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भर्तृहरि

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भर्तृहरि संस्कृत के महान कवि और वैयाकरण थे। संस्कृत साहित्य के इतिहास में वे एक नीतिकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। इनके शतकत्रय (नीतिशतक, शृंगारशतक, वैराग्यशतक) की उपदेशात्मक कहानियाँ भारतीय जनमानस को विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। प्रत्येक शतक में सौ-सौ श्लोक हैं। बाद में इन्होंने गुरु गोरखनाथ के शिष्य बनकर वैराग्य धारण कर लिया था इसलिये इनका एक लोकप्रचलित नाम बाबा भरथरी भी है।

उक्तियाँ

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शृङ्गारशतक

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  • शम्भुस्वयम्भुहरयो हरिणेक्षणानां येनाक्रियंत सततं गृहकर्मदासाः ।
वाचामगोचरचरित्रविचित्रिताय तस्मै नमो भगवते कुसुमायुधाय ॥ -- शृंगारशतक का मङ्गलाचरण
  • जिसने विष्णु और शिव को मृग के समान नयनों वाली कामिनियों के गृहकार्य करने के लिये सतत् दास बना रखा है, जिसका वर्णन करने में वाणी असमर्थ है ऐसे चरित्रों से विचित्र प्रतीत होने वाले उस भगवान पुष्पायुध (कामदेव) को नमस्कार है।
  • स्मितेन भावेन च लज्जया भिया पराङ्गमुखैरर्धकटाक्षवीक्षणैः ।
वचोभिरीर्ष्याकलहेन लीलया समस्तभावैः खलु बन्धनं स्त्रियः ॥
मन्द मुस्कराहट से, अन्तकरण के विकाररूप भाव से, लज्जा से, आकस्मिक भय से, तिरछी दृष्टि द्वारा देखने से, बातचीत से, ईर्ष्या के कारण कलह से, लीला विलास से-इस प्रकार सम्पूर्ण भावों से स्त्रियां पुरूषों के संसार-बंधन का कारण हैं।
  • भ्रूचातुर्यात्कुष्चिताक्षाः कटाक्षाः स्निग्धा वाचो लज्जितान्ताश्च हासाः ।
लीलामन्दं प्रस्थितं च स्थितं च स्त्रीणां एतद्भूषणं चायुधं च ॥
भौंहों के उतार-चढ़ाव आदि की चतुराई, अर्द्ध-उन्मीलित नेत्रों द्वारा कटाक्ष, अत्यधिक स्निग्ध एवं मधुर वाणी, लज्जापूर्ण सुकोमल हास, विलास द्वारा मन्द-मन्द गमन और स्थित होना-ये भाव स्त्रियों के आभूषण भी हैं और आयुध (हथियार) भी हैं।
  • द्रष्टव्येषु किं उत्तमं मृगदृशः प्रेमप्रसन्नं मुखं
घ्रातवेष्वपि किं तद्आस्यपवनः श्रव्येषु किं तद्वचः ।
किं स्वाद्येषु तद्ओष्ठपल्लवरसः स्पृश्येषु किं तद्वपुर्ध्येयं
किं नवयौवने सहृदयैः सर्वत्र तद्विभ्रमाः ॥
(इस संसार में) दर्शनीय वस्तुओं में उत्तम क्या है? मृगनयनी का प्रेम से प्रसन्न मुख। सूंघने योग्य वस्तुओं में क्या उत्तम है? उसके मुख का सुगन्धित पवन। श्रवण योग्य वस्तुओं में उत्तम क्या है? स्त्रियों के मधुर वचन। स्वादिष्ट वस्तुओं में उत्तम क्या है? स्त्रियों के पल्लव के समान अधर का मधुर रस। स्पर्श योग्य वस्तुओं में उत्तम क्या है? उसका कुसुम-सुकुमार कोमल शरीर। ध्यान करने योग्य उत्तम वस्तु क्या है? सदा विलासिनियों का यौवन विलास।
गुरुणा स्तनभारेण मुखचन्द्रेण भास्वता ।
शनैश्चराभ्यां पादाभ्यां रेजे ग्रहमयीव सा॥१७॥
  • स्तन भार के कारण देवगुरू बृहस्पति के समान, कान्तिमान होने के कारण सूर्य के समान, चन्द्रमुखी होने के कारण चन्द्रमा के समान, और मन्द-मन्द चलने वाली अथवा शनैश्चर-स्वरूप चरणों से शोभित होने के कारण सुन्दरियां ग्रह स्वरूप ही हुआ करती है।

नीतिशतक

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  • यस्यास्ति वित्तं स नरः कुलीनः स पण्डितः स श्रुतवान् गुणज्ञः ।
स एव वक्ता स च दर्शनीयः सर्वे गुणाः काञ्चनमाश्रयन्ति ॥
जिसके पास धन है वही उच्च कुल का है, वही पंडित है, वही शास्त्रों का ज्ञाता है, वही दूसरों का आकलन करते की क्षमता रखता है, वही उत्तम वक्ता है, उसी का व्यक्तित्व प्रभावि है। यह सब इसलिए कि सभी गुण धन के प्रतीक कांचन अर्थात् सोने पर निर्भर हैं ।
  • यदा किञ्चिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिप्तं मम मन:।
यदा किञ्चित्किञ्चिद्बुधजनसकाशादवगतं
तदा मूर्खोऽस्मीति ज्वर इव मदो मे व्यपगत:॥ -- नीतिशतक, ८
जब मैं अल्‍पज्ञ था तब हाथी की भांति मुझे अभिमान था, तब मैं ही सर्वज्ञ हूँ ऐसा मेरा मन समझता था । जब मैं विद्वानों के सम्‍पर्क में रहकर कुछ-कुछ जानकार हुआ तब मुझे यह ज्ञात हुआ कि वस्‍तुत: मैं मूर्ख हूँ और मेरा अभिमान ज्‍वर की भांति उतर गया ।
  • संपत्सु महतां चित्तं भवत्युत्पलकोमलं ।
आपत्सु च महाशैलशिलासंघातकर्कशम् ॥ -- नीतिशतक
महान व्यक्तियों का स्वभाव उनके सुखी और समृद्ध होने पर भी पुष्प के समान कोमल होता है। परन्तु यदि उनके ऊपर कोई विपत्ति आती है तो उस स्थिति में वह एक पर्वत की शिलाओं के समान कठोर हो जाता है।
  • अज्ञः सुखमाराध्यः सुखतरमाराध्यते विशेषज्ञः ।
ज्ञानलवदुर्विदग्धं ब्रह्मापि नरं न रञ्जयति ॥ -- नीतिशतक, मूर्खपद्धति
किसी मूर्ख व्यक्ति को समझाना आसान है, एक बुद्धिमान व्यक्ति को समझाना उससे भी आसान है, लेकिन एक अधूरे ज्ञान से भरे व्यक्ति को भगवान ब्रह्मा भी नहीं समझा सकते, क्यूंकि अधूरा ज्ञान मनुष्य को घमंडी और तर्क के प्रति अँधा बना देता है।
  • श्रोतं श्रुतेनैव न कुण्डलेन दानेन पाणिर्न तु कङ्कणेन । -- नीतिशतक
कानों की शोभा कुण्डल से नहीं बल्कि शास्त्रों को सुनने में है, हाथ की शोभा दान देने से है न कि कंगन पहने से।

वैराग्यशतक

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  • यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता
साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्त:।
अस्मत्कृते च परिशुष्यति काचिदन्या
धिक्ताञ्च तं च मदनं च इमां च मां च ॥ -- वैराग्यशतकम्
जिस स्त्री का मैं सतत चिन्तन करता हूँ, वह मुझसे विरक्त है ! वह दूसरे पुरुष को चाहती है। उसका अभीष्ट वह पुरुष भी किसी अन्य स्त्री पर असक्त है, तथा मरे लिए अन्य स्त्री अनुरक्त है। अत: उस स्त्री को, उस पुरुष को, कामदेव को, मेरे में अनुरक्त इस स्त्री को तथा मुझे धिक्कार है।
  • भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भभयं
मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जरायाभयम् ।
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं
सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ।. -- वैराग्यशतकम् ३१
भोग करने पर रोग का भय, उच्च कुल मे जन्म होने पर बदनामी का भय, अधिक धन होने पर राजा का भय, मौन रहने पर दैन्य का भय, बलशाली होने पर शत्रुओं का भय, रूपवान होने पर वृद्धावस्था का भय, शास्त्र मे पारङ्गत होने पर वाद-विवाद का भय, गुणी होने पर दुर्जनों का भय, अच्छा शरीर होने पर यम का भय रहता है। इस संसार मे सभी वस्तुएँ भय उत्पन्न करने वालीं हैं। केवल वैराग्य से ही लोगों को अभय प्राप्त हो सकता है।
  • व्याघ्रीव तिष्टति जरा परितर्जयन्ती रोगाश्च शत्रव इव प्रहरन्ति देहम् ।
आयुः परिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भो लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम् ॥
मानव जीवन में बुढ़ापा दहाड़ती हुई बाघिन की तरह सामने आ धमकती है। विविध रोग शत्रुओं की भांति शरीर पर प्रहार करते हैं। जैसे दरार पड़े घड़े से पानी रिसता है वैसे ही आयु हाथ से खिसकती रहती है । आश्चर्य होता है इतना सब होते हुए भी लोग अहितकर कर्मों में लिप्त रहते हैं ।
  • आयुः परिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भः -- वैराग्यशतक
आयु वैसे ही बिती चली जा रही है जिस प्रकार चूने वाले घड़े से पानी।

बाहरी कड़ियाँ

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