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पुरुषार्थ

विकिसूक्ति से

पुरुषार्थ (= पुरुष + अर्थ) का शाब्दिक अर्थ है 'पुरुष द्वारा प्राप्त करने योग्य'। सतानत चिन्तन में प्रायः चार पुरुषार्थ माने गये हैं - धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष। धर्म का अर्थ है- जीवन का नियामक तत्त्व, अर्थ का तात्पर्य है - जीवन के भौतिक साधन, काम का अर्थ है- जीवन की वैध कामनाएँ और मोक्ष का अभिप्राय है जीवन के सभी बन्धनों से मुक्ति। प्रथम तीन को 'पवर्ग' और अन्तिम को 'अपवर्ग' कहते हैं। इन चारों पुरुषार्थों को चतुर्वर्ग की संज्ञा दी गई है। इन चारों का चारो आश्रमों से भी विशेष सम्बन्ध है। इन चारों पुरुषार्थों में विकास भी परिलक्षित होता है। यथा एक से दूसरे की प्राप्ति। धर्म से अर्थ, अर्थ से काम तथा धर्म से पुनः मोक्ष की प्राप्ति।

बाद में चलकर मोक्ष को अन्तिम मानकर तीन पुरुषार्थों धर्म, अर्थ और काम पर ही बल दिया गया जिन्हें त्रिवर्ग कहा गया। ये तीनों जीवन में एक साथ अनुसरित किये जा सकते हैं।

उक्तियाँ

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  • यो विषादं प्रसहते विक्रमे समुपस्थिते ।
तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न सिद्धयति ॥ -- वाल्मीकि रामायण
पराक्रम दिखाने का समय आने पर जो पीछे हट जाता है, उस तेजहीन का पुरुषार्थ सिद्ध नही होता।
  • यथा हि एकेन चक्रेण न रथस्य गतिर्भवेत् ।
एवं पुरुषकारेण विना दैवं न सिद्ध्यति ॥
जिस प्रकार केवल एक पहिये से रथ चल नहीं सकता, उसी प्रकार पुरुषार्थ के बिना भाग्य भी सिद्ध नहीं होता।
  • उर्ध्वबाहुर्विरौम्येष न च कश्चित शृणोति मे।
धर्मादर्थश्च कामश्च स किमर्थ न सेव्यते॥ -- महाभारत
मैं बाहों को उठाकर जोर-शोर से चिल्ला रहा हूँ, किंतु मेरी बात कोई नहीं सुनता? धर्म से ही अर्थ और काम प्राप्त होते हैं, फिर उस धर्म का किसलिए पालन नहीं किया जाता?
  • अधर्मी (अपने विवेक से च्युत) पुरुष यदि काम और अर्थ संबंधी क्रियाएं करता है तो उसका फल बांझ स्त्री के पुत्र जैसा होता है अर्थात् उनसे किसी प्रकार के कल्याण की सिद्धि नहीं होती। -- पुराण
  • शतायुर्वै पुरुषो विभज्य कालम् अन्योन्य अनुबद्धं परस्परस्य अनुपघातकं त्रिवर्गं सेवेत।
बाल्ये विद्याग्रहणादीन् अर्थान्
कामं च यौवने
स्थाविरे धर्मं मोक्षं च -- (कामसूत्र १.२.१ - १.२.४)
पुरुष को सौ वर्ष की आयु को तीन भागों में बाँटकर बाल्यकाल में विद्या और अर्थ का अर्जन करना चाहिये, काम यौवन में तथा बुढ़ापे में धर्म और मोक्ष का अर्जन करना चाहिये।
  • एषां समवाये पूर्वः पूर्वो गरीयान
अर्थश्च राज्ञः/ तन्मूलत्वाल् लोकयात्रायाः/ वेश्यायाश् चैति त्रिवर्गप्रतिपत्तिः -- कामसूत्र १.२.१४ - १.२.१५)
सामान्य लोगों के लिये) धर्म, अर्थ से श्रेष्ठ है ; अर्थ, काम से श्रेष्ठ है। लेकिन राजा को अर्थ को प्राथमिकता देनी चाहिये क्योंकि अर्थ ही लोकयात्रा का आधार है। वेश्याओं के लिये इनके महत्व का क्रम उल्टा है (काम सबसे श्रेष्ठ है, फिर अर्थ है, और सबसे अन्त में धर्म)।
  • तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पौरुषे यत्नमाचरेत्।
  • जो व्यक्ति आलसी होता है और कर्म नहीं करता, वह भूखा मरता है। भाग्य के भरोसे बैठे रहने वाला मनुष्य कभी भी जीवन में सफल नहीं होता। उस मनुष्य से श्रीवृद्धि तथा समृद्धि सदैव रूठी रहती है। -- मत्स्य पुराण
  • प्रथमेनार्जिता विद्या द्वितीयेनार्जितं धनम् ।
तृतीयेनार्जितः पुण्यं चतुर्थे किं करिष्यति ॥
जिस व्यक्ति ने पहले आश्रम (ब्रम्हचर्य) में विद्या अर्जित नहीं की, दूसरे आश्रम (गृहस्थ) में धन अर्जित नहीं किया, तीसरे आश्रम (वानप्रस्थ) में पुण्य अर्जित नहीं किया, वह अब चौथे आश्रम (सन्यास) में क्या कर सकेगा?
  • सौभाग्य और दुर्भाग्य मनुष्य की दुर्बलता के नाम हैं। मैं तो पुरुषार्थ को ही सबका नियामक समझता हूँ। पुरुषार्थ ही सौभाग्य को सींचता है। -- जयशंकर प्रसाद
  • पुरुषार्थ का सहारा पाकर ही भाग्य भली भांति बढ़ता है। -- महाभारत
  • पुरुषार्थ नहीं करते वे धन, मित्र, ऐश्वर्य, उत्तम कुल तथा दुर्लभ लक्ष्मी का उपयोग नहीं कर सकते। -- महाभारत

मत्स्यपुराण में पुरुषार्थ वर्णन

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मत्स्यपुराण के अध्याय २२१ में 'दैव और पुरुषार्थ' का वर्णन है। इस विषय में मनु के प्रशन का मत्स्य भगवान उत्तर देते हैं।

मनुरुवाच

दैवे पुरुषकारे च किं ज्यायस्तद् ब्रवीहि मे ।
अत्र मे संशयो देव छेत्तुमर्हस्यशेषतः ॥ १

मनुरुवाच

स्वमेव कर्म दैवाख्यं विधि देहान्तरार्जितम् ।
तस्मात् पौरुषमेवेह श्रेष्ठमाहर्मनीषिणः ॥ २

प्रतिकूलं तथा दैवं पौरुषेण विहन्यते ।
मङ्गलाचारयुक्तानां नित्यमुत्थानशालिनाम् ॥ ३

येषां पूर्वकृतं कर्म सात्त्विकं मनुजोत्तम ।
पौरुषेण विना तेषां केषांचिद् दृश्यते फलम् ॥ ४

कर्मणा प्राप्यते लोके राजसस्य तथा फलम् ।
कृच्छ्रेण कर्मणा विद्धि तामसस्य तथा फलम् ॥ ५

पौरुषेणाप्यते राजन् प्रार्थितव्यं फलं नरैः ।
दैवमेव विजानन्ति नराः पौरुषवर्जिताः ॥ ६

तस्मात् त्रिकालं संयुक्तं दैवं तु सफलं भवेत् ।
पौरुषं दैवसम्पत्त्या काले फलति पार्थिव ॥ ७

दैवं पुरुषकारश्च कालश्च पुरुषोत्तम ।
त्रयमेतन्मनुष्यस्य पिण्डितं स्यात् फलावहम् ॥ ८

कृषेर्वृष्टिसमायोगाद् दृश्यन्ते फलसिद्धयः ।
तास्तु काले प्रदृश्यन्ते नैवाकाले कथञ्चन ॥ ९

तस्मात् सदैव कर्तव्यं सधर्मं पौरुषं नरैः ।
विपत्तावपि यस्येह परलोके ध्रुवं फलम् ॥ १०

नालसाः प्राप्नुवन्त्यर्थान्न च दैवपरायणाः ।
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन पौरुषे यत्नमाचरेत् ॥ ११

त्यक्त्वाऽऽलसान् दैवपरान् मनुष्यानुत्थानयुक्तान् पुरुषान् हि लक्ष्मीः ।
अन्विष्य यलावृणुयान्नृपेन्द्र तस्मात् सदोत्थानवता हि भाव्यम् ॥ १२[१]

मनुने पूछा- देव! भाग्य और पुरुषार्थ इन दोनोंमें कौन श्रेष्ठ हैं? यह मुझे बतलाइये। इस विषयमें मुझे संदेह है, अतः आप उसका सम्पूर्णरूपसे निवारण कीजिये ॥ १॥

मत्स्यभगवान्ने कहा-राजन् ! अन्य जन्ममें अपने द्वारा किया गया पुरुषार्थ (कर्म) ही दैव कहा जाता है, इसी कारण इन दोनोंमें मनीषियोंने पौरुषको ही श्रेष्ठ माना है; क्योंकि माङ्गलिक आचरण करनेवाले एवं नित्य - प्रति अभ्युदयशील पुरुषोंका प्रतिकूल दुर्देव भी पुरुषार्थद्वारा नष्ट हो जाता है। मानवश्रेष्ठ ! जिन्होंने पूर्वजन्ममें सात्त्विक कर्मे किया है, उन्हींमें किन्हीं- किन्हींको पुरुषार्थके बिना भी अच्छे फलकी प्राप्ति देखी जाती है। लोक रजोगुणी पुरुषको कर्म करनेसे फलकी प्राप्ति होती है और तमोगुणी पुरुषको कठिन कर्म करनेसे फलकी प्राप्ति जाननी चाहिये ॥ २ - ५॥

राजन् ! मनुष्यों को पुरुषार्थद्वारा अभिलषित पदार्थकी प्राप्ति होती है, किंतु जो लोग पुरुषार्थसे हीनँ हैं, वे दैवको ही सब कुछ मानते हैं। अतः तीनों कॉलमें पुरुषार्थैयुक्त देव ही सफल होता है। राजन्! भाग्ययुक्त मनुष्यका पुरुषार्थ समयपर फल देता है। पुरुषोत्तम! दैव, पुरुषार्थ और काल- ये तीनों संयुक्त होकर मनुष्यको फल देनेवाले होते हैं । कृषि और वृष्टिका संयोग होनेसे फलकी सिंधियाँ देखी जाती हैं, किंतु वे भी समय आनेपर ही दिखायी पड़ती हैं, बिना समय किसी प्रकार भी नहीं। इसलिये मनुष्यको सर्वदा धर्मयुक्त पुरुषार्थ करना चाहिये। उसके इस लोकमें आपत्तियोंमें पड़ जानेपर भी परलोकमें उसे निश्चय ही फल प्राप्त होगा। आलसी और भाग्यपर निर्भर रहनेवाले पुरुषोंको अर्थों की प्राप्ति नहीं होती। इसलिये सभी प्रयत्नोंसे पुरुषार्थ करनेमें तत्पर रहना चाहिये । राजेन्द्र ! लक्ष्मी भाग्यपर भरोसा रखनेवाले एवं आलसी पुरुषों को छोड़कर पुरुषार्थ करनेवाले पुरुषोंको यत्नपूर्वक ढूँढ़कर वरण करती है, इसलिये सर्वदा पुरुषार्थशील होना चाहिये ॥६- १२ ॥

इन्हें भी देखें

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सन्दर्भ

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