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अरविन्द घोष

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अरविन्द घोष

अरविन्द घोष (बांग्ला: শ্রী অরবিন্দ, जन्म: १८७२, मृत्यु: १९५०) भारत के एक क्रान्तिकारी, योगी एवं दार्शनिक थे। वे १५ अगस्त १८७२ को कलकत्ता में जन्मे थे।

उद्धरण

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  • भारत का युग मृत नहीं है और न ही उसने अपना अंतिम रचनात्मक शब्द बोला है यह है और अभी भी अपने और मानव लोगों के लिए कुछ करना चाहती है।
  • अतीत के दावों से संबंध नहीं, बल्कि भविष्य की दोपहर से।
  • अब हमारे सारे कार्यों के लक्ष्य मातृभूमि की सेवा ही होनी चाहिए। आपका अध्ययन, मनन, शरीर ,मन और आत्मा का संस्कार सभी कुछ मातृभूमि के लिए ही होना चाहिए। आप काम करो, जिससे मातृभूमि समृद्ध हो।
  • अस्तित्व की सभी समस्याएं अनिवार्य रूप से सद्भाव की समस्याएं हैं।
  • आत्मा जो देखती है और अनुभव करती है , वह जानती है ; वाकी उपस्थिति , पूर्वाग्रह और राय है।
  • आध्यात्मिकता वास्तव में भारतीय मन की प्रमुख कुंजी है इनफिनिटिव ( अनन्त ) की भावना इसके मूल निवासी हैं।
  • एक भगवान जो मुस्कुरा नहीं सकता है , वह इस हास्य ब्रह्मांड का निर्माण नहीं कर सकता है।
  • एकता स्थापित करने वाले सच्चे बन्धु हैं।
  • और लोग अपने देश को एक भौतिक चीज की तरह जानते हैं। जैसे- मैदान, जमीन, पहाड़, जंगल, नदी वगैरह। लेकिन मैं अपने देश को माँ की तरह जानता हूँ। मैं उसे अपनी भक्ति अर्पित करता हूँ। उसे अपनी पूजा अर्पण करता हूँ।
  • कला अतिसूक्ष्म और कोमल है। अतः अपनी गति के साथ यह मस्तिष्क को भी कोमल और सूक्ष्म बना देती है।
  • कुछ धर्मपरापण लोगों को सुनने के लिए, कोई कल्पना करेगा भगवान कभी नहीं हंसे।
  • केवल वह आत्मा है , जो नग्न और निश्छल ,।शुद्ध और निर्दोष है।
  • कोई भी देश या जाति अब विश्व से अलग नहीं रह सकती।
  • क्या यह सच है कि अस्तित्व में केवल ऊर्जा की क्रिया होती है ? या ऐसा नहींं है कि ऊर्जा अस्तित्व का उत्पादन है ?।
  • गुण कोई किसी को नहीं सिखा सकता। दूसरे के गुण लेने या सीखने की जब भूख मन में जागती है, तो गुण अपने आप सीख लिए जाते हैं।
  • गुप्त प्रकृति गुप्त भगवान है।
  • जब मन शांत होता है, तब सत्य को मौन की पवित्रता में सुनने का मौका मिलता है।
  • जिसमें त्याग की मात्रा, जितने अंश में हो, वह व्यक्ति उतने ही अंश में हो, वह व्यक्ति उतने ही अंश में पशुत्व से ऊपर है।
  • जिसमें फूट हो गई है और पक्ष भेद हो गए हैं, ऐसा समाज किस काम का ? आत्मप्रतिष्ठा और आत्मा की एकता की मूर्ति का समाज चाहिए। अलग रह कर जितना काम होता है, उससे सौ गुना संघशक्ति से होता है।
  • जिसे हम हिन्दू धर्म कहते हैं , वह वास्तव में सनातन धर्म है।
  • जीवन जीवन है – चाहे एक बिल्ली का हो, या कुत्ता या आदमी का। एक बिल्ली या एक आदमी के बीच कोई अंतर नहीं है। अंतर का यह विचार मनुष्य के स्वयं के लाभ के लिए एक मानवीय अवधारणा है।
  • जैसे सारा संसार बदल रहा है, उसी प्रकार, भारत को भी बदलना चाहिए।
  • तुम लोग जड़ पदार्थ, मैदान, खेत, वन-पर्वत आदि को ही स्वदेश कहते हो, परन्तु मैं इसे ‘माँ’ कहता हूँ।
  • दर्द नश्वर हृदय में मृत प्रतिरोध को तोड़ने के लिए देवताओं का हथौड़ा है।
  • धन को विलास के लिए खर्च करना एक प्रकार से चोरी होगी। वह धन असहायों और जरूरतमन्दों के लिए है।
  • पढो, लिखो, कर्म करो, आगे बढो, कष्ट सहन करो, एकमात्र मातृभूमि के लिए, माँ की सेवा के लिए।
  • बहुत आम तौर पर , परोपकारिता केवल स्वार्थ का सबसे बड़ा रुप है।
  • भारत की एकता, स्वाधीनता और उन्नति सहज साध्य हो जाएगी, भाषा की रक्षा करते हुए साधारण भाषा के रूप में हिन्दी भाषा को ग्रहण कर उस बाधा को दूर करेंगें।
  • भारत भौतिक समृद्धि से हीन है, यद्दपि, उसके जर्जर शरीर में आध्यात्मिकता का तेज वास करता है।
  • मेरा ईश्वर प्रेम है और इसके मीठे रूप से सभी पीडि़त हैं।
  • मेरा प्यार दिल की भूख नहीं है , मेरा प्यार मांस की लालसा नहीं है ; यह मेरे पास ईश्वर की ओर से आया और ईश्वर की ओर लौटता है।
  • मेरा हर काम अपने लिए न होकर देश के लिए ही है, मेरा हित एवं मेरे परिवार का हित देशहित में ही निहित है।
  • मैंने शपथ ली कि मैं दुनिया के दु:ख और दुनिया की मूर्खता और क्रूरता और अन्याय से पीडि़त नहीं होऊंगा और मैंने अपने दिल को स्टील की एक पॉलिश सतह के रूप में nether मिलस्टोन और अपने दिमाग के रूप में कठिन बना दिया। मुझे - कोई तकलीफ नहीं हुई थी , बस आनंद मुझसे दूर हो गया।
  • यदि तुम किसी का चरित्र जानना चाहते हो तो उसके महान कार्य न देखो, उसके जीवन के साधारण कार्यों का सूक्ष्म निरीक्षण करो।
  • यह देश यदि पश्चिम की शक्तियों को ग्रहण करे और अपनी शक्तिओं का भी विनाश नहीं होने दे तो उसके भीतर से जिस संस्कृति का उदय होगा वह अखिल विश्व के लिए कल्याणकारिणी होगी। वास्तव में वही संस्कृति विश्व की अगली संस्कृति बनेगी।
  • युगों का भारत मृत नहीं हुआ है और न उसने अपना अंतिम सृजनात्मक शब्द उच्चारित ही किया है, वह जीवित है और उसे अभी भी स्वयं अपने लिए और मानव लोगों के लिए बहुत कुछ करना है और जिसे अब जागृत होना आवश्यक है।
  • लेकिन हार अंत नहीं है , यह केवल एक द्वार या एक शुरुआत है।
  • व्यक्तियों में सर्वथा नवीन चेतना का संचार करो, उनके अस्तित्व के समग्र रूप को बदलो, जिससे पृथ्वी पर नए जीवन का समारंभ हो सके।
  • सच्चा ज्ञान सोचने से नहीं मिलता। यह वही है जो तुम हो , यह वही है जो तुम बनना चाहते हो।
  • सारा जगत स्वतंत्रता के लिए लालायित रहता है फिर भी प्रत्येक जीव अपने बंधनो को प्यार करता है।
  • आज भारत स्वाधीन हो गया है, पर उसने अखंडता प्राप्त नहीं की है। केवल आधी-अधूरी खंडित स्वतंत्रता पाई है। कांग्रेस द्वारा तय किए गए विभाजन को सदा के लिए स्थायी निर्णय नहीं माना जाना चाहिए। हमें आशा है कि धीरे-धीरे विभाजन की इस मनोवृत्ति और तनाव से मुक्ति मिलेगी। मेल-मिलाप बढ़ेगा, शांति आएगी और अस्थायी विभाजन की रेखा पानी की लहर के समान मिट जाएगी। जो भी हो, इस विभाजन को मिटाना ही होगा भारतमाता की अखंड प्रतिमा ही पूजा के योग्य रहेगी जब तक यह प्रतिमा अखंड नहीं होती, हमें इसकी अखंडता के लिए निरंतर प्रयास करना ही होगा। -- 15 अगस्त, 1947 को आकाशवाणि से प्रसारित अपने सन्देश में
  • भागवत शक्ति ने- जो कि मेरा पथ-प्रदर्शन करती है- उस कार्य के लिए अपनी अनुमति दे दी है और उस पर मुहर लगा दी है जिसके साथ-साथ मैंने अपना जीवन आरम्भ किया था। देश का विभाजन दूर होना ही चाहिए, वह दूर होगा या तो तनाव के ढीले पड़ जाने से या शांति और समझौते की आवश्यकता को धीरे-धीरे हृदयंगम करने से, या किसी कार्य को मिलजुलकर करने की सतत् आवश्यकता से या उस उद्देश्य की पूर्ति के लिए साधनों की जरूरतों को महसूस करने से। जिस किसी तरह क्यों न हो, विभाजन दूर होना ही चाहिए और दूर होकर ही रहेगा। -- 15 अगस्त 1947 को देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के अवसर पर अपने उद्बोधन में

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