉन्ट्रैक्ट) करते हैं न किसी प्रतिभूति (सेक्योरिटी) की आवश्यकता होती है। -- विल डुरान्ट और एरिएल डुरान्त, The Story of Civilization, Book I, Our Oriental Heritage (1935)
  • भारत केवल अपने धैर्य, अतिमानवीय शक्ति एवं विशाल आकार के कारण बचा रह सका। -- Fernand Braudel: A History of Civilizations, p.232., quoted in Elst, Koenraad (1999). Update on the Aryan invasion debate New Delhi: Aditya Prakashan.
स्वतंत्रता के पश्चात
  • मेरे मन में इस बात की कोई शंका नहीं है कि भविष्य में भारत एक महान अर्थिक शक्ति बनेगा। भारत का एक यही अभिशाप है कि भारत के लोगों में भारतीय होने का गर्व नहीं है। जिस क्षण उनके स्वभिमान आ जायेगा, भारत दूसरा जापान बन जायेगा। -- माइक्रोकम्प्यूटर के अग्रदूत आदम ऑसबॉर्न (Adam Osborne), टाइम्स ऑफ इण्डिया में, 7/12/1990. Quoted from Elst, Koenraad (1991). Ayodhya and after: Issues before Hindu society.