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विदुर नीति

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विदुर धृतराष्ट्र के महामंत्री और नीतिशास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान् थे। महाभारत में बहुत ही महान बता कर उनकी प्रशंसा की गई है। उन्होंने महाभारत के युद्ध को टालने का हरसम्भव प्रयास किया था परन्तु असफल रहे। युद्ध के अनन्तर विदुर पांडवों के भी मंत्री हुए। पांडवों ने उनकी ही आज्ञा तथा सलाह लेकर शासन आरम्भ किया और आदर्श राज्य की स्थापना की।

महाभारत में महात्मा विदुर सदैव अपनी नीतियों से सही समय पर सही सुझाव देते नजर आते हैं। ये दूरदर्शी थे जो समय से पहले ही परेशानियों को भांप लेते थे। महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले विदुर ने धृतराष्ट्र को चेताया था कि इस युद्ध का अन्त अत्यन्त ही बुरा होगा। महात्मा विदुर को अपने समय के बुद्धिजीवियों में से एक माना जाता है।

विदुर-नीति वास्तव में महाभारत युद्ध से पूर्व युद्ध के परिणाम के प्रति शंकित हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के साथ उनका संवाद है। युद्ध के पूर्व महाराजा धृतराष्ट्र अपने सलाहकार विदुर को बुलाकर अच्छे और बुरे के बारे में चर्चा करते हैं। ‘महाभारत’ के उद्योग पर्व में इस चर्चा का वर्णन मिलता है।

उपदेश[सम्पादन]

  • अभियुक्तं बलवता दुर्बलं हीनसाधनम्।
हृतस्वं कामिनं चोरमाविशन्ति प्रजागरः॥
विदुरजीने बोले-राजन्! जिसका बलवान् के साथ विरोधवहो गया है, उस साधनहीन दुर्बल मनुष्यको , जिसका सब कुछ हर लिया गया है उसको, कामीको तथा चोरको रातमें नींद नहीं आती।
  • कच्चिदेतैर्महादोषैर्न स्पृष्टोऽसि कदाचन।
कच्चिच्च परवित्तेषु गृध्यन् न परितप्यसे॥
नरेन्द्र! कहीं आपका भी इन महान् दोषोंसे सम्पर्क तो नहीं हो गया है? कहीं पराये धनके लोभसे तो आप कष्ट नहीं पा रहे हैं?
  • श्रोतुमिच्छामि ते धर्म्यं परं नैःश्रेयसं वचः।
अस्मिन् राजर्षिवंशे हि त्वमेकः प्राज्ञसम्मतः॥
  • राजा लक्षणसम्पन्नस्त्रैलोक्यस्याधिपो भवेत्।
प्रेष्यस्ते प्रेषितश्चैव धृतराष्ट्र युधिष्ठिरः॥
विदुरजी बोले-महाराज धृतराष्ट्र! श्रेष्ठ लक्षणोंसे सम्पन्न राजा युधिष्ठिर तीनों लोकोंकी स्वामी हो सकते हैं। वे आपके आज्ञाकारी थे, पर आपने उनहें वनमें भेज दिया।
  • विपरीततरश्च त्वं भागधेये न सम्मतः।
अर्चिषां प्रक्षयाश्चैव धर्मात्मा धर्मकोविदः॥
आप धर्मात्मा और धर्मके जानकार होते हुए भी आँखों की ज्योतिसे हीन होनेके कारण उन्हें पहचान न सके, इसी से उनके अत्यन्त विपरीत हो गये और उन्हें राज्यका भाग देनेमें सम्मती नहीं हुई।
  • आनृशंश्यादनुक्रोशाद् धर्मात् सत्यात् पराक्रमात्।
गुरुत्वात् त्वयि सम्प्रेक्ष्य बहून् क्लेशांस्तितिक्षते॥
युधिष्ठिरमें क्रूरताका अभाव, दया, धर्म, सत्य , तथा पराक्रम है, वे आपमें पूज्यबुद्धि रखते हैं। इनहीं सद्गुणोंके कारण वे सेच विचारकर चुपचाप बहुत-से क्लेश सहते हैं।
  • दुर्योधने सौबले च कर्णे दुःशासने तथा।
एतेष्वैश्वर्यमादाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि॥
आप दुर्योधन, शकुनि, कर्ण तथा दुःशासन-जैसे अयोग्य व्यक्तियों पर राज्यका भार रखकर केसे कल्याण चाहते हैं?
  • आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता।
यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
  • निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते।
अनास्तिकःश्रद्धधान एतत् पण्डितलक्षणम्॥
जो अच्छे कर्मोंका सेवन कर्ता और बूरे कर्मोंसे दूर रहता है, साथ ही जो आस्तिक और श्रद्धालु है, उसके वे सद्गुण पण्डित होनेके लक्षण है।
  • क्रोधो हर्षश्च दर्पश्च ह्रीः स्तम्भो मान्यमानिता।
यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते।१७
क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्दण्डता तथा अपनेको पूज्य समझाना-ये भाव जिसको पुरुषार्थको भ्रष्ट नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है।
  • यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे।
कृतमेवास्यजानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
दूसरे लोग जिसके कर्तव्य, सलाह और पहलेसे किये हुए विचारको नहीं जानते , बल्कि काम पूरा होनेपर ही जानते है, वही पण्डित कहलाता है।
  • यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः।
समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते॥
सर्दी-गर्मी, भय-अनुराग, सम्पत्ति-दरिद्रता-ये जिस्के कार्यमें विघ्न नहीं डालते , वही पण्डित कहलाता है।
  • यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थावनुवर्तते।
कामादर्थं वृणीते यः स वै पण्डित उच्यते॥
जिसकी लौकिक बुद्धि धर्म और अर्थका ही अनुसरण करते है और जो भोगको छोडकर पुरुषार्थका ही वरण करता है, वहीं पण्डित कहलाता है।
  • यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते।
न किंचिदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः॥
  • क्षिप्रं विजानन्ति चिरं श्रुणोति
विज्ञाय चार्थं भजते न कामात्।
नासम्पृष्टो व्युपयुङ्क्ते परार्थे
तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य॥
  • नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम्।
आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः॥
पण्डितोंकी-सी बुद्धि रखनेवाले मनुष्य दुर्लभवस्तुकी कामना नहीं करते, खोयी हुई वस्तुके विषयमें शोक करना नहीं चाहते और विपत्तिमें बड़कर घबराते नहीं हैं।
  • निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः।
अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते॥
जो पहले निश्शय करके फिर कार्यका आरम्भ करता है, कार्यके बीचमें नहीं रुकता, समयको व्यर्थ नहीं जाने देता, और मनको वशमें रखता है।
  • आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते।
हितं च नाभ्यसूयन्ति पण्डिताः भरतर्षभ॥
भरतकुलभूषण! पण्डितजन श्रेष्ठकर्मों में रुचि रखते है, उन्नतिके कार्य करते है, तथा भलाई करनेवलों में दोष पहीं निकालते।
  • न हृष्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तप्यते।
गाङ्गो ह्रद इवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते॥
जो अपना आदर होनेपर हर्षके मारे फूल नहीं उठता, अनादरसे संतप्त नहीं होता तथा गंगाजीके ह्रद(गहरे गर्त) – के सम्मान जिसके चित्तको क्षुभ नहीं होता, वही पण्डित कहलाता है।
  • तत्त्वज्ञःसर्वभूतानां योगज्ञःसर्वकर्मणाम्।
उपायज्ञो मनुष्याणां नरःपण्डित उच्यते॥
जो संपूर्ण भौतिक पदार्थोंकी असलीयतका ज्ञान रखनेवाला, सब कार्योंके करनेका ढंग जाननेवाला तथा मनुष्योंमें सबसे बढकरउपायका जानकार है, वह मनुष्य पण्डित कहलाता है।
  • प्रवृत्तवाक् चित्रकथ ऊहवान् प्रतिभानवान्।
आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पणडित उच्यते॥
जिसकी वाणी कहीं रुकती नही , जो विचित्र ढंग से बातचीत करता है, तर्क में निपुण और प्रतिभाशाली है तथा जो ग्रन्थकेतात्पर्यको शीघ्र बता सक्ताहै, वह पण्डित कहलाता है।
  • श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगाः।
असंभिन्नार्यमर्यादः पण्डिताख्यां लभेत सः॥
जिसकी विद्या बुद्धिका अनुसरण करती है, और बुद्धि विद्याका तथा जो शिष्ट पुरुषोंकी मर्यादाका उल्लंघन नही करता, वही पण्डितकी संज्ञा पासकता है।
  • अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः
अर्थांश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधैः॥
विना पढ़े ही कर्व करनेवाले, दरिद्र होकर भी बड़े -बड़े मनोरथ करनेवाले और बिना काम किये ही धन पानेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको पण्डितलोग मूर्ख कहते है।
  • स्वमर्थं यः परित्यज्य परार्थमुनुतिष्ठति।
मिथ्या चरति मित्रार्थे यश्च मूढः स उच्यते॥
जो अपने कर्तव्य छोडकर दूसरेके कर्तव्यका पालन करता है, तथा मित्रके साथ असत् आचरण करता है, वह मूर्ख कहलाता है।
  • अकामान् कामयति यः कामयानान् परित्यजेत्।
बलवन्तंच यो द्वेष्टि तमाहुर्मूढचेतसम्॥
जो नचाहनेवालोंको चाहता है, और चाहनेवालोंको त्याग देता है जो अपनेसे बलवान्के साथ वैर बाँधता है, उसे मूढ विचारका मनुष्य कहते है।
  • अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च।
कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेतसम्॥
जो शत्रुको मितूर बानाता और मित्र से द्वेष करते हुए उसे कष्ट पहूँचता है तथा सदा बूरे कर्मोंका आरम्भ किया करता है, उसे मूढ चित्तवाला कहते है।
  • संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते।
चिरं करोति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ॥
  • श्राद्धं पित्रुभ्यो न ददाति दैवतानि नार्चति।
सुहृन्मित्रं न लभते तमाहुर्मूढचेतसम्॥
जो पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका पूजन नहीं करता तथा जिसे सुहृद् नहीं मिलता, उसे मूढचित्तवाला कहते है।
  • श्राद्धं पित्रुभ्यो न ददाति दैवतानि नार्चति।
सुहृन्मित्रं न लभते तमाहुर्मूढचेतसम्॥
जो पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका पूजन नहीं करता तथा जिसे सुहृद् नहीं मिलता, उसे मूढचित्तवाला कहते है।
  • अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहुभाषते।*
अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधमः॥
मूढ चित्तवाला अधम मनुष्य बिना बुलाये ही भीतर चला आता है, बिना पूछे ही बहुत बोलता है तथा अविश्वसनीय मुनुष्यपर भी विश्वास करता है।
  • परं क्षिपति दोषेण वर्तमानः स्वयं तथा
यश्च कृध्यत्यनीशानः स च मूढतमो नरः॥
दोषयुक्त बर्ताव करते हुए भी जो दूसरेपर उसके दोष बताकर आक्षेप करता है तथा जो असमर्थ होते हुए भी क्रोध सकता है, वह मुष्य महामूर्ख है।
  • आत्मनो बलमज्ञाय धर्मार्थपरिवरिजितम्।
अलभ्यमिच्छन् नैष्कर्म्यान्मूढबुद्धिरहोच्यते॥
जो अपने बलको न समझकर विना काम किये ही धर्म और अर्थसे विरुद्ध तथा न पानेयोग्य वस्तुकी इच्छा करता है , वह पुरुष इस संसारमें मूढबुद्धि कहलाता है।
  • अशिष्यं शास्ति यो राज यश्च शून्यमुपासते।
कदर्यं भजते यश्च तमाहुर्मूढचेतसम्॥
जो अनधिकारीको उपदेश देता है और शून्यकी उपासना करता है, तथा जो कृपणका आश्रय लेता है, उसे मूढचित्तवाला कहते है।
  • अर्थं महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव च।
विचरत्यसमुन्नद्धो यः स पण्डित उच्यते॥
जो बहुत धन, विद्या तथावैश्वर्यको पाकर भी उद्दण्डतापूर्वक नही चलता, वह पण्डितवकहलाता है।
  • एकःसम्पन्नमश्नाति वस्ते वासश्च शोभनम्।
योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः को नृशंसतरस्ततः॥
जो अपनेद्वारा भरण-पोषणके योग्यव्यक्तियोंको बाँटे बिना अकेले ही उत्तम भोजन भोजन करता है, और अच्छा वस्त्र पहलाता है, उससे बढ़कर क्रर कौन होगा?
  • एकः पापानि कुरुते फलं भुङ्क्ते महाजनः।
भोक्तरो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते॥
मनुष्य अकेला पाप कर(-के धन कमा)-ता है और (उस धन) उपभोग बहुत-लोग करते है।उपभोग करनेवाले तो दोषसे छूट जाते है, पर उसका करता दोषका भागी होता है।
  • एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता।
बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्यद्राष्ट्रं सराजकम्॥
किसी धुनुर्धर वीरके द्वारा छोडा हुआ बाण सम्भव है, एकको भी मारे या न मारे। परन्तु बुद्धिमान् द्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजाके साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्रका विनाश कर सकती है।
  • एकया द्वे विनिश्चित्य त्रींश्चतुर्भिर्वशे कुरु।
पञ्च जित्वा विदित्वा षट् सप्त हित्वा सुखी भव॥
एक (बुद्धि)से दो (कर्तव्य और अकर्तव्य) का निश्चय करके चार ( साम,दान,भेद,दण्ड)-से तीन (शत्रु, मित्र तथा उदासीन)-को वशमें कीजिये। पाँच( इन्द्रियों)को जीतकर छः ( सन्धि,विग्रह, यान ,आसन, द्वैधीभाव और समाश्रयरूप) गुणोंको जानकर तथा सात (स्त्री, जुआ, मृगया, मद्य, कठोरवचन, दण्डकी कठोरता, और अन्यायसे धनोपार्जन) को छोडकर सुखी हो जाइये।
  • एकं विषरसो हन्ति शस्त्रेणैकश्च वध्यते।
सराष्ट्रं सप्रजं हन्न्ति राजानं मन्त्रविप्लवः॥
विषका रस एक (पीनेवाले ) की मारता है,शस्त्रसे एकका ही वध होता है, किन्तु (गुप्त) मन्त्रणा प्रकाशित होना राष्ट्र और प्रजाके साथ ही राजाका भी विनाश कर डालता है।
  • एकः स्वादु न भुञ्जीत एकश्चार्थान् न चिन्तयेत्।
एको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्तेषु जागृयात्॥
अकेले स्वादिष्ट भोजन न करे, अकेला किसी विषयका निश्च न करे, अकेला रास्ता न चले और बहुत-से लोग सोये हों तो उनमें अकेला न जागता रहे।
  • एकमेवाद्वितीयं तद् यद् राजन् नावबुद्ध्यसे।
सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावास्य नौरिव॥
राजन्! जैसे समुद्रके पार जानेके लिये नाव ही एकमात्र साधन है, उसी प्रकार स्लर्गके लिये सत्य ही एकमात्र सोपान है, दूसरा नहीं, किंतु अप इसे नहीं समझ रहे है।
  • एकःक्षमवतां दोषो द्वितीयो नोपपद्यते।
यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः॥
क्षमाशील पुरुषोंमें एक ही दोषका आरोप होता है, दूसरेकी तो संभावना ही नहीं है। वह दोष यह है कि क्षमाशील मनुष्यको लोग असमर्थ समझ लेते है।
  • सोऽस्य दोषो न मन्तव्यःक्षमा हि परमंबलम्।
क्षमागुणो ह्यशक्तानां शक्तानां भूषणं क्षमा॥
किन्तु क्षमाशील पुरुषका वह दोष नहीं मानना चाहिये, क्योंकी क्षमा बहुत बड़ा बल है। क्षमा असमर्थ मनुष्योंका गुण तथा समर्थोंका भूषण है।
  • क्षमा वशीकृतिर्लोके क्षमया किं न साध्यते।
शान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः॥
इस जगत् मे क्षमा वशीकरणरूप है, भला, क्षमासे क्या नहीं सिद्ध होता है? जिसके हाथमें शान्तिरूपी तलवार है, उसका दुष्ट पुरुष क्या कर लगें?
  • अतृणे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति।
अक्षमावान् परं दोषैरात्मानंचैव योजयेत्॥
तृणरहितस्थानमें गिरी हुई आग अपने-आप बुझ जाती है। क्षमाहीन पुरुष अपनेको तथा दूसरेको भी दोषका भागी बन लेता है।
  • एको धर्मः परं श्रेयःक्षमैका शान्तिरुत्तमा।
विद्यैका परमातृप्तिरहिंसैका सुखावहा॥
केवल धर्म ही परमकल्याणकारक है, एकमात्र क्षमा ही शान्तिका सर्वश्रेष्ठ उपाय है। एक विद्या ही परम संतोष देनेवाले है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देनेवाले है।
  • पृथिव्यां सागरान्तायां द्वाविमौ पुरुषाधमौ।
गृहस्थश्च निरारम्भः सारम्भश्चैव भिक्षुकः॥
समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथिवीमें दो प्रकारके अथम पुरुष है-अकर्मण्य गृहस्थ और कर्मों में लगा हुआ संन्यासी
  • द्वाविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलाशयानिव।
राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम्॥
बिलमें रहनेवाले जीवोंको जैसेवसाँप खा जाता है, उसी प्रकार यह पृथिवी शत्रुसे विरोध न करनेवाले राजा और परदेश सेवन करनेवाले ब्राह्मण-इन दोनोंको खा जाती है।
  • द्वाविमौ कण्टकौ तीक्ष्णौ शरीरपरिशोषिणौ।
यश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यत्यनीश्वरः॥
जो निर्धन होकर भी बहुमूल्य वस्तुकी इच्छा रखता उर असमर्थ होकर भी कर्रोध करता है-ये दोनों ही अपने लिये तीक्ष्ण काँटोंके समान हैं एवं अपने शरीरको सुखानेवाले हैं।
  • द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा।
गृहस्थस्य निरारम्भः कार्यवांश्चैव भिक्षुकः॥
दो ही अपने विपरीत कर्मके कारण शोभा नहीं पाते-अकर्मण्य गृहस्थ और प्रपञ्चमें लगा हुआ संन्यासी।
  • द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम्।
धनवन्तमदातारं दरिद्रं चाऽतपस्विनम्॥
जो धनी होनेपर भी दान नदे और दरिद्र होने पर भी सहन नकर सके-इन दो प्रकारके मनुष्योंको गलेमें मजबूत पत्थर बाँधकर पानीमें डुबा देना चाहिये।
  • द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र सूर्यमण्डलभेदिनौ।
परिव्राड् योगयुक्तश्च रणे चाभिमुखे हतः॥
पुरुषश्रेष्ठ! ये दो प्रकारके पुरुष सूर्यमण्डलको भेदकर ऊर्ध्वगतिको प्राप्त होते है-योगयुक्त संन्यासी, और संग्राममें शत्रुओंके सम्मुख युद्ध करके मारा गया योद्धा।
  • त्रयो न्याया मनुष्याणां श्रूयन्ते भरतर्षभ।
कनीयान् मध्यमः श्रेष्ठ इति वेदविदो विदुः॥
मनुष्योंके कार्यसिद्धिके लिए उत्तम, मध्यम और अधम – ये तीन प्रकारके न्यायानुकूल उपाय सुने जाते है, ऐसा वेदवेत्ता विद्वान् जानते हैं।
  • त्रिविधाः पुरुषा राजन्नुत्तमाधममध्यमाः।
नियोजयेद् यथावत्तांस्त्रिविधेष्वेव कर्मसु॥
राजन्! उत्तम,मध्यमऔर अधम-ये तीन प्रकारके पुरुष होते हैं, इनको यथायोग्य तीन ही प्रकारके कर्मोंमें लगाना चाहिये॥
  • त्रय एवाधना राजन् भार्या दासस्तथा सुतः।
यत् ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद् धनम्॥
राजन्! तीन ही धनके अधिकारी नहीं माने जाते-स्त्री,पुत्र, तथा दास। ये जो कुछ कमाते है, वह धन उसीका होता है, जिसके अधीन ये रहते हैं।
  • हरणं च परस्वानां परदाराभिमर्शनम्।
सुहृदश्च परित्यागस्त्रयो दोषाः क्षयावहाः॥
दूसरेके धनका हरण, दूसरेकी स्त्रीका संसर्ग,सुहृद् मित्रका परित्याग-ये तीनों ही दोष (मनुष्यके आयु, धर्म तथा कीर्तिका) क्षय करनेवाले होते है।
  • त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामक्रोधस्तथालोभः तस्मादेतत्रयं त्यजेत्॥
  • वरप्रदानं राज्यं च पुत्रजन्म च भारत।
शत्रोश्च मोक्षणं कृच्छात् त्रीणि चैकं च तत्समम्॥
भारत! वरदान पाना, राज्यकी प्राप्ति और पुत्रका जन्म-ये तीन एक ओर और शत्रुके कष्टसे छूटना-यह एक ओर, वे तीन और एक बराबर ही ह।
  • भक्तं च भजमानं च तवास्मीति च वादिनम्।
त्रीनेतांश्छरणं प्राप्तान् विषमेऽपि न संत्यजेत्।६८
भक्त, सेवक तथा मैं आपका ही हूँ, ऐसावकरनेवाले-इन तीन प्रकारके शरणागत मनुष्योंको संकट पड़नेपर भी नहीं छोडनि चाहिये।
  • चत्वारि राज्ञा तु महाबलेन
वर्ज्यान्याहुः पण्डितस्तानि विद्यात्।
अल्पप्रज्ञैः सहमन्त्रं च नकुर्या-
न्न दीर्घसूत्रै रभसैश्चारणैश्च॥
थोडी बुद्धिवाले, दीर्घसूत्री, जल्दबाज और स्तुति करनेवाले लोगोंके साथ गुप्त सलाह नहीं करनी चाहिये। ये चारोंवमहाबली राजाके लिये त्यागनेयोग्य बताये गये हैं। विद्वान् पुरुष ऐसे लोगोंको पहचान ले।
  • देवतानां च संकल्पमनुभावं च धीमताम्।
विनयं कृतविद्यानां विनाशं पापकर्मणाम्॥
देवताओंका संकल्प, बुद्धिमानोंका प्रभाव, विद्वानोंकी नम्रता और पापियोंका विनाश।
  • चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि
भयं प्रयच्छन्त्यथाकृतानि।
मानाग्निहोत्रमुतमानमौनम्
मानेनाधीतमुतमानयज्ञः॥
चार कर्म भयको दूर करनेवाले है, किन्तु वे ही ठीक तरहसे सम्पादित न हो, तो भयप्रदान करते हैं। वे कर्म हैं-आदरके साथ अग्निहोत्र, आदरपूर्वक मौनका पालन, आदरपूर्वक स्वाध्याय और आदरके साथ यज्ञका अनुष्ठान।
  • पञ्च त्वानुगमिष्यन्ति यत्र यत्र गमिष्यसि।
मित्राण्यमित्रा मध्यस्था उपजीव्योपजीविनः॥
राजन्! आप जहाँ जहाँ जायँगे, वहाँ-वहाँ मित्र, शत्रु, उदासीन, आश्रय देनेवाले तथा आश्रय पानेवाले-ये पाँच आपके पीछे लगे रहेंगे।
  • पञ्चेन्द्रियस्य मर्त्यस्यच्छिद्रं चेदेकमिन्द्रियम्।
ततोऽस्य स्रवति प्रज्ञा दृतेः पात्रादिवोदकम्॥
पाँच ज्ञानेन्द्रियोंवाले पुरुषकी यदि एक भी इन्द्रिय छिद्र(दोष) युक्त हो जाय तो उससे उसकी बुद्धि इस प्रकार बाहर निकल जाती है, जैसे मशकके छेदसे पानी।
  • षड्दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता।
निद्रा तंद्रा भयं क्रोधं आलस्यं दीर्घसूत्रता॥
  • षडिमान् पुरुषो जह्याद् भिन्नं नावमिवार्णवे।
अप्रवक्तारमचार्यमनधीयानमृत्विजम्॥
अरक्षितारं राजानं भार्यां चाप्रियवादिनीम्।
ग्रामकामं च गोपालं वनकामं च नापितम्॥
  • षडेव तु गुणाः पुंसा न हातव्याः कदाचन।
सत्यं दानमनालस्यमनसूया क्षमा धृतिः॥
  • अर्थागमो नित्यमरोगता च
प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च।
वश्यश्च पुत्रोऽर्थकरी च विद्या
षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्॥
राजन्! धनकी प्राप्ति, नित्य नीरोग रहना, स्त्रीका अनुकूल तथा प्रियवादिनी होना, पुत्रके आज्ञाके अन्दर रहना, तथा धन पैदा करनेवाली विद्याका ज्ञान-ये छः बातें इस मनुष्य लोकमें सुखदायिनी होती हैं।
  • षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्यं योऽधिगच्छति।
न स पापैः कुतोऽनर्थैर्युज्यते विजितेन्द्रियः॥
मनमें नित्य रहनेवाले छः शत्रु( काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य) – को जो वशमें कर लेता है, वह जितेन्द्रिय पुरुष पापोंसे ही लिप्त नहीं होता, फिर उनसे उत्पन्न होनेवाले अनर्थोंसे युक्त होनेकी तो बात ही क्या है?
  • षडिमे षट्सु जीवन्ति सप्तमो नोपलभ्यते।
चौराः प्रमत्ते जीवन्ति व्याधितेषु चिकित्सकाः॥
  • प्रमदाः कामयानेषु यजमानेषु याचकाः।
राजा विवदमानेषु नित्यं मूर्खेषु पण्डितः॥
  • षडिमानि विनश्यन्ति मुहूर्तमनवेक्षणात्।
गावः सेवा कृषिर्भार्या विद्या वृषलसङ्गतिः॥
  • षडेते ह्यवमन्यन्ते नित्यं पूर्वोपकारिणम्।
आचार्यं शिक्षिताः शिष्याः कृतदाराश्च मातरम्॥
  • नारीं विगतकामास्तु कृतार्थश्च प्रयोजकम्।
नावं विस्तीर्णकान्तारा आतुराश्च चिकित्सकम्॥
  • आरोग्यमनृण्यमविप्रवासः
सद्भिर्मनुष्यैः सह सम्प्रयोगः।
स्वप्रत्यया वृत्तिरभीतवासः
षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्॥
  • ईष्यी घृणी नसंतुष्टः क्रोधिनो नित्यशङ्कितः।
परभाग्योपजीवी च षडेते नित्यदुःखिताः॥
  • सप्तदोषाः सदा राज्ञा हातव्या व्यसनोदयाः।
प्रायशो यैर्विनश्यन्ति कृतमूला अपीश्वराः॥
  • स्त्रियोऽक्षा मृगया पानं वाक्पारुष्यं च पञ्चमम्।
महच्च दण्डपारुष्यमर्थदूषणमेव च॥
स्त्रीविषयक आसक्ति, जूआ, शिकार, मद्यपान, वचनकी कठोरता, अत्यन्त कठोर दण्ड देना और धनका दुरुपयोग करना-ये सात दुःखदायी दोष राजाको सदा त्याग देना चाहिये। इनसे दृढ़मूल राजा भी प्रायः नष्ट हो जाते हैं।
  • अष्टौ पूर्वनिमित्तानि नरस्य विनशिष्यतः।
ब्राह्मणान् प्रथमं द्वेष्टि ब्राह्मणैश्च विरुध्यते॥
  • ब्राह्मणस्वानि चादत्ते ब्राह्मणांश्च जिघांसति।
रमते निंदया चैषां प्रशंसां नाभिनन्दति॥
  • नैनान् स्मरति कृत्येषु याचितश्चाभ्यसूयति।
एतान् दोषान् नरः प्राज्ञो बुध्येत् बुद्ध्वा विसर्जयेत्॥
विनाशके मुखमें पड़नेवाले मनुष्यके आठ पूरवचिह्न हैं-प्रथम तो वह ब्रह्मणोंसे द्वेष करता है, ब्रह्मणोंका धन हड़प लेता है, उनको मारना चाहता है, ब्राह्मणेंकी निन्दामें आनन्द मानता है, उनकी प्रशंसा सुनना नहीं चाहता, यज्ञ-यागादिमें उनका स्मरण नहीं करता। तथा कुछ माँगनेपर उनमें दोष निकालने लगता है, इन सब दोषोंको बुद्धिमान् मनुष्य समझे और समझकर त्याग दे।
  • अष्टाविमानि हर्षस्य नवनीतानि भारत।
वर्तमानानि दृश्यन्ते तान्येव स्वसुखन्यपि॥
  • समागमश्च सखिभिर्महांश्चैव धनागमः।
पुत्रेण च परिष्वङ्गः सन्निपातश्च मैथुने॥
  • समये च प्रियालापः स्वयूथेषु समुन्नतिः।
अभिप्रेतस्य लाभश्च पूजा च जनसंसदि॥
भारत! मित्रोंसे समागम, अधिकधनकी प्राप्ति, पुत्रका आलिङ्गन, मैथुनमें संलग्न होना, समपर प्रियवचन बोलना, अपने वर्गके लोगोंमें उन्नति, अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति, और जनसमाजमें सन्मान-ये आठ हर्षके सार दिखायी देते हैं और ये ही अपने लौकिक सुखके भी साधन होते हैं।
  • अष्टौगुणाः पुरुषं दीपयन्ति
प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतं च।
पराक्रमश्चाबहुभाषिता च
दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च॥
  • नवद्वारमिदं वेश्म त्रिस्थूणं पञ्चसाक्षिकम्।
क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं विद्वान् यो वेद स परःकविः॥
  • दशधर्मं नजानन्ति धृतराष्ट्र निबोध तान्
मत्तः प्रमत्त उन्मत्तः श्रान्तः कृद्धो बुभुक्षितः॥
  • त्वरमाणश्च लुब्धश्च भीतः कामी च ते दश।
तस्मादेतेषु सर्वेषु न प्रसज्जेत पण्डितः॥
  • यो नोद्धतं कुरुते जातु वेषं
न पौरुषेणापि विकत्थतेऽन्यात्।
न मूर्च्छितः कटुकान्याह किंचित्
प्रियं सदा तं कुरुते जनो हि॥
जो कभी उद्दण्डका-वेष नहीं बनता, दूसरोंके सामने अपने पराक्रमकी श्लाघ भी नहीं करता, क्रोधसे व्याकुल होनेपर भी कटुवचन नहीं बोलता, उस मनुष्यको लोग सदा ही प्यार बना लेते है।
  • न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं
न दर्पमरोहति नास्तमेति।
न दुर्गतोऽस्मीति करोत्यकार्यं
तमार्यशीलं परमाहुरार्याः॥
जो शान्त हुई वैरके आग फिर प्रज्वलित नहीं करता, गर्व नहीं करता, हीनता नहीं दिखाता तथा ‘ विपत्तिमें पड़ा हूँ’ ऐसा सोचकर अनुचित काम नहीं करता, उस उत्तम आचरणवाले पुरुषको आर्यजन सर्वश्रेष्ठ कहते है।
  • अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्।
पुत्रार्थमसुरेन्द्रेण गीतं चैव सुधन्वता॥
इसी विषयमें असुरोंके राजा प्रह्लादने सुधन्वाके साथ अपने पुत्रके प्रति कूछ उपदेश दिया था। नीतिज्ञलोग उस पुरातन इतहास उदाहरण देते हैं।
  • यः काममन्यू प्रजहाति राजा
पात्रे प्रतिष्ठापयते धनं च।
विशेषविच्छृतवान् क्षिप्रकारी
तं सर्वलेकः कुरुते प्रमाणम्॥
जो राजा काम और क्रोधका त्यग करता है और सुपात्रको धन देता है, विशेषज्ञ है , शास्त्रोंका ज्ञाता और कर्तव्यको शीघ्र पूरा करनेवाला है, – के व्यवहार और वचनों) उस को सब लोग प्रमण मानते है।
  • जानाति विश्वासयितुं मनुष्यान्
विज्ञातदोषेषु दधाति दण्डम्।
जानाति मात्रां च तथा क्षमां च
तं तादृशं श्रीर्जुषते समग्रा॥
  • सुदुर्बलं नावजानाति कंचिद्
युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम्।
न विग्रहं रोचयते बलस्थैः
काले च यो विक्रमते स धीरः॥
  • न संरम्भेणारभते त्रिवर्ग-
माकारितः शंसति तत्त्वमेव।
न मित्रार्थे रोचयते विवादं
नापूजयति कुप्यति चाप्यमूढः॥
  • न योऽभ्यसूयत्यनुकम्पते च
न दुर्बलः प्रतिभाव्यं करोति।
नात्याह किंचित् क्षमते विवादं
सर्वत्र तादृग् लभते प्रशंसाम्॥
जो क्रोध या उतावलीके साथ धर्म, अर्थ,तथा कामका आरम्भ नहीं करता, पूछनेपर यथार्थ बात ही बतलाता है, मित्रके लिये झगड़ा नहीं पसंद करता , आदर न पाने पर क्रुद्ध नहीं होता, विवेक नहीं खो बैठता, दूसरोंके दोष नहीं देखता, सबपर दया करता है, असमर्थ होते हुए किसीकी जमानत नहीं देता, बढ़कर नहीं बोलता तथा विवादको सह लेता है, ऐसा मनुष्य सब जगह प्रशंसा पाता है।
  • यो नोद्धतं कुरुते जातु वेष
न पौरुषेणापि विकत्थतेऽन्
न मूर्च्छितः कटुकान्याह किंचित्
प्रियं सदा तं कुरुते जनो हि॥
जो कभी उद्दण्डका-वेष नहीं बनता, दूसरोंके सामने अपने पराक्रमकी श्लाघ भी नहीं करता, क्रोधसे व्याकुल होनेपर भी कटुवचन नहीं बोलता, उस मनुष्यको लोग सदा ही प्यार बना लेते है।
  • न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं
न दर्पमरोहति नास्तमेति।
न दुर्गतोऽस्मीति करोत्यकार्यं
तमार्यशीलं परमाहुरार्याः॥
जो शान्त हुई वैरके आग फिर प्रज्वलित नहीं करता, गर्व नहीं करता, हीनता नहीं दिखाता तथा ‘ विपत्तिमें पड़ा हूँ’ ऐसा सोचकर अनुचित काम नहीं करता, उस उत्तम आचरणवाले पुरुषको आर्यजन सर्वश्रेष्ठ कहते है।
  • न स्वेसुखे वै कुरुते प्रहर्षं
नान्यस्य दुःखे भवति प्रहृष्टः।
दत्त्वा न पश्चात् कुरुतेऽनुतापं
स कथ्यते सत्पुरुषार्यशीलः॥
जो अपने सुखमें प्रसन्न नहीं होता, दूसरेके दुःखके समय हर्ष नहीं मानता, और दान देकर पश्चात्ताप नहीं करता, वह सज्जनोंमें सदाचारी कहलाता है।
  • देशाचारान् समयाञ्जातिधर्मान्
बुभूषते यः स परावरज्ञः।
स यत्र तत्राभिगतः सदैव
महाजनस्याधिपत्यं करोति॥
जो मनुष्य देशके व्यवहार , अवसर तथा जातियोंके धर्मोंको तत्तवसे जानना चाहता है, उसे उत्तम-अथमका विवेक हो जाता है। वह जहाँ कहीं भी जाता है, सदा महान जनसमूह पर अपनी प्रभुता स्थापित कर लेता है।
  • दम्भं मोहं मत्सरं पापकृत्यं
राजद्विष्टं पैशुनं पूगवैरम्।
मत्तोन्त्तैर्दुर्जनैश्चापि वादं
यः प्रज्ञावान् वर्जयेत् स प्रधानः॥
  • दानं होमं दैवतं मङ्गलानि
प्रायश्चित्तान् विधिवल्लोकवादान्।
एतानि यः कुरुते नैत्यकानि
तस्योत्थानं देवता राधयन्ती॥
  • समैर्विवाहं कुरुते न हीनैः
समैः सख्यं व्यवहारं कथां च।
गुणैर्विशिष्टांश्च पुरो दधाति
विपश्चितस्यस्य नयाः सुनीताः॥
जो अपने बराबरवालोंके साथ विवाह, मित्रता, व्यवहार तथा बातचीत करता है, हीन पुरुषोंके साथ नहीं और गुणोंमे बड़े-चड़े पुरुषोंको सदा आगे रहता है, उस विद्वानकी नीति श्रेष्ठ नीति है।
  • मितं भुङ्क्ते संविभाज्याश्रितेभ्यो
मितं स्वपित्यमितं कर्म कृत्वा।
ददात्यमित्रेष्वपि याचितः सं-
स्तमात्मवन्तं प्रजहन्त्यनर्थाः॥
  • चिकीर्षितं विप्रकृत्यं च यस्य
नान्ये जनाः कर्मजानन्ति किंचित्।
मन्त्रे गुप्ते सम्यगनुष्ठिते च
नाल्पोप्यस्य च्यवते कश्चिदर्थः॥
  • यः सर्वभूत प्रशमे निविष्टः
सत्यो मृदुर्मानकृच्छुद्धभावः।
अतीव स ज्ञायते ज्ञातिमध्ये
महामणिर्जात्य इव प्रसन्नः॥
जो इनके प्रमाणोंको उपर्युक्त प्रकारसे ठीक ठीक जानता है तथा धर्म और अर्थके ज्ञनमें दत्तचित्त रहता है, वह राज्यको प्रप्त करता है।
  • य आत्मानाऽपत्रपते भृशं नरः
स सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत।
अनन्ततेजाः सुमनाः समाहितः
सतेजसा सूर्य इवावभासते॥
सुमनसा, समाहितमनसा च सूर्य इव विराजते।: जो स्वयं ही अधिक लज्जा शील है, वह सब लोगोंमे श्रेष्ठ समझा जाता है । वह अपने अनन्त तेज, शुद्ध हृदय एवं एकाग्रतासे युक्त होनेके कारण कान्तिमें सूर्यके समान शोभा पाता है।
  • वनेजाताः शापदग्धस्य राज्ञः।
पाण्डोः पुत्राः पञ्चपञ्चेन्द्रकल्पाः।
त्वयैव बाला वर्धिताः शिक्षिताश्च
तवादेशं पालयन्त्याम्बिकेय॥
अम्बिकानन्दन! (मृगरूपधारी किंदमऋषि के) शापसे दग्ध राजा पाण्डुके जो पाञ्च पुत्र वनमें उत्पन्न हुए, वे पाञ्च इन्द्रके समान शक्तिशाली है, उनहें आपने ही बचपनसे पाला और शिक्षा दी है, वे भी आपकी आज्ञाका पालन करते रहते है।
  • प्रदायैषामुचितं तात राज्यं
सुखी पुत्रैः सहितो मोदमानः।
न देवानां नापि च मानुषाणां
भविष्यसि त्वं तर्कणीयो नरेन्द्र॥
  • तात! उन्हें उनका न्ययोचित राज्यभाग देकर आप अपने पुत्रेंके साथ आनन्दित होते हुए सुख भोगियें। नरेन्द्र! ऐसा करनेपर आप देवतओं तथा मनुष्येंकी आलोचनाके विषय नहीं रह जायँगे।
  • जाग्रतो दह्यमानस्य यत् कार्यमनुपश्यति।
तद् ब्रूहि त्वं नस्तात धर्मार्थकुशलो ह्यसि॥
धृतराष्ट्र बोलें-तात! मैं चिन्तासे जलता हुआ अभीतक जाग रहा हूँ। तुम मेरे करनेयोग्य जो कार्य समझो, उसे बताओ, क्योंकी हमलोगोंमें तुमहीं धर्म और अर्थकी ज्ञनमें निपण हो।
  • त्वं मां यथावद् विदुर प्रशाधि
प्रज्ञापूर्वं सर्वमजातशत्रोः।
यन्मन्यसे पथ्यमदीनसत्त्व
श्रेयस्करं ब्रहि तद् वै कुरूणाम्॥
उदारचित्त विदौर! तुम अपनी बुद्धीसे विचारकरमुझे ठीक ठीक उपदेश करो। जो बात युधिष्ठिरके लिये हितकर और कौरवोंके लियेवकल्याणकारो समझो, वह सब अवश्य बताओ।
  • पापशङ्की पापमेवानुपश्यन्
पृच्छामि त्वां व्याकुलेनात्मनाहम्।
कवे तन्मे ब्रूहि सर्वं यथाव-
न्मनीषितं सर्वमजातशत्रोः॥
विद्वन्! मेरे मनमें अनिष्टकी अंशका बनी रहती सै, इसलिए मैं सर्वत्र अनिष्ट ही देखता हूँ। अतः व्याकुलहृदयसे तुमसे पूछ रहा हूँ-अजातशत्रु युधिष्ठिर क्या चाहते हैं, सो सब ठीक-ठीक बताओ।
  • शुभं वा यदि वा पापं द्वेष्यं वा यदि वा प्रियम्।
अपृष्टस्तस्य तद् ब्रूयाद् यस्य नेच्छेत् पराभवम्॥
  • विदुरजीने कहाँ-राजन्! मनुष्यको चाहिये कि वह जिसकी पराजय नहीं चाहता, उसके बिना पूछे भी अच्छी अथवा बुरी, कल्याण करनेवाली या अनिष्ट करनेवाली-जी भी बात हो, बात दे।
  • तस्माद् वक्ष्यामि ते राजन् हितं यत्स्यात् कुरून् प्रति।
वचः श्रेयस्करं धर्म्यं ब्रुवत स्तन्निबोध मे॥
  • इसलिए राजन्! जिससे समस्त कौरवोंका हित हो, मैं वही बात आपसे कहूँगा। मैं जो कल्याणकारी एवं धर्मयुक्त वचन कह रहा हूँ, उन्हें आप ध्यान देकर सुनें।
  • मिथ्योपेतानि कर्माणि सिध्येयुर्यानि भारत।
अनुपायप्रयुक्तानि मा स्म तेषु मनः कृथाः॥
भारत! असत् उपायों( अन्यायपूर्वक युद्ध एवं द्यूत) आदिका प्रयोग करके जो कपटपूर्ण कार्य सिद्धि होते हैं, उनमें आप मन मत लगाइए।
  • तथैव योगविहितं यत् तु कर्म न सिद्ध्यति।
उपाययुक्तं मेधावी न तत्र ग्लपयेन्मनः॥
  • अनुबन्धानपेक्षेत सानुबन्धेषु कर्मसु।
सम्प्रधार्य च कुर्वीत न वेगेन समाचरेत्॥
किसी प्रयोजनसे किये गये कर्मों में पहले प्रयोजनको समझ लेना चाहिये। खूब सोच विचारकर काम करना चाहिये, जलादबाजीसे किसी कामका आरम्भ नहीं करना चाहिये।
  • अनुबन्धं च सम्प्रेक्ष्य विपाकं चैव कर्मणाम्।
उत्थानमात्मनश्चैव धीरः कुर्वीत वा न वा॥
धीर मनुष्यको उचित है कि पहले कर्मोंका प्रयोजन, परिणाम तथाव्पनी उन्नतीका विचार करके फिर काम आरम्भ करे या न करे।
  • यः प्रमाणं न जानाति स्थाने वृद्धौ तथा क्षये।
कोशे जनपदे दण्डे न स राज्येऽवतिष्ठते॥
  • यस्त्येतानि प्रमाणानि यथोक्तान्यनुपश्यति।
युक्तो धर्मार्थयोर्ज्ञाने स राज्यमधिगच्छति॥
जो इनके प्रमाणोंको उपर्युक्त प्रकारे ठीक – ठीक जामाता है तथा धर्म और अर्थके ज्ञानमेव दत्तचित्त रस्ता है , वह राज्यको प्राप्तः करता है।
  • न राज्यं प्राप्तमित्येव वर्तितव्यमसाम्प्रतम्।
श्रियं ह्यविनयो हन्ति जरा रूपमिवोत्तमम्॥
‘अब तो राज्य प्राप्त ही हो गया’–ऐसा समझकर अनुचित बर्ताव नहीं करना चाहिये।उद्दण्डता सम्पत्तिको उसी प्रकार नष्ट कर देती है , जैसे सुन्दर रूपको बुढापा।
  • भक्ष्योत्तमप्रतिच्छन्नं मत्स्यो बडिशमायशम्।
लोभाभिपाती ग्रसते नानुबन्धमवेक्षते॥
जैसे मछली बढ़िया खाद्य वस्तुसे ढकी हुई लोहेकी काँटीको लोभमें पड़कर निगल जाती है , उससे होनेवाले परिणाम परं विचारः नहीं करती(अतएव मर जाती है)
  • यच्छक्यं ग्रसितुं ग्रस्यं ग्रस्तं परिणमेच्च यत्।
हितं च परिणामे यत् तदाद्यं भूतिमिच्छता॥
यद् भोक्तुं समर्थोऽस्ति तदेव तथा यत् परिणमते तदेव परिणामानन्तरं यद् हितं यच्छति तदेव भोक्तव्यम्।: अतः अपनी उन्नति चाहनेवाले पुरुषो वहीं वस्तु खानी (या ग्रहण करनी) चाहिये,(जो परिणाममें अनिष्टकर न हो अर्थात्) जो खाने योग्य हो तथा खानी जा सकते , खाने (या ग्रहण करणे)-पर चक सके और पर जानेपर हितकारी हो।
  • वनस्पतेरपक्वानि फलानि प्रचिनोति यः।
स नाप्नोति रसं तेभ्यो बीजं चास्य विनस्यति॥
जो पेड़से कच्चे फलोंको तोड़ता है, वह उन फलोंसेरस तो पाता नहीं, परंतु उस वृक्षके बीजका नाश हो जाता है।
  • यस्तु पक्वमुपादत्ते काले परिणतं फलम्।
फलाद्रसं स लभते बीजाच्चैव फलं पुनः॥
परंतु जो समयपर पके हुए फलको ग्रहण करता है , वह उन फलोंसे रस पाता है और उस बीजसे पुनः फल प्राप्त करता है।
  • यथा मधु समादत्ते रक्षन् पुष्पाणि षट्पदः।
तद्वदर्थान् मनुष्येभ्य आदद्यादविहिंसया॥
जैसे भैंरा फूलोंकी रक्षा करता हुआ ही उनके मधुका ग्रहण करता है, उसी प्रकार राजा भी प्रजाजनोंको कष्ट दिये बिना ही उनसे धन ले।
  • पुष्पं पुष्पं विचिन्वीत मूलच्छेदं न कारयेत्।
मालाकार इवारामे न यथाङ्गारकारकः॥
  • किन्नु मे स्यादिदं कृत्वा किन्नु मे स्यादकुर्वतः।
इति कर्माणि संचिन्त्य कुर्याद् वा पुरुषो न वा॥
इसे करने मेरा क्या लाभ होगा और न करनेसे क्या हानि होगा-इस प्रकार कर्मोंके विषयमें भलीभाँति विचार करके फिर मनुष्य( कर्म ) करे या न करे।
  • अनारभ्या भवन्त्यर्थाः केचिन्नित्यं तथागताः।
कृतः पुरुषकारो हि भवेद्*येषु निरर्थकः॥
जिस ऐसे व्यर्थ कार्य हैं, जो नित्य अप्राप्त होनेके कारण आरम्भ करने योग्य नहीं होते, क्योंकी उनके लिए किया हुआ पुरुषार्थ भी व्यर्थ हो जाता है।
  • प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थकः।
न तं भर्तारमिच्छन्ति षण्डं पतिमिव स्त्रियः॥
जिसकी प्रसन्नताका कोई फल नहीं और क्रोध भी व्यर्थ है,हउसको प्रजा स्वमीबनना नहीं चाहती-जैसे स्त्री नपुंसकको पति नहीं बनाना चाहती।
  • कांश्चिदर्थान् नरः प्राज्ञो लघुमूलान् महाफलान्।
क्षिप्रमारभते कर्तुं न विघ्नयति तादृशान्॥
जिनका मूल (साधना)छोटा और फल महान् हो , बुद्धिमान् पुरुष उनको शीघ्र ही आरम्भ कर देताहै, वैसे काममें वह विघ्न नहीं आने देता।
  • ऋजु पश्यति यःसर्वं चाक्षुषानुपिबन्निव।
आसीनमपितूष्णीकमनुरज्यन्ति तं प्रजाः॥
जो राजा इसी प्रकार प्रेमके साथ कोमल दृष्टिसे देखता है, वह चुपचाप बैठा भी रहे, तो भी प्रजा उससे अनुराग रखती है।
  • सुपुष्पितः स्यादफलः फलितः स्याद् दुरारुहः।
अपक्वःपक्वसंकाशो न तु शीर्येत कर्हिचित्॥
  • चक्षुषा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम्।
प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनुप्रसीदति ॥
जो राजा नेत्र, मन, वाणी और कर्म-इन चारोंसे प्रजाको प्रसन्न करता है, उससी प्रजा प्रसन्न रहती है।
  • यस्मात् त्रस्यन्ति भूतानि मृगव्याधान्मृगाइव।
सागरान्तमपि महीं लब्ध्वा स परिहीयते॥
जैसे व्याधसे हरिण भयभीत होते हैं, उसी प्रकार जैसे समस्त प्राणी डरते है, वह समुद्रपर्यन्त पृथवीका राज्य पाकर भी प्रजाजनोंके द्वारा त्याग दिया जाता है।
  • पितृपैतामहं राज्यं प्राप्तवान् स्वेन कर्मणा।
वायुरभ्रमिवासाद्य भ्रंशयत्यनये स्थितः॥
अन्यायमें स्थित हुआ राजा बाप-दादोंका राज्य पाकर भी अपने कर्मोंसे उसे इस तरह भ्रष्ट कर देता है, जैसा हवा बादलको भिन्न भिन्न कर देती है।
  • धर्ममाचरतो राज्ञः सद्भिश्चरितमादितः।
वसुधा वसुसंपूर्णा वर्धते भूतिवर्धिनी॥
परम्परासे सज्जनपुरुषों द्वारा किये हुए धर्मका आचरण करनेवाले राज्यकी पृथ्वी धन-धान्यसे पूर्ण होकर उन्नतीकी प्राप्त होती है और उसके ऐश्वर्यको बढ़ाती है।
  • अथ संत्यजतो धर्ममधर्मं चानुतिष्ठतः।
प्रतिसंवेष्टते भूमिरग्नौ चर्माहितं यथा॥
  • जो राजा धर्मको छोड़ता और अधर्मका अनुष्ठान करता है, उसकी राज्यभूमि आगपर रखे हुए चमड़ेकी भाँती संकुचित हो जाती है।
  • य एव यत्नः क्रियते परराष्ट्रविमर्दने।
स एव यत्नः कर्तव्यः स्वराष्ट्रपरिपालने॥
दूसरेराष्ट्रोंका नाश करनेके लिये जिस प्रकारका प्रयत्न किया जाता है, उसी प्रकारकी तत्परता अपने राज्यकी रक्षाके लिये करना चाहिये।
  • भूयासं लभते क्लेशं या गौर्भवति दुर्दुहा।
अथ या सुदुहा राजन् नैव तां वितुदन्त्यपि॥
राजन्! जो गाय बड़ी कठिनाई से दुहने देती है, वह बहुत क्लेश उठाति है। किन्तु जो आसानीसे दूध देते है, उसे लोग कष्ट नहीं देते।
  • यदतप्तं प्रणमति न तत् संतापयन्त्यपि।
यच्च स्वयं नतं दारु न तत् संनमयन्त्यपि॥
जो धातु बिना गरम किये मुड़ जाते हैं, उनहें आगमें नहीं तपाते। जो काठ स्वयं झुका हचता है, उसे कोई झुकानेका प्रयत्न नहीं करता।


  • जो लोग अच्छे कार्य करते हैं उनके पास स्थाई लक्ष्मी आती है, यानी सही तरीके से कमाया गया धन ही हमारे पास टिकता है।
  • जिस धन को अर्जित करने में मन तथा शरीर को क्लेश हो, धर्म का उल्लंघन करना पड़े, शत्रु के सामने अपना सिर झुकाने की बाध्यता उपस्थित हो, उसे प्राप्त करने का विचार ही त्याग देना श्रेयस्कर है।
  • आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता ।
यमार्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते॥
अर्थ : आत्मज्ञान, उद्योग, कष्ट सहने की सामर्थ्य और धर्म में स्थिरता, ये बातें जिसको 'अर्थ' (पुरुषार्थ) से नहीं भटका पातीं हैं वही पंडित कहलाता है। दूसरे शब्दों में, महात्मा विदुर का कहना है कि तमाम सदगुणों के बाद भी जो व्यक्ति अर्थ से विचलित नहीं होता है, उसे ही बुद्धिमान माना जा सकता है।
  • परस्त्री का स्पर्श, पर धन का हरण, मित्रों का त्याग रूप यह तीनों दोष क्रमशः काम, लोभ, और क्रोध से उत्पन्न होते हैं।
  • जो विश्वास का पात्र नहीं है, उसका तो कभी विश्वास किया ही नहीं जाना चाहिए। पर जो विश्वास के योग्य है, उस पर भी अधिक विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। विश्वास से जो भय उत्पन्न होता है, वह मूल उद्देश्य का भी नाश कर डालता है।
  • संसार के छह सुख प्रमुख है- धन प्राप्ति, हमेशा स्वस्थ रहना, वश में रहने वाले पुत्र, प्रिय भार्या, प्रिय बोलने वाली भार्या और मनोरथ पूर्ण कराने वाली विद्या- अर्थात् इन छह से संसार में सुख उपलब्ध होता है।
  • बुद्धिमान व्यक्ति के प्रति अपराध कर कोई दूर भी चला जाए तो चैन से न बैठे, क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति की बाहें लंबी होती है और समय आने पर वह अपना बदला लेता है।
  • क्षमा को दोष नहीं मानना चाहिए, निश्चय ही क्षमा परम बल है। क्षमा निर्बल मनुष्यों का गुण है और बलवानों का क्षमा भूषण है।
  • ईर्ष्या, दूसरों से घृणा करने वाला, असंतुष्ट, क्रोध करने वाला, शंकालु और पराश्रित (दूसरों पर आश्रित रहने वाले) इन छह प्रकार के व्यक्ति सदा दुखी रहते हैं।
  • जो पुरुष अच्छे कर्मों और पुरुषों में विश्वास नहीं रखता, गुरुजनों में भी स्वभाव से ही शंकित रहता है। किसी का विश्वास नहीं करता, मित्रों का परित्याग करता है... वह पुरुष निश्चय ही अधर्मी होता है।
  • जो अच्छे कर्म करता है और बुरे कर्मों से दूर रहता है, साथ ही जो ईश्वर में भरोसा रखता है और श्रद्धालु है उसके ये सद्गुण पंडित होने के लक्षण हैं।
  • जो अपना आदर-सम्मान होने पर खुशी से फूल नहीं उठता और अनादर होने पर क्रोधित नहीं होता तथा गंगा जी के कुण्ड के समान जिसका मन अशांत नहीं होता, वह ज्ञानी कहलाता है।
  • मूढ़ चित वाला नीच व्यक्ति बिना बुलाए ही अंदर चला आता है, बिना पूछे ही बोलने लगता है तथा जो विश्वास करने योग्य नहीं हैं उन पर भी विश्वास कर लेता है।
  • जो बहुत धन, विद्या तथा ऐश्वर्य को पाकर भी इठलाता नहीं, वह पंडित कहलाता है।
  • मनुष्य अकेला पाप करता है और बहुत से लोग उसका आनंद उठाते हैं। आनंद उठाने वाले तो बच जाते हैं पर पाप करने वाला दोष का भागी होता है।
  • किसी धनुर्धर वीर के द्वारा छोड़ा हुआ बाण संभव है किसी एक को भी मारे या न मारे, मगर बुद्धिमान द्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजा के साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्र का विनाश कर सकती है।
  • विदुर धृतराष्ट्र को समझाते हुए कहते हैं: राजन! जैसे समुद्र के पार जाने के लिए नाव ही एकमात्र साधन है उसी प्रकार स्वर्ग के लिए सत्य ही एकमात्र सीढ़ी है, कुछ और नहीं, किन्तु आप इसे नहीं समझ रहे हैं।
  • केवल धर्म ही परम कल्याणकारक है, एकमात्र क्षमा ही शांति का सर्वश्रेष्ठ उपाय है। एक विद्या ही परम संतोष देने वाली है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देने वाली है।
  • विदुर धृतराष्ट्र से कहते हैं : राजन! ये दो प्रकार के पुरुष स्वर्ग के भी ऊपर स्थान पाते हैं- शक्तिशाली होने पर भी क्षमा करने वाला और निर्धन होने पर भी दान देने वाला।
  • त्रिविधं नरकस्येदं द्वारम नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥
(अर्थ : काम, क्रोध और लोभ यह तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं, यानी दुखों की ओर जाने के मार्ग हैं। यह तीनों आत्मा का नाश करने वाले हैं, इसलिए इनसे हमेशा दूर रहना चाहिए।
  • भरतश्रेष्ठ! पिता, माता, अग्नि, आत्मा और गुरु-मनुष्य को इन पांच की बड़े यत्न से सेवा करनी चाहिए।


  • अच्छे कर्मो को अपनाना और बुरे कर्मों से दूर रहना साथ ही परमात्मा में विश्वास रखना और श्रद्धालु भी होना - ऐसे सद्गुण बुद्धिमान और पंडित होने का लक्षण है।
  • क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्दंडता, तथा स्वयं को पूज्य समझना - ये भाव जिस व्यक्ति को पुरुषार्थ के मार्ग (सन्मार्ग) से नहीं भटकाते वही बुद्धिमान या पंडित कहलाता है।
  • जिस व्यक्ति के कर्त्तव्य, सलाह और पहले से लिए गए निर्णय को दूसरे लोग केवल काम संपन्न होने पर ही जान पाते हैं, वही पंडित कहलाता है।
  • जिस व्यकित के कर्मों में न ही सर्दी और न ही गर्मी, न ही भय और न ही अनुराग, न ही संपत्ति और न ही दरिद्रता विघ्न डाल पाते हैं वही पण्डित कहलाता है।
  • जिस व्यक्ति का निर्णय और बुद्धि धर्मं का अनुशरण करती है और जो भोग विलास ओ त्याग कर पुरुषार्थ को चुनता है वही पण्डित कहलाता है।
  • ज्ञानी और बुद्धिमान पुरुष शक्ति के अनुसार काम करने के इच्छा रखते हैं और उसे पूरा भी करते हैं तथा किसी वस्तु को तुक्ष्य समझ कर उसकी अवहेलना नहीं करते हैं।
  • जो व्यक्ति किसी विषय को शीघ्र समझ लेते हैं, उस विषय के बारे में धैर्य पूर्वक सुनते हैं, और अपने कार्यों को कामना से नहीं बल्कि बुद्धिमानी से संपन्न करते हैं, तथा किसी के बारे में बिना पूछे व्यर्थ की बात नहीं करते हैं वही पण्डित कहलाते हैं।
  • बुद्धिमान तथा ज्ञानी लोग दुर्लभ वस्तुओं की कामना नहीं रखते, न ही खोयी हुए वस्तु के विषय में शोक करना चाहते हैं तथा विपत्ति की घडी में भी घबराते नहीं हैं।
  • जो व्यक्ति पहले निश्चय करके रूप रेखा बनाकर काम को शुरू करता है तथा काम के बीच में कभी नहीं रुकता और समय को नहीं गँवाता और अपने मन को वश में किये रखता है वही पण्डित कहलाता है।
  • हे भारत कुलभूषण (धृतराष्ट्र), ज्ञानी पुरुष हमेशा श्रेष्ठ कर्मों में रूचि रखते हैं, और उन्न्नति के लिए कार्य करते व प्रयासरत रहते हैं तथा भलाई करनेवालों में अवगुण नहीं निकालते हैं।
  • जो अपना आदर-सम्मान होने पर भी फूला नहीं समाता, और अपमान होने पर भी दुखी व विचलित नहीं होता तथा गंगाजी के कुण्ड के समान जिसके मन को कोई दुख नहीं होता वह पण्डित कहलाता है।
  • जो व्यक्ति प्रकृति के सभी पदार्थों का वास्तविक ज्ञान रखता है, सब कार्यों के करने का उचित ढंग जाननेवाला है तथा मनुष्यों में सर्वश्रेष्ठ उपायों का जानकार है वही मनुष्य पण्डित कहलाता है।
  • जो निर्भीक होकर बात करता है , कई विषयों पर अच्छे से बात कर सकता है, तर्क-वितर्क में कुशल है, प्रतिभाशाली है और शाश्त्रों में लिखे गए बातों को शीघ्रता से समझ सकता है वही पण्डित कहलाता है।
  • जिस व्यक्ति की विद्या या ज्ञान उसके बुद्धि का अनुशरण करती है और बुद्धि उसके ज्ञान का तथा जो भद्र पुरुषों की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करता वही पण्डित की पदवी पा सकता है।