नीति के वचन

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अति सर्वत्र वर्जयेत(सब जगह अति करने से बचना चाहिये)

अति का भला न बोलना, अतिकी भली न चूप ।
अतिका भला न बरसना अतिकि भली न धूप ।

धर्म का तत्व समझो और उसे गुनो! जो अपने लिये प्रतिकूल हो, वैसा आचरण या व्यवहार दूसरों के साथ नहीं करना चाहिये।
(श्रूयताम धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवानुवर्यताम ।
आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषाम न समाचरेत ।।)

दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करना चाहिये। ( शठे शाठ्यम समाचरेत् )
-- चाणक्य