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संसार

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संसार, जगत या विश्व।

  • गच्छति इति जगतः।
यह चलता हैं इसलिये जगत कहलाता है।
  • संसार विषवृक्षस्य द्वे फले ह्यमृतोमपे ।
सुभाषित रसस्वादः सङ्गतिः सुजनैः सह॥
संसार के विषैले वृक्ष पर केवल दो फल अमृत के समान हैं - सुभाषितों का रस स्वाद और अच्छे लोगों की संगति।
  • यह ऐसा संसार है जैसा सेमल फूल।
दिन दस के व्यवहार में झूठे रंग न भूल।। -- कबीरदास
  • असारे अस्मिन संसारे सारं श्वसुर मन्दिरम्।
हरो हिमालये शेते हरि: शेते महोदधौ ॥
इस सारहीन जगत में केवल श्वशुर का घर रहने योग्य है । इसी कारण शंकर भगवान हिमालय में रहते है और विष्णु क्षीरसागर में।
  • परिवर्तिनि संसारे मॄतः को वा न जायते ।
स जातो येन जातेन याति वंशः समुन्न्तिम् ॥ -- नितीशतक
इस परिवर्तनशील संसार में कौन नहीं मरता है? लेकिन उसीका जन्म, जन्म होता है जिसके जन्मने से कुल का गौरव बढता है।
  • तुलसी इस संसार में, भांति भांति के लोग ।
सबसे हस मिल बोलिए, नदी नाव संजोग ॥
अर्थ:– तुलसीदास जी कहते हैं कि इस संसार में भांति-भांति के अर्थात विभिन्न व्यवहार स्वभाव और प्रभाव वाले लोग रहते हैं। इस संसार में सुख पूर्वक जीने के लिए हमें सबसे हंस बोल कर अच्छा व्यवहार करते हुए संसार-सागर को पार करना चाहिए। संसार में आकर हमारा लोगों से मिलना वैसे ही है जैसे नदी पार करते समय नाव में लोगों से मिलना होता है। नाव में भी भांति-भांति के लोग होते हैं और उनका साथ बहुत ही अल्प समय के लिये होता है।
  • माघ मास लहि टेसुआ मीन परे थल और
त्यों रहीम जग जानिए, छुटे आपुने ठौर॥
अर्थ: माघ मास आने पर टेसू (पलाश ) के वृक्ष और पानी से बाहर पृथ्वी पर आ पड़ी मछली की दशा बदल जाती है। इसी प्रकार संसार में अपने स्थान से छूट जाने पर संसार की अन्य वस्तुओं की दशा भी बदल जाती है।

इन्हें भी देखें

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