प्रयागराज
प्रयागराज भारत के उत्तरप्रदेश में गंगा, यमुना एवं सरस्वती के पवित्र ‘त्रिवेणी संगम’पर बसा तीर्थस्थान है । गंगा एवं यमुना नदी दिखाई देती हैं; परन्तु सरस्वती नदी अदृश्य है । इस पवित्र संगम के कारण ही इसे ‘प्रयागराज’ अथवा ‘तीर्थराज’ कहा जाता है।
प्रयाग शब्द ‘प्र’ उपसर्गपूर्वक ‘यज्’ इस धातु से बना है । इसका अर्थ है ‘बड़ा यज्ञ करना’ । ‘प्रयाग’ यह नाम अर्थपूर्ण एवं वेदों के समान प्राचीन है।
मत्स्यपुराण के १०२ अध्याय से लेकर १०७ अध्याय तक में इस तीर्थ के माहात्म्य का वर्णन है। उसमें लिखा है कि प्रयाग प्रजापति का क्षेत्र है जहाँ गंगा और यमुना बहती हैं। साठ सहस्र वीर गंगा की और स्वयं सूर्य जमुना की रक्षा करते हैं। यहाँ जो वट है उसकी रक्षा स्वयं शूलपाणि करते हैं। पाँच कुंड हैं जिनमें से होकर जाह्नवी बहती है। माघ महीने में यहाँ सब तीर्थ आकर वास करते हैं। इससे उस महीने में इस तीर्थवास का बहुत फल है। संगम पर जो लोग अग्नि द्वारा देह विसर्जित करेत हैं वे जितने रोम हैं उतने सहस्र वर्ष स्वर्ग लोक में वास करते हैं।
उक्तियाँ
[सम्पादित करें]- सितासिते सरिते यत्र सङ्गते तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति ।
- ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते जनासो अमृतत्वं भजन्ते ॥ -- ऋग्वेद, खिलसूक्त
- जहां गंगा-यमुना दोनों नदियां एक होती हैं, वहां स्नान करनेवालों को स्वर्ग मिलता है एवं जो धीर पुरुष इस संगम में तनुत्याग करते हैं, उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है ।
- त्रिषु लोकषु विख्यातं तीर्थं त्रैलोक्यपावनम्।
- सर्वतीर्थमयं दिव्यं प्रयागं तीर्थनायकम्॥ -- वायुपुराण
- तीनों लोकों में विख्यात और तीनों लोकों में पावन तीर्थ यह सर्वतीर्थमय दिव्य प्रयाग तीर्थों का राजा है।
- गङ्गायमुनयोः संधौ यत् तीर्थं तीर्थनायकम्।
- पुण्यं च पावनं चैव महापातकनाशनम्॥ -- महाभारत (वन पर्व)
- जहां गंगा और यमुना नदियों का संगम होता है, वह तीर्थों का राजा है। यह स्थान पवित्र है और यहां स्नान करने से महान पापों का भी नाश हो जाता है।
- प्रयागः सर्वतीर्थेभ्यः प्रभवत्यधिकं विभो ॥
- श्रवणात् तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि ।
- मृत्तिकालम्भनाद्वापि नरः पापात् प्रमुच्यते ॥ -- महाभारत, पर्व ३, अध्याय ८३, श्लोक ७४, ७५
- हे राजन्, प्रयाग सर्व तीर्थों में श्रेष्ठ है । उसका माहात्म्य श्रवण करने से, नामसंकीर्तन करने से अथवा वहां की मिट्टी का शरीर पर लेप करने से मनुष्य पापमुक्त होता है ।
- प्रयागं मानवश्रेष्ठं सर्वपापप्रणाशनम्।
- अत्र देवाः सदा स्नात्वा पुनरलोकं न गच्छन्ति॥ -- मत्स्य पुराण
- प्रयागराज मानवों के लिए सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है, जो सभी पापों का नाश करने वाला है। यहां देवता भी स्नान कर मोक्ष प्राप्त करते हैं और फिर पुनः जन्म नहीं लेते।
- यत्र कृत्वा च संकल्पं यज्ञियं फलमाप्नुयात्।
- सर्वतीर्थमयं तीर्थं प्रयागाख्यमनुत्तमम्॥ -- स्कन्द पुराण
- जहां संकल्प लेने मात्र से यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है, वही स्थान है प्रयाग, जो सभी तीर्थों का समन्वय करने वाला और अद्वितीय है। प्रयागराज में किसी भी शुभ कार्य का संकल्प करने से उसी प्रकार का पुण्य फल मिलता है, जैसा कि बड़े यज्ञों से प्राप्त होता है। यह अद्वितीय तीर्थ है।
- ग्रहाणां च यथा सूर्यो नक्षत्राणां यथा शशी ।
- तीर्थानामुत्तमं तीर्थं प्रयागाख्यमनुत्तमम् ॥ -- पद्मपुराण
- जिस प्रकार ग्रहों में सूर्य एवं नक्षत्रों में चंद्रमा श्रेष्ठ है, उसी प्रकार सर्व तीर्थों में प्रयागराज सर्वोत्तम है।
- त्रिवेणीं माधवं सोमं भरद्वाजं च वासुकिम् ।
- वन्देऽक्षयवटं शेषं प्रयागं तीर्थनायकम् ॥
- त्रिवेणी (संगम), वेणीमाधव, सोमेश्वर, भारद्वाज, वासुकी नाग, अक्षयवट, शेष (बलदेव) एवं तीर्थराज प्रयागको मैं वंदन करता हूं ।
- माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥
- देव दनुज किन्नर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनी ॥ -- तुलसीदास
- सूर्य जब मकर रशि में प्रवेश करते हैं, तो तीर्थराज प्रयाग में सब लोग आते हैं। देवता, दानव, किन्नर, मानव आदि सभी त्रिवेणी में स्नान करते हैं।