प्रकाश

विकिसूक्ति से
नेविगेशन पर जाएँ खोज पर जाएँ
  • असतो मा सद्गमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्माऽमृतमं गयम ॥ -- पवमान मन्त्र (या पवमन अभ्यारोह), वृहदारण्यक उपनिषद्
मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो, अन्धरकार से प्रकाश की ओर ले चलो, मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।
  • स्वल्पमपि दीपककणिका बहुलं नाशयेत्तमः।
स्वप्रकाशो परानन्दे तमो मूढस्य जायते॥
बहुत धीमे धीमे टिमटिमाने वाले दीपक का मन्द प्रकाश बहुत बड़े घर के अन्धकार का भी नाश कर देता है। उसी प्रकार अज्ञानरूप तम से आच्छादित मूढ़ जनों के हृदय में यदि परमानन्द का (थोड़ा सा भी) प्रकाश हृदयरूपी घर में प्रवेश करते ही समस्त देहरूपी घर के अन्धकार को नष्ट कर के उसमे ज्ञानरूप प्रकाश को भरकर अज्ञानरूपी अन्धकार को नष्ट कर देता है।
उलूकस्य यथा भानुरन्धकारः प्रतीयते।
स्वप्रकाशो परानन्दे तमो मूढस्य जायते॥
जिस प्रकार सूर्य का तेज प्रकाश उल्लू को अन्धकार की भाँति प्रतीत होता है, वैसे ही स्वप्रकाशित परमानन्द का प्रकाश मूढ़ों के हृदय में भी अन्धकार की भाँति प्रतीत होता है।

इन्हें भी देखें[सम्पादन]