आदि शंकराचार्य

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आदि शंकराचार्य अद्वैत वेदान्त के प्रणेता थे। स्मार्त सम्प्रदाय में आदि शंकराचार्य को शिव का अवतार माना जाता है। इन्होंने ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, मांडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, बृहदारण्यक और छान्दोग्योपनिषद् पर भाष्य लिखा।

प्रमुख विचार[सम्पादन]

  • ब्रह्म सत्यं जगत् मिथ्या।
ब्रह्मा ही सत्य है और जगत मिथ्या (माया) है।
  • आत्मा की गति मोक्ष में हैं।
  • सबसे उत्तम तीर्थ अपना मन है, जो विशेष रूप से शुद्ध किया गया हो।
  • प्रज्वलित दीपक को चमकने के लिए, दूसरे दीपक की आवश्यकता नहीं होती। उसी प्रकार आत्मा जो स्वयं ज्ञान का स्वरूप है उसे और किसी ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती।
  • यह मोह से भरा हुआ संसार एक स्वप्न की तरह है। यह तब तक ही सत्य प्रतीत होता है जब तक व्यक्ति अज्ञान रुपी निद्रा में सो रहा होता हैं, परन्तु जाग जाने पर इसकी कोई सत्ता नही रहती।
  • सत्य की परिभाषा क्या है? सत्य की इतनी ही परिभाषा है कि जो सदा था, जो सदा है और जो सदा रहेगा।
  • लोग तभी तक याद रखते है जब तक उनकी साँसे चलती है जैसे ही साँसे चलनी बन्द हो जाती हैं सबसे निकट सम्बन्धी, मित्र यहाँ तक की पत्नी भी अपनों से दूर चली जाती है।
  • यदि हृदय में सत्य को जानने की इच्छा है तो बाहरी चीजें अर्थहीन लगती हैं।
  • हर व्यक्ति को यह ज्ञान होना चाहिए कि आत्मा एक राजा के समान होती है जो शरीर, इन्द्रियों, मन बुद्धि से बिल्कुल अलग होती है। आत्मा इन सबका साक्षी स्वरूप हैं।