श्रीराम शर्मा

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श्रीराम शर्मा (२० सितम्बर १९११ - ०२ जून १९९०) भारत के एक युगदृष्टा मनीषी थे जिन्होने अखिल भारतीय गायत्री परिवार की स्थापना की। उनने अपना जीवन समाज की भलाई तथा सांस्कृतिक व चारित्रिक उत्थान के लिये समर्पित कर दिया।

गायत्री मंत्र पर[सम्पादन]

  • जिस भी मनुष्य ने गायत्री और यज्ञ को जीवन में उतार दिया। उसका जीवन सफल है।
  • गायत्री मंत्र इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली मंत्र हैं।
  • जब भी थकान, मुसीबत में फँस गये हो, स्वर या मन में जप शुरू कर दो। उस समस्या का समाधान तुरन्त हो जायेगा।
  • भोजन बनाते समय, आटा गूँथते समय गायत्री मंत्र जप करने से वह भोजन अमृत बन जाता हैं वह भोजन पोषित हो जाता हैं।
  • लगातार एक माला गायत्री मंत्र जप प्रतिदिन करने से गलत कामो से ध्यान हटता हैं। शरीर को अत्यधिक खुशी मिलती हैं।
  • लगातार 12 साल, एक माला गायत्री मंत्र जप प्रतिदिन करने से, उससे प्राप्त उर्जा और शक्ति को अपने अच्छे कर्म में लगाकर सिद्धि प्राप्त की जा सकती हैं। अपने लक्ष्य में सफलता प्राप्त की जा सकती है।
  • भारत के सभी महापुरुष, भगवान राम, कृष्ण, सभी ऋषि-मुनियों ने, अवतारी पुरुषो ने गायत्री मंत्र का जप किया है।

मनुष्य-जीवन पर[सम्पादन]

  • जीवन का अर्थ है, समय। जो जीवन से अधिक प्यार करते हों, वे व्यर्थ में एक क्षण न गवाएँ।
  • यदि विचार बदल जाएँगें तो कार्यों का बदलना सुनिश्चित है। कार्य बदलने पर भी विचारों का न बदलना सम्भव है, पर विचार बदल जाने पर उनसे विपरीत कार्य देर तक नहीं होते रह सकते। विचार बीज हैं, कार्य अंंकुर..विचार पिता हैं, कार्य पुत्र। इसलिए जीवन परिवर्तन का कार्य विचार परिवर्तन से आरम्भ होता है। जीवन-निर्माण का, आत्म-निर्माण का अर्थ है—‘विचार-निर्माण’।
  • युग निर्माण का सत्संकल्प नित्य दुहराना चाहिए। मानव-जीवन का आदर्श, कर्तव्य, धर्म और सदाचार का इस संकल्प मंत्र में भावनापूर्वक समावेश हुआ है। इसका पाठ करना किसी धर्म ग्रन्थ के पाठ से कम प्रेरणा और पुण्यफल प्रदान करने वाला नहीं है।
  • मनुष्य को सफल बनने के लिए पहले अपने विचारों को बदलना पड़ेगा।
  • मनुष्य जन्म सिर्फ पेट भरने और बच्चा पैदा करने के लिए नही हुआ है।
  • असफलता का मतलब है कि जितना अभ्यास, मेहनत और समय आपको उस काम को देना था, उतना काम आपने नहीं किया।
  • सादा जीवन : उच्च विचार ।
  • मनुष्य अपने भाग्य निर्माता स्वंय हैं।
  • अगर किसी को उपहार देना ही है तो हिम्मत और आत्मविश्वास बढ़ाने वाला उपहार दो।
  • मनुष्य की पहचान उसके सत्कर्मो और अच्छे विचारों से होगी।
  • नर-नारी में कोई भेदभाव नही करेंगे।
  • एक स्वस्थ युवा ही सबल राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।
  • नशा मनुष्य और समाज दोनों को बर्बाद के देता है।
  • मेरा स्मारक बनाने के बदले जीवन में एक पेड़ लगा देना।
  • हर गाँव आदर्श गांव हो, हर आदमी आत्मनिर्भर बने।
  • प्रतिदिन एक घंटा श्रमदान जरूर करें।
  • गपशप नही करे। जप-तप करें।
  • अगर व्यक्ति जीभ और कामुकता पर नियंत्रण कर लें, तो उसकी नब्बे प्रतिशत समस्याएँ स्वतः खत्म हो जायेंगी।

स्वास्थ्य पर[सम्पादन]

  • भूख से कम भोजन खाये । मतलब रोज चार रोटी खाते हो तो तीन ही खाये। क्योंकि ज्यादा भोजन करने से शक्ति नहीं मिलती हैं। जो भोजन अच्छी तरह पच कर रस बन जाता है, वही काम आता है।
  • प्राकृतिक चिकित्सा शरीर का कायाकल्प करने के लिए सबसे अच्छी चिकित्सा हैं। आप गायत्री परिवार की शक्तिपीठ ग्राम आँवलखेड़ा पर कम कीमत में करवा सकते हैं। खाना-पीना, रहना और भोजन मुफ्त हैं।
  • मनुष्य के लिए अस्वाद भोजन ही सर्वश्रेष्ठ है। अस्वाद भोजन का मतलब बिना नमक, मिर्ची, शक्कर के बना भोजन।
  • कोई भी खाने की चीज खाने के बाद कुल्ला अवश्य करें। इससे आपके दाँत 100 साल तक टिके रहेंगे।
  • आसनों और प्राणायाम का सुंदर योग आसन "प्रज्ञायोग" जरूर करें।
  • आसन-प्राणायाम करने से हमारा शरीर हिलता-डुलता हैं जिससे शरीर में जमा सारी गंदगी कफ, सांस, और मल-मूत्र के द्वार से बाहर निकल जाती है।
  • कहते हैं, योगी प्राणायाम से अपने मृत्यु को वश में कर देते हैं और जब तक चाहे, वो जिंदगी जी सकते हैं। प्राणायाम से शरीर की प्राण ऊर्जा बढ़ती हैं।
  • अगर भारत के लोग बाहर शौच करने जाते, समय साथ में खुरपी ( गड्ढा खोदने का औजार ) भी लेकर जांय, और गड्ढा खोदकर उसमें मल त्यागें। इससे बहुत सारी बीमारियों से भी बचा जा सकता हैं। वह मल भी खाद में बदल जाता हैं।
  • जो लाभ गाय का घी खाने से मिलते हैं वही लाभ गाय के घी का दीपक जलाकर प्राणायाम करने से मिलते हैं।
  • संसार के सभी जीव-जन्तु , पशु-पक्षी अपना भोजन बिना मिलावट खाते हैं।
  • यज्ञ इस पृथ्वी का सर्वश्रेष्ठ कर्म है क्योंकि इस से सभी को लाभ मिलता हैं।
  • हमेशा पंचगव्य से निर्मित नहाने का साबुन इस्तेमाल करें।
  • नियमित रूप से शुद्ध सरसो के तेल से पुरे शरीर पर मालिश करने से आँखों की दृष्टि तेज होती है। सभी अंग पुष्ट होते हैं।
  • भोजन करने से पहले तीन बार गायत्री मंत्र का जप जरूर करे।
  • आत्मबोध की साधना और तत्त्वबोध की साधना जरूर करें। मतलब हर दिन जन्म और हर दिन मृत्यु।
  • ऐसा कोई भी खाद्य-पर्दाथ जिस पर मख्खी बैठ गई है, वह खाना फेंक दो या बाहर जानवरों को खिला दो क्योंकि मख्खी को 'रोग की अम्मा' कहा जाता हैं।

विविध विषयों पर[सम्पादन]

  • युग निर्माण योजना का प्रधान उद्देश्य है - विचार क्रान्ति । मूढ़ता और रूढ़ियों से ग्रस्त अनुपयोगी विचारों का ही आज सर्वत्र प्राधान्य है ।। आवश्यकता इस बात की है कि (१) सत्य (२) प्रेम (३) न्याय पर आधारित विवेक और तर्क से प्रभावित हमारी विचार पद्धति हो । प्रकारान्तर से यही है, महान् परिवर्तन प्रस्तुत कर सकने वाली विचार क्रान्ति की रूप-रेखा। लोक-मानस के परिष्कार नाम से भी इसी का उल्लेख होता है। अवांछनीय मान्यताओं, गतिविधियों की रोक-थाम के लिए यह अनिवार्य रूप से आवश्यक है।
  • पिछले दिनों जब हमारे देश के नागरिकों की विचारणा का स्तर बहुत ऊँचा था, तब शिक्षा के माध्यम से और अन्य वातावरणों के माध्यम से, धर्म और अध्यात्म के माध्यम से यह प्रयत्न किया जाता था कि आदमी ऊँचे किस्म का सोचने वाला हो एवं उसके विचार, उसकी इच्छा, आकांक्षा और महत्त्वाकांक्षाएँ नीच श्रेणी के जानवरों जैसी न होकर महापुरुषों जैसी हों। जब ये प्रयास किए जाते थे तो अपना देश कितना ऊँचा था! यहाँ के नागरिक देवताओं की श्रेणी में गिने जाते थे और यह राष्ट्र दुनिया के लोगों की आँखों में स्वर्ग जैसा दिखाई पड़ता था। इस महानता और विशेषता को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए धर्म और अध्यात्म का सारा ढाँचा खड़ा किया गया है।
  • विचार शक्ति को एक जीवित जादू कहा जा सकता है। उसके स्पष्ट होने से निर्जीव मिट्टी नयनाभिराम खिलौने के रूप में और प्राणघातक विष जीवनदायी रसायन के रूप से बदल जाता है।
  • यों संसार में शारीरिक, सामाजिक, राजनीतिक और सैनिक- बहुत सी शक्तियाँ विद्यमान हैं। किन्तु इन सब शक्तियों से भी बढ़कर एक शक्ति है, जिसे विचार- शक्ति कहते हैं। वह सर्वोपरि है। उसका एक मोटा सा कारण तो यह है कि विचार-शक्ति निराकार और सूक्ष्मातिसूक्ष्म होती है और अन्य शक्तियाँ स्थूलतर। स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म में अनेक गुना शक्ति अधिक होती है।
  • विचारों का तेज ही आपको ओजस्वी बनाता है और जीवन संग्राम में एक कुशल योद्धा की भाँति विजय भी दिलाता है। इसके विपरीत आपके मुर्दा विचार आपको जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में पराजित करके जीवित मृत्यु के अभिशाप के हवाले कर देंगे। जिसके विचार प्रबुद्ध हैं उसकी आत्मा प्रबुद्ध है और जिसकी आत्मा प्रबुद्ध है उससे परमात्मा दूर नहीं है।
  • विचारों को जाग्रत कीजिये, उन्हें परिष्कृत कीजिये और जीवन के हर क्षेत्र में पुरस्कृत होकर देवताओं के तुल्य ही जीवन व्यतीत करिये। विचारों की पवित्रता से ही मनुष्य का जीवन उज्ज्वल एवं उन्नत बनता है इसके अतिरिक्त जीवन को सफल बनाने का कोई उपाय मनुष्य के पास नहीं है। सद्विचारों की सृजनात्मक शक्ति से बड़ी शक्ति और क्या होगी?
  • हमारे विचार बड़े पैने हैं, तीखे हैं। हमारी सारी शक्ति हमारे विचारों में समाहित है। दुनिया को हम पलट देने का जो दावा करते हैं, वह सिद्धियों से नहीं, अपने सशक्त विचारों से करते हैं। आप इन विचारों को फैलाने में हमारी सहायता कीजिए।
  • हमारा जीवन मंदिरों के लिए नहीं है, न आपका जीवन मंदिरों के लिए होना चाहिए। आपका जीवन एक काम के लिए होना चाहिए, विचारों के लिए। विचार क्रांति के लिए।
  • हम व्यक्ति के रुप में कब से खत्म हो गए। हम एक व्यक्ति हैं? नहीं हैं। हम कोई व्यक्ति नहीं हैं। हम एक सिद्धांत हैं, आदर्श हैं, हम एक दिशा हैं, हम एक प्रेरणा हैं।
  • आप बोना-काटना शुरु कीजिए। अगर आप बोएगें नहीं तो पैदा नहीं होगा।
  • बच्चों से क्या माँगना?माँगना है यह है कि जहाँ खजाना भरा पड़ा है, जहां शक्तियों के भंडार भरे पड़े हैं वहाँ खेत में बोना शुरू करें। धीरज रखें, समय लगाएँ, नियमितता-निरंतरता का ध्यान रखें।
  • यह विचारणा के चमत्कार है, विचार पद्धति के चमत्कार हैं। विचार पद्धति को बदल देने की वजह से ऋषि, ऋषि हो गए थे।
  • अच्छे विचार ही मनुष्य को सफलता और जीवन देते हैं ।
  • किसी का भी अमंगल चाहने पर स्वयं पहले अपना अमंगल होता है ।
  • जूठन छोड़ कर अन्न भगवान का तिरस्कार ना करें ।
  • अपनी प्रशंसा पर गर्वित होना ही चापलूसी को प्रोत्साहन देना है ।
  • बलिदान वही कर सकता है, जो शुद्ध है, निर्भय है और योग्य है ।
  • बाज़ार में वस्तुओं की कीमत दूसरे लोग निर्धारित करते हैं, पर मनुष्य अपना मूल्यांकन स्वयं करता है और वह अपना जितना मूल्यांकन करता है उससे अधिक सफलता उसे कदपित नहीं मिल पाती ।
  • अपने व्यक्तित्व को सुसंस्कारित एवं चरित्र को परिष्कृत बनाने वाले साधक को गायत्री महाशक्ति मातृवत् संरक्षण प्रदान करती है ।
  • ब्रह्ममुहूर्त में गायत्री पाठ करने से चित शुद्ध होता है, हृदय में निर्मलता आती है और शरीर निरोग रहता है ।
  • डरना केवल दो से चाहिए, एक ईश्वर के न्याय से और दूसरे पाप अनाचार से ।
  • दूसरों की परिस्तिथि में हम अपने को रखें, अपनी परिस्थिति में दूसरों को रखें और फिर विचार करें की इस स्तिथि में क्या सोचना और करना उचित है? ।
  • प्रत्येक व्यक्ति जो आगे बढ़ने की आकांक्षा रखते हैं , उन्हें यह मानकर चलना चाहिए परमात्मा ने उसे मनुष्य के रूप में इस पृथ्वी पर भेजते समय उसकी चेतना में समस्त संभावनाओं के बीज डाल दिये हैं ।
  • बुद्धि को निर्मल, पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने का महामंत्र है – गायत्री मंत्र ।
  • अपनी रोटी मिल- बाँटकर खाओ, ताकि तुम्हारे सभी भाई सुखी रह सकें ।
  • आशावादी हर कठिनाई में अवसर देखता है, पर निराशावादी प्रत्येक अवसर में कठिनाई ही खोजता है ।
  • व्यभिचार के, चोरी के, अनीति बरतने के, क्रोध एवं प्रतिशोध के, ठगने एवं दंभ, पाखंड बनाने के कुविचार यदि मन में भरे रहें तो मानसिक स्वास्थ्य का नाश ही होने वाला है ।
  • अपनी गलतियों को ढूँढना, अपनी बुरी आदतों को समझना, अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं को अनुभव करना और उन्हें सुधारने के लिए निरन्तर संघर्ष करते रहना यही जीवन संग्राम है ।
  • अपनी छोटी – मोटी भूलों के बारे में हम यही आशा करते हैं कि लोग उन पर बहुत ध्यान न देंगे, ‘क्षमा करो और भूल जाओ’ की नीति अपनावे तो फिर हमे भी उतनी ही उदारता मन में क्यों नहीं रखनी चाहिये ।
  • गायत्री को इष्ट मानने का अर्थ है – सत्प्रवृति की सर्वोत्कृष्टता पर आस्था ।
  • सच्चा ज्ञान वह है, जो हमारे गुण , कर्म, स्वभाव की त्रुटियाँ सुझाने, अच्छाईयाँ बढ़ाने एवं आत्म – निर्माण की प्रेरणा प्रस्तुत करता है ।
  • बाहरी शत्रु उतनी हानि नहीं कर सकते, जितनी अंतः शत्रु करते हैं ।
  • आत्मिक समाधान के लिए कुछ क्षड़ ही पर्याप्त होते हैं ।
  • जल्दी सोना , जल्दी उठना शरीर और मन की स्वस्थता को बढ़ाता है ।
  • तृष्णा नष्ट होने के साथ ही विपत्तियाँ भी नष्ट होती हैं”

  • चरित्र के उत्थान एवं आत्मिक शक्तियों के उत्थान के लिए इन तीनों सद्गुणों-होशियारी, सज्जनता और सहनशीलता का विकास अनिवार्य है।
  • अपना धर्म, अपनी संस्कृति अथवा अपनी सभ्यता छोड़कर दूसरों की नक़ल करने से कल्याण की संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं।
  • विचारों के अन्दर बहुत बड़ी शक्ति होती है। विचार आदमी को गिरा सकतें है और विचार ही आदमी को उठा सकतें है, आदमी कुछ नहीं हैं।
  • जीवन में दो ही व्यक्ति असफल होते हैं, एक वे जो सोचते हैं पर करते नहीं, दूसरे जो करते हैं पर सोचते नहीं।
  • यदि आप अपने दैनिक जीवन और व्यवहार में निरन्तर जागरुक, सावधान रहें, छोटी छोटी बातों का ध्यान रखें, सतर्क रहें, तो आप अपने निश्चित ध्येय की प्राप्ति में निरन्तर अग्रसर हो सकते हैं। सतर्क मनुष्य कभी गलती नहीं करता, असावधान नहीं रहता और कोई उसे दबा नहीं सकता।
  • कुविचारों और दुर्भावनाओं के समाधान के लिए स्वाध्याय, सत्संग, मनन और चिन्तन यह चार ही उपाय हैं।
  • आशावादी हर कठिनाई में अवसर देखता है पर निराशावादी प्रत्येक अवसर में कठिनाई ही खोजता है।
  • सज्जनता एक ऐसा दैवी गुण है जिसका मानव समाज में सर्वत्र आदर होता है। सज्जन पुरुष वन्दनीय है। वह जीवन पर्यंत पूजनीय होता है। उसके चरित्र की सफाई, मृदुल व्यवहार, एवं पवित्रता उसे उत्तम मार्ग पर चलाती हैं।
  • जल्दी सोना, जल्दी उठना शरीर और मन की स्वस्थता को बढ़ाता है।
  • सहनशीलता दैवी सम्पदा में सम्मिलित है। सहन करना कोई हँसी खेल नहीं प्रत्युत बड़े साहस और वीरता का काम है केवल महान आत्माएँ ही सहनशील होकर अपने मार्ग पर निरन्तर अग्रसर हो सकती हैं।
  • विनम्र रहिये, क्योंकि आप इस महान संसार की वस्तुतः एक बहुत छोटी इकाई हैं। शील दरिद्रता का, दान दुर्गति का, बुद्धि अज्ञान का और भक्ति भय का नाश करती है।
  • इस संसार में प्यार करने लायक़ दो वस्तुएँ हैं-एक दुख और दूसरा श्रम। दुख के बिना हृदय निर्मल नहीं होता और श्रम के बिना मनुष्यत्व का विकास नहीं होता।
  • संपदा को जोड़-जोड़ कर रखने वाले को भला क्या पता कि दान में कितनी मिठास है।
  • मानसिक बीमारियों से बचने का एक ही उपाय है कि हृदय को घृणा से और मन को भय व चिन्ता से मुक्त रखा जाय।
  • मनुष्य कुछ और नहीं, भटका हुआ देवता है।
  • असफलता यह बताती है कि सफलता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं किया गया।
  • शारीरिक गुलामी से बौद्धिक गुलामी अधिक भयंकर है।
  • जीवन में सफलता पाने के लिए, आत्म विश्वास उतना ही ज़रूरी है, जितना जीने के लिए भोजन।
  • अपनी गलतियों को ढूँढना, अपनी बुरी आदतों को समझना, अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं को अनुभव करना और उन्हें सुधारने के लिए निरन्तर संघर्ष करते रहना यही जीवन संग्राम है।
  • कोई भी सफलता बिना आत्मा विश्वास के मिलना असंभव है।
  • जैसी जनता, वैसा राजा। प्रजातन्त्र का यही तकाजा।
  • सच्चा ज्ञान वह है, जो हमारे गुण, कर्म, स्वभाव की त्रुटियाँ सुझाने, अच्छाईयाँ बढ़ाने एवं आत्म निर्माण की प्रेरणा प्रस्तुत करता है।
  • राग और द्वेष, स्वार्थ और कुसंगत के जन्मदाता है
  • केवल वे ही असंभव कार्य को कर सकते हैं जो अदृष्य को भी देख लेते हैं।
  • मनुष्य की वास्तविक पूँजी धन नहीं, विचार हैं।
  • प्रज्ञा-युग के चार आधार होंगे – समझदारी, इमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी।
  • मनःस्थिति बदले, तब परिस्थिति बदले।
  • संकट या तो मनुष्य को तोड़ देते हैं या उसे चट्टान जैसा मज़बूत बना देते हैं।
  • रचनात्मक कार्यों से देश समर्थ बनेगा।
  • संसार का सबसे बडा दिवालिया वह है जिसने उत्साह खो दिया।
  • समाज के हित में अपना हित है।
  • पुण्यों में सबसे बड़ा पुण्य, परोपकार है।
  • सुख में गर्व न करें, दुःख में धैर्य न छोड़ें।
  • उसी धर्म का अब उत्थान, जिसका सहयोगी विज्ञान।
  • मानव के कार्य ही उसके विचारों की सर्व श्रेष्ठ व्याख्या है।
  • बड़प्पन अमीरी में नहीं, ईमानदारी और सज्जनता में सन्निहित है।
  • धर्म से आध्यात्मिक जीवन विकसित होता है और जीवन में समृद्धि का उदय होता है।
  • जो बच्चों को सिखाते हैं, उन पर बड़े खुद अमल करें तो यह संसार स्वर्ग बन जाय।
  • आलस्य से बढ़कर अधिक घातक और अधिक समीपवर्ती शत्रु दूसरा नहीं।
  • विनय अपयश का नाश करता हैं, पराक्रम अनर्थ को दूर करता है, क्षमा सदा ही क्रोध का नाश करती है और सदाचार कुलक्षण का अंत करता है।
  • जब तक व्यक्ति असत्य को ही सत्य समझता रहता है, तब तक उसके मन में सत्य को जानने की जिज्ञासा उत्पन्न नहीं होती है।
  • बुद्धि को निर्मल, पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने का महामंत्र है गायत्री मंत्र।
  • अवसर तो सभी को जिन्दगी में मिलते हैं, किंतु उनका सही वक्त पर सही तरीके से इस्तेमाल कुछ ही कर पाते हैं।
  • किसी का भी अमंगल चाहने पर स्वयं पहले अपना अमंगल होता है।
  • आत्मा की आवाज़ को जो सुनता है। सत्य मार्ग पर सदा ही चलता है।
  • दूसरों की परिस्तिथि में हम अपने को रखें, अपनी परिस्थिति में दूसरों को रखें और फिर विचार करें की इस स्तिथि में क्या सोचना और करना उचित है ?
  • सारी दुनिया का ज्ञान प्राप्त करके भी जो स्वयं को नहीं जानता उसका सारा ज्ञान ही निरर्थक है।
  • जो शिक्षा मनुष्य को धूर्त, परावलम्बी और अहंकारी बनाती हो वह अशिक्षा से भी बुरी है।
  • हमारी शिक्षा तब तक अपूर्ण रहेगी, जब तक उसमें धार्मिक विचारों का समावेश नहीं किया जाएगा।
  • मुस्कुराने की कला दुखों को आधा कर देती है।

  • जिस समाज में लोग एक दूसरे के दु:ख-दर्द में सम्मिलित रहते हैं, सुख संपत्ति को बाँटकर रखते हैं और परस्पर स्नेह, सौजन्य का परिचय देते हुये स्वयं कष्ट सहकर दूसरों को सुखी बनाने का प्रयत्न करते हैं, उसे देव-समाज कहते हैं। जब जहाँ जनसमूह इस प्रकार पारस्परिक सम्बन्ध बनाये रखता है तब वहाँ स्वर्गीय परिस्थितियां बनी रहती हैं।
  • पाप, दुराचार, अनीति, छल एवं अपराधों की प्रवृत्तियां जहाँ पनप रही होंगी वहाँ प्रगति का मार्ग रुक जाएगा और पतन की व्यापक परिस्थितियाँ उत्पन्न होने लगेगी। मनुष्य की वास्तविक प्रगति एवं शांति तो पारस्परिक स्नेह, सौजन्य एवं सहयोग पर निर्भर रहती है, यदि वह प्राप्त न हो सके तो विपुल साधन सामग्री पाकर भी सुख-शान्ति के दुर्लभ ही रहेंगे।
  • अच्छे व्यक्तित्व अच्छे समाज में ही जन्मते, पनपे और फलते-फूलते हैं। जिस समाज का वातावरण दूषित तत्वों से भरा हुआ रहता है, उसकी अगली पीढ़ियाँ क्रमशः अधिक दुर्बल एवं पतित बनती चली जाती है। धन कमाने, पद प्राप्त करने या चातुर्य दिखाने में कोई व्यक्ति सफल हो जाये तो भी यदि वह भावना और कर्तृत्व की दृष्टि से गिरा हुआ है तो उसे सामाजिक दृष्टि से अवांछनीय व्यक्ति ही माना जाएगा। उसकी सफलतायें उसके लिए सुविधाजनक हो सकती हैं, पर उनसे देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति का कुछ भी भला नहीं हो सकता।
  • नम्रता, सज्जनता, कृतज्ञता, नागरिकता एवं कर्तव्य परायणता की भावना से ही किसी का मन ओत-प्रोत रहे ऐसे पारस्परिक व्यवहार का प्रचलन हमें करना चाहिए। दूसरों के दु:ख सुख सब लोग अपना दु:ख-सुख समझें और एक दूसरे की सहायता के लिए तत्परता प्रदर्शित करते हुए संतोष अनुभव करें, ऐसा जनमानस निर्माण किया जाना चाहिए। जिस समाज में मनुष्य की महत्ता का मूल्यांकन धन के आधार पर होता है, वह कभी उच्चस्तरीय प्रगति करने कर सकने में समर्थ नहीं हो सकता।
  • समाज के निर्माण के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि अपने अपने परिवार के नव-निर्माण कार्य में प्रत्येक ग्रहस्थ पूरी रुचि लेने लगे। समाज की नवरचना दंपत्ति जीवन को परिष्कृत करने से होगी। इस प्रकार आत्मनिर्माण की प्रक्रिया आरंभ करके परिवार, समाज एवं आगामी पीढ़ी को सुसंस्कृत, समुन्नत बना सकना संभव होगा, यह विचार हमें जन-मानस में भली प्रकार हृदयंगम करा देना चाहिए। समाज के नव=निर्माण का मूल आधार यही है।
  • समय की पाबंदी, वचन का पालन, पैसे का विवेकपूर्ण सद्व्यय, सज्जनता और सहिष्णुता, श्रम का सम्मान, शिष्टाचार पूर्ण व्यवहार, ईमानदारी की कमाई, अनैतिकता से घृणा, प्रसन्नतापूर्ण मुखाकृति, आहार और विहार का संयम, समूह के हित में स्वार्थ का परित्याग, न्याय और विवेक का सम्मान, स्वच्छता और सादगी की यह हमारे सामाजिक गुण होने चाहिये।
  • सभ्य समाज वह है जिसमें हर नागरिक को अपना व्यक्तित्व विकसित करने एवं प्रगति पथ पर बढ़ने के लिए समान रूप से अवसर मिले। इस मार्ग में जितनी भी बाधायें हो उन्हें हटाया जाना चाहिए। हमें सामाजिक न्याय का ऐसा प्रबंध करना होगा कि हर व्यक्ति निर्बाध गति से प्रगति का समान अवसर प्राप्त कर सके।
  • जब श्रेष्ठ व्यक्ति घट जाते हैं और सामाजिक वातावरण में उत्कृष्टता बनाये रखने के रचनात्मक प्रयास शिथिल हो जाते हैं तो समाज का स्तर गिर जाता है। समाज गिरेगा तो उस काल के व्यक्ति भी निकृष्ट, अधःपतित और दीन दुर्बल बनते चले जायेंगे। अच्छा समाज- अच्छे व्यक्ति उत्पन्न करता है और अच्छे व्यक्ति अच्छा समाज बनाते हैं। दोनों अन्योन्याश्रित हैं।
  • अच्छे व्यक्तियों की आवश्यकता हो तो अच्छा समाज बनाने के लिए जुटना चाहिये । अच्छा समाज बनाने पर ही श्रेष्ठ व्यक्तित्व की आवश्यकता पूरी होगी। सुख साधनों का अभिवर्धन और समुन्नत लोक-व्यवहार का प्रचलन ही सर्वतोमुखी सुख-शान्ति की आवश्यकता पूरी करता है और इस प्रकार का उत्पादन प्रखर प्रतिभासंपन्न सुसंस्कृत व्यक्ति ही कर सकने में समर्थ होते हैं।
  • समाज में यदि अनैतिक, अवांछनीय, आपराधिक तत्व भरे पड़े हैं तो उन की हलचलें, हरकतें- किसी संत, सज्जन की उत्कृष्टता को सुरक्षित नहीं रहने दे सकती। विकृत समाज में असीम विकृतियाँ उत्पन्न होती है और अनेक प्रकार के विग्रह उत्पन्न करती है। उनकी लपेट में आये बिना कोई नीतिवान व्यक्ति भी रह नहीं सकता।
  • व्यक्ति-निर्माण और परिवार-निर्माण की तरह ही समाज-निर्माण भी हमारे अत्यंत आवश्यक दैनिक कार्यक्रमों का अंग माना जाना चाहिए। अपने लिए हम जितना श्रम, समय, मनोयोग एवं धन खर्च करते हैं, उतना ही समाज को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए लगाना चाहिए। यह परोपकार परमार्थ की दृष्टि से ही नहीं विशुद्ध स्वार्थ-साधन और सुरक्षा की दृष्टि से भी आवश्यक है। भारतीय संस्कृति की सुनिश्चित परंपरा है कि वैयक्तिक और पारिवारिक प्रयोजनों के लिए किसी को भी आधे से अधिक समय एवं मनोयोग नहीं लगाना चाहिये।
  • राष्ट्रीय दृष्टि से स्वार्थपरता, व्यक्तिवाद, असहयोग, संकीर्णता हमारा एक प्रमुख दोष है। सारी दुनिया परस्पर सहयोग के आधार पर आगे बढ़ रही है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, वह परस्पर सहयोग के आधार पर ही बढ़ा और समुन्नत हुआ है। जहाँ प्रेम, ममता, एकता, आत्मीयता, सहयोग और उदारता है वहीँ स्वर्ग रहेगा।
  • धर्म और अध्यात्म की शिक्षा भी यही है कि व्यक्ति अपने लिये धन,वैभव जमा न करके अपनी प्रतिभा, बुद्धि, क्षमता और संपदा को जीवन निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकता के लिए ही उपयोग करें और शेष जो कुछ बचता हो सबको सामूहिक उत्थान में लगा दें। जिस समाज में ऐसे परमार्थी लोग होंगे वही फलेगा, फूलेगा और वही सुखी रहेगा।
  • विचार-क्रांति किए बिना समाज-निर्माण की आधारशिला नहीं रखी जा सकेगी। ज्ञान-यज्ञ के बिना सुख-शान्ति एवं प्रगति की सर्वतोमुखी संभावनायें प्रस्तुत कर सकने वाले नवयुग का अवतरण नहीं हो सकेगा। हमें हनुमान आदि की तरह- पांडवों की तरह-धर्म की स्थापना कर सकने वाले अधर्म-विरोधी अभियान में अपने आप को झोकना चाहिए। सभ्य समाज की रचना के लिए कुरीतियों और अनैतिकताओं के दोहरे मोर्चे पर लड़ा जाना आवश्यक है।
  • अनाचार प्रायः हर क्षेत्र में अपनी जड़ें गहरी करता चला जा रहा है। इसके खतरों से जन-साधारण को सचेत किया जाना चाहिए। लोकमानस में अवांछनीयता के प्रति विरोध, असहयोग एवं विद्रोह की भावनायें जगाई जानी चाहिए। कुड़कुड़ाते रहने की अपेक्षा अनीति से जूझने की संघर्षात्मक चेतना उभारी जानी चाहिये और उसका सजीव मार्गदर्शन हमें आगे बढ़कर करना चाहिए।
  • कम से कम इतना तो संघर्ष हर मोर्चे पर हम में से हर किसी को करना चाहिये कि अनीति एवं अनौचित्य के साथ कोई संबंध न रखें- समर्थन न करें- सहयोग न दें। उससे पूरी तरह अलग रहें और समय-समय पर अपने असहयोग एवं विरोध को व्यक्त करते रहें। जहाँ, जो संभव हो अनीति के विरुद्ध मोर्चा बनाया ही जाना चाहिए। ताकि आततायी, अनाचारियों को निर्भय होकर कुछ भी करते रहने की छूट न मिले।
  • समाज में पनपने वाली दुष्प्रवृत्तियों को रोकना, केवल सरकार का ही काम नहीं है वरन उसका पूरा उत्तरदायित्व सभ्य नागरिकों पर है। प्रबुद्ध और मनस्वी लोग जिस बुराई के विरुद्ध आवाज उठाते हैं वह आज नहीं तो कल मिटकर रहती है।
  • सामाजिक कुरीतियों और सामूहिक दुष्प्रवृत्तियों का कायम रहना सज्जनों के भीविपत्ति का कारण ही रहेगा। व्यक्ति कितनी ही उन्नति कर ले, पतित वातावरण में यह उन्नति भी बालू की दिवार की तरह अस्थिर रहेगी। जैसे हमें जितनी व्यक्तिगत उन्नति की चिंता है उतना ही सामाजिक उन्नति का भी ध्यान रखना होगा और इसके लिए हर सम्भव प्रयत्न करना होगा। इस दिशा में की हुई उपेक्षा हमारे अपने लिये ही घातक होगी।
  • हमारी सामाजिक क्रांति का अर्थ देश में प्रचलित कुरीतियों को हटा देने मात्र तक सीमित नहीं रहना चाहिए, वरन एक सभ्य, सुरक्षित एवं सुसंस्कृत समाज की रचना होनी चाहिये। सज्जनता को जन-मानस का सहज स्वभाव बनाया जा सका तो आज की भयंकर दिखाई देने वाली कुरीतियाँ अनायास ही नष्ट हो जायेगी।

इन्हें भी देखें[सम्पादन]

बाह्य सूत्र[सम्पादन]

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