सामग्री पर जाएँ

हर्ष

विकिसूक्ति से
  • हर्षस्थान सहस्राणि भयस्थान शतानि च ।
दिवसे दिवसे मूढं आविशन्ति न पंडितम् ॥
मूर्ख मनुष्य के लिए प्राति दिन हर्ष के सौ कारण होते हैं तथा दुःख के लिए एक हजार कारण। परन्तु पण्डितों के मन का सन्तुलन ऐसे छोटे कारणों से नही बिगड़ता।
  • समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥ -- सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान
जिसके दोष (वात, पित्त और कफ) सम हों, अग्नि (जठराग्नि) सम हो, रस आदि सात धातुएँ सम हों, मल-विसर्जन की क्रिया का सम हो, जिसके आत्मा, इन्द्रिय और मन प्रसन्न हों - वह स्वस्थ कहलाता है। (यहाँ सम का अर्थ 'सामान्य' (normal) से है; न बहुत अधिक न बहुत कम।)
  • हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना॥
राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानंद परेस पुराना॥ -- रामचरितमानस
हर्ष, शोक, ज्ञान, अज्ञान, अहंता और अभिमान - ये सब जीव के धर्म हैं। राम तो व्यापक ब्रह्म, परमानंदस्वरूप, परात्पर प्रभु और पुराण पुरुष हैं। इस बात को सारा जगत जानता है।
  • आवत हिय हरषै नहीं, नैनन नहीं सनेह।
‘तुलसी’ तहाँ न जाइए, कंचन बरसे मेह॥ -- रामचरितमानस
जिस घर में जाने पर घर वाले लोग देखते ही प्रसन्न न हों और जिनकी आँखों में प्रेम न हो, उस घर में कभी न जाना चाहिए। उस घर से चाहे कितना ही लाभ क्यों न हो वहाँ कभी नहीं जाना चाहिए।

इन्हें भी देखें

[सम्पादन]