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वर्ण

विकिसूक्ति से

सनातन धर्म में चार वर्ण माने गये हैं, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।

उक्तियाँ[सम्पादन]

  • समानी प्रण सह वो अन्नभागः समनि योक्त्रे सह वो पुर्नाज्म।
सभ्यंचो अग्नि सपर्यत आरानाभि मिवाऽमितः॥ -- अथर्ववेद
ऐ मनुष्यो! तुम लोगों की पानी पीने की तथा भोजन करने की एक ही जगह हों, समान धुरा मैं मैंने तुम सबको समानता से जोत दिया है। जिस प्रकार एक चक्र के बीच आरे जमे रहते हैं उसी प्रकार तुम भी एक जगह एकत्रित होकर अग्नि मैं हवन करो।
  • शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् ।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥ -- मनुस्मृति १०.६५
विद्या (कर्म) के अनुसार ब्राह्मण शूद्रता को प्राप्त हो जाता है और शूद्र ब्राह्मणत्व को। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न संतान भी अन्य वर्णों को प्राप्त हो जाया करती हैं।
  • जन्मना जायतेशूद्रः संस्काराद् द्विज उच्यते।
वेद्भ्यासी भवेद्विप्रः ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः॥
जन्म से तो सभी शूद्र होते हैं। द्विज कहलाता उनके संस्कारों की वजह से है। यदि वह वेदाध्ययन करने वाला है तो वह विप्र कहलायेगा और जो ब्रह्म को जानता है वह ब्राह्मण कहलाता है।
  • सामग्रयानुष्ठाननयुणौः सयम्राः
शूद्रायतः सन्ति समाद्विजानाम्
तस्माद्विशेषो द्विजशूद्रनाम्नो-
नाध्यात्मिको बाह्यनिमित्तकोवा । -- भविष्यपुराण
सामान्य शूद्र और सामान्य ब्राह्मण, ये दोनों सामग्री और अनुष्ठान समान ही है, इसीलिये ब्राह्मण और शूद्र भी वाध्य या आध्यात्मिक कोई भेद नहीं हैं।
  • तस्मान्नच विभेदोऽस्ति न वहिर्मान्तरात्मनि!
न सुखादौ न चाश्वैर्ये नाज्ञाया न भयेष्वपि।
न वीर्ये नाकृतौ नाक्षे न व्यापारे न चायुषि।
नाँगे पुष्टे न दौर्बल्ये न स्थैर्ये नापि चापले।
न प्रज्ञाया न वैरग्ये न धैर्ये न पराक्रमे॥
न त्रिवर्गे न नैपुण्ये न रुपादौ न भेषजे।
न स्त्रीगर्भे न गमते न दह मलसंप्लवं।
नास्थि रंध्रे न च प्रेम्णि न प्रमाणे न लोमसु ॥ -- भविष्यपुराण
जाति-भेद में और सम्प्रदाय-सम्प्रदाय में कोई भेद नहीं है। भेद न तो बाहर है न भीतर, न सुख में, न ऐश्वर्य में, न आज्ञा में, न भय में, न वीर्य में, न आकृति में, न ज्ञान-दृष्टि में, न व्यापार में, न आयु में, न अंग की पुष्टि में, न दुर्बलता में, न स्थिरता में, न चंचलता में, न बुद्धि में, न वैराग्य में, न रूपादि में, न औषध में, न स्त्रीगर्भ में, न गमन में, न देह के मल-मोचन में, न हड्डी के छेद में, न प्रेम में, न प्रमाण में और न लोभ में।
  • न योनिर्नापि संस्कारों न श्रुतिर्नच सन्ततिः।
कारणानि द्विजत्वस्य वृत्तमिव तु कारणम्।
सर्वोऽयं ब्राह्मणो लोके वृत्तेन तु विधीयते।
वृत्ते स्थितश्च शूद्रोऽपि ब्राह्मणत्वं चगच्छति।
ब्रह्मत्वभावः सुश्रोणि, समः सर्वत्र में मतः।
निगुणाँ निमलं ब्रह्म यत्र तिष्ठति स द्विजः॥ -- ब्रह्मपुराण
जाति, संस्कार श्रुति और स्मृति से कोई द्विज नहीं होता, केवल चरित्र से ही होता है। इस लोक में चरित्र से ही सबके ब्राह्मणत्व का विधान है। सद्वृत्त में स्थित शूद्र भी ब्राह्मणता को प्राप्त होता है। ब्राह्मण वही है जिसमें निर्मल, निर्गुण ब्रह्मज्ञान हो।
  • नामागरिष्टय पुत्रौ द्वौ वैश्यौ ब्राह्मणताँ गतो। -- हरिपुराण
नाभगरिष्ट के दो पुत्र वैश्य से ब्राह्मण हो गये थे।
  • पोरवस्य महाराज ब्रह्मर्षीः कौशिकस्यच।
सम्बन्धो ह्यास्य वंशेऽस्मिन् ब्रह्मक्षत्रस्य विश्रुतः॥
पुरुपंशीय राजा और ब्रह्मर्षि कौशिक ये दोनों क्षत्रिय ब्राह्मण वंश परस्पर सम्बन्ध है, यह बात लोक प्रसिद्ध है।
  • ब्राह्मणाक्षत्रिया वैश्याः शूद्रद्रोहिजनस्तिथा।
भाविताः पूर्णजा तीषु कर्मभिश्चशुभाशुभैः॥ -- वायुपुराण
सृष्टि के आदि काल में कर्मों के शुभ या अशुभ होने के अनुसार ब्राह्मण आदि वर्ण बनाये गये थे।
  • स्थितो ब्राह्मण्यमुपजीवति । -- ब्रह्मपुराण
ब्राह्मण धर्म के आचरण और ब्राह्मण जीविका के अवलम्बन से क्षत्रिय और वैश्य भी ब्राह्मण हो जाते हैं।
  • कर्मणा दुष्कृतेनेह स्थानाद्भ्रश्यति वै द्विजः।
ज्येष्ठं वर्णमनुप्राप्य तस्माद्रक्षेत वै द्विजः ॥ -- महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय १४३, ७
अर्थात्- दुष्कर्म करने से द्विज वर्णस्थ अपने वर्णस्थान से पतित हो जाता है। अतः बड़े वर्ण को प्राप्त करके द्विज को उसकी रक्षा करनी चाहिये (उसके अनुरूप आचरण करना चाहिये।)
  • यस्तु विप्रत्वमुत्सृज्य क्षात्रं धर्मं निषेवते ।
ब्राह्मण्यात्स परिभ्रष्टः क्षत्रयोनौ प्रजायते ॥ -- महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय १४३, ९
क्षत्रियों जैसे कर्म करने वाला ब्राह्मण भ्रष्ट होकर क्षत्रिय वर्ण का हो जाता है। ब्राह्मणत्व से परिभ्रष्ट मनुष्य क्षत्रिय योनि में जन्म लेता है।
  • स द्विजो वैश्यतामेति वैश्यो वा शूद्रतामियात् ।
स्वधर्मात्प्रच्युतो विप्रस्ततः शूद्रत्वमाप्नुते ॥ -- महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय १४३, ११
वैश्य वाले कर्म करने वाला द्विज वैश्य हो जाता है और शूद्र का काम करने वाला वैश्य, शूद्र वर्ण का हो जाता है। अपने धर्म से प्रच्युत विप्र वैसे-वैसे शूद्र हो जाता है।
  • एभिस्तु कर्मभिर्देवि शुभैराचरितैस्तथा।
शूद्रो ब्राह्मणतां याति वैश्यः क्षत्रियतां व्रजेत्॥ -- महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्याय १४३ श्लोक २६
हे देवि ! इन कर्मों के पालन करने से तथा शुभ आचरण से शूद्र भी ब्राह्मण बन जाता है और वैश्य क्षत्रिय हो जाता है।
  • शूद्रे तु यत् भवेत् लक्ष्म द्विजे तच्च न विद्यते।
न वै शूद्रो भवेत् शूद्रो ब्राह्मणो न च ब्राह्मणः॥ -- महाभारत, वनपर्व 180.19; शान्तिपर्व 188.1
अर्थात्-शूद्र में जो लक्षण या कर्म होते हैं वे ब्राह्मण में नहीं होते। ब्राह्मण के कर्म और लक्षण शूद्र में नहीं होते। यदि शूद्र में शूद्र वाले लक्षण न हों तो वह शूद्र नहीं होता और ब्राह्मण में ब्राह्मण वाले लक्षण न हों तो वह ब्राह्मण नहीं होता। अभिप्राय यह है कि लक्षणों और कर्मों के अनुसार ही व्यक्ति उस वर्ण का होता है जिसके लक्षण या कर्म वह ग्रहण कर लेता है।
  • वर्णेर्त्कषमवाघ्नोति नरः पुण्येन कर्मण।
दुर्लभं तमलब्धवा हि हन्यात् पापेन कर्मणा॥ -- महाभारत, शान्तिपर्व
पुण्य कर्म करने से उच्च वर्ण को प्राप्त होता है और पाप कर्म करने से नीचता प्राप्त होती है।
  • कर्मभिः शुचिभिर्देवि शुद्धात्मा विजितेन्द्रियः।
शुद्रोपि द्विजवत्सेव्य इति ब्रह्माऽब्रवीत् स्वयम्॥ -- महाभारत
हे देवि ! शूद्र भी यदि जितेन्द्रिय होकर सत्कर्मों के अनुष्ठान से अपना अन्त:करण शुद्ध बना लेता हैं, तो वह भी द्विज की भांति आदरणीय बनता हैं, यह साक्षात ब्रह्माने कहा हैं।
  • एक वर्णमिद पूर्ण विश्वमासीद युधिष्ठिर।
कर्मक्रिया विभेदेन चातुर्वणर्य प्रतिष्ठतम्॥
सर्वे वै योनिजा मर्त्याः सर्वे मूत्रपुरीषजाः।
एकेन्द्रियेन्द्रियार्थाश्च तम्माच्छीलगुरौर्द्विजः॥
शूद्रोऽपि शीलसम्पन्नो गुणवान् ब्रह्मणो भवेत्।
ब्राह्मणोऽपि क्रियाहीनः शूद्रत् प्रत्यवरो भवेत्॥ -- महाभारत, वनपर्व
हे युधिष्ठिर! इस जगत में पहले एक ही वर्ण था। आगे चलकर गुणकर्म के विभाग हो जाने से चार वर्ण हुए। सब मनुष्य योनि से ही उत्पन्न हुए हैं, सब लोगों की उत्पत्ति रज और वीर्य के मिश्रण से ही है। सबकी इन्द्रियाँ समान हैं। इसलिये जन्म से जातिभेद मानना ठीक नहीं। जिस मनुष्य में शील की प्रधानता होती है, वह द्विज कहलाता है। यदि शूद्र शीलवान हो तो उसे द्विज ही समझना चाहिये और यदि ब्राह्मण शीलता से परे हो तो उसे शूद्र से भी नीच समझना चाहिये।
  • शूद्रोऽप्यागमसंन्मो द्विजोभवति संस्कृतः । -- ब्रह्मपुराण
शूद्र भी यदि आगम सम्पन्न और संस्कृत हो तो वह द्विज हो जाता है।
  • एक एव पुरा षदः प्रणवः सर्ववाड्मयः।
देवो नारायणो नान्यः एकोऽग्निर्वर्ण एव च॥ -- श्रीमद्भागवत् पुराण
प्रारम्भ में एक ही वाङ्मय ॐ था, नारायण ही एकमात्र देव थे, दूसरा नहीं और एक ही अग्नि यानी ब्राह्मण वर्ण था।
  • न शूद्रा भगवद्भक्त विप्रा भागवताः स्मृताः॥ -- भारत-सावित्री, १४
जो ईश्वर के सच्चे भक्त हैं वे शूद्र नहीं हैं। भगवान के भक्त (तो) ब्राह्मण कहलाते हैं।
  • न शूद्रा भगवद्भक्ता विप्रा भागवताः स्मृताः ।
सर्ववर्णेषु ते शूद्रा ये ह्यभक्ता जनार्दने ॥ -- महाभारत
यदि भगवद्भक्त शूद्र है तो वह शूद्र नहीं, परमश्रेष्ठ ब्राह्मण है। वास्तवमें सभी वर्णों में शूद्र वह है, जो भगवान्‌ की भक्ति से रहित है।
  • अज्ञमाला वशिष्ठेन संयुक्त धमयोनिजा।
शारंगी मंदपलिन जगामार्म्यहणीयताम्॥
रताश्चान्याश्च लोकेऽस्मिन् अपकृष्ट प्रस्तयः।
उत्कर्ष योजितः प्राप्ताः स्वैः स्वैर्भतृ गुणौः शुभैः। -- मनुस्मृति
अधम योनिजा कन्या अक्षमाला वशिष्ठ के साथ युक्त होकर और तिर्यक् कन्या शारंगी मंदपाल ऋषी की परिणीता होकर मान्या पदवी को प्राप्त हुई थी इनके सिवा और अनेक नारियाँ निकृष्ट कुल में उत्पन्न होकर भी पति के महद्गुण के कारण उत्कृष्ट स्थान प्राप्त कर गई थीं।
  • चत्वार एकस्य पितुः सुताश्च तेषां सुतानां खलु जातिरेका ।
एवं प्रजानां हि पितैक एवं पित्रैकभावान्न च जातिभेदः ॥
फलान्यथोदुम्बरवृक्षजातेर्यथाग्रमध्यान्तभवानि यानि ।
वर्णाकृतिस्पर्शरसैः समानि तथैकतो जातिरतिप्रचिन्त्या ॥ -- भविष्यपुराण, ब्राह्मपर्व, अध्याय-४१
यदि एक पिता के चार पुत्र हो तो उन पुत्रों की एक जाति होनी चाहिये। इसी प्रकार सबका पिता एक ही परमेश्वर है अतः मनुष्य समाज में भी जाति भेद बिल्कुल नहीं होना चाहिये। जिस प्रकार एक ही गूलर के वृक्ष के अग्रभाग, मध्यभाग तथा पींड में वर्ण, आकृति, स्पर्श तथा रस इन बातों में एक से फल लगते हैं उसी प्रकार एक विराट् पुरुष परम ब्रह्म परमेश्वर से उत्पन्न हुये मनुष्यों में भी किसी प्रकार का जातिभेद नहीं हो सकता।
  • शूद्र ब्राह्मणयोर्भेदो मृग्यमाणोऽपि यत्नतः।
नश्चते सर्वधर्मेषु संहतौस्त्रिदशैरपि॥ -- भविष्यपुराण
अति यत्नपूर्वक सभी देवता मिलकर भी खोजे तो ब्राह्मण और शूद्र में कोई भेद नहीं पावेंगे।
  • न ब्राह्मणाश्चन्द्रमरीचि शुक्ला न क्षत्रियाः किंशुक पुष्पवर्णाः।
न चेद वैश्या हरिताल तुल्याः शूद्रान चाँगार समानवर्णाः॥ -- भविष्यपुराण
ब्राह्मण लोग भी चाँदी की किरण के समान शुक्ल वर्ण नहीं हैं। क्षत्रिय लोग भी किंशुक पुष्प से लाल नहीं हैं और शूद्र कोयले के समान काले नहीं हैं।
  • पादप्रचारैस्तनुवर्ण, केशैः सुखेन दुःखेन च शोणितेन।
त्वं मासमेदोऽस्थिरसैः समानाश्चतुः प्रभेदारि कथं भवन्ति।
वर्णप्रमाणा कृतिगर्भवासग्बुद्धि कर्मेन्द्रिय जीवितेषु।
बलत्रिवर्गाभयभेषजेषु न विद्यते जातिकृतो विशेषः।
चत्वार एकस्यपितुः सुताश्चतेषाँसुतानाँ खुल जातिरेका।
एवं प्रजानाँ हि पितेक एव पित्रैकभावान्न च जातिभेदः॥ -- भविष्य पुराण
चलना, फिरना, शरीर, वर्ण केश, सुख दुख रक्त , त्वचा, माँस, मेद, अस्थि रस-इनमें सभी तो समान हैं, फिर चार वर्णों का भेद कहाँ है? वर्ण, प्रमाण आकृति, गर्भवास, वाक्य, बुद्धि कर्म, इन्द्रिय, प्राणशक्ति धर्म,अर्थ,काम,व्याधि, औषधि-इनमें कहीं भी तो जातिगत प्रभेद नहीं है। जिस प्रकार एक ही पिता के चार पुत्रों की जाति एक ही होती है उसी प्रकार सभी प्रजाओं का वह भगवान एकमात्र पिता है। इसीलिये जातिभेद नहीं हैँ।
  • ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्रकामाय नेष्यते । -- श्रीमद्भा॰ ११-१७-४२
  • जिन ब्राह्मणोंका खान-पान, आचरण सर्वथा भ्रष्ट है, उन ब्राह्मणोंका वचनमात्रसे भी आदर नहीं करना चाहिये। -- मनुस्मृति (४-३०-१९२)
  • अहो बत श्वपचोऽतो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम् ।
तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥ -- श्रीमद्भा॰ ३-३३-७
अहो ! वह चाण्डाल भी सर्वश्रेष्ठ है, जिसकी जीभके अग्रभागपर आपका नाम विराजता है । जो श्रेष्ठ पुरुष आपका नाम उच्चारण करते हैं, उन्होंने तप, हवन, तीर्थस्नान, सदाचारका पालन और वेदाध्ययन‒सब कुछ कर लिया ।
  • विप्राद् द्विषड्‌गुणयुतादरविन्दनाभपादारविन्दविमुखाच्छ्‌वपचं वरिष्ठम् ।
मन्ये तदर्पितमनोवचनेहितार्थप्राण पुनाति स कुलं न तु भूरिमानः ॥ -- श्रीमद्भा॰ ७-१-१०
मेरी समझसे बारह गुणोंसे युक्त ब्राह्मण भी यदि भगवान् कमलनाभके चरण-कमलोंसे विमुख हो तो वह चाण्डाल श्रेष्ठ है, जिसने अपने मन, वचन, कर्म, धन और प्राणोंको भगवान्‌के अर्पण कर दिया है; क्योंकि वह चाण्डाल तो अपने कुलतकको पवित्र कर देता है; परन्तु बड़प्पनका अभिमान रखनेवाला भगवद्विमुख ब्राह्मण अपनेको भी पवित्र नहीं कर सकता ।
  • चाण्डालोऽपि मुनेः श्रेष्ठो विष्णुभक्तिपरायणः ।
विष्णुभक्तिविहीनस्तु द्विजोऽपि श्वपचोऽधमः ॥ -- पद्मपुराण
हरिभक्तिमें लीन रहनेवाला चाण्डाल भी मुनिसे श्रेष्ठ है और हरिभक्तिसे रहित ब्राह्मण चाण्डालसे भी अधम है।
  • अवैष्णवाद् द्विजाद् विप्र चाण्डालो वैष्णवो वरः।
सगणः श्वपचो मुक्तो ब्राह्मणो नरकं व्रजेत् ॥ -- ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्मा॰ ११-३९
अवैष्णव ब्राह्मणसे वैष्णव चाण्डाल श्रेष्ठ है; क्योंकि वह वैष्णव चाण्डाल अपने बन्धुगणोंसहित भव-बन्धनसे मुक्त हो जाता है और वह अवैष्णव ब्राह्मण नरकमें पड़ता है।
  • वल्पेनैव प्रयत्नेन धर्म: सिद्धॺति वै कलौ।
नरैरात्मगुणाम्भोभि: क्षालिताखिलकिल्बिषै:॥
शूद्रैश्च द्विजशुश्रूषातत्परैर्मुनिसत्तमा:।
तथा स्त्रीभिरनायासं पतिशुश्रूषयैव हि॥
ततस्त्रितयमप्येतन्मम धन्यतमं मतम्। -- विष्णुपुराण ६।२।३४—३६
हे मुनिगण! कलियुगमें मनुष्य सद्‍वृत्तिका अवलम्बन करके थोड़े-से प्रयाससे ही सारे पापोंसे छूटकर धर्मकी सिद्धि पाता है। शूद्र द्विजसेवा से और स्त्रियाँ केवल पतिसेवा से अल्पायास से ही उत्तम गति पा सकती हैं। इसीलिये मैंने इन तीनों को धन्यतम कहा है। (इससे यह सिद्ध होता है कि वर्तमान देश-कालमें और स्त्री, शूद्रों के लिये तो मुक्ति का पथ और भी सुगम है।)

इन्हें भी देखें[सम्पादन]