गायत्री मंत्र

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गायत्री मंत्र व उसका अर्थ[सम्पादन]

'ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।'

                            (ऋग्वेद ३.६२.१० यजुर्वेद ३.३५,२२.९,३०.२,३६.३ सामवेद १४६२)

भावार्थः-हम उस अविनाशी ईश्वर का ध्यान करते है, जो भूलोक,अंतरिक्ष ,और स्वर्ग लोकोंका का उत्पन्न किया है,उस सृष्टी कर्ता ,पापनाशक,अतिश्रेष्ठ देव को हम धारण करते है – वह (ईश्वर) हमें सद्बुद्धी दें एवम सत्कर्म मे प्रेरित करे।

यह गायत्री मंत्र ऋग्वेद यजुर्वेद और सामवेद में प्रस्तुत है।  एक ईश्वर का उपासना करना इसका मुख्य उद्देश्य है।  चार वेदो में से यह मंत्र सबसे प्रसिद्ध मंत्र है

विचार[सम्पादन]

  • "गायत्री मंत्र का निरन्तर जप रोगियों को अच्छा करने और आत्माओं की उन्नति के लिए उपयोगी है। गायत्री का स्थिर चित्त और शान्त हृदय से किया हुआ जप आपत्तिकाल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है।" - महात्मा गाँधी
  • "ऋषियों ने जो अमूल्य रत्न हमको दिऐ हैं, उनमें से एक अनुपम रत्न गायत्री से बुद्धि पवित्र होती है।" - मदन मोहन मालवीय
  • "भारतवर्ष को जगाने वाला जो मंत्र है, वह इतना सरल है कि ऐक ही श्वास में उसका उच्चारण किया जा सकता है। वह मंत्र है गायत्री मंत्र।" - रबीन्द्रनाथ टैगोर
  • "गायत्री में ऐसी शक्ति सन्निहित है, जो महत्वपूर्ण कार्य कर सकती है।" - अरविंद
  • "गायत्री का जप करने से बडी‍-बडी सिद्धियां मिल जाती हैं। यह मंत्र छोटा है, पर इसकी शक्ति भारी है।" - रामकृष्ण परमहंस
  • "गायत्री सदबुद्धि का मंत्र है, इसलिऐ उसे मंत्रो का मुकुटमणि कहा गया है।" - स्वामी विवेकानंद

बाह्य सूत्र[सम्पादन]

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