अन्न

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  • पृथिव्यां त्रिणी रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् । (पृथ्वी पर तीन रत्न हैं- जल, अन्न और सुभाषित ।)
  • जैसा अन्न, वैसा मन ।
  • मुझे बता दो कि तुम क्या खाते हो और मैं बता दूँगा कि तुम क्या हो। (Jean Anthelme Brillat-Savarin, Physiologie du Gout (1825))
  • आदमी जैसा खाता है, वैसा बन जाता है।
  • अन्न का दान परम दान है।
  • रूखा सूखा काय के ठण्डा पानी पीव। देखि पराई चूपड़ी मत ललचावै जीव ॥ (कबीर)