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बौद्ध धर्म

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बौद्ध धर्म, महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं पर आधारित धर्म है। इसका जन्म भारत में अनुमातः ईसापूर्व ६ठी शताब्दी से लेकर ईसापूर्व ४थी शताब्दी के बीच हुआ। इसके बाद यह धर्म एशिया के अधिकांश भागों में फैल गया। बौद्ध धर्म के जीवित सम्प्रदायों में दो प्रमुख सम्प्रदाय हैं- (१) थेरवाद (हीनयान) (२) महायान।

उक्तियाँ[सम्पादन]

  • बौद्ध धर्म एवं ब्राह्मण धर्म का जितना गम्भीर अध्ययन किया जाए उतना ही दोनों के बीच अन्तर जानना कठिन हो जाता है, या यह कहना कठिन हो जाता है कि किन रूपों में बौद्ध धर्म, वास्तव में अशास्त्रीय या अहिन्दू है। -- आनन्द के० कुमारस्वामी
  • त्रिपिटकों से यह नहीं प्रकट होता है कि उनका ब्राह्मणों से कोई विरोध था और बुद्ध ने वही कहा जो उन दिनों के ब्राह्मणवाद के प्रमुख तत्वों में विद्यमान थे। बुद्ध ने उपनिषदों की उस शिक्षा को स्वीकार किया कि ब्रह्मानन्द एवं मोक्ष की प्राप्ति के लिए नैतिक आचरण अति उच्च होना चाहिए। -- राइज डेविड्स, अपने 'दि रिलेशन बिटवीन अर्ली बुद्धिज्म एवं ब्राह्मणीज्म' नामक भाषण में
  • बुद्धका लक्ष्य था उपनिषद् के श्रेष्ठ विज्ञानवाद ( Idealism) को स्वीकारकर उसे मानव जाति के दिन-प्रतिदिन की अवश्यकता के लिए सुलभ बनाना । ऐतिहासिक बौद्ध धर्म का अर्थ है उपनिषद् के सिद्धान्त का जनता में प्रसार। -- सर्वेपल्ली राधाकृष्णन
  • यदि मुखे कोई एक धर्म चुनना पड़े तो मैं बौद्ध धर्म को चुनूंगा। बौद्ध धर्म एक दया-प्रधान धर्म है। इसमें हास्य है, ज्ञान है, यह एक-दूसरे के प्रति अच्छा होना सिखाता है। -- Harlan Ellison, in the clue book for the computer version of I Have No Mouth, and I Must Scream, as quoted on "Secular Web Kiosk".
  • भिक्षुओ ! इन दो अतियों (चरम-पंथों) को नहीं सेवन करना चाहिए - प्रथम काम-सुख में लिप्त होना और द्वितीय शरीर-पीड़ा लगना । इन दोनों अतियों को छोड़कर मैंने मध्यम-मार्ग खोज निकाला है, जो कि आँख देनेवाला, ज्ञान करानेवाला, शान्ति देने वाला है। वह ( मध्यम मार्ग) यही आर्य अष्टांगिक मार्ग है, जैसे कि ठीक दृष्टि (दर्शन), ठीक संकल्प, ठीक वचन, ठीक कर्म, ठीक जीविका, ठीक प्रयत्न, ठीक स्मृति और ठीक समाधि। -- महात्मा बुद्ध, सारनाथ में पाँच भिक्षुओं को दिये अपने प्रथम उपदेश में
  • जन्म भी दुख है, बुढ़ापा भी दुख है, मरण, शोक, रूदन, मन की खिन्नता, हैरानगी दुख है। अप्रिय से संयोग भी, प्रिय से वियोग भी दुख है, इच्छा करके जिसे नहीं पाता, वह भी दुख है। संक्षेप में पांचों उपादान स्कन्ध (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान) दुख हैं। -- महात्मा बुद्ध
  • भगवान बुद्ध के बारे में एक बात बड़े ही विश्वास के साथ कही जा सकती है कि वे कुछ नहीं थे, यदि उनका कथन बुद्धिसंगत, तर्क–संगत नहीं होता। -- भदन्त आनन्द कौसात्यायन
  • आत्मा की शुद्धता और सभी संवेदनशील प्राणियों के लिए प्रेम का बुद्ध के द्वारा खूब आनंद लिया गया। उन्होंने कभी पाप की बात नहीं की , लेकिन केवल अज्ञानता और मूर्खता की बात की , जिसे आत्मज्ञान और सहानुभूति से ठीक किया जा सकता है। -- डॉ॰ सर्वेपल्ली राधाकृष्णन
  • बुद्ध ने जो सिखाया उसे स्वय कर के दिखाया , 45 वर्षो के अपने सफल और घटनापूर्ण समय में उन्होंने अपने कहे हर शब्द को अमल कर दिखाया , और ऐसी कोई जगह नहीं छोड़ी जहा से मानव दोष या किसी प्रकार का जूनून बहार निकल सके , आज तक दुनिया में जानी गयी नैतिक संहिता में , बुद्ध की नैतिक संहिता दुनिया में सबसे उत्तम है । -- मैक्स मूलर
  • बौद्ध या गैर बौद्ध , मैंने दुनिया के महान धार्मिक प्रणालियों में से हर एक की जांच की है और मुझे उस में ऐसा कुछ नहीं मिला जो बुद्ध के दिए आष्टांगिक मार्ग की सुंदरता और व्यापकता को पार पा सके। -- ब्रिटिश विद्वान थॉमस विलियम रिस् डेविड्स
  • अगर कोई दुनिया के सभी धर्म एक तरफ रख दे , यही नहीं दुनिया के सभी दार्शनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों भी , तो दूसरी तरफ बौद्ध धर्म इन सब की जगह अकेले ले लेगा। -- जर्मन विद्वान डॉ० पॉल ढालके
  • यदि धर्म नैरात्म (आत्माहीन ) अवस्था की आत्मा है , और विशव के हृदयहीन लोगो का हिर्दय है , और लोगों की अफीम है , तब बौद्ध धर्म , निश्चित रूप से इस तरह का धर्म नहीं है। यदि धर्म जीवन की बीमारियों से मुक्ति की एक प्रणाली है , तो तब बौद्ध धर्म धर्मों का धर्म है। -- कार्ल मार्क्स
  • मैं गौतम बुद्ध से प्यार करता हु , क्यों की वह मेरे लिए धर्म के लिए आवश्यक मूल का प्रतिनिधित्व करते है। वह धर्म रहित धर्म के संस्थापक है।उन्होंने धर्म प्रतिपादित नहीं किया बल्कि धार्मिकता को प्रतिपादित किया और यह मानव चेतना के इतिहास में एक महान क्रांतिकारी परिवर्तन है।बुद्ध से पहले धर्मों तो थे लेकीन पवित्र धार्मिकता नहीं थी , मानव अभी परिपक्व नहीं हुआ है , लेकिन बुद्ध की मानवता ने एक परिपक्व उम्र में प्रवेश कर लिया है। कोई भी शुद्ध खुशबू का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। अन्य धर्मो के संस्थापकों , अन्य जागृत लोग ने अपने आदर्शो के साथ समझौता किया है। लेकीन बुद्ध ने ऐसा नहीं , इस लिए वह पवित्र है। -- आचार्य रजनीश
  • यदि धरती पर कभी सभी धर्म की सभा हो तो बौद्ध धर्म समुद्र की सबसे उँची लहर की तरह चमकेगा और बुद्ध हिमालय की सर्वाच्च चोटी एवेरेस्ट की तरह प्रतीयमान होगे। -- डॉ॰ हरिसिंह गौर
  • जहा अन्य धर्मो में कर्मकाण्ड और हठधर्मिता का पहला और सबसे महत्वपूर्ण स्थान है , वही बौद्ध धर्म में नैतिकता को हमेशा सबसे ऊपर रखा गया है और उस पर जोर दिया गया है। -- हैलिना ब्लावट्स्की
  • भविष्य का धर्म एक कॉस्मिक रिलिजन होगा। ये दुनियाभर के व्यक्तिगत भगवानों की जगह ले लेगा और बिना तर्क के धार्मिक विश्वासों और तमाम धार्मिक क्रिया-कलापों , कर्म-कांडों को बेमानी कर देगा। ये प्राकृतिक भी होगा और आध्यात्मिक भी , ये उन अनुभवों से बने तर्कों पर आधारित होगा कि सभी प्राकृतिक और आध्यात्मिक चीजें इस तरह एक हैं जिनका समझा जा सकने वाला एक अर्थ है। ये जो कुछ भी मैं कह रहा हूं , इसका जवाब बौद्ध धर्म में है। अगर कोई ऐसा धर्म है जो भविष्य में आधुनिक वैज्ञानिक जरूरतों के साथ कदम से कदम मिला कर चल सकता है , तो वह बौद्ध धर्म होगा। -- अल्बर्ट आइंस्टीन
  • मनुष्य प्रकृति के अंधे बलों की तुलना में अधिक बड़ा होता है क्यों की मनुष्य प्रकृति बलों द्वारा कुचल दिया गया हो लेकिन मनुष्य हमेशा उन से बेहतर रहेगा , क्यों की वह उन प्राकर्तिक बालो को समझ सकता है बौद्ध धर्म इस सच्चाई को और आगे ले जाता है , बौद्ध धर्म बताता है की मनुष्य अपनी समझ के आधार पर अपनी परिस्थितियों को नियंत्रित कर सकता हैं , वह अपनी समझ के आधार पर उन प्रकृति के अंधे बलों से संघर्ष कर सकता है , और खुद को बढ़ाने के लिए प्रकृति के अंधे बलों के नियमो का उपयोग भी कर सकता है। -- जो फ्रांसीसी गणितज्ञ तथा भौतिकज्ञ ब्लेज़ पास्कल
  • बुद्ध ने सार्वकालिक मूल्यों की सच्चाई को एक अभिव्यक्ति दी है और न केवल भारत बल्कि सम्पूर्ण मानवता को एक नैतिक उन्नती प्रदान की है बुद्ध दुनिया में रहे सबसे बड़े विशिष्ट नैतिक पुरुषों में से एक थे। -- अल्बर्ट स्चवेिटज़र

बौद्ध धर्म पर स्वामी विवेकानन्द के विचार[सम्पादन]

  • बुद्ध एक आदर्श कर्मयोगी है जिन्होंने किसी उद्देश्य के बिना कर्म किये। मानवता का सम्पूर्ण इतिहास बताता है की वह धरती पर पैदा हुए महत्तम मानव थे , तुलना से परे , हृदय और मस्तिष्क का ऐसा महानतम संगम जो कभी भी अस्तित्व में रहा हो।
  • जैसा कि आप पहले से ही जानते हैं, मैं बौद्ध नहीं हूँ। चीन, जापान, सीलोन उस महान शिक्षक के उपदेशों का पालन करते हैं, किन्तु भारत उसे पृथ्वी पर भगवान के अवतार के रूप में पूजता है। मैं वास्तव में बौद्ध धर्म का आलोचक हूँ, लेकिन मैं नहीं चाहूंगा कि आप केवल इस पर ध्यान केंद्रित करें। सामान्यतः मैं उस व्यक्ति की आलोचना करने से दूर रहूँगा जिसे मैं भगवान के अवतार के रूप में पूजता हूँ। लेकिन हम सोचते हैं कि बुद्ध को उनके शिष्यों ने गहराई से नहीं समझा था। हिंदू धर्म (हिंदू धर्म से मेरा तात्पर्य वैदिक धर्म से है) और जिसे हम आज बौद्ध धर्म कहते हैं, वे दोनों आपस में उससे भी अधिक निकट है जितनी निकतता यहूदी धर्म और ईसाई धर्म के बीच है। ईसा मसीह एक यहूदी थे और शाक्य मुनि हिंदू थे। यहूदियों ने यीशु मसीह को अस्वीकार कर दिया, इसके अलावा, उन्होंने उन्हे क्रूस पर चढ़ाया, जबकि हिंदुओं ने शाक्य मुनि को भगवान के रूप में स्वीकार किया और उन्हें भगवान के रूप में पूजा। लेकिन हम हिंदू, यह दिखाना चाहेंगे कि आधुनिक बौद्ध धर्म के विपरीत, भगवान बुद्ध का शिक्षण, यह है कि शाक्य मुनि ने मौलिक रूप से कुछ भी नया नहीं किया। मसीह की तरह, वह पूरक था लेकिन नष्ट नहीं हुआ। लेकिन यहूदी लोग मसीह को नहीं समझते थे, तो बुद्ध के अनुयायी उनके शिक्षण में जो मुख्य बात थी, उसको महसूस नहीं कर पा रहे थे। जिस तरह यहूदी यह नहीं समझ पाए कि ईसा मसीह पुराने नियम को पूरा करने के लिए उत्पन्न हुए हैं, इसी प्रकार बौद्ध के अनुयायियों ने हिंदू धर्म के विकास में बुद्ध द्वारा उठाए गए अंतिम कदम को नहीं समझा। और मैं फिर दोहराता हूं - शाक्य मुनि विनाश करने नहीं आए थे, बल्कि पूरा करने के लिए आए थे - यह तार्किक निष्कर्ष था, हिंदू समाज का तार्किक विकास ...
  • हिन्दू धर्म बौद्ध धर्म के बिना नहीं रह सकता, ठीक वैसे ही जैसे हिन्दू धर्म के बिना बौद्ध धर्म। हमें यह समझने की जरूरत है कि इस विभाजन ने हमें क्या दिखाया। बौद्ध धर्म ब्राह्मण धर्म के ज्ञान और दर्शन के बिना खड़ा नहीं हो सकता, जैसे ब्राह्मण धर्म बुद्ध के महान हृदय के बिना नहीं खड़ा नहीं हो सकता। बौद्धों और वैदिक धर्म के अनुयायियों के बीच यह विभाजन भारत के पतन का कारण है। यही कारण है कि भारत में तीस करोड़ भिखारियों का निवास है, और पिछले हजार वर्षों से भारत को विजेताओं द्वारा गुलाम बनाये जाने का कारण भी यही है। आइए हम ब्राह्मणों की अद्भुत बुद्धि को हृदय, महान आत्मा और महान शिक्षक की जबरदस्त मानव-प्रेम शक्ति के साथ जोड़ दें।[१]

बौद्ध धर्म पर भीमराव आम्बेडकर के विचार[सम्पादन]

  • बौद्ध धर्म एक क्रांति थी। यह फ्रांसीसी क्रांति जितनी ही महान क्रांति थी। हालाँकि इसकी शुरुआत एक धार्मिक क्रांति के रूप में हुई, लेकिन यह धार्मिक क्रांति से कहीं अधिक बन गयी। यह एक सामाजिक और राजनीतिक क्रांति बन गई।
  • जीवन स्वभावतः दुख है, यह सिद्धान्त जैसे बौद्ध धर्म की जड़ पर ही कुठाराघात करता प्रतीत होता है। यदि जीवन भी दुख है, मरण भी दुख है, पुनरुत्पत्ति भी दुख है, तब तो सभी कुछ समाप्त है। न धर्म ही किसी आदमी को इस संसार में सुखी बना सकता है और न दर्शन ही। यदि दुख से मुक्ति ही नहीं है तो फिर धर्म भी क्या कर सकता है और बुद्ध भी किसी आदमी को दुख से मुक्ति दिलाने के लिये क्या कर सकते हैं, क्योंकि जन्म ही स्वभावतः दुखमय है? ये चारों आर्यसत्य, जिनमें प्रथम आर्यसत्य ही दुख–सत्य है, अबौद्धों द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण किये जाने के मार्ग में बड़ी बाधा है। ये उनके गले आसानी से नहीं उतरते। ये सत्य मनुष्य को निराशावाद के गढ़े में ढकेल देते हैं। ये सत्य बुद्ध के धम्म को एक निराशावादी धर्म के रूप में उपस्थित करते हैं।
  • बुद्ध का धर्म सभी को विचारों की स्वतंत्रता और आत्म-विकास की स्वतंत्रता देता है।
  • सभी पैगम्बरों ने मोक्ष का वादा किया है। बुद्ध एक ऐसे गुरु हैं जिन्होंने ऐसा कोई वादा नहीं किया। उन्होंने मोक्ष दाता और मार्ग दाता, जो मोक्ष देता है और जो केवल रास्ता दिखाता है, के बीच स्पष्ट अंतर किया। वह केवल एक मार्ग दाता थे। प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रयास से अपने लिए मुक्ति की खोज करनी चाहिए।
  • मैं दक्षिण पूर्व एशिया के बौद्ध देशों की मानसिकता साम्यवाद की ओर मुड़ने से बहुत आश्चर्यचकित हूं। इसका मतलब यह है कि वे नहीं समझते कि बौद्ध धर्म क्या है। मेरा दावा है कि बौद्ध धर्म कार्ल मार्क्स और उनके साम्यवाद का पूर्ण उत्तर है।
  • बौद्ध धर्म का मूल आधार क्या है? अन्य धर्म और बौद्ध धर्म बहुत भिन्न हैं। अन्य धर्मों में परिवर्तन नहीं होगा, क्योंकि वे धर्म मनुष्य और ईश्वर के बीच संबंध बताते हैं। अन्य धर्म कहते हैं कि ईश्वर ने संसार की रचना की। ईश्वर ने आकाश, वायु, चंद्रमा, सब कुछ बनाया। ईश्वर ने हमारे लिए करने के लिए कुछ भी नहीं छोड़ा। इसलिए हमें ईश्वर की आराधना करनी चाहिए। ईसाई धर्म के अनुसार, मृत्यु के बाद, न्याय का दिन होता है और सब कुछ उस निर्णय पर निर्भर करता है। बौद्ध धर्म में ईश्वर और आत्मा के लिए कोई स्थान नहीं है। भगवान बुद्ध ने कहा कि संसार में सर्वत्र दुख है। नब्बे प्रतिशत मानवजाति दुःख से व्यथित है। पीड़ित मानवजाति को दुःख से मुक्ति मिले–यही बौद्ध धर्म का मूल कार्य है। कार्ल मार्क्स ने ऐसा क्या कहा जो बुद्ध की बातों से भिन्न था? [हालाँकि,] भगवान ने जो कहा, वह किसी पागल, टेढ़े-मेढ़े रास्ते से नहीं कहा।
  • इस प्रश्न का सीधा उत्तर कि मेरा झुकाव बौद्ध धर्म की ओर क्यों है, यह है कि किसी भी धर्म की तुलना इससे नहीं की जा सकती। यदि विज्ञान जानने वाले आधुनिक मनुष्य के पास कोई धर्म होना चाहिए, तो उसका एकमात्र धर्म बुद्ध का धर्म हो सकता है।
  • कुछ लोग सोचते हैं कि धर्म समाज के लिए आवश्यक नहीं है। मैं यह दृष्टिकोण नहीं रखता। मैं धर्म की नींव को समाज के जीवन और प्रथाओं के लिए आवश्यक मानता हूं।
  • मैं बुद्ध के धम्म को सर्वश्रेष्ठ मानता हूं। किसी भी धर्म की तुलना इससे नहीं की जा सकती। यदि विज्ञान जानने वाले आधुनिक मनुष्य के पास कोई धर्म होना ही चाहिए, तो उसके पास एकमात्र धर्म बुद्ध का धर्म ही हो सकता है। सभी धर्मों के पैंतीस वर्षों के गहन अध्ययन के बाद मुझमें यह दृढ़ विश्वास विकसित हुआ है।
  • धम्म में प्रार्थना, तीर्थयात्रा, अनुष्ठान, समारोह और बलि के लिए कोई जगह नहीं है।
  • एक बौद्ध का कर्तव्य केवल एक अच्छा बौद्ध बनना नहीं है। उनका कर्तव्य बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार करना है। उन्हें यह विश्वास करना चाहिए कि बौद्ध धर्म का प्रसार करना मानव जाति की सेवा करना है।
  • मेरा दृढ़ विश्वास है कि बुद्ध का धम्म ही एकमात्र सच्चा धर्म है।
  • बौद्ध धर्म का मूल सिद्धांत समानता है।
  • कम्युनिस्टों को बौद्ध धर्म का अध्ययन करना चाहिए, ताकि वे जान सकें कि मानवता की बुराइयों को कैसे दूर किया जाए।
  • मानव जाति की प्रगति के लिए धर्म एक बहुत ही आवश्यक चीज है। मैं जानता हूं कि कार्ल मार्क्स के लेखन के कारण एक संप्रदाय का उदय हुआ है। उनके पंथ के अनुसार, धर्म का कोई मतलब नहीं है। उनके लिए धर्म महत्वपूर्ण नहीं है। उन्हें सुबह का नाश्ता चाहिए, जिनमें ब्रेड, क्रीम, मक्खन, चिकन लेग आदि मिलता हो; उन्हें चैन की नींद चाहिए, उन्हें फिल्में देखने को मिलनी चाहिए और बस इतना ही। यह उनका दर्शन है। मैं उस राय का नहीं हूं।
  • बुद्ध ने अपने लिए या अपने धम्म के लिए किसी देवत्व का दावा नहीं किया। इसकी खोज मनुष्य ने मनुष्य के लिए की थी। यह कोई रहस्योद्घाटन नहीं था।
  • …बुद्ध के धर्म में समय के अनुसार बदलने की क्षमता है, एक ऐसा गुण जिसका दावा कोई अन्य धर्म नहीं कर सकता…
  • बुद्ध की शिक्षाएँ शाश्वत हैं, लेकिन फिर भी बुद्ध ने उन्हें अचूक घोषित नहीं किया। बुद्ध के धर्म में समय के अनुसार परिवर्तन करने की क्षमता है, यह एक ऐसा गुण है जिसका दावा कोई अन्य धर्म नहीं कर सकता… अब बौद्ध धर्म का आधार क्या है? यदि आप ध्यानपूर्वक अध्ययन करेंगे तो आप देखेंगे कि बौद्ध धर्म तर्क पर आधारित है। इसमें लचीलेपन का तत्व अंतर्निहित है, जो किसी अन्य धर्म में नहीं पाया जाता है।

भारत में बौद्ध धर्म के क्षय के बारे में विचार[सम्पादन]

  • भारतीय जीवनक निर्माण में इतनी देन देकर बौद्धधर्म भारत में लुप्त हो गया, इससे किसी भी सहृदय व्यक्ति को खेद हुए बिना नहीं रहेगा। उसके लुप्त होनेके क्या कारण थे, इसके बारेमें कई भ्रान्तिमूलक धारणायें फैली हैं। कहा जाता है, शंकराचार्य ने बौद्ध-धर्म को भारत से निकाल बाहर किया। किन्तु शंकराचार्य के समय आठवीं सदी में भारत में बौद्ध धर्म लुप्त नहीं, प्रबल होता देखा जाता है। यह नालन्दा के उत्कर्ष और विक्रमशिला की स्थापना का समय था। आठवीं सदी में ही पालों जैसा शक्तिशाली बौद्ध राजवंश स्थापित हुआ था। यही समय है, जब कि नालन्दा ने शान्तरक्षित, धर्मोत्तर जैसे प्रकाण्ड दार्शनिक पैदा किये। तंत्र-मत के सार्वजनिक प्रचार के कारण भीतर में निर्बलतायें भले ही बह रही हों, किन्तु जहाँ तक बिहारों और अनुयायियों की संख्या का सम्बन्ध है, शंकराचार्य के चार सदियों बाद बारहवीं सदी के अन्त तक बौद्धों का ह्रास नहीं हुआ था। उत्तरी भारत का शक्तिशाली गहड़वार-वंश केवल ब्राह्मण धर्म का ही परिपोषक नहीं था, बल्कि वह बौद्धों का भी सहायक था। गहड़वार रानी कुमार देवी ने सारनाथ में "धर्मचक महाविहार" की स्थापना की थी और गोविन्दचन्द ने जेतवन महाविहार को कई गाँव दिये थे। अन्तिम गहड़वार राजा जयचन्दक भी दीक्षागुरु जगन्मित्रानन्द (मित्रयोगी) एक बौद्ध सन्त थे, जिन्होंने कि तिब्बत से अपने शिष्य जयचन्द को पत्र लिखा था, जो आज भी "चन्द्रराज-लेख" के नामसे तिब्बती भाषा में उपलब्ध है। गहड़वारों के पूर्वी पड़ोसी पाल थे, जो अंतिम क्षण तक बौद्ध रहे। दक्षिण कोकण का शिलाहार वंश भी बौद्ध था। दूसरे राज्यों में भी बौद्ध काफी संख्या में थे। स्वयं शंकराचार्य की जन्मभूमि केरल भी बौद्ध शिक्षा का बहिष्कार नहीं कर पाई थी, उसने तो बल्कि बौद्धों की "मंजूश्री मूलकल्प" को रक्षा करते हुए हमारे पास तक पहुँचाया। वस्तुतः बौद्ध धर्म को भारत से निकालने का श्रेय या अयश किसी शंकराचार्यको नहीं है।
    फिर बौद्धधर्म भारतसे नष्ट कैसे हुआ? तुर्कों का प्रहार जरूर इसमें एक मुख्य कारण बना। मुसलमानों को भारत से बाहर मध्य एसिया में जरफ्शां और वक्षु की उपत्यकाओं, फर्गाना और वाह्लीक की भूमियों में बौद्धों का मुकाबिला करना पड़ा। वैसा संघर्ष उन्हें ईरान और रोम के साथ भी नहीं करना पड़ा था। घुटे चेहरे और रंगे कपड़ेवाले बुतपरस्त (बुद्ध-परस्त) भिक्षुओं से वे पहले ही से परिचित थे। उन्होंने भारत आकर अपने चिरपरिचित बौद्ध शत्रुओं के साथ जरा भी दया नहीं दिखाई। उनके बड़े-बड़े बिहार लूटकर जला दिए गए, भिक्षुओं के संघाराम नष्ट कर दिए गये। उनके रहने के लिए स्थान नहीं रह गए। देश की उस विपन्नावस्था में कहीं आशा नहीं रह गई और पड़ोस के बौद्ध देश उनका स्वागत करने के लिए तैयार थे। इस तरह भारतीय बौद्धसंघ के प्रधान कश्मीरी पंडित शाक्यश्रीभद्र विक्रमशिला विश्वविद्यालय के ध्वस्त होनेके बाद भागकर पूर्वी बंगाल के 'जगत्तला' बिहार में पहुँचे । जब वहां भी तुर्कों की तलवार गई, तो वे अपने शिष्यों के साथ भागकर नेपाल गये। उनके आने की खबर सुनकर भोट (तिब्बत)-सामन्त कीर्तिध्वज ने उन्हें अपने यहाँ निमन्त्रित किया । विक्रमशिला के संघराज कई सालों भोटमें रहे और अंत में ऊपर ही ऊपर अरपनी जन्मभूमि कश्मीर में जाकर उन्होंने १२२६ ई० में शरीर छोड़ा। शाक्यश्रीभद्र की तरह न जाने कितने बौद्ध भिक्षुओं और धर्माचार्यां ने बाहर के देशों में जाकर शरण ली। बौद्धों के धार्मिक नेता गृहस्थ नहीं भिक्षु थे, इसलिए एक जगह छोड़कर दूसरी जगह चला जाना उनके लिए आसान था। बाहरी बौद्ध देशों में जहाँ उनकी बहुत आवभगत थी, वहाँ देश में उनके रंगे कपड़े मृत्यु के वारंट थे। यह कारण था, जिससे कि भारत के बौद्ध केन्द्र बहुत जल्दी बौद्ध भिक्षुओं से शून्य हो गये। अपने धार्मिक नेताओं के अभाव में बौद्धधर्म बहुत दिनों तक टिक नहीं सकता था। इस प्रकार और वह भारत में तुर्कों के पैर रखने एक डेढ शताब्दियों में ही लुप्त हो गया। वज्रयान के सुरासुन्दरी सेवन ने चरित्र को खोखला करके इस काम में और सहायता की। -- राहुल सांकृत्यायन, अपनी पुस्तक 'बौद्ध संस्कृति' के 'बौद्ध धर्म का अन्त' शीर्षक में[२]
  • इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत में बौद्ध धर्म का पतन मुसलमानों के आक्रमण के कारण हुआ। इस्लाम 'बुत' का दुश्मन बनकर आया था। सबको पता है कि इस्लामी जगत में 'बुत' शब्द का अर्थ 'मूर्ति' है। लेकिन कम ही लोगों को पता है कि 'बुत' शब्द की व्युत्पत्ति कैसे हुई है? अरबी का 'बुत' शब्द 'बुद्ध' का अपभ्रंश है। इस प्रकार इस शब्द की उत्पत्ति से पता चलता है कि मुसलमानों के दिमाग में मूर्तिपूजा और बौद्ध धर्म एक ही हैं। -- डॉ० भीमराव आम्बेडकर[३]
  • मुसलमान आक्रमणकारियों ने जिन बौद्ध विश्वविद्यालयों को लूटा, इनमें कुछ नाम नालंदा, विक्रमशिला, जगद्दल, ओदंतपूरी के विश्वविद्यालय हैं। उन्होंने बौद्ध मठों को भी तहस-नहस कर दिया, जो सारे देश में स्थित थे। हजारों की संख्या में भिक्षु भारत से बाहर भागकर नेपाल, तिब्बत और कई स्थानों में चले गए। मुसलमान सेनापतियों ने बहुत बड़ी संख्या में भिक्षुओं को मौत के घाट उतार दिया। बौद्ध भिक्षुओं को मुसलमान आक्रमणकारियों ने अपनी तलवार से किस प्रकार नष्ट किया, उसका वर्णन स्वयं मुस्लिम इतिहासकारों ने किया है।
    इस प्रकार बौद्ध पुजारियों का मुसलमान आक्रमणकारियों द्वारा संहार किया गया। उन्होंने जड़ पर ही कुल्हाड़ी मारी। धम्मोपदेष्टा की हत्या कर इस्लाम ने बौद्ध धर्म की ही हत्या कर दी। यह एक घोर संकट था, जो भारत में बौद्ध धर्म के लिए विनाशकारी सिद्ध हुआ। किसी अन्य विचारधारा की भांति धर्म की स्थापना केवल प्रचार द्वारा ही की जा सकती है। यदि प्रचार असफल हो जाए तो धर्म भी लुप्त हो जाता है। पुजारी वर्ग, वह चाहे जितना भी घृणास्पद हो, धर्म के प्रवर्तन के लिए आवश्यक होता है। धर्म-प्रचार के आधार पर ही रह सकता है। पुजारियों के बिना धर्म लुप्त हो जाता है। इस्लाम की तलवार ने पुजारियों पर भारी आघात किया । इससे वह या तो नष्ट हो गया या भारत के बाहर चला गया। बौद्ध धर्म के दीपक को प्रज्ज्वलित रखने के लिए कोई भी जीवित नहीं बचा।
    कहा जा सकता है कि वही बात ब्राह्मणवादी पौरोहित्य के संबंध में भी हुई होगी। ऐसा होना संभव है, भले ही उस सीमा तक नहीं हो। परंतु यह अंतर इन दोनों धर्मों के संगठन में रहा और यह अंतर इतना बड़ा है कि इसी कारण ब्राह्मण धर्म तो मुसलमानों के आक्रमण के बाद भी बचा रहा, परंतु बौद्ध धर्म नहीं बच सका। ये अंतर पुरोहित वर्ग से संबंधित है। ब्राह्मणवादी पौरोहित्य का एक बहुत ही विस्तृत व व्यापक संगठन रहा है। इसका स्पष्ट किंतु संक्षिप्त विवरण स्वर्गीय सर रामकृष्ण भंडारकर ने अपने ग्रन्थ 'इंडियन एटिक्वैरी' में दिया है। -- भीमराव आम्बेडकर[४]
  • बार-बार लूटमार और आक्रमणों के कारण बिहार में जिस मुसलमान सेनापति का नाम पहले ही आतंक बन चुका था, उसने एक झटके में ही यहां राजधानी पर कब्जा कर लिया। लगभग उन्हीं दिनों एक इतिहासकार की भेंट सन् 1243 में आक्रमण करने वाले दल के एक व्यक्ति से हुई। उससे उसको यह पता चला था कि बिहार के किले पर केवल दो सौ घुड़सवारों ने बेखटके, निधड़क होकर पिछले द्वार से धावा बोला और उस स्थान पर अधिकार कर लिया था। उन्हें लूट में भारी मात्रा में माल मिला और 'सिरमुंडे ब्राह्मणों' अर्थात बौद्ध भिक्षुओं की इस प्रकार से हत्या करके उनका सफाया कर दिया था कि जब विजेता ने मठों व विहारों के पुस्तकालयों में पुस्तकों की विषय-वस्तु को समझाने व स्पष्ट करने के लिए किसी योग्य व सक्षम व्यक्ति की तलाश की, तो ऐसा कोई भी जीवित व्यक्ति नहीं मिला जो उनको पढ़ सकता। हमें यह बताया गया कि बाद में यह पता चला था कि समूचा दुर्ग तथा नगर एक महाविद्यालय (कॉलिज ) था। हिंदी भाषा में महाविद्यालय को वे विहार कहते थे। -- विन्सेंट स्मिथ, 'अर्ली हिस्ट्री आफ इंडिया' (1924), पृ. 419-20
  • यदि तन्त्रवाद के कारण बौद्ध धर्म का पतन हुआ तो शाक्त और शैव मत के कई उपसम्प्रदाय भी तंन्त्रवाद से प्रभावित होने के कारण इनका पतन क्यों नहीं हुआ? -- जी०सी० पाण्डेय कृत ‘बौद्ध धर्म के विकास का इतिहास’ में
  • बौद्ध धर्म के अपकर्ष के कारण थे- संघ की शक्ति का ह्रास, मुस्लिम आक्रमण एवं हिन्दू जनता का विरोध ।-- प्रो. के. डब्ल्यू मार्गन
  • हीनयान की अपेक्षा महायान के भ्रष्टाचारों के कारण भारत में बौद्ध धर्म का पतन हुआ। -- चार्ल्स ऐलियट, 'बुद्धिज्म इण्ड हिन्दुइज्म' भाग-२

इन्हें भी देखें[सम्पादन]

सन्दर्भ[सम्पादन]