पाखण्ड

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  • कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥ -- श्रीमद्भगवद्गीता
जो मूर्ख व्यक्ति अपनी कर्मेन्द्रियों को वश में कर लेता हैं परन्तु मन में इन्द्रियसुख के विषयों के बारे में सोचता रहता है, वह मिथ्याचारी (पाखंडी) कहलाता हैं।
  • उच्चेरध्ययनं पुराणकथा स्त्रीभिः सहालापनं
तासामर्भकलालनं पतिनुतिस्तत्पाकमिथ्यास्तुतिः ।
आदेश्यस्य करावलम्बनविधि: पांडित्यलेखक्रिया
होरागारुडमंत्रतंत्रकविधिपाखंडोब्राह्मणोंर्गुणा द्वादश ॥ -- सुभाषित रत्नावली - ३
पाखण्डी ब्राह्मण के बारह गुण हैं- (सब को अपना संस्कृत ज्ञान दिखाने के लिए) बड़े बड़े आवाज़ से पाठ करना ; (केवल) पुराण की कथाओं का पारायण करना (क्योंकि उसे वेदों का ज्ञान नहीं है) ; स्त्रियों के देख कर (उनके सामने अपनी विद्वत्ता प्रदर्शित करने) उनके साथ वार्तालाप करना ; स्त्रियों के पति की मिथ्या प्रशंसा करना (अर्थात किसी भी व्यक्ति के सामने लाचार हो जाना) ; (ऐसी स्त्रियों को प्रभावित करने) उनके बालकों को संभालना ; स्त्रियों की रसोई की मिथ्या प्रशंसा करना ; (शास्त्रीय मान्यता हो या ना हो केवल यजमान की इच्छा से और उसके द्वारा पैसा कमाने के लिए) अनावश्यक विधियों का चयन करना (अर्थात यजमान को मुर्ख बनाना) ; (अनावश्यक) लेखनकार्य में पंडिताई का दर्शन करना ; गारुड़ीविद्या, मन्त्र, तन्त्र, कविता इत्यादि में ही रममाण होना (केवल उसमे ही विद्वत्ता हासिल करना) ।
  • कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड ।
दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड॥ -- रामचरितमानस
राम के गुणों के समूह कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल और कलियुग के कपट, दंभ और पाखंड को जलाने के लिए वैसे ही हैं, जैसे ईंधन के लिए प्रचंड अग्नि॥
  • हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ॥ -- रामचरितमानस
भावार्थ:-पृथ्वी घास से परिपूर्ण होकर हरी हो गई है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते। जैसे पाखंड मत के प्रचार से सद्ग्रंथ गुप्त (लुप्त) हो जाते हैं॥
  • आओ, मनुष्य बनो! उन पाखंडी पुरोहितों को, जो सदैव उन्नत्ति के मार्ग में बाधक होते हैं, ठोकरें मार कर निकाल दो, क्योंकि उनका सुधार कभी न होगा, उनके हृदय कभी विशाल न होंगे। उनकी उत्पत्ति तो सैकड़ों वर्षों के अंधविश्वासों और अत्याचारों के फलस्वरूप हुई है। पहले पुरोहिती पाखंड को जड-मूल से निकाल फेंको। -- स्वामी विवेकानन्द
  • कृषि के बाद, पाखण्ड हमारे युग का सबसे बड़ा उद्योग है। -- अल्फ्रेड नोबेल
  • पाखण्ड मुंह कि दुर्गन्ध कि तरह होता है, अपने को पाता नहीं चलता और दूसरों कि बुरी लगती है।