सुख

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  • सुखस्य मूलं धर्मः । धर्मस्य मूलं अर्थः । अर्थस्य मूलं राज्यम्। राज्यस्य मूलं इन्द्रियजयः। -- चाणक्य
सुख का मूल धर्म है (अर्थात धर्म का आचरण करने से ही सुख मुल सकता है)। धर्म का मूल अर्थ है। अर्थ का मूल राज्य है। राज्य का मूल इन्द्रियों पर विजय पाना है।
  • सुखं शेते सत्यवक्ता सुखं शेते मितव्ययी ।
हितभुक् मितभुक् चैव तथैव विजितेन्द्रियः॥ -- चरकसंहिता
सत्य बोलने वाला, मर्यादित खर्चा करने वाला, हितकारक पदार्थ जरूरी मात्रा मे खाने वाला, तथा जिसने इन्द्रियों पर विजय पाया है, ये सभी सुख की नींद सोते हैं।
  • विकारो धातुवैषम्यं साम्यं प्रकृतिरुच्यते।
सुखसंज्ञकमारोग्यं विकारो दुःखमेव च ॥ -- चरकसंहिता
रसरक्तादि धातुओं का वैषम्य (abnormal) होना ही विकार (रोग) है और उनका साम्य (सामान्य होना) प्रकृति (स्वास्थ्य) है। (सुख-दुःख कुछ और नहीं हैं बल्कि) निरोग होना ही सुख है तथा रोगग्रस्त होना ही दु:ख कहलाता है।
  • अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च।
वश्यश्च पुत्रोऽर्थकारी च विद्या षड्‌ जीवलोकस्य सुखानि राजन्‌॥
छः प्रकार के सुख प्राप्त होता है - धन की आवाक से , नित्य निरोग रहने से , प्रेम करने वाली ओर मधुर बोलने वाली भार्या (पत्नी) , आज्ञावान पुत्र , धन प्राप्त कराने वाली विद्या - यह इस जीवलोक के छह सुुुख हैं रााजा ।
  • यदा न कुरूते भावं सर्वभूतेष्वमंगलम्।
समदॄष्टेस्तदा पुंसः सर्वाः सुखमया दिशः॥
जब मनुष्य किसीका अमंगल हो ऐसा भाव नही रखता अर्थात् सभी का कल्याण हो ऐसी भावना रखने वाला , सभीको समान दृष्टि से देखने वाले पुरुष को सभी दिशाओं से सुख की प्राप्ति होती है । वह सर्वत्र सुख की अनुभूति करता है ।
  • संसार में प्रायः सभी जन सुखी एवं धनशाली मनुष्यों के शुभेच्छु हुआ करते हैं। विपत्ति में पड़े मनुष्यों के प्रियकारी दुर्लभ होते हैं।-- मृच्छकटिकम्
  • सुखिया सब संसार है, खाये अरु सोये।
दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोये॥ -- कबीरदास
  • कबिरा आप ठगाइए, और न ठगिए कोय ।
आप ठगे सुख होत है, और ठगे दुख होय ॥ -- कबीरदास
  • काहु न कोउ सुख दुख कर दाता।
निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥ -- रामचरितमानस, लक्ष्मण-निषाद सम्वाद
कोई किसी को सुख-दुख देने वाला नहीं है, अपितु सब अपने ही किए हुए कर्मों का फल भोगते हैं।
  • सुखो के भोग की लालसा आत्मसम्मान का सर्वनाश कर देती है। -- प्रेमचंद
  • मेरी हार्दिक इच्छा है कि मेरे पास जो भी थोड़ा-बहुत धन शेष है, वह सार्वजनिक हित के कामों में यथाशीघ्र खर्च हो जाए। मेरे अंतिम समय में एक पाई भी न बचे, मेरे लिए सबसे बड़ा सुख यही होगा। -- राजर्षि पुरुषोत्तम दास टण्डन
  • चाहे राजा हो या किसान , वह सबसे ज्यादा सुखी है जिसको अपने घर में शान्ति प्राप्त होती है। -- गेटे
  • अरहर की दाल औ जड़हन का भात
गागल निंबुआ औ घिउ तात
सहरसखंड दहिउ जो होय
बाँके नयन परोसैं जोय
कहै घाघ तब सबही झूठा
उहाँ छाँड़ि इहवैं बैकुंठा -- घाघ

इन्हें भी देखें[सम्पादन]