इस्लाम
दिखावट
(मुसलमान से अनुप्रेषित)
इस्लाम अरब में ७वीं शताब्दी में जन्मा एक मजहब है।
उक्तियाँ
[सम्पादित करें]- भारत में यह एक सचमुच गम्भीर समस्या है। बहुत कम हिन्दू जानते हैं कि इस्लाम क्या है। बहुत कम हिन्दुओं ने इस का अध्ययन किया है या इस पर कभी सोचा है। -- सर वी. एस. नॉयपाल
- तुम किसी ऐसे धर्म के साथ सौमनस्य से रह सकते हो जिसका सिद्धान्त सहिष्णुता है। किन्तु ऐसे धर्म के साथ शांति से रहना कैसे सम्भव है जिसका सिद्धांत है “मैं तुम्हें बर्दाश्त नहीं करूँगा”? तुम वैसे लोगों के साथ कैसे एकता रख सकते हो? निश्चय ही, हिन्दू-मुस्लिम एकता इस आधार पर तो नहीं बन सकती कि मुसलमान तो हिन्दुओं को धर्मांतरित कराते रहेंगे जब कि हिन्दू किसी मुसलमान को धर्मांतरित नहीं कराएंगे।… मुसलमानों को हानिरहित बनाने का एक मात्र उपाय संभवतः यही है कि वे अपने मजहब पर उन्मादी विश्वास छोड़ दें। -- अरविन्द घोष, 23 जुलाई 1923, सांध्य वार्ताओं में
- मुसलमान लोग इस दृष्टि से सबसे अधिक संकुचित और संप्रदायवादी हैं। उन का घोष-वाक्य है, “अल्लाह केवल एक है और मुहम्म्द उस का पैगंबर है।” उस के अतिरिक्त जो कुछ है वह न केवल बुरा है, अपितु नष्ट हो जाना चाहिए। इस घोष-वाक्य पर आस्था न रखने वालों को तुरन्त ध्वस्त कर देना चाहिए। जो पुस्तक उन से भिन्न उपदेश देती है उसे जला देना चाहिए। पाँच सौ वर्षों तक प्रशान्त महासागर से अटलांटिक महासागर तक रक्त की धारा बहाई गई, यही है इस्लामवाद। -- स्वामी विवेकानन्द, 1900 में, पसेडेना, कैलिफोर्निया में एक व्याख्यान में
- इस से इंकार करना विवेक विरुद्ध है कि इस्लाम एक तालाब है जिस में हम सब डूब रहे हैं। अपनी जमीन की रक्षा न करना, अपने घर, अपने बच्चों, अपना आत्मसम्मान, अपने सारतत्व की रक्षा न करना विवेक विरुद्ध है। मूर्खतापूर्ण या बेईमानी भरे झूठ को स्वीकार करना, जो सूप में आर्सेनिक की तरह हमें परोसे जा रहे हैं, विवेक विरुद्ध है। कायरता या आलस्य के कारण हार मान लेना, आत्मसमर्पण कर देना विवेक विरुद्ध है। यह सोचना भी विवेक विरुद्ध है कि ट्रॉय की आग अपने-आप या मैडोना के चमत्कार से बुझ जाएगी। इसलिए सुनो मेरी बात, मैं तुमसे विनती करती हूँ! मेरी बात सुनो, क्योंकि मैं मजे के लिए या पैसे के लिए नहीं लिखती। मैं कर्तव्य के रूप में लिख रही हूँ। ऐसा कर्तव्य जो मेरी जिंदगी की कीमत पर हो रहा है। और कर्तव्यवश ही मैंने इस ट्रेजेडी पर इतना विचारा है। पिछले चार वर्षों से मैंने इस्लाम और पश्चिम का, उन के अपराध और हमारी भूलों का विश्लेषण करने के सिवा कुछ नहीं किया है। अर्थात्, वह युद्ध लड़ना जिससे हम अब और नहीं बच सकते। उसके लिए, मैंने अपना वह उपन्यास लिखना तक किनारे कर दिया, वह पुस्तक जिसे मैं ‘मेरा बच्चा’ कहती थी। इस से भी बुरा यह कि मैंने अपनी परवाह छोड़ दी, अपना जीवन। उस विंदु पर जब मेरा जीवन बहुत कम शेष बचा है। और मैं यह सोचते हुए मरना चाहूँगी कि यह बलिदान कुछ काम का रहा। -- ओरियाना फलासी, 2003 में लिखित पुस्तक ‘फोर्स ऑफ रीजन’ में।
- अब इस कुरान के विषय को लिख के बुद्धिमानों के सम्मुख स्थापित करता हूँ कि पुस्तक कैसा है। मुझसे पूछो तो यह किताब न ईश्वर, न विद्वान् की बनाई और न विद्या की हो सकती है। यह तो बहुत थोड़ा-सा दोष प्रकट किया, इसलिए कि लोग धोखे में पड़कर अपना जन्म व्यर्थ न गमावें। जो कुछ इसमें थोड़ा-सा सत्य है वह वेदादि विद्या पुस्तकों के अनुकूल होने से जैसे मुझको ग्राह्य है वैसे अन्य भी मज़हब के हठ और पक्षपातरहित विद्वानों और बुद्धिमानों को ग्राह्य है। इसके बिना जो कुछ इसमें है वह सब अविद्या, भ्रमजाल और मनुष्य के आत्मा को पशुवत् बनाकर शान्तिभंग कराके उपद्रव मचा, मनुष्यों में विद्रोह फैला, परस्पर दुःखोन्नति करने वाला विषय है। और पुनरुक्त दोष का तो कुरान जानों भण्डार ही है। -- दयानन्द सरस्वती, अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश’ के चौदहवें समुल्लास (अध्याय) में कुरान की १६१ आयतों की समीक्षा करने के बाद अपने निष्कर्ष में [१]
इस्लाम और मुसलमान पर भीमराव अम्बेडकर के विचार
[सम्पादित करें]- मुस्लिम आक्रान्ता निःसंदेह हिन्दुओं के विरुद्ध घृणा के गीत गाते हुए आए थे। परन्तु वे घृणा का गीत गाकर और मार्ग में कुछ मंदिरों को आग लगाकर ही वापस नहीं लौटे। ऐसा होता तो वरदान माना जाता। वे इतने ही नकारात्मक परिणाम से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने तो भारत में इस्लाम का पौधा रोपा। इस पौधे का विकास बखूबी हुआ और यह एक बड़ा ओक का पेड़ बन गया।
- मुसलमान कभी भी मातृभूमि के भक्त नहीं हो सकते। हिन्दुओं से कभी उनके दिल मिल नहीं सकते। देश में रह कर शत्रुता पालते रहने की अपेक्षा उन्हें अलग राष्ट्र दे देना चाहिए। भारतीय मुसलमानों का यह कहना है कि वे पहले मुसलमान हैं और फिर भारतीय हैं। उनकी निष्ठाएं देश-बाह्य होती हैं। देश से बाहर के मुस्लिम राष्ट्रों की सहायता लेकर भारत में इस्लाम का वर्चस्व स्थापित करने की उनकी तैयारी है। जिस देश में मुस्लिम राज्य नहीं हो, वहाँ यदि इस्लामी कानून और उस देश के कानून में टकराव पैदा हुआ तो इस्लामी कानून ही श्रेष्ठ समझा जाना चाहिए। देश का कानून झटक कर इस्लामी कानून मानना मुसलमान समर्थनीय समझते हैं। -- ‘पाकिस्तान अथवा भारत का विभाजन’
- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र आदि प्रकार के भेद सिर्फ हिन्दू धर्म में ही हैं, ऐसी बात नहीं। इस तरह के भेद ईसाई और इस्लाम में भी दिखाई देते हैं।
- यदि मैं इस्लाम स्वीकार करूँगा तो इस देश में मुसलमानों की संख्या दूनी हो जाएगी और मुस्लिम प्रभुत्व का खतरा उत्पन्न हो जाएगा।
- जो कोई भी व्यक्ति एशिया के नक्शे को देखेगा उसे यह ध्यान में आ जाएगा कि किस तरह यह देश दो पाटों के बीच फंस गया है। एक ओर चीन व जापान जैसे भिन्न संस्कृतियों के राष्ट्रों का फंदा है तो दूसरी ओर तुर्की, पर्शिया और अफगानिस्तान जैसे तीन मुस्लिम राष्ट्रों का फंदा पड़ा हुआ है। इन दोनों के बीच फंसे हुए इस देश को बड़ी सतर्कता से रहना चाहिए, ऐसा हमें लगता है... इन परिस्थितियों में चीन एवं जापान में से किसी ने यदि हमला किया तो... उनके हमले का सब लोग एकजुट होकर सामना करेंगे। मगर स्वाधीन हो चुके हिन्दुस्थान पर यदि तुर्की, पर्शिया या अफगानिस्तान जैसे तीन मुस्लिम राष्ट्रों में से किसी एक ने भी हमला किया तो क्या कोई इस बात की आश्वस्ति दे सकता है कि इस हमले का सब लोग एकजुटता से सामना करेंगे? हम तो यह आश्वस्ति नहीं दे सकते। -- 18 जनवरी, 1929 को ‘नेहरू कमेटी की योजना और हिन्दुस्थान का भविष्य’ शीर्षक से 'बहिष्कृत भारत' में एक अग्रलेख
- इस्लाम एक क्लोज कॉर्पोरेशन है और इसकी विशेषता ही यह है कि मुस्लिम और गैर मुस्लिम के बीच वास्तविक भेद करता है। इस्लाम का बंधुत्व मानवता का सार्वभौम बंधुत्व नहीं है। यह बंधुत्व केवल मुसलमान का मुसलमान के प्रति है। दूसरे शब्दों में इस्लाम कभी एक सच्चे मुसलमान को ऐसी अनुमति नहीं देगा कि आप भारत को अपनी मातृभूमि मानो और किसी हिन्दू को अपना आत्मीय बंधु।
- मुसलमानों में एक और उन्माद का दुर्गुण है। जो कैनन लॉ या जिहाद के नाम से प्रचलित है। एक मुसलमान शासक के लिए जरूरी है कि जब तक पूरी दुनिया में इस्लाम की सत्ता न फैल जाए तब तक चैन से न बैठे। इस तरह पूरी दुनिया दो हिस्सों में बंटी है दार-उल-इस्लाम (इस्लाम के अधीन) और दार-उल-हर्ब (युद्ध के मुहाने पर)। चाहे तो सारे देश एक श्रेणी के अधीन आयें अथवा अन्य श्रेणी में। तकनीकी तौर पर यह मुस्लिम शासकों का कर्तव्य है कि कौन ऐसा करने में सक्षम है। जो दार-उल-हर्ब को दर उल इस्लाम में परिवर्तित कर दे। भारत में मुसलमान हिजरत में रुचि लेते हैं तो वे जिहाद का हिस्सा बनने से भी हिचकेंगे नहीं।
- प्रत्येक हिन्दू के मन में यह प्रश्न उठ रहा था कि पाकिस्तान बनने के बाद हिन्दुस्तान से साम्प्रदायिकता का मामला हटेगा या नहीं, यह एक जायज प्रश्न था और इस पर विचार किया जाना जरूरी था। यह भी स्वीकारना पड़ेगा कि पाकिस्तान के बन जाने से हिन्दुस्तान साम्प्रदायिक प्रश्न से मुक्त नहीं हो पाया। पाकिस्तान की सीमाओं की पुनर्रचना कर भले ही इसे सजातीय राज्य बना दिया गया हो लेकिन भारत को तो एक मिश्रित राज्य ही बना रहेगा। हिन्दुस्तान में मुसलमान सभी जगह बिखरे हुए हैं, इसलिए वे ज्यादातर कस्बों में एकत्रित होते हैं। इसलिए इनकी सीमाओं की पुनर्रचना और सजातीयता के आधार पर निर्धारण सरल नहीं है। हिन्दुस्तान को सजातीय बनाने का एक ही रास्ता है कि जनसंख्या की अदला-बदली सुनिश्चित हो, जब तक यह नहीं किया जाता तब तक यह स्वीकारना पड़ेगा कि पाकिस्तान के निर्माण के बाद भी, बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक की समस्या और हिन्दुस्तान की राजनीति में असंगति पहले की तरह बनी रहेगी।
- मुसलमानों में इन बुराइयों का होना दुःखद है। किन्तु उससे भी अधिक दुःखद तथ्य यह है कि भारत के मुसलमानों में समाज सुधार का ऐसा कोई संगठित आंदोलन नहीं उभरा जो इन बुराइयों का सफलतापूर्वक उन्मूलन कर सके। हिंदुओं में भी अनेक सामाजिक बुराइयां हैं, परन्तु संतोष की बात यह है कि उनमें से अनेक इनकी विद्यमानता के प्रति सजग हैं और उनमें से कुछ उन बुराइयों के उन्मूलन हेतु सक्रिय तौर पर आन्दोलन भी चला रहे हैं। दूसरी ओर मुसलमान यह महसूस ही नहीं करते कि ये बुराइयां हैं, परिणामतः वे उनके निवारण हेतु सक्रियता भी नहीं दर्शाते। इसके विपरीत, अपनी मौजूदा प्रथाओं में किसी भी परिवर्तन का विरोध करते हैं।
- मुसलमानों की सोच में लोकतंत्र प्रमुखता नहीं है। उनकी सोच को प्रभावित करने वाला तत्व यह है कि लोकतंत्र प्रमुख नहीं है। उनकी सोच को प्रभावित करने वाला तत्व यह है कि लोकतंत्र, जिसका मतलब बहुमत का शासन है, हिन्दुओं के विरुद्ध संघर्ष में मुसलमानों पर क्या असर डालेगा। क्या उससे वे मजबूत होंगे अथवा कमजोर? यदि लोकतंत्र से वे कमजोर पड़ते हैं तो वे लोकतंत्र नहीं चाहेंगे। वे किसी मुस्लिम रियासत में हिंदू प्रजा का मुस्लिम शासक की पकड़ कमजोर करने के बजाए अपने निकम्मे राज्य को वरीयता देंगे।
- मुस्लिम संप्रदाय में राजनीतिक और सामाजिक गतिरोध का केवल ही कारण बताया जा सकता है। मुसलमान सोचते हैं कि हिंदुओं और मुसलमानों को सतत संघर्षरत रहना चाहिए। हिंदू मुसलमानों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयास करते हैं, और मुसलमान अपनी शासक होने की ऐतिहासिक हैसियसत बनाए रखने का।
- मुसलमानों द्वारा राजनीति में अपराधियों के तौर-तरीके अपनाया और दंगे इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि गुंडागर्दी उनकी राजनीति का एक स्थापित तरीका हो गया है। चेकों के विरुद्ध सुडेटेन जर्मनों ने जिन तौर-तरीकों को अपनाया था वे उसका जानबूझकर तथा समझते हुए अनुकरण करते प्रतीत हो रहे हैं।[२]
- पर्दा प्रथा की वजह से मुस्लिम महिलाएं अन्य जातियों की महिलाओं से पिछड़ जाती हैं। वो किसी भी तरह की बाहरी गतिविधियों में भाग नहीं ले पातीं हैं जिसके चलते उनमें एक प्रकार की दासता और हीनता की मनोवृत्ति बनी रहती है। उनमें ज्ञान प्राप्ति की इच्छा भी नहीं रहती क्योंकि उन्हें यही सिखाया जाता है कि वो घर की चारदीवारी के बाहर वे अन्य किसी बात में रुचि न लें। पर्दे वाली महिलाएं प्रायः डरपोक, निस्साहय, शर्मीली और जीवन में किसी भी प्रकार का संघर्ष करने के अयोग्य हो जाती हैं। भारत में पर्दा करने वाली महिलाओं की विशाल संख्या को देखते हुए कोई भी आसानी से ये समझ सकता है कि पर्दे की समस्या कितनी व्यापक और गंभीर है। -- 'पाकिस्तान, अथवा भारत का विभाजन'
- पर्दा प्रथा ने मुस्लिम पुरुषों की नैतिकता पर विपरीत प्रभाव डाला है। पर्दा प्रथा के कारण कोई मुसलमान अपने घर-परिवार से बाहर की महिलाओं से कोई परिचय नहीं कर पाता। घऱ की महिलाओं से भी उसका संपर्क यदा-कदा बातचीत तक ही सीमित रहता है। बच्चों और वृद्धों के अलावा पुरुष अन्य महिलाओं से हिल-मिल नहीं सकता, अपने अंतरंग साथी से भी नहीं मिल पाता। महिलाओं से पुरुषों की ये पृथकता निश्चित रूप से पुरुष के नैतिक बल पर विकृत प्रभाव डालती है। ये कहने के लिए किसी मनोवैज्ञानिक विश्लेषण की आवश्यकता नहीं कि ऐसी सामाजिक प्रणाली से जो पुरुषों और महिलाओं के बीच के संपर्क को काट दे उससे यौनाचार के प्रति ऐसी अस्वस्थ प्रवृत्ति का सृजन होता है जो आप्राकृतिक और अन्य गंदी आदतों और साधनों को अपनाने के लिए प्रेरित करती है।
- ऐसी पृथकता का मुस्लिम महिलाओं के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। वो खून की कमी, टीबी, पायरिया और कई अन्य रोगों से पीड़ित हो जाती हैं। उनका शरीर भी मजबूत नहीं रह पाता और उनकी कमर भी झुकती जाती है, उनकी हड्डियां निकल आती हैं, हाथ और पांव में खम पड़ जाता है, वे कुरूप हो जाती हैं। पसलियों, जो़ड़ों और ज्यादातर सभी हडिड्यों में दर्द रहता है। उनमें हृदय की धड़कन बढ़ने का सिलसिला भी प्राय: पाया जाता है। इन सभी कमजोरियों के फलस्वरूप प्रसूति काल (डिलिवरी) के दौरान अधिकांश की मृत्यु हो जाती है। पर्दाप्रथा के कारण मुस्लिम महिलाओं का मानसिक और नैतिक विकास भी नहीं हो पाता। स्वस्थ्य सामाजिक जीवन से वंचित रहने से उनमें गलत प्रवृत्ति आ जाती है। बाहरी दुनिया से बिल्कुल अलग-थलग रहने के कारण उनका ध्यान तुच्छ पारिवारिक झगड़ों में ही उलझा रहता है। इसका परिणाम संकीर्ण सोच और संकुचित दृष्टिकोण के रूप में सामने आता है।
- ऐसा नहीं है कि पर्दा और ऐसी ही अन्य बुराइयां देश के कुछ भागों में हिंदुओं के कई वर्गों में प्रचलित नहीं हैं। परन्तु अन्तर केवल यही है कि मुसलमानों में पर्दा-प्रथा को एक धार्मिक आधार पर मान्यता दी गई है, लेकिन हिन्दुओं में ऐसा नहीं है। हिन्दुओं की तुलना में मुसलमानों में पर्दा-प्रथा की जड़े गहरी हैं। मुसलमानों में पर्दाप्रथा एक वास्तविक समस्या है और जबकि हिंदुओं में ऐसा नहीं है। मुसलमानों ने इसे समाप्त करने का कभी प्रयास किया हो इसका भी कोई साक्ष्य नहीं मिलता है।[३]
इस्लाम पर राहुल सांकृत्यायन के विचार
[सम्पादित करें]- धर्मों की जड़ में कुल्हाड़ा लग गया है, और इसलिए अब मजहबों के मेल-मिलाप की बातें भी कभी-कभी सुनने में आती हैं। लेकिन, क्या यह सम्भव है? ‘मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना’- इस सफेद झूठ का क्या ठिकाना है? अगर मजहब बैर नहीं सिखलाता तो चोटी-दाढ़ी की लड़ाई में हजार बरस से आज तक हमारा मुल्क पामाल (बर्बाद) क्यों है?असल बात तो यह है कि मजहब तो सिखाता है आपस में बैर रखना। भाई को है सिखाता भाई का खून पीना। हिन्दुस्तानियों की एकता मजहब के मेल पर नहीं होगी, बल्कि मजहबों की चिता पर। कौव्वे को धोकर हंस नहीं बनाया जा सकता। कमली धोकर रंग नहीं चढ़ाया जा सकता। मजहबों की बीमारी स्वाभाविक है। उसकी मौत को छोड़कर इलाज नहीं। ('तुम्हारी क्षय', में)
- कहने के लिए तो हिन्दुओं पर ताना कसते हुए इस्लाम कहता है कि हमने जात-पांत के बंधनों को तोड़ दिया। इस्लाम में आते ही सब भाई-भाई हो जाते हैं। लेकिन क्या यह बात सच है? यदि ऐसा होता तो आज मोमिन (जुलाहा), अप्सार (धुनिया), राइन (कुंजड़ा) आदि का सवाल न उठता। अर्जल और अशरफ़ का शब्द किसी के मुंह पर न आता। सैयद-शेख़, मलिक-पठान, उसी तरह का ख़्याल अपने से छोटी जातियों से रखते हैं, जैसा कि हिंदुओं के बड़ी जात वाले। खाने के बारे में छूतछात कम है और वह तो अब हिंदुओं में भी कम होता जा रहा है। लेकिन सवाल तो है – सांस्कृतिक और आर्थिक क्षेत्र में इस्लाम की बड़ी जातों ने छोटी जातों को क्या आगे बढ़ने का कभी मौक़ा दिया?
- जो मजहब अपने नाम पर भाई का खून करने के लिए प्रेरित करता है, उस मजहब पर लानत! जब आदमी चुटिया काट दाढ़ी बढ़ाने भर से मुसलमान और दाढ़ी मुड़ा चुटिया रखने मात्र से हिंदू मालूम होने लगता है, तो इसका मतलब साफ है कि यह भेद सिर्फ बाहरी और बनावटी है।
- हमें यह मानने में कोई उज्र हो ही नहीं सकता कि हमारे देश के मुसलमान अपनी जातीयता में मजहब को बहुत स्थान देते हैं।[४]
- इस्लाम की समानता और बौद्धों की समानता में बहुत अन्तर है। इस्लाम में मजहबी समानता है। हरेक मुसलमान धर्म-क्षेत्र में समान समझा जाता है, लेकिन बौद्ध धर्म में मानवमात्र समान है – यही क्यों, जीवमात्र समान है। इस मौलिक भेद के कारण एक धर्म युक्तियों, अनुरोध, स्नेह, बन्धुत्व, त्याग, सहिष्णुता से फैला और दूसरा तलवारों की धार पर। वैसे अनेक मुसलमान संतों ने सहिष्णुता और मानव समानता का प्रचार भी किया, पर बहुत कम।[५]
- ये जानते नहीं कि जिहाद का समय बीत चुका है और विज्ञान का युग आ गया है। ये समझते हैं कि इस्लामी छूरेबाजी के बल पर इन्होने पाकिस्तान कायम किया है। उनको यह नहीं मालूम कि अंग्रेजों ने अशगुन पैदा करने के लिए पाकिस्तान को बनाया।[६]
- इस्लाम की सफलता किसी उच्च दार्शनिक विचार, महान सदाचार या भव्य आदर्शवाद के कारण नहीं हुई है। आप कुरान को उठा कर किसी धर्म के प्रमुख ग्रंथ से मिला के देख लीजिए, वह हर तरह से बहुत निम्न कोटि का जँचेगा। ...(इस्लाम की) दूसरी सफलता की कुंजी थी : जैसे भी हो स्त्रियों को रख के उससे औलाद को पैदा कर के बढ़ाना। धर्म प्रचार का इस अनूठे ढंग को आप किसी धर्म के लिए शोभा की बात तो नहीं कह सकते।... एक सांप्रदायिकता दूसरी सांप्रदायिकता को पैदा करती है। मुसलमान इस्लाम को मानें, इसमें कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, किन्तु यदि वह वेश-भूषा, भाषा, संस्कृति में अपने को विदेशी रखना चाहते हैं, तो समझ लें, यह उनके लिए आफत की चीज है। -- 'युधिष्ठिर' नामक पात्र के माध्यम से [७]
- मुसलमानों को वही बोली–बानी, वही पर-पोसाक, वही खान-पान अपनाना होगा, जो कि हिंदुओं का है। बिलाइत में ईसाई रहते हैं, यहूदी भी रहते हैं, लेकिन उनको देख के कोई नहीं कह सकता, कि वह दो तीन धर्म को मानते हैं। -- 'भैया' नामक पात्र के माध्यम से[८]
- एक ईश्वर मानने वाले धर्मों की अपेक्षा अनेक देवता मानने वाले धर्म हज़ार गुना उदार रहे हैं। उनके ईश्वरों की संख्या अपरिमित होने से औरों का भी समावेश आसानी से हो सकता था किंतु एक ईश्वरवादी वैसे करके अपने अकेले ईश्वर की हस्ती को ख़तरे में नहीं डाल सकते थे। आप दुनिया के एक ईश्वरवादी धर्मों के पिछले दो हज़ार वर्ष के इतिहास को देख डालिए, मालूम होगा कि वह सभ्यता, कला, विद्या, विचार-स्वातन्त्र्य और स्वयं मनुष्यों के प्राणों के सबसे बड़े दुश्मन रहे हैं।
इन्हें भी देखें
[सम्पादित करें]सन्दर्भ
[सम्पादित करें]- ↑ महर्षि दयानन्द सरस्वती की दृष्टि में इस्लाम
- ↑ क्यों इस्लाम धर्म का विरोध करते थे आंबेडकर?
- ↑ इस्लाम में बुर्का प्रथा पर डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर के विचार
- ↑ राहुल सांकृत्यायन, आज की समस्याएँ , किताब महल , इलाहाबाद, 1945, पृ 1
- ↑ यह उद्धरण डा जयनाथ ‘नलिन’ के संस्मरण से लिया गया है। ‘नलिन’ जी ने राहुल जी से मसूरी में डेढ़ घंटा बातचीत की थी जिसमें यह प्रसंग आया था। देखें – डा जयनाथ ‘नलिन’, ‘राहुल जी का सहज व्यक्तित्व’, डा० ब्रह्मानन्द द्वारा सम्पादित 'राहुल सांकृत्यायन : व्यक्तित्व एवं कृतित्व' , हरियाणा प्रकाशन, दिल्ली, 1971, पृ 19-20
- ↑ मेरी जीवन यात्रा भाग 3
- ↑ राहुल सांकृत्यायन , भागो नहीं दुनिया को बदलो , किताब महल, इलाहाबाद, 2016 [प्रथम संस्करण 1945]
- ↑ राहुल सांकृत्यायन , 'भागो नहीं दुनिया को बदलो', किताब महल, इलाहाबाद, 2016 [प्रथम संस्करण 1945], पृ॰ 242-243