भगवद्गीता

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Bhagavata Gita Bishnupur Arnab Dutta 2011.JPG

भगवद्गीता, महाभारत के भीष्म पर्व का एक भाग है। इसे प्रायः 'गीता' कहा जाता है। इसमें वैदिक दर्शन, योगदर्शन, वेदान्त दर्शन और तांत्रिक दर्शन के कई पहलुओं का सार है। 'भगवद्गीता' का शाब्दिक अर्थ "भगवान का गीत" है। गीता अपने आप को एक 'उपनिषद' कहती है और कभी-कभी इसे 'ज्ञानोपनिषद' कहा जाता है।

गीता पर महापुरुषुरों के विचार[सम्पादन]

महात्मा गांधी तो गीता को अपनी माँ और अपने जीवन का सन्दर्भ ग्रंथ मानते थे। वह गीता की स्थितप्रज्ञ की अवधारणा से इतने अधिक प्रभावित थे कि जीवन भर इस अवस्था को प्राप्त करने की एकनिष्ठ साधना करते रहे। लोकमान्य तिलक ने गीता की बहुत गहन व्याख्या की। उनके इस ग्रंथ का नाम “गीता रहस्य” है। उनके अनुसार ज्ञान-भक्ति-युक्त कर्मयोग ही गीता का सार है। महर्षि अरविन्द के अनुसार “गीता आध्यात्मिक जीवन का ग्रन्थ है”। आदि शंकर सहित अनेक सन्तों और योगियों ने गीता पर सुंदर टीकाएँ लिखी हैं, जिनमें सन्त ज्ञानेश्वर की “ज्ञानेश्वरी” बहुत अद्वितीय है। भारत के पूर्व राष्ट्रपति ऐपीजे अब्दुल कलाम रोजाना गीता का अध्ययन करते थे और इसे अपने सिरहाने रखकर सोते थे। भारत के बाहर विश्व की अनेक महान हस्तियाँ गीता से किस तरह प्रभावित रहीं। प्रसिद्ध अमेरिकी कवि। लेखक और दार्शनिक हेनरी डेविड थोरेओ गीता से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने अपनी पुस्तक “वाल्डेन” में भगवतगीता के अनेक उद्धरण दिए।पुस्तक के पहले ही अध्याय में वह लिखते हैं कि “पूरब के सभी अवशेषों में गीता सबसे अधिक प्रशंसनीय है”। अमेरिका के इस प्रसिद्ध मशहूर अँगरेज कवि-आलोचक टीएस ईलियट पर गीता का बहुत प्रभाव था। उसने हार्वर्ड में पढ़ाई के दौरान भारतीय दर्शन को संस्कृत में पढ़ा था। उसने अपनी कविता The Dry Salvages, में अतीत और भविष्य के बीच सम्बन्ध पर अपनी बात पर पर बल देने के लिए भगवान् कृष्ण और अर्जुन के संवाद का उल्लेख किया और व्यक्तिगत लाभ के पीछे भागने के बजाय ईश्वरीय इच्छा का पालन करने पर जोर दिया। भारतीय मूल की अमेरिकन अन्तरिक्ष यात्री सुनीता विलियम गीता में बहुत आस्था रखती थीं। उन्होंने अपने अन्तरिक्ष मिशन पर जाते समय भगवान् श्रीगणेश की प्रतिमा और भगवत गीता की एक प्रति अपने साथ रखी। उन्होंने कहा कि ये आध्यात्मिक चीजें स्वयं, जीवन और अपने आसपास की दुनिया पर चिंतन में मदद के लिए हैं और इनसे हम विश्व को एक दूसरे नज़रिए से देख सकते हैं। बीसवीं सदी के इस महान अमेरिकी संगीतज्ञ कम्पोजर फिलिप ग्लास ने अपनी एक पुस्तक में गीता का उल्लेख किया है। उसने “सत्याग्रह” नाम का एक ओपेरा भी बनाया जो महात्मा गांधी के जीवन पर आधारित था। इसमें भगवत गीता के श्लोक का उल्लेख है, जो उसके परफॉरमेंस के दौरान गाया जाता था। आयरलैंड की इस समाजवादी विदूषी और थियोसोफिस्ट एनी बेसेन्ट ने भारत के स्वत्तन्त्रता संग्राम के दौरान भारत में होम रूल का समर्थन किया था। उनकी भारत के धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथों को पढने में बहुत रुचि थी। उन्होंने गीता का अंग्रेजी में अनुवाद किया जिसका शीर्षक है The Lord’s Song में लिखा है कि “आध्यात्मिक व्यक्ति को वैरागी होने की ज़रूरत नहीं है। दुनिया में रहकर और कर्म करते हुए दिव्यात्मा से सम्पर्क हो सकता है और इसे कायम रखा जा सकता है। इस मिलन में जो बढ़ाएं वे बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर हैं- यही भगवत गीता की मुख्य शिक्षा है”। यह बात किसी को बड़ी आश्चर्यजनक लग सकती है, लेकिन यह सही है। बंगाल के पहले गवर्नर और भारत के पहले गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग ने भगवत गीता का अनुवाद करने वाले चार्ल्स विल्किन्सन को बहुत सहयोग दिया। विल्किन्सन इंग्लिश टाइपोग्राफर था। कहते हैं कि हेस्टिंग्स ने विल्किन्संस द्वारा अनूदित गीता की एक प्रति ईस्ट इंडिया कम्पनी के चेयरमैन को भेंट करते हुए कहा कि “ यह एक महान मौलिक ग्रंथ है, जिसमें विचार की उदात्तता, तर्क और शैली बेमिसाल है। उन्नीसवीं शताब्दी के इस लोकप्रिय निबंधकार राल्फ वाल्डो इमर्सन का भारतीय दर्शन के साथ परिचय फ्रांसीसी दार्शनिक विक्टर कजिन को पढ़ते समय हुआ।भारतीय दर्शन के ग्रंथों के बारे में उसने कहा कि “ भगवतगीता का में बहुत ऋणी हूँ। मुझे ऐसा लगा कि जैसे कोई साम्राज्य ने मुझसे बात की हो। इसमें कुछ भी छोटी और व्यर्थ बात नहीं है। इसमें शान्ति और संगति है। इसमें प्राचीन बुद्धिमत्ता है। इसका चिंतन किसी और युग में हुआ लेकिन हम जिन प्रश्नों से जूझ रहे हैं, उनका उत्तर इनमें है।

  • यह एक सुलभ ग्रन्थ है। इस अमर ग्रन्थ के ७०० श्लोक यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि हिन्दू धर्म क्या है और उसे जीवन में किस प्रकार उतारा जाए। गीता में किसी धर्म के प्रति द्वेष नहीं है। मुझे यह कहते बड़ा आनन्द होता है कि मैंने गीता के प्रति जितना पूज्य भाव रखा है, उतने ही पूज्य भाव से बाइबल-कुरान-जदअवस्ता और संसार के अन्य धर्म ग्रंथ पढ़े हैं। इस वाचन ने गीता के प्रति मेरी इच्छा को दृढ़ बनाया है। उससे मेरी दृष्टि और मेरा हिन्दू धर्म विशाल हुआ है। मैं अपने को हिन्दू कहने में गौरव मानता हूँ, क्योंकि मेरे मन में यह शब्द इतना विशाल है कि पृथ्वी के चारों कोनों के पैगम्बरों के प्रति यह केवल सहिष्णुता ही नहीं रखता, वरना उन्हें आत्मसात कर देता है।-- मोहनदास करमचन्द्र गांधी

प्रमुख उपदेश[सम्पादन]

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  • नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
अर्थ- आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते और न अग्नि इसे जला सकती है। जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।
  • जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥
अर्थ - जन्म लेने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है। इसलिए जो अटल है अपरिहार्य है उसके विषय में तुमको शोक नहीं करना चाहिये।
  • क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है, जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है। जब तर्क नष्ट होता है तब व्यक्ति का पतन हो जाता है।
  • नरक के तीन द्वार होते है, वासना, क्रोध और लालच।
  • जिस प्रकार अग्नि स्वर्ण को परखती है, उसी प्रकार संकट वीर पुरुषों को।
  • मनुष्य को परिणाम की चिन्ता किए बिना, लोभ- लालच बिना एवं निस्वार्थ और निष्पक्ष होकर अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।
  • मनुष्य को अपने कर्मों के संभावित परिणामों से प्राप्त होने वाली विजय या पराजय, लाभ या हानि, प्रसन्नता या दुःख इत्यादि के बारे में सोच कर चिंता से ग्रसित नहीं होना चाहिए।
  • अपने अनिवार्य कार्य करो, क्योंकि वास्तव में कार्य करना निष्क्रियता से बेहतर है।
  • अपकीर्ति मृत्यु से भी बुरी है।
  • युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा॥
अर्थ - जो खाने, सोने, आमोद-प्रमोद तथा काम करने की आदतों में नियमित रहता है। वह योगाभ्यास द्वारा समस्त भौतिक क्लेशों को नष्ट कर सकता है।
  • मनुष्य का मन इन्द्रियों के चक्रव्यूह के कारण भ्रमित रहता है। जो वासना, लालच, आलस्य जैसी बुरी आदतों से ग्रसित हो जाता है। इसलिए मनुष्य का अपने मन एवं आत्मा पर पूर्ण नियंत्रण होना चाहिए।
  • असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
अर्थ - हे महाबाहो ! निःसन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। परन्तु, हे कुन्तीपुत्र! उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा वश में किया जा सकता है।
  • जो मन को नियंत्रित नहीं करते उनके लिए वह शत्रु के समान कार्य करता है।
  • मैं धरती की मधुर सुगंध हूँ, मैं अग्नि की ऊष्मा हूँ, सभी जीवित प्राणियों का जीवन और सन्यासियों का आत्मसंयम हूँ। (कृष्ण)
  • यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥18.78॥
अर्थ- जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन है वहीं पर श्री, विजय, विभूति और ध्रुव नीति है, ऐसा मेरा मत है। (संजय, गीता के अन्त में)

इन्हें भी देखें[सम्पादन]