महाभारत

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महाभारत संस्कृत का एक महाकाव्य है जिसकी रचनाकाल के बारे में बहुत मतभेद है। विभिन्न विद्वानों ने इसका रचनाकाल ३१०० ईसापूर्व से लेकर ४०० ईसवी तक मानते हैं। मैकडोनाल्ड और भण्डारकर इसका रचनाकाल रामायण (१६०० ई.पू.) तथा गृहसूत्रों (४००ई.पू.) के मध्य ५०० ई.पू. मानते हैं। महाभारत की सबसे बड़ी पाण्डुलिपि में लगभग २० लाख शब्द हैं। कभी-कभी इसे विश्व का सबसे बड़ा काव्य माना जाता है।


  • निर्वनो वध्यते व्याघ्रो निर्व्याघ्रं छिद्यते वनम् ।
तस्माद्व्याघ्रो वनं रक्षेद्वनं व्याघ्रं च पालयेत् ॥
अर्थ - बिना वन के व्याघ्र (वाघ) का वध हो जाता है, (और) व्याघ्ररहित वन भी काट दिया जाता है। इसलिए व्याघ्र को चाहिये कि वह वन की रक्षा करे और वन को चाहिए कि वह (अपने अन्दर) व्याघ्र को पाले।
  • अत्यन्त लोभी का धन तथा अधिक आसक्ति रखनेवाले का काम - ये दोनों ही धर्म को हानि पहुंचाते हैं।
  • अधिक बलवान तो वे ही होते हैं जिनके पास बुद्धि बल होता है। जिनमें केवल शारीरिक बल होता है, वे वास्तविक बलवान नहीं होते।
  • अपनी दृष्टि सरल रखो, कुटिल नहीं। सत्य बोलो, असत्य नहीं। दूरदर्शी बनो, अल्पदर्शी नहीं। परम तत्व को देखने का प्रयास करो, क्षुद्र वस्तुओं को नहीं।
  • अपनी निन्दा सहने की शक्ति रखने वाला व्यक्ति मानों विश्व पर विजय पा लेता है।
  • अपनी प्रभुता के लिए चाहे जितने उपाय किए जाएं परन्तु शील के बिना संसार में सब फीका है।
  • अपने पूर्वजों का सम्मान करना चाहिए। उनके बताए हुए मार्ग पर चलना चाहिए। उनके दिए उपदेशों का आचरण करना चाहिए।
  • अभीष्ट फल की प्राप्ति हो या न हो, विद्वान पुरुष उसके लिए शोक नहीं करता।
  • अमृत और मृत्यु दोनों इस शरीर में ही स्थित हैं। मनुष्य मोह से मृत्यु को और सत्य से अमृत को प्राप्त होता है।
  • अविश्वास से अर्थ की प्राप्ति नहीं हो सकती और हो भी जाए, तो जो विश्वासपात्र नहीं है उससे कुछ लेने को जी ही नहीं चाहता। अविश्वास के कारण सदा भय लगा रहता है और भय से जीवित मनुष्य मृतक के समान हो जाता है।
  • अशांत को सुख कैसे हो सकता है। सुखी रहने के लिए शान्ति बहुत जरुरी है।
  • अहंकार मानव का और मानव समाज का इतना बङा शत्रु है, जो सम्पुर्ण मानव जाति के कष्ट का कारण और अन्ततः विनाश का द्वार बनता है।
  • अहिंसा परम धर्म है अहिंसा परम तप है अहिंसा परम ज्ञान है अहिंसा परम पद है।
  • आशा ही दुख की जननी है और निराशा ही परम सुख शांति देने वाली है।
  • उसी की बुद्धि स्थिर रह सकती है जिसकी इंद्रियाँ उसके वश मेँ हो।
  • एक बुरा आदमी उतना ही प्रसन्न होता है जितना कि एक अच्छा आदमी दूसरों के बीमार बोलने से व्यथित होता है।
  • एकमात्र विद्या ही परम तृप्ति देने वाली है।
  • कभी-कभी समय के फेर से मित्र शत्रु बन जाता है और शत्रु भी मित्र हो जाता है, क्योंकि स्वार्थ बड़ा बलवान है।
  • कर्म करते जाओ, फल की चिंता मत करो।
  • किसी का सहारा लिए बिना कोई ऊंचे नहीं चढ़ सकता, अतः सबको किसी प्रधान आश्रय का सहारा लेना चाहिए।
  • किसी की निंदा नहीं करनी चाहिए और न किसी प्रकार उसे सुनना ही चाहिए।
  • किसी के प्रति मन मेँ क्रोध रखने की अपेक्षा उसे तत्काल प्रकट कर देना अधिक अच्छा है जैसे पल मेँ जल जाना देर तक सुलगने से अच्छा है।
  • क्षमा धर्म है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा वेद है और क्षमा शास्त्र है। जो इस प्रकार जानता है, वह सब कुछ क्षमा करने योग्य हो जाता है।
  • गहरे जल से भरी हुई नदियां समुद्र में मिल जाती हैं परंतु जैसे उनके जल से समुद्र तृप्त नहीं होता, उस प्रकार चाहे जितना धन प्राप्त हो जाए, पर लोभी तृप्त नहीं होता।
  • चतुर मित्र सबसे श्रेष्ठ व मार्ग-प्रदर्शक होता है।
  • जब बोलते समय वक्ता श्रोता की अवहेलना करके दूसरे के लिए अपनी बात कहता है, तब वह वाक्य श्रोता के हृदय में प्रवेश नहीं करता है।
  • जहां कृष्ण हैं वहां धर्म है, और जहां धर्म है वहां जय है।
  • जहां लुटेरो के चंगुल मे फंस जाने पर झूठी शपथ खाने से छुटकारा मिलता हो, वहां झूठ बोलना ही ठीक है। ऐसे मे उसे ही सत्य समझना चाहिए।
  • जहाँ सब लोग नेता बनने के इच्छुक हों, जहाँ सब सम्मान चाहते हों और पंडित बनते हों, जहाँ सभी महत्वाकांक्षी हों, वह समुदाय पतित और नष्ट हुए बिना नहीं रह सकता।
  • जिस परिवार व राष्ट्र में स्त्रियों का सम्मान नहीं होता, वह पतन व विनाश के गर्त में लीन हो जाता है।
  • जिस मनुष्य की बुद्धि दुर्भावना से युक्त है तथा जिसने अपनी इंद्रियों को वश में नहीं रखा है, वह धर्म और अर्थ की बातों को सुनने की इच्छा होने पर भी उन्हें पूर्ण रूप से समझ नहीं सकता।
  • जिस राजा की प्रजा हमेशा कर के भार से पीड़ित रहे, प्रतिदिन दुखी रहे और जिसे तरह-तरह के अनर्थ झेलने पड़ते हैं, उस राजा की हमेशा पराजय होती है।
  • जिसकी बुद्धि नष्ट हो जाती है, वह मनुष्य सदा पाप ही करता रहता है। पुनः-पुनः किया हुआ पुण्य बुद्धि को बढ़ाता है।
  • जिसके मन में संशय भरा हुआ है, उसके लिए न यह लोक है, न परलोक है और न सुख ही है।
  • जिसके साथ सत्य हो, उसके साथ धर्म है, और जिसके साथ धर्म हो, उसके साथ परमेश्वर है, और जिसके साथ स्वयं परमेश्वर हो उसके पास सब कुछ है।
  • जिसने इच्छा का त्याग किया है, उसको घर छोड़ने की क्या आवश्यकता है, और जो इच्छा का बंधुआ मज़दूर है, उसको वन में रहने से क्या लाभ हो सकता है? सच्चा त्याबी जहां रहे वहीं वन और वही भवन-कंदरा है।
  • जिसने पहले तुम्हारा उपकार किया हो, वह यदि बड़ा अपराध करे तो भी उनके उपकार की याद करके उसका अपराध क्षमा दो।
  • जिसमें सत्य नहीं, वह धर्म नहीं और जो कपटपूर्ण हो, वह सत्य नहीं है।
  • जिसे सत्य पर विश्वास होता है, और जो अपने संकल्प पर दृढ होता है, उसका सदैव कल्याण होता रहता है।
  • जुआ खेलना अत्यंत निष्कृष्ट कर्म है। यह मनुष्य को समाज से गिरा देता है।
  • जैसे जल द्वारा अग्नि को शांत किया जाता है वैसे ही ज्ञान के द्वारा मन को शांत रखना चाहिए।
  • जैसे तेल समाप्त हो जाने पर दीपक बुझ जाता है, उसी प्रकार कर्म के क्षीण हो जाने पर दैव भी नष्ट हो जाता है।
  • जैसे बिना नाविक की नाव जहाँ कहीं भी जल में बह जाती है और बिना सारथी का रथ चाहे जहाँ भटक जाता है। उसी प्रकार सेनापति बिना सेना जहाँ चाहे भाग सकती है।
  • जैसे सूखी लकड़ी के साथ मिली होने पर गीली लकड़ी भी जल जाती है, उसी प्रकार दुष्ट-दुराचारियों के साथ सम्पर्क में रहने पर सज्जन भी दुःख भोगते है।
  • जो केवल दया से प्रेरित होकर सेवा करते हैँ उन्हें निःसंशय सुख की प्राप्ति होती है।
  • जो जैसा शुभ या अशुभ कर्म करता है अवश्य ही उसका फल भोगता है।
  • जो मनुष्य अपनी निंदा सह लेता है, उसने मानो सारे जगत पर विजय प्राप्त कर ली।
  • जो मनुष्य अपने माता-पिता की सेवा पुरे सद्भाव से करते है, उनकी ख्याति इस लोक मे ही नही बल्कि परलोक मे भी होती है।
  • जो मनुष्य क्रोधी पर क्रोध नहीं, क्षमा करता है, वह अपनी और क्रोध करने वाले की महा संकट से रक्षा करता है। वह दोनों का रोग दूर करने वाला चिकित्सक है।
  • जो मनुष्य जिसके साथ जैसा व्यवहार करे उसके साथ भी उसे वैसा व्यवहार करना चाहिए, यह धर्म है।
  • जो मनुष्य न किसी से द्वेष करता है, और न किसी चीज़ की अपेक्षा करता है, वह सदा ही संन्यासी समझने के योग्य है।
  • जो मनुष्य नाश होने वाले सब प्राणियों में सम भाव से रहने वाले अविनाशी परमेश्वर को देखता है, वही सत्य को देखता है।
  • जो विपत्ति पड़ने पर कभी दुखी नहीं होता, बल्कि सावधानी के साथ उद्योग का आश्रय लेता है तथा समय आने पर दुख भी सह लेता है, उसके शत्रु पराजित ही हैं।
  • जो वेद और शास्त्र के ग्रंथों को याद रखने में तत्पर है किन्तु उनके यथार्थ तत्व को नहीं समझता, उसका वह याद रखना व्यर्थ है।
  • जो सज्जन ता का अतिक्रमण करता है उसकी आयु संपत्ति, यश, धर्म, पुण्य, आशीष, श्रेय नष्ट हो जाते हैँ।
  • ज्ञानरूप, जानने योग्य और ज्ञान से प्राप्त होने वाला परमात्मा सबके हृदय में विराजमान है।
  • झूठे पर विश्वास और विश्वस्त पर भी विश्वास सहसा नहीं करना चाहिए।
  • दुख को दूर करने की एक ही अमोघ औषधि है- मन से दुखों की चिंता न करन।
  • दुखों में जिसका मन उदास नहीं होता, सुखों में जिसकी आसक्ति नहीं होती तथा जो राग, भय व क्रोध से रहित होता है, वही स्थितिप्रज्ञ है।
  • दूसरों के लिए भी वही चाहो जो तुम अपने लिए चाहते हो।
  • दूसरों से घृणा करने वाले, दूसरों से ईर्ष्या करने वाले, असंतोषी, क्रोध, सभी बातों में शंका करने वाले और दूसरे के धन से जीविका निर्वाह करने वाले ये छहों सदा दुखी रहते हैं।
  • दो प्रकार के व्यक्ति संसार में स्वर्ग के भी ऊपर स्थिति होते हैं- एक तो जो शक्तिशाली होकर क्षमा करता है और दूसरा जो दरिद्र होकर भी कुछ दान करता रहता है।
  • द्वैष से सदैव दूर रहें।
  • धर्म का पालने करने पर जिस धन की प्राप्ति होती है, उससे बढ़कर कोई धन नहीं है।
  • धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मी सब शील के ही आश्रय पर रहते हैं। शील ही सबकी नींव है।
  • न कोई किसी का मित्र है और न कोई किसी का शत्रु। स्वार्थ से ही मित्र और शत्रु एक-दूसरे से बंधे हुए हैं।
  • नारी प्रकृति की बेटी है, उस पर क्रोध मत करो, उसका हृदय कोमल है, उस पर विश्वास करो।
  • नारी वह धुरी है, जिसके चारों ओर परिवार घूमता है।
  • निरोगी रहना, ऋणी न होना, अच्छे लोगों से मेल रखना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना और निभर्य होकर रहना- ये मनुष्य के सुख हैं।
  • परिवर्तन इस संसार का अटल नियम है, और सब को इसे स्वीकारना ही पड़ता है; क्योकि कोई इसे बदल नही सकता।
  • परोपकार सबसे बड़ा पुण्य और परपीड़ा यानि दूसरों को कष्ट देना सबसे बड़ा पाप है।
  • पुरुषार्थ का सहारा पाकर ही भाग्य भली भांति बढ़ता है।
  • पुरुषार्थ नहीं करते वे धन, मित्र, ऐश्वर्य, उत्तम कुल तथा दुर्लभ लक्ष्मी का उपयोग नहीं कर सकते।
  • प्रयत्न न करने पर भी विद्वान लोग जिसे आदर दें, वही सम्मानित है। इसलिए दूसरों से सम्मान पाकर भी अभिमान न करे।
  • प्राप्त हुए धन का उपयोग करने में दो भूलें हुआ करती हैं, जिन्हें ध्यान में रखना चाहिए। अपात्र को धन देना और सुपात्र को धन न देना।
  • प्रिय वस्तु प्राप्त होने पर भी तृष्णा तृप्त नहीं होती, वह ओर भी भड़कती है जैसे ईधन डालने से अग्नि।
  • प्रेम जैसा कोई सुख नहीँ है।
  • बड़े से बड़ा शूरवीर भी अगर अधर्म और अन्याय का साथ देता है तो धर्म के आगे उसे अन्ततः झुकना ही पड़ता है।
  • बलवती आशा कष्टप्रद है। नैराश्य परम सुख है।
  • बाणों से बिंधा हुआ तथा फरसे से कटा हुआ वन भी अंकुरित हो जाता है, किंतु कटु वचन कहकर वाणी से किया हुआ भयानक घाव नहीं भरता।
  • बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि सुख या दुख, प्रिय अथवा अप्रिय, जो प्राप्त हो जाए, उसका हृदय से स्वागत करे, कभी हिम्मत न हारे।
  • बुरे कर्मों का बुरा परिणाम निकलता है।
  • बैर के कारण उत्पन होने वाली आग एक पक्ष को स्वाहा किए बिना कभी शांत नहीं होती।
  • मधुर शब्दों में कही हुई बात अनेक प्रकार से कल्याण करती है, किंतु यही यदि कटु शब्दों में कही जाए तो महान अनर्थ का कारण बन जाती है।
  • मन का दुख मिट जाने पर शरीर का दुख भी मिट जाता है।
  • मन में संतोष होना स्वर्ग की प्राप्ति से भी बढ़कर है, संतोष ही सबसे बड़ा सुख है। संतोष यदि मन में भली-भांति प्रतिष्ठित हो जाए तो उससे बड़कर संसार में कुछ भी नहीं है।
  • मन से दुखों का चिंतन न करना ही दुखों के निवारण की औषधि है।
  • मन, वचन और कर्म से प्राणी मात्र के साथ अद्रोह, सब पर कृपा और दान यही साधु पुरूषों का सनातन धर्म है।
  • मन, वचन और कर्म से सब प्राणियों के प्रति अदोह, अनुग्रह और दान - यह सज्जनों का सनातन धर्म है।
  • मनुष्य का पराक्रम उसके सब अनर्थ दूर कर देता है।
  • मनुष्य को अपनी मातृभूमि सर्वोपरि रखनी चाहिए और हर परिस्थत मे उसकी रक्षा करनी चाहिए।
  • मनुष्य जीवन की सफलता इसी में है कि वह उपकारी के उपकार को कभी न भूले। उसके उपकार से बढ़ कर उसका उपकार कर दे।
  • मनुष्य दूसरे के जिस कर्म की निंदा करे उसको स्वयं भी न करे। जो दूसरे की निंदा करता है किंतु स्वयं उसी निंद्य कर्म में लगा रहता है, वह उपहास का पात्र होता है।
  • माता के रहते मनुष्य को कभी चिंता नहीं होती, बुढ़ापा उसे अपनी ओर नहीं खींचता। जो अपनी मां को पुकारता हुआ घर में प्रवेश करता है, वह निर्धन होता हुआ भी मानो अन्नपूर्णा के पास चला आता है।
  • मेरा कहना तो यह है कि प्रमाद मृत्यु है और अप्रमाद अमृत।
  • मोह मे फंसकर अधर्म का प्रतिकार न करने के कारण ही महाभारत जैसे युध्द से महान जन-धन की हानि हुई।
  • मौत आती है, और एक आदमी को अपना शिकार बनाती है, एक ऐसा आदमी जिसकी शक्तियां अभी तक अनपेक्षित हैं; फूलों के इरादे को इकट्ठा करने की तरह, जिनके विचार दूसरे तरीके से बदल जाते हैं। अच्छी प्रैक्टिस करने के लिए दांव लगाना शुरू करें, ऐसा न हो कि भाग्य आपके लिए योजनाओं और परवाह के दौर को अनदेखा कर दे; दुःखद कार्य करने के लिए दिन का समापन।
  • यदि अपने पास धन इकट्ठा हो जाए, तो वह पाले हुए शत्रु के समान है क्योंकि उसे छोड़ना भी कठिन हो जाता है।
  • यदि पानी पीते – पीते उसकी बूंद मुंह से निकलकर भोजन में गिर पड़े तो वह खाने योग्य नहीं रहता। पीने से बचा हुआ पानी पुनः पीने के योग्य नहीं होता।
  • ये इन्द्रियाँ ही स्वर्ग और नरक है। इनको वश में रखना स्वर्ग और स्वतंत्र छोड़ देना नर्क है।
  • राजधर्म एक नौका के समान है। यह नौका धर्म रूपी समुद्र में स्थित है। सतगुण ही नौका का संचालन करने वाला बल है, धर्मशास्त्र ही उसे बांधने वाली रस्सी है।
  • राजन, यद्यपि कहीं-कहीं शीलहीन मनुष्य भी राज्य लक्ष्मी प्राप्त कर लेते हैं, तथापि वे चिरकाल तक उसका उपभोग नहीं कर पाते और मूल सहित नष्ट हो जाते हैं।
  • राजा की स्थिति प्रजा पर ही निर्भर होती है। जिसे पुरवासी और देशवासियों को प्रसन्न रखने की कला आती है, वह राजा इस लोक और परलोक में सुख पाता है।
  • लज्जा नारी का अमूल्य रत्न है।
  • लोभ धर्म का नाशक है।
  • लोभी मनुष्य किसी कार्य के दोषों को नहीं समझता, वह लोभ और मोह से प्रवृत्त हो जाता है।
  • विजय की इच्छा रखने वाले शूरवीर अपने बल और पराक्रम से वैसी विजय नहीं पाते, जैसी कि सत्य, सज्जनता, धर्म तथा उत्साह से प्राप्त कर लेते हैं।
  • विद्या के समान कोई नेत्र नहीं है।
  • विद्या, शूरवीरता, दक्षता, बल और धैर्य, ये पांच मनुष्य के स्वाभाविक मित्र हैं। बुद्धिमान लोग हमेशा इनके साथ रहते हैं।
  • विधि के विधान के आगे कोई नही टिक सकता। एक पुरुर्षाथी को भी वक्त के साथ मिट कर इतिहास बन जाना पड़ता है।
  • विपत्ति के आने पर अपनी रक्षा के लिए व्यक्ति को अपने पड़ोसी शत्रु से भी मेल कर लेना चाहिए।
  • विवेकी पुरुष को अपने मन में यह विचार करना चाहिए कि मैं कहां हूं, कहां जाऊंगा, मैं कौन हूं, यहां किसलिए आया हूं और किसलिए किसका शोक करूं।
  • विषयों के भोगों से विषय वासना की शांति नहीं होती, हवन से बढती हुई अग्नि के समान यह काम वासना नित्य बढती ही जाती है।
  • व्यक्ति को अभिमान नहीं करना चाहिए नहीं तो दुर्योधन जैसा हाल होगा।
  • शरणागत की रक्षा करना बहुत ही पुनीत कर्म है, ऐसा करने से पापी के भी पाप का प्रायश्चित हो जाता है।
  • शोक करनेवाला मनुष्य न तो मरे हुए के साथ जाता है और न स्वयं ही मरता है। जब लोक की यही स्वाभाविक स्थिति है तब आप किस लिए बार-बार शोक कर रहे हैं।
  • सच्चा धर्म यह है कि जिन बातों को इन्सान अपने लिए अच्छा नहीं समझता दूसरों के लिए भी न करे।
  • सत्पुरुष दूसरों के उपकारों को ही याद रखते हैं, उनके द्वारा किए हुए बैर को नहीं।
  • सत्य से सूर्य तपता है, सत्य से आग जलती है, सत्य से वायु बहती है, सब कुछ सत्य में ही प्रतिष्ठित है।
  • सत्य ही धर्म, तप और योग है। सत्य ही सनातन ब्रह्मा है, सत्य को ही परम यज्ञ कहा गया है तथा सब कुछ सत्य पर ही टिका है।
  • सत्य, धर्म, सम्मान, आदि जगहो पे झुकने से मनुष्य कीर्तिवान, और यशस्वी बन जाता है।
  • सदाचार से धर्म उत्पन्न होता है तथा धर्म से आयु बढ़ती है।
  • सभी को भ्रातृभाव से रहना चाहिए।
  • समय अत्यधिक बलवान होता है, एक क्षण मे समस्त परिस्थितियाँ बदल जाती है।
  • संसार में ऐसा कोई नहीं हुआ है जो मनुष्य की आशाओं का पेट भर सके। पुरुष की आशा समुद्र के समान है, वह कभी भरती ही नहीं।
  • संसार में वही मनुष्य प्रशंसा के योग्य है, वही उत्तम है, वही सत्पुरुष और वही धनी है, जिसके यहाँ से याचक या शरणागत निराश न लौटे।
  • सो कर नींद जीतने का प्रयास न करें। कामोपयोग के द्वारा स्त्री को जीतने की इच्छा न करें।
  • स्वार्थ की अनुकूलता और प्रतिकूलता से ही मित्र और शत्रु बना करते हैं।
  • स्वार्थ बड़ा बलवान है। इसी कारण कभी-कभी मित्र शत्रु बन जाता है और शत्रु मित्र।

महाभारत के बारे में[सम्पादन]

  • धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्॥
अर्थ : धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष के विषय में जो भी ज्ञात है वह सब महाभारत में है। (किन्तु) जो यहाँ नहीं है वह कहीं नहीं है।
  • महाभारत में, राज्याभिषेक के समय उपदेश में यह भी कहा गया है कि राजा को माली (मालाकार) के समान होना चाहिये न कि लकड़ी का कोयला बनाने वाले (आङ्गारिक) की तरह। माला सामाजिक समरसता का संकेत करता है, यह धार्मिक विविधता का रूपक है जिसमें विभिन्न रंगों के फूल मिलकर अत्यन्त सुखदायक प्रभाव उत्पन्न करते हैं। उसके विपरीत लकड़ी का कोयला बनाने वाला पाशविक शक्ति का प्रतीक है जो विविधता को (जलाकर) एकरूपता में बदलता है, जिसमें जीवित पदार्थ को निर्जीव एकसमान राख में बदल दिया जाता है। -- राजीव मल्होत्रा, इन्द्राज नेट में ; राजीव मल्होत्रा निम्नलिखित श्लोक की बात कर रहे हैं-
मालाकारोपमो राजन् भव माङ्गारिकोपमः ।
तथायुक्तश्चिरं राष्ट्रं भोक्तुं शक्यसि पालयन् ॥

इन्हें भी देखें[सम्पादन]