दण्ड

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  • यथावयो यथाकालं यथा प्राणञ्च ब्राह्मणे।
प्रायश्चितं प्रदातव्यं ब्राह्मणैर्धर्मपाठकैः।
येन शुद्धिमवाप्नोति न च प्राणैर्वियुज्यते।
आर्तिं वा महतीं याति न चैतद् व्रतमादिशेत् ॥ (हारीत ऋषि)
अर्थ - धर्मशास्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मणों द्वारा पापी को उसकी आयु, समय और शारीरिक क्षमता को ध्यान में रखते हुए दण्ड (प्राय्श्चित) देना चाहिए। दण्ड ऐसा हो कि वह पापी का सुधार (शुद्धि) करे, ऐसा नहीं जो उसके प्राण ही ले ले। पापी या अपराधी के प्राणों को संकट में डालने वाला दण्ड देना उचित नहीं है।
  • ये कार्यिकेभ्योऽर्थमेव गृह्णीयुः पापचेतसः |
तेषां सर्वस्वमादाय राजा कुर्यात् प्रवासनम् || -- मनुस्मृति
जो भ्रष्टबुद्धि घुसखोरीका काला काला कम करते हैं, उनका सर्वस्व हर कर राजा उन्हें देशनिकाला दे दे।
  • न वै राज्यं न राजासीत् न दण्डो न च दाण्डिकः।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम् ॥ -- महाभारत, शान्तिपर्व ५९.१४
अर्थ - (राजन! शाकद्वीप के मंक, मशक, मानस, मदंग नामक जनपद में) न कोई राजा था, न दण्ड है और न दण्डदेनेवाला। वहाँ के लोग धर्म के ज्ञाता थे और स्वधर्म पालन के ही प्रभाव से एक दूसरे की रक्षा करते थे।
  • न कालो दण्डमुद्यम्य शिरः कृन्तति कस्यचित् ।
कालस्य बलमेतावत् विपरीतार्थदर्शनम् ॥ -- संस्कृत सुभाषितानि
काल ( भाग्य) किसी व्यक्ति को यदि दण्ड देता है तो किसी दण्ड (शस्त्र ) से न दे कर केवल उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर देता है। उसकी शक्ति इसी में निहित है कि वह उस व्यक्ति की अपना भला बुरा समझने की शक्ति को ही नष्ट कर देता है जिस के फलस्वरूप वह हर बात का उलटा मतलब निकाल कर नष्ट हो जाता है।
  • दण्ड द्वारा प्रजा की रक्षा करनी चाहिये लेकिन बिना कारण किसी को दंड नहीं देना चाहिये। -- रामायण
  • चोर केवल दंड से ही नहीं बचना चाहता, वह अपमान से भी बचना चाहता है। वह दंड से उतना नहीं डरता जितना कि अपमान से। -- प्रेमचन्द
  • अपराध करने के बाद भय उत्पन्न होता है और यही उसका दंड है। -- वाल्टेयर