गायत्री मंत्र

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गायत्री मंत्र व उसका अर्थ[सम्पादन]

'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।'

(ऋग्वेद ३.६२.१० यजुर्वेद ३.३५,२२.९,३०.२,३६.३ सामवेद १४६२)

भावार्थः-हम उस अविनाशी ईश्वर का ध्यान करते है, जो भूलोक,अंतरिक्ष ,और स्वर्ग लोकोंका का उत्पन्न किया है,उस सृष्टी कर्ता ,पापनाशक,अतिश्रेष्ठ देव को हम धारण करते है – वह (ईश्वर) हमें सद्बुद्धी दें एवम सत्कर्म मे प्रेरित करे।

यह गायत्री मंत्र ऋग्वेद यजुर्वेद और सामवेद में प्रस्तुत है।  एक ईश्वर का उपासना करना इसका मुख्य उद्देश्य है।  चार वेदो में से यह मंत्र सबसे प्रसिद्ध मंत्र है

हिंदी में अर्थ (विजय बहादुर चौहान) .....................#गायत्री_आसन

         जिस गायत्री मंत्र और उसके भावार्थ को हम गली नुक्कड़ से सुनते और पढ़ते आये हैं, वह भावार्थ इसके मूल शब्दों से बिल्कुल अलग है। वास्तव में यह मंत्र 'नव-योनि' तांत्रिक क्रियाओं में बोले जाने वाले मन्त्रों में से एक है। 
इसके प्रत्येक शब्द का गहराई से मंथन करें तो यह किसी भी दृष्टि से अध्यात्मिक अर्थ व सुख नहीं देता, बल्कि कथावाचक व प्रवचनकर्ता धर्माचार्यों द्वारा कन्याओं व महिलाओं को अपनी जांघों पर बिठाने व सहवास के लिए आह्वान (बुलाने) करने के लिए होता है।
          जब सावित्री को ब्रह्मा द्वारा उसके आगोश में आने के लिये बुलाया तो सावत्री ने उसकी आगोश में आलिंग होने से इंकार कर दिया..... तब ब्रह्मा ने गायत्री को अपनी जांघों पर बिठाने हेतु गायत्री को कामुक बातें सुना सूनाकर गुहार लगाई तो गायत्री  ब्रह्मा की जांघों पर आसीन हो गयी और ब्रह्मा का लिंग व गायत्री की योनिश्वरी एकाकार होकर एकालिंग हो गये और एक-दूसरे का मंथन (रगडने) करने लगे।
   गायत्री-मंत्र  निम्नानुसार कहा जाता है-

मंत्र - ॐ भू: भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं ! भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात् !!

 भाषाई दानिशवरों ( विद्वानों) द्वारा गायत्री मंत्र के प्रत्येक शब्दों के मूल भावार्थ का बखान (व्याख्या) निम्नलिखित कहे जाते हैं :-

ॐ भूर्भुवः (भुः भुवः), स्वः तत्सवितुर्वरेण्य (तत् सवित उर वरणयं), भर्गो=भार्गव/भृगु, देवस्य(देव स्य), धीमहि धियो योनः प्र चोद्यात (चोदयात)!!

ॐ =प्रणव, भूर = भूमि पर , भुवः = आसीन / निरापद हो जाना /लेट जाना [(भूर्भुवः=भुमि पर)], स्व= अपने आपको, तत्= उस, सवित= अग्नि के समान तेज, कान्तियुक्त की, उर=भुजाओं, जंघाओं में, वरण्यं = वरण करना, एक दूसरे के/ एकाकार हो जाना, एक-दूसरे में समा जाना, भर्गोः देवस्य=भार्गवर्षि/विप्र (ब्राहमण) के लिये, धीमहि= ध्यानस्थ होना /उसके साथ एक रूप होना | [ (धी =ध्यान करना),

(महि=धरा, धरती, धरणी, धारिणी के/से सम्बद्ध होना) धियो =उनके प्रति/मन ही मन मे ध्यान करना/मुग्ध हो जाना/ भाव आवेश क्षमता (ताकत) को तीव्रता से प्रेरित करना,

योनः= मादा जननांग, चूत, भौसडी, योनि, प्र= [उपसर्ग] दूसरों के / सन्मुख होना/ आगे करना या होना, समर्पित / समर्पण करना,

चोद्यात्= चोदयात चोदना, चोदया, चुदवाना, मैथुन / समागम / सन्सर्ग, सम्भोग सहवास हेतु।

सरलार्थ:- हे त्रीदेवी (गाय-त्री के समान)- भू पर आसीन होते (लेटते, बैठते) हुए , उस अग्निमय और कान्तियुक्त सवितदेव के समान तेज भृगु (ब्रह्मन-ब्राह्मन) की बाजुओं में एकाकार होकर मन ही मन में उन्ही के प्रति भावमय होकर उसको अपनी बाहों में धारण (भर) कर लो और पूर्ण क्षमता से अपनी योनि को संभोग/चुदवाने हेतु उसके लिंग को समर्पित कर दो...

      वैदिक-पौराणिक धर्म का मूल आधार सुरा - सुंदरी, सहवास सम्भोग, सामिष (मांसाहार) और शास्त्रार्थ है और तीन देवियों के समान गायत्री और गाय-त्री मन्त्र सम्भोग मन्त्र माना जाता है।
          गायत्री मंत्र को नव-योनि (कुवांरी कन्या की अक्षत योनि) मंत्र भी कहा जाता है। जिस अश्लील मंत्र को आज धर्माचार्य आचार्य ऋषि-मुनि-मनु व इनके पूत-पुत्र अपने आश्रम डेरे धाम मंदिरों में शुभ (फायदा लाभ) बताकर नाबालिग, जवान लड़कियों व शादीशुदा महिलाओं के वस्त्रहरण/चीरहरण कर उनका शीलहरण, योनिहरण (बलात्कार) करते हुए चरित्रहरण व ब्लैकमेल भी करते हैं।

Courtesy Rajesh Choudhary G ...........

विचार[सम्पादन]

  • गायत्री मंत्र का निरन्तर जप रोगियों को अच्छा करने और आत्माओं की उन्नति के लिए उपयोगी है। गायत्री का स्थिर चित्त और शान्त हृदय से किया हुआ जप आपत्तिकाल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है। - महात्मा गाँधी
  • सचमुच गायत्री ऐसी ही महाशक्ति है जिसको हमें भी श्रद्धापूर्वक हृदयंगम करना चाहिए। -- महात्मा गाँधी
  • ऋषियों ने जो अमूल्य रत्न हमको दिऐ हैं, उनमें से एक अनुपम रत्न गायत्री से बुद्धि पवित्र होती है। - मदन मोहन मालवीय
  • भारतवर्ष को जगाने वाला जो मंत्र है, वह इतना सरल है कि ऐक ही श्वास में उसका उच्चारण किया जा सकता है। वह मंत्र है गायत्री मंत्र। - रबीन्द्रनाथ टैगोर
  • मैं लोगों से कहता हूँ कि लम्बे लम्बे साधन करने की उतनी जरूरत नहीं है। इस छोटी सी गायत्री की साधना को करके देखो। गायत्री का जप करने से बड़ी बड़ी सिद्धियाँ मिल जाती हैं। यह मंत्र छोटा है पर इसकी शक्ति बड़ी भारी है। अरविन्द घोष
  • गायत्री में ऐसी शक्ति सन्निहित है, जो महत्वपूर्ण कार्य कर सकती है। - अरविन्द घोष
  • गायत्री का जप करने से बडी‍-बडी सिद्धियां मिल जाती हैं। यह मंत्र छोटा है, पर इसकी शक्ति भारी है। - रामकृष्ण परमहंस
  • गायत्री सदबुद्धि का मंत्र है, इसलिऐ उसे मंत्रो का मुकुटमणि कहा गया है। - स्वामी विवेकानंद
  • गायत्री के मंत्र का निरन्तर जप रोगियों को अच्छा करने के लिए इसका प्रयोग, प्रार्थना की परिभाषा -आत्मा एक उन्नत अवस्था से दूसरी उन्नत अवस्था को पहुँचने के लिए आतुर हो रही है-सर्वथा चरितार्थ करता है। यदि इसी गायत्री मंत्र का जप अनवरत चित्त और शान्त हृदय से राष्ट्रीय आपत्ति काल में किया जाता है तो उन संकटों को मिटाने के लिए प्रभाव और पराक्रम दिखलाता है। जिन लोगों का यह विश्वास है कि ‘मंदिरों में जाकर गायत्री का जप करना, नमाज या प्रेयर करना मूर्खता या विडम्बना है’ वे भ्रम में फंसे हुए हैं। मैं तो यहाँ तक कह सकता हूँ कि ऐसी मान्यता से बड़ी भूल मनुष्य से ओर कोई नहीं हो सकती।
-यंग इंडिया
  • गायत्री की महिमा का वर्णन करना मनुष्य की सामर्थ्य से बाहर है। बुद्धि का शुद्ध होना इतना बड़ा कार्य है जिसकी समता संसार के और किसी काम से नहीं हो सकती। आभा प्राप्ति करने की दिव्य दृष्टि जिस शुद्ध बुद्धि से प्राप्त होती है उसकी प्रेरणा गायत्री द्वारा होती है। गायत्री आदि मंत्र है। उसका अवतार दुरितों को नष्ट करने और ऋत के अभिवर्धन के लिए हुआ है। -- महर्षि रमण
  • गायत्री मंत्र ऐसा मंत्र है जिससे आध्यात्मिक और भौतिक दोनों प्रकार के लाभ मिलते हैं। -- मदन मोहन मालवीय
  • ऋषियों ने जो अमूल्य रत्न हमें दिये हैं उनमें से एक अनुपम रत्न गायत्री है। गायत्री से बुद्धि पवित्र होती है। ईश्वर का प्रकाश आत्मा में आता है। इस प्रकाश में असंख्यों आत्माओं को भव बन्धन से त्राण मिला है। गायत्री में ईश्वर परायणता के भाव उत्पन्न करने की शक्ति है, साथ ही वह भौतिक अभावों को दूर रह करती। -- लोकमान्य तिलक
  • भारतीय जनता आज अन्धकार में भटक रही है। उसका कल्याण केवल अन्न धन वृद्धि से ही न हो जायगा। आर्थिक दशा सुधर जाने पर भी मनुष्य सुखी नहीं हो सकता उसे आज ऐसे प्रकाश की आवश्यकता है जो उसकी आत्मा को प्रकाशित कर दे। जिस बहुमुखी दासता के बन्धनों में आज प्रजा जकड़ी हुई है उनका अन्त राजनैतिक संघर्ष करने मात्र से नहीं हो जायगा। उसके लिए तो आत्मा के अन्दर प्रकाश उत्पन्न होना चाहिए जिससे सत् और असत् का विवेक हो। कुमार्ग को छोड़ कर श्रेष्ठ मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले। गायत्री मंत्र में वह भावना विद्यमान है। उसमें प्रकाश की कामना की गई है। अन्तः करण में प्रज्वलित ज्ञान ज्योति ही हमारा पथ प्रदर्शन कर सकती है और उसी के पीछे अनुगमन करने से आज की विपन्न दशा से छुटकारा पाया जा सकता है।
-- स्वामी शिवानन्द
  • प्रातःकाल ब्राह्ममुहूर्त में उठकर, नित्य कर्म से निवृत्त होकर गायत्री का जप करना चाहिए। ब्राह्ममुहूर्त में गायत्री का जप करने से चित्त शुद्ध होता है और हृदय में निर्मलता आती है। शरीर निरोग रहता है और स्वभाव में नम्रता आती है। बुद्धि सूक्ष्म होने से दूर दर्शिता बढ़ती है और स्मरण शक्ति का विकास होता है। कठिन प्रसंगों में गायत्री द्वारा दैवी सहायता मिलती है। उसके द्वारा आत्म दर्शन हो सकता है। -- स्वामी रामतीर्थ
  • राम को प्राप्त करना सब से बड़ा काम है। गायत्री अभिप्राय बुद्धि को काम रुचि से हटाकर राम रुचि में लगा देना है। जिसकी बुद्धि पवित्र होगी वही राम को प्राप्त करने का काम कर सकेगा। गायत्री पुकारती है कि-बुद्धि में इतनी पवित्रता होनी चाहिए कि वह काम को राम से बढ़ कर न समझे। -- रामकृष्ण परमहंस
  • परमात्मा से क्या माँगना चाहिए? क्या वह वस्तुएं माँगें जिन्हें अपने बाहुबल से आसानी के साथ कमाया जा सकता? नहीं, ऐसा उचित न होगा। बुहारी की आवश्यकता पड़ने पर उसे दो चार पैसे में बाजार से खरीद लिया जाता है। उसे कौन बुद्धिमान कहेगा जो बुहारी माँगने राजदरबार में जावे। राजा ऐसे माँगने पर हँसेगा और उसकी इस तुच्छ बुद्धि पर हँसेगा। राजा से वही वस्तु माँगी जानी चाहिए जो उसके गौरव के अनुकूल हो। परमात्मा से माँगने योग्य वस्तु सद्बुद्धि है। जिस पर परमात्मा प्रसन्न होते हैं उसे सद्बुद्धि प्रदान करते हैं। सद्बुद्धि से सत् मार्ग पर प्रगति होती है और सत्कर्म से सब प्रकार के सुख मिलते हैं। जो सत् की ओर बढ़ रहा है उसको किसी प्रकार के सुख की कमी नहीं रहती। गायत्री सद्बुद्धि का मंत्र है। इसलिए उसे मन्त्रों का मुकुटमणि कहा गया है। -- स्वामी करपात्री
  • मनुष्य शरीर में बुद्धि का प्रमुख स्थान है। गायत्री बुद्धि को पवित्र करती है। जब बुद्धि पवित्र हो गई तो सब कुछ पवित्र हो गया समझना चाहिए। जिसकी बुद्धि पवित्र है उसके लिए संसार में कुछ भी अप्राप्य नहीं है। गायत्री ब्राह्मणों का तो प्रधान आधार है। -- काली कमली वाले बाबा विश्रद्धानन्द
  • गायत्री ने बहुतों को सुमार्ग पर लगाया है। कुमार्ग गामी पुरुष की पहले तो गायत्री की ओर रुचि ही नहीं होती। यदि ईश्वर कृपा से हो जाए तो वह कुमार्ग गामी नहीं रहता। गायत्री जिसके हृदय में बास करती है उसका मन ईश्वर की ओर जाता है। विषय विकारों की व्यर्थता उसे भली प्रकार अनुभव होने लगती है।
  • कई महात्मा गायत्री का जप करके परम सिद्ध हुए हैं। परमात्मा की शक्ति ही गायत्री है। जो गायत्री के निकट जाता है वह शुद्ध होकर रहता है। आत्मकल्याण के लिए मन की शुद्धि आवश्यक है। मन की शुद्धि के लिए गायत्री मन्त्र अदभुत है। ईश्वर प्राप्ति के लिए गायत्री जप को प्रथम सीढ़ी समझना चाहिए। -- प्रसिद्ध आर्यसमाजी महात्मा सर्वदानन्द
  • गायत्री मन्त्र द्वारा प्रभु का पूजन सदा से आर्यों की रीति रही है। ऋषि दयानंद ने भी उसी शैली का अनुसरण करके सन्ध्या का विधान, यथाशक्ति सार्थक व्याख्यान तथा वेदों के स्वाध्याय में प्रयत्न करना बतलाया है। ऐसा करने से अन्तःकरण की शुद्धि तथा निर्मल बुद्धि होकर मनुष्य जीवन अपने और दूसरों के लिए हितकर हो जाता है। जितनी भी इस शुभ कर्म में श्रद्धा और विश्वास हो, उतना ही अविद्या आदि क्लेशों का ह्रास होता है। फिर विद्या के प्रकाश में उपासना, प्रभु के आस पास हो जाता है।
  • जो जिज्ञासु अर्थ पूर्वक इस मन्त्र का सप्रेम नियमपूर्वक उच्चारण करता है उसके लिए गायत्री संसार सागर संस्तरण की तरणि (नाव) और आत्म प्रसाद प्राप्ति की सरणि (सड़क) है। -- टी0 सुब्बाराव

बाह्य सूत्र[सम्पादन]

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