कर्म

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  • कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। (गीता)
अर्थ : कर्म करने में ही तुम्हारा अधिकार है, कभी भी फल में नहीं।
  • ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः॥ -- भगवद्गीता ; अध्याय-१८
ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता -- इन तीनों से कर्मप्रेरणा होती है तथा करण, कर्म और कर्ता -- इन तीनों से कर्मसंग्रह होता है।
  • ननुनाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि।
अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥ -- ब्रह्मवैवर्तपुराण १/४४/७४
मनुष्य जो कुछ अच्छा या बुरा कार्य करता है, उसका फल उसे भोगना ही पड़ता है. अनन्त काल बीत जाने पर भी कर्म, फल को प्रदान किए बिना नाश को प्राप्त नहीं होता।
  • सकल पदरथ एहि जग माँही । करमहीन नर पावत नाहीं॥
अर्थ : इसी संसार में सभी पदार्थ मौजूद हैं किन्तु कर्महीन व्यक्ति को वे नहीं मिलते।
  • काल्ह करै सो आज कर, अज करै सो अब।
पल में परलय होयगी, बहुरि करैगा कब॥ (कबीरदास)
  • कर्मणा सिद्धिः । (कर्म से ही सिद्धि मिलती है।)
  • कर्मप्रधान बिश्व रचि राखा।
जो जस करई सो तस फल चाखा॥ (तुलसीदास)
अर्थ - यह विश्व कर्मप्रधान है। जो जैसा करता है वह वैसा ही फल पाता (चखता) है।
  • ज्ञानं भारः क्रियां बिना। -- हितोपदेश
आचरण के बिना ज्ञान केवल भार होता है।
  • उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
नहिं सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ॥ -- हितोपदेश
कार्य उद्यम से ही सिद्ध होते हैं , मनोरथ मात्र से नहीं। सोये हुए शेर के मुख में मृग प्रवेश नहीं करते।
  • देह शिवा बर मोहि इहै , शुभ करमन तें कबहूँ न टरौं ।
जब जाइ लरौं रन बीच मरौं , या रण में अपनी जीत करौं ॥ -- गुरू गोविन्द सिंह, दसम ग्रन्थ में
  • निज-कर-क्रिया रहीम कहि , सिधि भावी के हाथ ।
पांसा अपने हाथ में , दांव न अपने हाथ ॥
  • जो क्रियावान है , वही पण्डित है । ( यः क्रियावान् स पण्डितः )
  • जीवन की सबसे बडी क्षति मृत्यु नही है । सबसे बडी क्षति तो वह है जो हमारे अन्दर ही मर जाती है । -- नार्मन कजिन
  • आरम्भ कर देना ही आगे निकल जाने का रहस्य है। -- सैली बर्जर
  • जो कुछ आप कर सकते हैं या कर जाने की इच्छा रखते है उसे करना आरम्भ कर दीजिये । निर्भीकता के अन्दर मेधा ( बुद्धि ), शक्ति और जादू होते हैं । -- गोथे
  • छोटा आरम्भ करो, शीघ्र आरम्भ करो।
  • प्रारम्भ के समान ही उदय भी होता है । ( प्रारम्भसदृशोदयः ) -- रघुवंश महाकाव्यम्
  • यो विषादं प्रसहते विक्रमे समुपस्थिते ।
तेजसा तस्य हीनस्य पुरुषार्थो न सिद्धयति ॥ -- वाल्मीकि रामायण
पराक्रम दिखाने का समय आने पर जो पीछे हट जाता है, उस तेजहीन का पुरुषार्थ सिद्ध नही होता।
  • हजारों मील की यात्रा भी प्रथम चरण से ही आरम्भ होती है। -- चीनी कहावत
  • सम्पूर्ण जीवन ही एक प्रयोग है। जितने प्रयोग करोगे उतना ही अच्छा है। -- इमर्सन
  • सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप चौबीस घण्टे मे कितने प्रयोग कर पाते है। -- एडिशन
  • उच्च कर्म महान मस्तिष्क को सूचित करते हैं। -- जान फ़्लीचर
  • मानव के कर्म ही उसके विचारों की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है। -- लाक
  • जो जैसा शुभ व अशुभ कार्य करता है, वो वैसा ही फल भोगता है । -- वेदव्यास
  • अकर्मण्य मनुष्य श्रेष्ठ होते हुए भी पापी है। -- ऐतरेय ब्राह्मण-३३।३
  • मानव के कर्म ही उसके विचारों की सर्वश्रेष्ठ व्याख्या है । -- जान लाक
  • मनुष्य जितना ज्ञान में घुल गया हो उतना ही कर्म के रंग में रंग जाता है । -- विनोबा
  • सही स्थान पर बोया गया सुकर्म का बीज ही महान फल देता है । -- कथासरित्सागर

इन्हें भी देखें[सम्पादन]

बाहरी कड़ियाँ[सम्पादन]