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प्रश्न

विकिसूक्ति से
  • वैज्ञानिक मस्तिष्क उतना अधिक उपयुक्त उत्तर नही देता जितना अधिक उपयुक्त वह प्रश्न पूछता है।
  • भाषा की खोज प्रश्न पूछने के लिये की गयी थी। उत्तर तो संकेत और हाव-भाव से भी दिये जा सकते हैं, पर प्रश्न करने के लिये बोलना जरूरी है। जब आदमी ने सबसे पहले प्रश्न पूछा तो मानवता परिपक्व हो गयी। प्रश्न पूछने के आवेग के अभाव से सामाजिक स्थिरता जन्म लेती है। -- एरिक हाफर
  • प्रश्न और प्रश्न पूछने की कला, शायद सबसे शक्तिशाली तकनीक है।
  • सही प्रश्न पूछना मेधावी बनने का मार्ग है।
  • कोई भी प्रश्न मूर्खतापूर्ण-प्रश्न नहीं होते औरे कोई भी तभी मूर्ख बनता है जब वह प्रश्न पूछना बन्द कर दे। -- स्टीनमेज
  • जो प्रश्न पूछता है वह पाँच मिनट के लिये मूर्ख बनता है लेकिन जो नही पूछता वह जीवन भर मूर्ख बना रहता है।
  • सबसे चालाक व्यक्ति जितना उत्तर दे सकता है, सबसे बड़ा मूर्ख उससे अधिक पूछ सकता है।

विभिन्न प्रश्न[सम्पादन]

यक्ष प्रश्न[सम्पादन]

यक्ष-युधिष्ठिर संवाद, महाभारत में है।

  • को मोदते किमाश्चर्यं कः पन्थाः का च वार्तिका ।
ममैतांश्चतुरः प्रश्नान् कथयित्वा जलं पिब ॥
कौन व्यक्ति आनन्दित या सुखी है? इस सृष्टि का आश्चर्य क्या है? जीवन जीने का सही मार्ग कौन-सा है? रोचक वार्ता क्या है? मेरे इन चार प्रश्नों का उत्तर देने के बाद तुम जल पी सकते हो।
  • पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा शाकं पचति स्वे गृहे ।
अनृणी चाप्रवासी च स वारिचर मोदते ॥
हे जलचर (जलाशय में निवास करने वाले यक्ष), जो व्यक्ति पांचवें-छठे दिन ही सही, अपने घर में शाक (सब्जी) पकाकर खाता है, जिस पर किसी का ऋण नहीं है और जिसे परदेस में नहीं रहना पड़ता, वही मुदित-सुखी है।
  • दिने दिने हि भूतानि प्रविशन्ति यमालयम्।
शेषास्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥
प्रतिदिन ही प्राणी यम के घर में प्रवेश करते हैं, शेष प्राणी अनन्त काल तक यहाँ रहने की इच्छा करते हैं। क्या इससे बड़ा कोई आश्चर्य है?
  • अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।
शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥
प्रतिदिन ही प्राणी यम के घर में प्रवेश करते हैं, शेष प्राणी अनन्त काल तक यहाँ रहने की इच्छा करते हैं। इससे बड़ा और क्या आश्चर्य हो सकता है !
  • तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना नैको ऋषिर्यस्य मतं प्रमाणम् ।
धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायाम् महाजनो येन गतः सः पन्थाः ॥
जीवन जीने के असली मार्ग के निर्धारण के लिए कोई सुस्थापित तर्क नहीं है। श्रुतियां (शास्त्र तथा अन्य स्रोत) भी अलग-अलग बातें करती हैं। ऐसा कोई ऋषि/चिन्तक/विचारक नहीं है जिसके वचन प्रमाण कहे जा सकें। वास्तव में धर्म का रहस्य तो गुहा (गुफा) में छिपा है, यानी बहुत गूढ़ है। ऐसे में समाज में प्रतिष्ठित व्यक्ति जिस मार्ग को अपनाता है वही अनुकरणीय है ।
  • अस्मिन् महामोहमये कटाहे सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन ।
मासर्तुदर्वीपरिघट्टनेन भूतानि कालः पचतीति वार्ता ॥
काल (यानी निरंतर प्रवाहशील समय) सूर्य रूपी अग्नि और रात्रि-दिन रूपी ईंधन से तपाये जा रहे भवसागर रूपी महा मोहयुक्त कढ़ाई में महीने तथा ऋतुओं के कलछे से उलटते-पलटते हुए जीवधारियों को पका रहा है । यही प्रमुख वार्ता (खबर) है।

केनोपनिषद[सम्पादन]

  • केनेषितं पतति प्रेषितं मनः
केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः ।
केनेषितां वाचमिमां वदन्ति
चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ -- केनोपनिषद् , प्रथम मन्त्र
किसके द्वारा प्रेषित यह मन बाण की भांति अपने लक्ष्य पर जाकर गिरता है? किसके द्वारा नियुक्त प्रथम प्राण अपने पथ पर आगे बढ़ता है? किसके द्वारा प्रेरित है यह वाणी जिसे मनुष्य बोलते हैं? कौन है वह देव जिसने चक्षु और कर्ण को उनकी क्रियाओं में नियुक्त कर दिया है?
  • का ते कान्ता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमतीव विचित्रः।
कस्य त्वं कः कुत आयातस्तत्त्वं चिन्तय यदिदं भ्रान्तः ॥ -- आदि शङ्कराचार्य द्वारा रचित भजगोविन्दम् से
कौन तेरी स्त्री है, कौन तेरा पुत्र है, अरे यह संसार बड़ा विचित्र है। तू इसी तत्त्व का निरन्तर विचार कर कि तू कौन है, किसका है, और कहां से आया है। भ्रान्त मत हो और गोविन्द को भजो।

भज गोविन्दम्[सम्पादन]

  • कस्त्वं कोऽहं कुत आयातः
का मे जननी को मे तातः ।
इति परिभावय सर्वमसारम्
विश्वं त्यक्त्वा स्वप्न विचारम् ॥ -- आदि शङ्कराचार्य द्वारा रचित भजगोविन्दम् से
तुम कौन हो, मैं कौन हूँ, हम कहाँ से आये हैं, मेरी माँ कौन है, मेरे पिता कौन हैं - इस प्रकार सबको असार (सार रहित) समझते हुए तथा इस विश्व को स्वप्न में आये विचार जैसा समझकर ( तू निरन्तर गोविन्द का ही भजन कर )।

चरकसंहिता[सम्पादन]

चरकसंहिता में शारीरस्थानम् में पुरुष के संबंध में अनेक प्रश्न उठाकर उनका उत्तर दिया गया है। जिसमें सांख्य दर्शन का पूर्ण प्रभाव परिलक्षित होता है।

कतिधा पुरुषो धीमन्! धातुभेदेन भिद्यते। पुरुषः कारणं कस्मात्, प्रभवः पुरुषस्य कः॥३॥
किमज्ञो ज्ञः, स नित्यः किं किमनित्यो निदर्शितः। प्रकृतिः का, विकाराः के, किं लिङ्गं पुरुषस्य च॥४॥
निष्क्रियं च स्वतन्त्रं च वशिनं सर्वगं विभुम्। वदन्त्यात्मानमात्मज्ञाः क्षेत्रज्ञं साक्षिणं तथा॥५॥
निष्क्रियस्य क्रिया तस्य भगवन्! विद्यते कथम्। स्वतन्त्रश्चेदनिष्टासु कथं योनिषु जायते॥६॥
वशी यद्यसुखैः कस्माद्भावैराक्रम्यते बलात्। सर्वाः सर्वगतत्वाच्च वेदनाः किं न वेत्ति सः॥७॥
न पश्यति विभुः कस्माच्छैलकुड्यतिरस्कृतम्। क्षेत्रज्ञः क्षेत्रमथवा किं पूर्वमिति संशयः॥८॥
ज्ञेयं क्षेत्रं विना पूर्वं क्षेत्रज्ञो हि न युज्यते। क्षेत्रं च यदि पूर्वं स्यात् क्षेत्रज्ञः स्यादशाश्वतः॥९॥
साक्षिभूतश्च कस्यायं कर्ता ह्यन्यो न विद्यते। स्यात् कथं चाविकारस्य विशेषो वेदनाकृतः॥१०॥
अथ चार्तस्य भगवंस्तिसृणां कां चिकित्सति। अतीतां वेदनां वैद्यो वर्तमानां भविष्यतीम्॥११॥
भविष्यन्त्या असम्प्राप्तिरतीताया अनागमः। साम्प्रतिक्या अपि स्थानं नास्त्यर्तेः संशयो ह्यतः॥१२॥
कारणं वेदनानां किं, किमधिष्ठानमुच्यते। क्व चैता वेदनाः सर्वा निवृत्तिं यान्त्यशेषतः॥१३॥
सर्ववित् सर्वसन्न्यासी सर्वसंयोगनिःसृतः। एकः प्रशान्तो भूतात्मा कैर्लिङ्गैरुपलभ्यते॥१४॥

अग्निवेश, अत्रेय जी से पूछते हैं- हे बुद्धिमन्![१]

धातु-भेद से पुरुष पुरुष कितने प्रकार का है? यह पुरुष कारण (कर्ता) कैसे है? पुरुष को उत्पन्न करने वाला कौन है? ॥३॥
वह पुरुष क्या अज्ञ (ज्ञानरहित) है अथवा ज्ञानी है? क्या वह नित्य है अथवा अनित्य बताया गया है? प्रकृति कौन है? विकार कौन से हैं? और पुरुष का लिङ क्या है (जिससे वह अनुमान द्वारा जाना जाता है)? ॥४॥
आत्मज्ञानी लोग आत्मा को क्रियारहित, स्वतन्त्र, वशी (सब भौतिक पदार्थों को वश में रखने वाला), सर्वगत, विभु (सर्वव्यापक), क्षेत्रज्ञ तथा साक्षी बताते हैं। ('तथा' से यहाँ निर्विकार का अर्थ भी ग्रहण करना चाहिये।) ॥५॥
हे भगवन् ! उस निष्क्रय आत्मा की क्रिया किस प्रकार होती है? यदि वह स्वतन्त्र है तो अनि अनिष्ट-अप्रिय योनियों में वह किस प्रकार उत्पन्न होता है? (अर्थात् यदि वह स्वाधीन है तो वह क्यों कीड़े-मकोड़े आदि बुरी योनियों में जाय, क्योंकि कोई भी अपनी इच्छा से अप्रिय स्थान पर जाना नहीं चाहता।) ॥६॥
यदि वशी है तो बलात् दुःखकर भावों से आक्रान्त क्यों होता है? (अर्थात् यदि वह सबको वश में रखनेवाला है तो दुःखकर भावों से उसके आक्रान्त होने में आप क्या हेतु समझते हैं?) आत्मा सर्वगत है तो सब वेदनाओं को क्यों नहीं चाहता? || ७ ||
विभु आत्मा पर्वत वा दीवार आदि के पीछे छिपी वस्तु को क्यों नहीं देख पाता? यदि आत्मा क्षेत्रज्ञ है तो यह संशय होता है कि क्या क्षेत्रज्ञ पूर्व होगा वा क्षेत्र पूर्व है॥ ८॥
यदि क्षेत्रज्ञ पूर्व मानें तो वह हमारी समझ में नहीं आता। क्योंकि ज्ञेय है क्षेत्र। जब ज्ञेय ही नहीं तो शाता कहाँ से? अतएव क्षेत्रज्ञ का पूर्व होना युक्तिसंगत नहीं । यदि हम क्षेत्र को पूर्व मानें तो क्षेत्रज्ञ (आत्मा) को अशाश्वत-अनित्य मानना होगा। (क्योंकि क्षेत्र के बाद आत्मा उत्पन्न हुआ)॥९॥
जब आत्मा के अतिरिक्त अन्य कर्ता ही नहीं है तो यह साक्षी किसका है? ( एक व्यक्ति कर्म करता है और दूसरा उसको देखता है वह देखनेवाला व्यक्ति साक्षी कहाता है, परन्तु जब कोई अन्य कर्ता ही नहीं तो हम आत्मा को साक्षी कैसे स्वीकार करें?) आत्मा को अविकार (विकाररहित) कहा जाता है। अर्थात् उसमें किसी प्रकार परिवर्तन नहीं होता। यदि वह अविकार है तो वेदनाजन्य भिन्नता उसमें कैसे होती है?( अर्थात सुख-दुःख से उसमें भिन्नता क्योंकर होती है?)॥१०॥
हे भगवन् ! भूत, वर्तमान वा भविष्यत् - इन तीन प्रकार की वेदनाओं ( रोगों) में से वैद्य रोगी के किस रोग की चिकित्सा करता है? ॥११॥
भविष्यत् वेदना की चिकित्सा तो वह कर ही नहीं सकता, क्योंकि वह तो अभी तक पहुँची ही नहीं। जो भूत वेदना है वह वापिस नहीं आ सकती। जो वर्तमान पीड़ा है वह भी स्थिर नहीं, क्योंकि सब भावों का स्वभाव नित्य गमन करने का है। काल भी नित्यग है। जब संवत्सर रूपी काल और आतुरावस्था रूपी काल नित्यग हैं तो रोग की चिकित्सा नहीं हो सकती । क्योंकि ज्यों ही हम रोगी की वेदना का विचार करेंगे वैसे ही नयी अवस्था आ पहुँचेगी और इस प्रकार चिकित्सा असम्भव होगी । अतएव हमको यह संशय होता है कि वैद्य किस वेदना की चिकित्सा करता है॥१२॥
वेदनाओं का क्या कारण है? उनका अधिष्ठान (आश्रय ) क्या है? और ये सब वेदनायें सम्पूर्णतया कहाँ निवृत्त होती हैं? ॥१३॥
सर्वज्ञ, सर्वत्यागी, सब संयोगों से हटा हुआ, प्रशान्त भूतात्मा को किन लिङ्गों (लक्षणों) से जान सकते हैं? || १४ ||

प्रश्नोत्तररत्नमालिका[सम्पादन]

प्रश्नोत्तररत्नमालिका एक संस्कृत ग्रन्थ है जिसमें १८१ प्रश्नोत्तर सहित ६७ श्लोक हैं। यह रचना वैदिक धर्म के सनातन मूल्यों को प्रश्नोत्तर के रूप में प्रस्तुत करती है जो देश, काल एवं परिस्थिति से परे है।

  • भगवन् किमुपादेयं गुरुवचनं हेयमपि च किमकार्यम् ।
को गुरुरधिगततत्त्वः सत्त्वहिताभ्युद्यतः सततम् ॥[२]
भगवन् ! उपादेय (अर्थात् ग्रहण करने योग्य) क्या है? गुरुजनों के वचन । और हेय (त्यागने योग्य) क्या है?। अकार्य (नहीं करने योग्य कार्य)। गुरु कौन है? जिसने तत्त्व को समझ लिया है, जान लिया है तथा जो निरन्तर जगत के जीवों का हित करने में लगा हुआ हो।
  • किं संसारे सारम् बहुशोऽपि चिन्त्यमानं इदमेव ।
किं मनुजेषु इष्टतमम् स्वपरहिताय उद्यतं जन्म ॥
संसार का सार क्या है? — उस तत्व के लिए निरंतर चिंतन करना ।
मनुष्य के लिए इष्ट क्या है? — स्वयं के और दूसरों के लिए जीवन समर्पित करना ।
  • मदिरेव मोहजनकः कः स्नेहः के च दस्यवः विषयाः।
का भववल्ली तृष्णा को वैरी यस्तु अनुद्योगः ॥
मदिरा की तरह मोहजनक (भ्रामक ) क्या है? स्नेह । चोर कौन हैं? विषय (इन्द्रिय सुख)।
जन्म का कारण क्या है? तृष्णा (इच्छा) । शत्रु कौन है? जो बेकार बैठा है।
  • किं जीवितम् अनवद्यम् किं जाड्यम् पाठतोऽपि अनभ्यासः ।
को जागर्ति विवेकी का निद्रा मूढता जन्तोः ॥
जीवित कौन है? जो निष्कलंक है। मूर्खता क्या है? जो सीखा हुआ है, उसका अभ्यास न करना।
जागृत कौन है? जो विवेकी है। निद्रा क्या है? मनुष्य की अज्ञानता ।
  • को नरकः परवशता किं सौख्यम् सर्वसङ्ग विरतिः या ।
किं साध्यम् भूतहितम् प्रियं च किं प्राणिनाम् असवः॥
नरक क्या है? दूसरों के वश में रहना। सुख क्या है? सभी के साथ विरक्ति।
प्राप्त करने योग्य क्या है? प्राणीमात्र का हित । प्राणीमात्र को प्रिय क्या है ? अपना जीवन।
  • को अहर्निशं अनुचिन्त्या संसार असारता, न तु प्रमदा ।
का प्रेयसी विधेया करुणा दीनेषु सज्जने मैत्री ॥
दिन-रात किसके बारे में सोचते रहना चाहिये? संसार की क्षणिकता, न कि स्त्री की सुन्दरता ।
किससे प्रेम करना चाहिये? दीन व्यक्ति के प्रति करुणा, और सज्जनों से मैत्री ।
  • को अन्धः यो अकार्यरतः को बधिरः यो हितानि न शृणोति ।
को मूकः यो काले प्रियाणि वक्तुं न जानाति ॥
अंधा कौन है? जो बुरे कर्मों में लिप्त है । बहरा कौन है ? जो अपने हित की बातें नहीं सुनता ।
मूक कौन है? सही समय पर जो सही बात नहीं बोलता।

अन्य[सम्पादन]

  • कः कालः कानि मित्राणि को देशः कौ व्ययागमौ ।
कश्चाहं का च मे शक्तिरिति चिन्त्यं मुहुर्मुहुः ॥
कैसा समय (परिस्थिति) है, कौन मेरे मित्र हैं, मैं किस देश में हूँ, मेरी आय और व्यय कितना है, में कौन हूँ और मुझ में कितनी शक्ति है, इन विषयों पर बारम्बार विचार करना करना चाहिये। (और तदनुसार आचरण करना चाहिये )
  • कोऽरुक् कोऽरुक् कोऽरुक् हितभुग् मितभुग् जितेन्द्रियो नियतः।
कोऽरुक् कोऽरुक् कोऽरुक् शतपदगामी च वामशायी च॥ -- शुक रूपधारी धन्वन्तरि का प्रश्न और महान आयुर्वेदाचार्य वाग्भट का उत्तर
कौन निरोग रहता है, कौन निरोग रहता है, कौन निरोग रहता है? हितकारी (पोषक तत्वों से युक्त) भोजन करने वाला, कम मात्रा में भोजन करने वाला और इन्द्रियों को नियन्त्रण में रखने वाला निरोग रहता है।
कौन निरोग रहता है, कौन निरोग रहता है, कौन निरोग रहता है? सौ कदम चलने वाला और बाएँ तरफ करवट लेटकर सोने वाला निरोगी होता है।

इसका दूसरा रूप भी प्रचलित है-

  • कोऽरुक् कोऽरुक् कोऽरुक्
हितभुग् मितभुग् ऋतुभुग् ।
कौन निरोग रहता है? कौन निरोग रहता है? कौन निरोग रहता है? हितकारी भोजन करने वाला, अल्प मात्रा में भोजन करने वाला और ऋतु के अनुसार भोजन करने वाला निरोग रहता है।
  • किं भाग्यं देहवतामारोग्यं कः फली ? कृषिकृत् ।
कस्य न पापं ? जपतः, कः पूर्णो ? यः प्रजावान् स्यात ॥ -- शंकराचार्य
मनुष्यों के लिए (वस्तुतः) भाग्य कौन-सा है ? आरोग्य। किसको फल मिलता है? कृषि करने को। पाप किसको नहीं लगता? जप करने वाले को। पूर्ण कौन है ? बालबच्चेवाला ।
  • को धर्मों भूतदयाः किं सौख्यं नित्यमरोगिता जगति ।
कः स्नेहः सद्भावः किं पाण्डित्यं परिच्छेदः ॥ -- हितोपदेश
धर्म कौन सा (श्रेष्ठ) है? प्राणिमात्र पर दया करना। सुख क्या है? सदैव व्याधिमुक्त रहना। स्नेह कौन सा है ? (प्राणिमात्र के प्रति) सद्भाव रखना। पाण्डित्य कौन सा है ? परिच्छेद ।
(परिच्छेद = युक्तायुक्त, हिताहित, न्याय्यान्याय्य इत्यादि में भेद करके निर्णय करने की बुद्धिमत्ता।)
  • इह भवता यदिष्टं ‘सर्ववर्ण प्रधानं ब्राह्मणवर्ण’ इति, वयमत्र ब्रूमः कोऽयं ब्राह्मणो नाम। किं जीवः किं जातिः किं शरीरं किं ज्ञानं, किमाचारः किं कर्म किं वेद इति। -- वज्रसुचि उपनिषद्
आपकी जो यह इच्छा है कि 'सभी वर्णों में ब्राह्मण वर्ण प्रधान हो' तो यहाँ बताते हैं कि यह ब्राह्मण कौन है? क्या आत्मा ब्राह्मण है, क्या जाति ब्राह्मण है, क्या शरीर ब्राह्मण है, क्या आचार ब्राह्मण है, क्या कर्म ब्राह्मण है, क्या ज्ञान (वेद) ब्राह्मण है?

इन्हें भी देखें[सम्पादन]

सन्दर्भ[सम्पादन]