वैज्ञानिक विधि
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वैज्ञानिक विधि (scientific method) से आशय ज्ञान प्राप्त करने की उस विधि से है जो प्रयोगों पर आधारित हो।
उक्तियाँ
[सम्पादित करें]- वैज्ञानिक विधि पक्षपात, पूर्वाग्रह, और मन में पहले से बैठाये विचारों को नष्ट करने में सहायता करता है। इस विधि में यह अपेक्षित है कि कथनों की सावधानी से जाँच की जाय और अनुसन्धानकर्ता प्रयोग द्वारा पता करे कि क्या सम्भव है और क्या नहीं। वैज्ञानिक यह प्रशन पूछते हैं कि, "यहाँ हमारे पास क्या है", और उसके बाद इस भौतिक जगत की प्रकृति को जानने के लिये प्रयोग करने चल पड़ते हैं। इस प्रक्रिया में यह भी परमावश्यक है कि किसी के द्वारा किये गये प्रयोगों की जाँच दूसरों द्वारा भी की जाय और उन्हें भी वही परिणाम मिले जो पहले किये गये प्रयोगों में मिले थे। विज्ञान के क्षेत्र में सबसे बड़ा विकास यह अनुभव था कि हम केवल बुद्धि से समस्याओं का उत्तर नहीं पा सकते। -- Jacque Fresco, (2007), Designing the Future
- पञ्चावयवी वाक्य, प्राचीन विज्ञान की अनुसन्धान-विधि है। प्राचीन काल के आयुर्वेदाचार्य भी इस विधि का अनुसरण करते थे। पञ्चावयवी वाक्य के अन्तर्गत प्रतिज्ञा, हेतु, दृष्टान्त, उपनय और निगमन आते हैं। [१]
- अत्रासां तन्त्रयुक्तीनां किं प्रयोजनम्? उच्यते- वाक्ययोजनमर्थयोजनं च ॥ -- सुश्रुतसंहिता उत्तरतन्त्र
- इन तन्त्रयुक्तियों का क्या प्रयोजन है? कहा है कि इनके दो उपयोग हैं) - वाक्ययोजन (वाक्यों का उचित संयोजन) और अर्थयोजन (अर्थ का सही ढंग से प्रस्तुतीकरण या विन्यास)।
- अधीयानोऽपि तन्त्राणि तन्त्रयुक्त्यविचक्षणः।
- नाधिगच्छति तन्त्रार्थमर्थं भाग्यक्षये यथा॥ (अष्टांगहृदय की 'सर्वाङ्गसुन्दरा' टीका, पृष्ठ ९२)
- अर्थ : जिस प्रकार भाग्य के क्षय होने पर व्यक्ति को अर्थ (धन) की प्राप्ति नहीं होती है, उसी प्रकार यदि किसी ने तन्त्र (शास्त्र) का अध्ययन किया है किन्तु वह तन्त्रयुक्ति का उपयोग करना नहीं जानता तो वह शास्त्र का अर्थ नहीं समझ पाता है।
- यथाऽम्बुजवनस्यार्कः प्रदीपो वेश्मनो यथा
- प्रबोधस्य प्रकाशार्थं तथा तन्त्रस्य युक्तयः ॥ -- चरकसंहिता सूत्रस्थान 12.46
- एकस्मिन्नपि यस्येह शास्त्रे लब्धास्पदा मतिः ।
- स शास्त्रमन्यदप्याशु युक्तिज्ञत्वात् प्रबुध्यते॥ -- चरकसंहिता सूत्रस्थान 12.47
- भावार्थ : कमल के विकास में सूर्य की रश्मियां हेतु भूत हैं, और जैसे दीपक सम्पूर्ण घर को प्रकाशित कर देता है उसी प्रकार तन्त्रयुक्तियां भी शास्त्र के गभीर अर्थों को प्रकाशित करती हैं। जिस किसी भी अध्येता अथवा पाठक की मति अथवा जिस किसी भी मनुष्य की बुद्धि किसी एक शास्त्र में भी प्रविष्ट हो जाती है, ऐसा व्यक्ति अन्य गभीर शास्त्रों को भी अल्प प्रयास से और द्रुत गति से शास्त्र में प्रविष्ट हो जाता है। वहां भी युक्तिज्ञत्व ही हेतु है।
- बुद्धिः पश्यति यान् भावान् बहुकारणयोगजान् ।
- युक्तिस्त्रिकाला सा ज्ञेया त्रिवर्गः साध्यते यया ॥ -- चरकसंहिता, सूत्रस्थान 11.25
- जिसके माध्यम से धर्म, अर्थ, काम - इस त्रिवर्ग की सिद्धि होती है अथवा विज्ञात अर्थ में कारण उपपत्ति दर्शन के कारण से अविज्ञातार्थ का भी अवधारण युक्ति से ही किया जाता है। ज्ञातार्थ में सङ्गति देखकर अविदितार्थ में उसके समान ही विशेष रूप से निश्चय करना युक्ति है।
- असद्वादिप्रयुक्तानां वाक्यानां प्रतिषेधनम् ।
- स्ववाक्यसिद्धिरपि च क्रियते तन्त्रयुक्तितः ॥५॥
- व्यक्ता नोक्तास्तु ये ह्यार्था लीना ये चाप्यनिर्मलाः ।
- लेशोक्ता ये च केचित्स्युस्तेषां चापि प्रसाधनम् ॥६॥
- यथाऽम्बुजवनस्यार्कः प्रदीपो वेश्मनो यथा ।
- प्रबोधस्य प्रकाशार्थं तथा तन्त्रस्य युक्तयः ॥७॥ (तन्त्रयुक्त्यध्यायः / सुश्रुतसंहिता )
- अर्थात तन्त्रयुक्तियों के उपयोग ये हैं-
- असद् आदि वाक्यों का प्रतिषेध
- स्ववाक्यसिद्धि
- व्यक्त, लेशोक्त, नोक्त (न + उक्त), लीन, अनिर्मल आदि विचारों को स्पष्ट करना[२]
- जिस प्रकार सूर्य कमल को खिला देता है, उसी प्रकार प्रबोध को प्रकाशित करने के लिये यन्त्रयुक्तियों का उपयोग किया जाता है।