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स्वामी श्रद्धानन्द

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  • हमारे यहाँ टीचर हैं, प्रोफ़ेसर हैं, प्रिंसिपल हैं, उस्ताद हैं, मौलवी हैं पर आचार्य नहीं है। आचार्य अर्थात् आचारवान व्यक्ति की महती आवश्यकता है। चरित्रवान व्यक्तियों के अभाव में महान से महान व धनवान से धनवान राष्ट्र भी समाप्त हो जाते हैं।
  • छुआछूत ने इस देश में अनेक जटिलताओं को जन्म दिया है तथा वैदिक वर्ण व्यवस्था द्वारा ही इसका अन्त कर अछूतोद्धार सम्भव है।
  • अज्ञान, स्वार्थ व प्रलोभन के कारण धर्मान्तरण कर बिछुड़े स्वजनों की शुद्धि करना देश को मजबूत करने के लिए परम आवश्यक है।
  • भारत को सेवकों की आवश्यकता है, लीडरों की नहीं।
  • ऋषिवर! कौन कह सकता है कि तुम्हारे उपदेशों से निकली हुई अग्नि ने संसार में प्रचलित कितने पापों को दग्ध कर दिया है। परन्तु अपने विषय में मैं कह सकता हूँ कि तुम्हारे सत्संग ने मुझे कैसी गिरी हुई अवस्था से उठाकर सच्चा लाभ करने योग्य बनाया। -- (अपनी जीवन गाथा में)
  • प्यारे भाइयो! आओ, दोनों समय नित्य प्रति संध्या करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करें और उसकी सत्ता से इस योग्य बनने का यत्‍‌न करें कि हमारे मन, वाणी और कर्म सब सत्य ही हों। सर्वदा सत्य का चिन्तन करें। वाणी द्वारा सत्य ही प्रकाशित करें और कमरें में भी सत्य का ही पालन करें।

स्वामी श्रद्धानन्द के प्रति महापुरुषों के विचार[सम्पादन]

  • स्वामी श्रद्धानन्द की याद आते ही 1919 का दृश्य आंखों के आगे आ जाता है। सिपाही फ़ायर करने की तैयारी में हैं। स्वामी जी छाती खोल कर आगे आते हैं और कहते हैं – ‘लो, चलाओ गोलियां’। इस वीरता पर कौन मुग्ध नहीं होगा? -- सरदार बल्लभ भाई पटेल
  • वह वीर सैनिक थे। वीर सैनिक रोग शैय्या पर नहीं, परन्तु रणांगण में मरना पसंद करते हैं। वह वीर के समान जीये तथा वीर के समान मरे। -- महात्मा गांधी

इन्हें भी देखें[सम्पादन]