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पाखण्ड

विकिसूक्ति से

(संस्कृत पाषण्ड) वह भक्ति, उपासना या कोई अन्य कार्य जो केवल दूसरों के दिखाने के लिये की जाय और जिसमें कर्ता की वास्तविक निष्ठा वा श्रद्धा न हो । ढोंग । आडंबर । ढकोसला ।

आडम्बर का शब्दिक अर्थ है - 'छलने वाले कपड़े' । प्रपञ्च, ढकोसला, ढोंग, दिखावा आदि इसके समानार्थी हैं। आडम्बर शब्दों का हो सकता है, विशेषणॉ का हो सकता है, ज्ञान का हो सकता है, या किसी अन्य चीज का हो सकता है जो वास्तव में केवल दिखाने के लिये हो और वास्तव में न हो।

उक्तियाँ

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  • कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥ -- श्रीमद्भगवद्गीता
जो मूर्ख व्यक्ति अपनी कर्मेन्द्रियों को वश में कर लेता हैं परन्तु मन में इन्द्रियसुख के विषयों के बारे में सोचता रहता है, वह मिथ्याचारी (पाखंडी) कहलाता हैं।
  • दम्भोदर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पौरुषमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासूर्यम् ॥ -- श्री कृष्ण, गीता के १६/४ श्लोक में
दम्भ (पाखण्ड), घमण्ड, अभिमान, क्रोध, कठोरता तथा अज्ञान असुरी सम्पत्ति अर्थात बंध का कारण हैं।
  • पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडालव्रतिकांछठान्।
हैतुकान्वकवृत्तींश्च वाड्मात्रेणापि नार्चयेत्॥ -- मनुस्मृति
पाखंडी, दुष्ट कर्म करने वाला, दूसरों को मूर्ख बनाकर उनका धन लूटने वाला, दूसरों को दुख पहुंचाने वाला व वेदों में श्रद्धा न रखने वाला - इन 5 लोगों को अतिथि नहीं बनाना चाहिए और इनका शिष्टाचार पूर्वक स्वागत भी नहीं करना चाहिए।
  • उच्चेरध्ययनं पुराणकथा स्त्रीभिः सहालापनं
तासामर्भकलालनं पतिनुतिस्तत्पाकमिथ्यास्तुतिः ।
आदेश्यस्य करावलम्बनविधि: पांडित्यलेखक्रिया
होरागारुडमंत्रतंत्रकविधिपाखंडोब्राह्मणोंर्गुणा द्वादश ॥ -- सुभाषित रत्नावली - ३
पाखण्डी ब्राह्मण के बारह गुण हैं- (सब को अपना संस्कृत ज्ञान दिखाने के लिए) बड़े बड़े आवाज़ से पाठ करना ; (केवल) पुराण की कथाओं का पारायण करना (क्योंकि उसे वेदों का ज्ञान नहीं है) ; स्त्रियों के देख कर (उनके सामने अपनी विद्वत्ता प्रदर्शित करने) उनके साथ वार्तालाप करना ; स्त्रियों के पति की मिथ्या प्रशंसा करना (अर्थात किसी भी व्यक्ति के सामने लाचार हो जाना) ; (ऐसी स्त्रियों को प्रभावित करने) उनके बालकों को संभालना ; स्त्रियों की रसोई की मिथ्या प्रशंसा करना ; (शास्त्रीय मान्यता हो या ना हो केवल यजमान की इच्छा से और उसके द्वारा पैसा कमाने के लिए) अनावश्यक विधियों का चयन करना (अर्थात यजमान को मुर्ख बनाना) ; (अनावश्यक) लेखनकार्य में पंडिताई का दर्शन करना ; गारुड़ीविद्या, मन्त्र, तन्त्र, कविता इत्यादि में ही रममाण होना (केवल उसमे ही विद्वत्ता हासिल करना) ।
  • भैक्षव्रतपराः शूद्राः प्रव्रज्यालिङ्गिनोऽधमाः।
पाषण्ड संश्रयम् वृत्तिमाश्रयिष्यन्ति सत्कृताः ॥ -- विष्णुपुराण, ४-१-३७१
कलियुग में अधम शूद्रगण संन्‍यासाश्रम के चिह्न धारण कर भिक्षावृत्ति में तत्पर रहेंगे और लोगों से सम्मानित होकर पाषण्ड-वृत्ति का आश्रय ग्रहण करेंगे।
  • गुणेषु क्रियतां यत्नः किमाटोपैः प्रयोजनम्।
विक्रीयन्ते न घण्टाभिर्गावः क्षीरविवर्जिताः॥
गुणों के उपार्जन में प्रयास करना चाहिए, बाहरी आडम्बरों (दिखावों) से क्या लाभ है। क्योंकि घण्टे लटकाने से दूध न देने वाली गायें नहीं बिकती हैं।
  • कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड ।
दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड॥ -- रामचरितमानस
राम के गुणों के समूह कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल और कलियुग के कपट, दंभ और पाखंड को जलाने के लिए वैसे ही हैं, जैसे ईंधन के लिए प्रचंड अग्नि॥
  • हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥ -- रामचरितमानस
भावार्थ:- पृथ्वी घास से परिपूर्ण होकर हरी हो गई है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते। जैसे पाखंड मत के प्रचार से सद्ग्रंथ गुप्त (लुप्त) हो जाते हैं।
  • माया देखि के जगत लुभांनां काहे रे नर गरबांनां ।
निरभै भया कछू नहिं ब्यापै कहै कबीर दिवांनां ॥ -- कबीरदास
हे! मनुष्य तू इस संसार के झूठे मोह-माया, भौतिक सुख सुविधाओं के प्रति आकर्षित होकर व्यर्थ में अभिमानी हो रहा हैं। क्योंकि ये सब तो नश्वर हैं। कबीरदास कहते हैं कि इसीलिए संसार के सभी मोह-माया के बंधनों से मुक्त होकर, निडर होकर जियो और प्रभु भक्ति में लीन होकर उसे जानने व समझने की कोशिश करो। कहने का तात्पर्य यह है कि जिस तरह कबीर जान चुके हैं कि आत्मा परमात्मा एक हैं। और सभी उसी परमात्मा की संतान हैं। इसीलिए वो संसारिक मायामोह से दूर होकर और निर्भय होकर एक दीवाने की तरह प्रभु भक्ति में लीन हो चुके हैं।
  • साधो देखो जग बौराना।
साँची कहौ तो मारन धावै झूँठे जग पतियाना।
हिंदू कहत है राम हमारा मुसलमान रहमाना।
आपस में दोउ लड़े मरतु हैं मरम कोई नहिं जाना।
बहुत मिले मोहिं नेमी धर्मी प्रात करैं असनाना।
आतम छोड़ि पषानैं पूजैं तिनका थोथा ज्ञाना।
आसन मारि डिंभ धरि बैठे मन में बहुत गुमाना।
पीपर-पाथर पूजन लागे तीरथ-बर्न भुलाना।
माला पहिरे टोपी पहिरे छाप-तिलक अनुमाना।
साखी सब्दै गावत भूले आतम ख़बर न जाना।
घर घर मंत्र जो देत फिरत हैं माया के अभिमाना।
गुरुवा सहित सिष्य सब बूड़े अंतकाल पछिताना।
बहुतक देखे पीर औलिया पढ़ैं किताब क़ुराना।
करैं मुरीद कबर बतलावैं उनहूँ ख़ुदा न जाना।
हिंदु की दया मेहर तुरकन की दोनों घर से भागी।
वह करै जिबह वाँ झटका मारै आग दोऊ घर लागी।
या बिधि हँसत चलत हैं हमको आप कहावैं स्याना।
कहैं कबीर सुनो भाई साधो, इनमें कौन दिवाना॥ -- कबीरदास
देखो साधु, यह संसार पगला गया है। सच्ची बात कहो तो मारने को दौड़ते हैं लेकिन झूठ पर सबका विश्वास है। हिंदू राम का नाम लेता है और मुसलमान रहमान का और दोनों आपस में इस बात पर लड़ते-मरते हैं लेकिन सच्चाई से कोई भी परिचित नहीं। मुझे धर्म और उसके नियमों के मानने वाले बहुत मिले जो प्रातःकाल स्नान करते हैं और आत्मा को छोड़कर पत्थर की पूजा करते हैं। उनका ज्ञान झूठा है। दंभ धारण करके आसन लगाकर बैठते हैं और उनका मन अहंकार में डूब जाता है, जिसके कारण वह पत्थर और पीपल को पूजते हैं, माला और टोपी पहनकर तिलक और छापा लगाते हैं। उपदेश देते-देते वह आत्मा से बेख़बर हो गए हैं। जो गुरु माया के घमंड में घर-घर मंत्र सुनाते फिरते हैं, वे गुरु और उनके चेले सब डूब चुके हैं। उनके पास पछतावे के सिवा कुछ नहीं है। मैंने पीर और औलिया बहुत देखे हैं जो किताब और क़ुरान पढ़ते रहते हैं। वह क़ब्र दिखाकर लोगों को मुरीद बनाते हैं। ज़ाहिर है कि उन्होंने ख़ुदा को नहीं पहचाना है। हिंदू की दया और मुसलमानों की मुहब्बत, दोनों उनके घरों से निकल गई हैं। एक जानवर को ज़िबह करता है और दूसरा झटका करता है लेकिन आग दोनों के घर में लगी है। इस तरह वह हम पर तो हँसते हैं और ख़ुद सियाने कहलाते हैं। कबीर कहते हैं, ए साधु, तुम ही बताओ इन दोनों में कौन दिवाना है।
  • गिरना या फिसलना सरल है, संभलना समझदारी है पर, संभल कर उठकर खड़े होना, अपने को सच्चाई के मार्ग पर स्थापित कर लेना बेहद कठिन है। असत्य का परित्याग करना और सत्य को अपनाना, सत्य को जानना ही पाखंड को तोड़ना, उसका नाश करना है। पाखंड खंडनी पताका इसी का मार्गदर्शक है। -- दयानन्द सरस्वती, सन १८६७ में हरिद्वार के कुम्भ मेले में पाखण्ड-खण्डनी-पताका फहराने के विषय में बोलते हुए।
  • काल्पनिक सब्ज बाग दिखाकर संडे-मुसंडे लाल-पीले कपड़े पहनकर लोगों को ठगते रहते हैं। भोले लोग समझते हैं धर्म हो गया, पुण्य कमा लिया, पर वास्तविकता ऐसी कहाँ होती है। धूर्त लोगों को गुलछर्रे उड़ाने के लिए दिया हुआ धन भला धर्म कैसे हो जाएगा? पुण्य कर्म कैसे माना जाएगा? जिसका परिणाम न तो ज्ञान की सत्प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि हो और न पीड़ितों को कोई राहत मिले, वह कार्य पाखंड ही रहेगा, धर्म नहीं। आज धर्म के नाम पर पाखंड का बोलबाला है और भोली जनता अपनी गाढ़ी कमाई का अरबों रुपया उसी पाखंड पर स्वाहा कर देती है।
    पाखण्डों पर खर्च होने वाला समय और धन यदि उपयोगी कार्यों में लगे तो उसका कितना बड़ा सत्परिणाम उत्पन्न हो। मृत्युभोज, पशुबलि, बालविवाह, नींच-ऊँच, स्याने, दिवाने, भूत पलीत, कन्या विक्रय, स्त्रियों द्वारा गाये जाने वाले गन्दे गीत, पर्दा, होली में कीचड़ उछालना, दिवाली पर जुआ खेलना आदि अगणित ऐसी कुरीतियाँ हमारे समाज में प्रचलित हैं, जिनके कारण अनेक रोगों से ग्रसित रोगी की तरह हम सामाजिक दृष्टि से दिन-दिन दुर्बल होते चले जा रहे हैं। -- श्रीराम शर्मा, अखण्ड ज्योति जनवरी 1962
  • आओ, मनुष्य बनो! उन पाखंडी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नत्ति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मार कर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा, उनके हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकड़ों वर्षों के अंधविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को जड-मूल से निकाल फेंको। -- स्वामी विवेकानन्द
  • कृषि के बाद, पाखण्ड हमारे युग का सबसे बड़ा उद्योग है। -- अल्फ्रेड नोबेल
  • पाखण्ड मुंह कि दुर्गन्ध कि तरह होता है, अपने को पाता नहीं चलता और दूसरों कि बुरी लगती है।

इन्हें भी देखें

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