अन्न

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  • पृथिव्यां त्रिणी रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् ।
पृथ्वी पर तीन रत्न हैं- जल, अन्न और सुभाषित ।
  • जीर्णे हितं मितं चाद्यात्
पूर्वभोजन के जीर्ण होने (पचने) पर ही हितकर व मित भोजन करना चाहिए।
  • जीर्णे भोजनमात्रेयः लङ्घनं परमौषधम् ।
भावार्थ : पूर्वभोजन के जीर्ण होने पर ही भोजन करना चाहिए। यदि कभी प्रमाद से अजीर्ण हो जाए तो लंघन (उपवास) उसकी परम औषधि है।
  • हिताहारा मिताहारा अल्पाहाराश्च ये जनाः।
न तान् वैद्याश्चिकत्सन्ति आत्मनस्ते चिकित्सकाः॥
अर्थात् जो व्यक्ति हिताहारी (हितकर आहार करने वाले), मिताहारी (परिमित, नपा तुला, न अधिक न कम आहार करने वाले) तथा कभी- कभी अल्पाहारी (कम भोजन या उपवास करने वाले) होते हैं, उनकी चिकित्सा वैद्य लोग नहीं करते, प्रत्युत वे अपने चिकित्सक स्वयं होते हैं।
  • आहारमग्निः पचति दोषानाहारवर्जितः।
धातून् क्षीणेषु दोषेषु जीवितं धातुसंक्षये॥ (अष्टाङ्गहृदय, चिकित्सास्थान-१०.९१)
जठराग्नि आहार को पचाती है, यदि उसे आहार नहीं मिले तो बढ़े हुए दोषों को पचाती है, नष्ट करती है। दोषों के क्षीण होने पर भी उपवास किया जाएगा तो जठराग्नि रस-रक्त आदि धातुओं को जलाने लगती है व शरीर कृश होने लगता है तथा अन्त में जीवन को नष्ट कर देती है। (अतः उतना उपवास या अल्पाहार करना चाहिए जिससे दोष तो नष्ट हो जाएं, परन्तु शरीर की क्षीणता का अवसर न आए।)
  • सम्पन्नतरमेवान्नं दरिद्रा भुञ्जते सदा।
क्षुत् स्वादुतां जनयति सा चैवाढ्येषु दुर्लभा॥ (विदुरनीतित- २.५१)
कठोर श्रम से जीविकोपार्जन करने वाले दरिद्र लोग सदा स्वादिष्ठ भोजन करते हैं, क्योंकि भूख स्वाद पैदा कर देती है और वह धनी लोगों में प्रयः दुर्लभ होती है।
  • जैसा अन्न, वैसा मन ।
  • मुझे बता दो कि तुम क्या खाते हो और मैं बता दूँगा कि तुम क्या हो। (Jean Anthelme Brillat-Savarin, Physiologie du Gout (1825))
  • आदमी जैसा खाता है, वैसा बन जाता है।
  • अन्न का दान परम दान है।
  • रूखा सूखा काय के ठण्डा पानी पीव। देखि पराई चूपड़ी मत ललचावै जीव ॥ (कबीर)