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काव्य

विकिसूक्ति से
  • काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ॥
बुद्धिमान लोग अपनी समय साहित्य एवं दर्शन का अध्ययन करने में व्यतीत करते हैं जबकि मूर्ख लोग अपनी समय बुरी आदतों जैसे निद्रा, कलह एवं व्यसन में व्यतीत करते हैं।
  • दुक्खं कीरइ कव्वं कव्वम्मि कए पउंजणा दुक्खं ।
संते पउंजमाणे सोयारा दुल्लहा हुंति ॥ -- वज्जालग्ग (प्राकृत में)
काव्य रचना कष्ट से होती है, काव्य रचना हो जाने पर उसे सुनाना कष्टप्रद होता है एवं जब सुनाया जाता है तब सुनने वाले भी कठिनाई से मिलते हैं।
  • अबुहा बुहाण मज्झे पढंति जे छंदलक्खणविहूणा ।
ते भमुहाखग्गणिवाडियं पी सीसं न लक्खंति ॥ -- वज्जालग्ग (प्राकृत में)
जब विद्वान विरस एवं अशुद्ध काव्य पाठ से ऊब कर भौंहें टेंढ़ी करने लगते हैं, उस समय उनके कटाक्ष से मानों उन मूर्खों के सिर ही कट जाते हैं, परन्‍तु वे इतना भी नहीं जान पाते।
  • निज कबित्त केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका॥
जे पर भनिति सुनत हरषाहीं। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं॥ -- तुलसीदास, रामचरितमानस में
रसीली हो या अत्यन्त फीकी, अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती? किन्तु जो दूसरे की रचना को सुनकर हर्षित होते हैं, ऐसे उत्तम पुरुष जगत में बहुत नहीं हैं।
  • कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू॥
भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जो हँसें नहिं खोरी॥ -- तुलसीदास
जो न तो कविता के रसिक हैं और न जिनका श्री रामचन्द्रजी के चरणों में प्रेम है, उनके लिए भी यह कविता सुखद हास्यरस का काम देगी। प्रथम तो यह भाषा की रचना है, दूसरे मेरी बुद्धि भोली है, इससे यह हँसने के योग्य ही है, हँसने में उन्हें कोई दोष नहीं।
  • आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना॥
भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा॥ -- तुलसीदास
नाना प्रकार के अक्षर, अर्थ और अलंकार, अनेक प्रकार की छंद रचना, भावों और रसों के अपार भेद और कविता के भाँति-भाँति के गुण-दोष होते हैं।
  • मनुष्य के लिए कविता इतनी प्रयोजनीय वस्तु है कि संसार की सभ्य-असभ्य सभी जातियों में, किसी न-किसी रूप में पाई जाती है। चाहे इतिहास न हो, विज्ञान न हो, दर्शन न हो, पर कविता का प्रचार अवश्य रहेगा। -- रामचन्द्र शुक्ल
  • जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। हृदय की इसी मुक्ति की साधाना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आई है, उसे कविता कहते हैं। -- रामचन्द्र शुक्ल
  • काव्य के लिए अनेक स्थलों पर हमें भावों के विषयों के मूल और आदिम रूपों तक जाना होगा जो मूर्त और गोचर होंगें।…जब तक भावों से सीधा और पुराना लगाव रखने वाले मूर्त और गोचर रूप न मिलेंगें तब तक काव्य का वास्तविक ढांचा खड़ा न हो सकेगा। काव्य में अर्थ ग्रहण मात्र से काम नहीं चलता, बिम्ब ग्रहण अपेक्षित होता है। यह बिम्ब ग्रहण निर्दिष्ट, गोचर और मूर्त विषय का ही हो सकता है। -- रामचन्द्र शुक्ल
  • सुन्दर और कुरूप-काव्य में बस ये ही दो पक्ष हैं। भला-बुरा, शुभ-अशुभ, पाप-पुण्य, मंगल-अमंगल, उपयोगी-अनुपयोगी-ये सब शब्द काव्य-क्षेत्र के बाहर के हैं। ये नीति, धर्म, व्यवहार, अर्थशास्त्र आदि के शब्द हैं। शुद्ध काव्य-क्षेत्र में न कोई बात भली कही जाती है न बुरी, न शुभ, न अशुभ, न उपयोगी, न अनुपयोगी। सब बातें केवल दो रूपों में दिखाई जाती हैं-सुन्दर और असुन्दर। जिसे धार्मिक शुभ या मंगल कहता है, कवि उसके सौंदर्य-पक्ष पर आप ही मुग्धा रहता है और दूसरों को भी मुधा करता है। जिसे धर्मज्ञ अपनी दृष्टि के अनुसार शुभ या मंगल समझता है, उसी को कवि अपनी दृष्टि के अनुसार सुंदर कहता है। -- रामचन्द्र शुक्ल
  • नाद-सौंदर्य से कविता की आयु बढ़ती है। तालपत्र भोजपत्र, कागज आदि का आश्रय छूट जाने पर भी वह बहुत दिनों तक लोगों की जिह्ना पर नाचती रहतीहै। बहुत सी उक्तियों को लोग, उनके अर्थ की रमणीयता इत्यादि की ओर ध्याजनलेजाने का कष्ट उठाए बिना ही, प्रसन्न-चित्त रहने पर गुनगुनाया करते हैं। अत: नाद-सौंदर्य का योग भी कविता का पूर्ण स्वरूप खड़ा करने के लिए कुछ न-कुछ आवश्यक होता है। इसे हम बिलकुल हटा नहीं सकते। -- रामचन्द्र शुक्ल
  • गद्य और पद्य दोनों ही में कविता हो सकती है। यह समझना अज्ञानता की पराकाष्ठा है कि जो छन्दोबद्ध है सभी काव्य है। कविता का लक्षण जहाँ कहीं पाया जाय, चाहे वह गद्य में हो चाहे पद्य में वही काव्य है। लक्षणहीन होने से कोई भी छन्दोबद्ध लेख काव्य नहीं कहलाए जा सकते और लक्षणयुक्त होने से सभी गद्य-बन्ध काव्य-कक्ष में सन्निविष्ट किये जा सकते हैं, गद्य के विषय में कोई विशेष निर्दिष्ट करने की उतनी आवश्यकता नहीं, जितनी पद्य के विषय में है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी
  • सौरस्य ही कविता का प्राण है। जिस पद्य में अर्थ का चमत्कार नहीं वह कविता नहीं । कवि जिस विषय का वर्णन करे उस विषय से उसका तादात्म्य हो जाना चाहिए, ऐसा न होने से अर्थ-सौरस्य नहीं आ सकता। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी
  • कविता शब्द नहीं, शांति है; कोलाहल नहीं, मौन है। -- रामधारी सिंह ‘दिनकर’
  • जमीन से जुड़ी हुई कविता कभी नहीं मरती है। -- जॉन कीट्स
  • कवि लिखने के लिए तब तक कलम नहीं उठाता जब तक उसकी स्याही प्रेम की आहों में सराबोर नही हो जाती। -- शेक्सपियर
  • कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं। -- हजारी प्रसाद द्विवेदी
  • कविता वह सुरंग है जिसके भीतर से मनुष्य एक विश्व को छोड़कर दूसरे विश्व में प्रवेश करता हैं। -- रामधारी सिंह ‘दिनकर’
  • कविता सृष्टि का सौन्दर्य हैं। -- पुरूषोत्तम दास टण्डन
  • कविता सुखी और उत्तम मनुष्यों के उत्तम और सुखमय क्षणों का उद्गार है। -- शेली
  • कविता का बाना पहनकर सत्य और भी चमक उठता है। -- पोप
  • काव्य सभी ज्ञान का आदि और अंत है – यह इतना ही अमर है जितना मानव का हृदय। -- विलियम वर्ड्सवर्थ
  • कविता सत्य का उच्चार है – गहरे, हार्दिक सत्य का। -- चैपिन
  • कविता देवलोक के मधुर संगीत की गूँज है। -- अज्ञात
  • जिससे आनन्द की प्राप्ति न हो वह कविता नहीं है। -- जोबार्ट
  • कविता अभ्यास से नहीं आती जिसमें कविता करने का स्वाभाविक गुण होता है वही कविता कर सकता है। -- महावीर प्रसाद द्विवेदी
  • कविता भावना का संगीत है, जो हमको शब्दों के संगीत द्वारा मिलता है। -- चैटफील्ड
  • कविता तमाम मानवीय ज्ञान, विचारों, भावों, अनुभूतियों और भाषा की खुशबूदार कली है। -- कालरिज
  • कविता हृदय की भाषा है जो एक हृदय से निकलकर दुसरे हृदय तक पहुँचती हैं। -- दुनियाहैगोल
  • कविता करना अनंत पुन्य का फल हैं। -- जयशंकर प्रसाद
  • इतिहास की अपेक्षा कविता सत्य के अधिक निकट आती हैं। -- प्लेटो

रस[सम्पादन]

  • विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्ररस निष्पत्तिः। -- नाट्यशास्त्र में भरत मुनि
अर्थात विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।
  • वाग्वैधग्ध्यप्रधानेऽपि रसएवात्रजीवितम्" -- अग्निपुराण
अग्निपुराणकार ने काव्य में रस की प्रधानता स्वीकार की है।
  • हृदय का स्थायी भाव, जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव का संयोग प्राप्त कर लेता है तो रस रूप में निष्पन्न हो जाता है। -- साहित्य दर्पण
  • तथाहि अचेतनं शवशरीरं कुंडलाद्युपेतमपि न भाति, अलंकार्यस्याभावात् -- अभिनवगुप्त, लोचन
अभिनवगुप्त के विचार से रसहीन काव्य में अलंकारों की योजना करना शव को सजाने के समान है।
  • जो विभाव अनुभाव अरू, विभचारिणु करि होई।
थिति की पूरन वासना, सुकवि कहत रस होई॥ -- रीतिकाल के प्रमुख कवि 'देव'

अलंकार[सम्पादन]

  • अलंकरोति इति अलंकारः।
जो अलंकृत करे वही अलंकार है।
  • काव्यं ग्राह्यमलङ्कारात्। सौन्दर्यमलंकारः। -- वामन
व्यापक रूप में सौंदर्य मात्र को अलंकार कहते हैं और उसी से काव्य ग्रहण किया जाता है।
  • वक्राभिधेतशब्दोक्तिरिष्टा वाचामलं-कृति:। -- भामह
वक्रार्थविजा एक शब्दोक्ति अथवा शब्दार्थवैचित्र्य का नाम अलंकार है।
  • अभिधानप्रकाशविशेषा एव चालंकाराः। -- रुद्रट
अभिधानप्रकारविशेष को ही अलंकार कहते हैं।
  • काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते। -- दण्डी
अलंकार काव्य के शोभाकर धर्म हैं।
  • काव्यशोभायाः कर्त्तारो धर्मा गुणाः। तदतिशयहेतवस्त्वलंकाराः। -- आचार्य वामन, का० सू०
आचार्य वामन ने व्यापक अर्थ को ग्रहण करते हुए संकीर्ण अर्थ की चर्चा के समय अलंकारों को काव्य का शोभाकार धर्म न मानकर उन्हें केवल गुणों में अतिशयता लानेवाला हेतु माना।
  • तमर्थमवलंबते येऽङिगनं ते गुणाः स्मृताः। अंगाश्रितास्त्वलंकारा मन्तव्याः कटकादिवत्। -- आचार्य आनन्दवर्धन, ध्वन्यालोक में
आचार्य आनंदवर्धन ने अलंकार को काव्यशरीर पर कटककुंडल आदि के सदृश मात्र माना है।
  • ये रसस्यांगिनी धर्मा: शौयादय इवात्मन:। उत्कर्षहेतवस्तेस्युरचलस्थितयो गुणा:।। उपकुर्वंति ते संतं येऽङगद्वारेण जातुचित्। हारादिवदलंकारास्तेऽनुप्रासोपमादय:। -- आचार्य मम्मट
आचार्य मम्मट ने गुणों को शौर्यादिक अंगी धर्मों के समान तथा अलंकारों को उन गुणों का अंगद्वारा उपकार करनेवाला बताकर उन्हीं का अनुसरण किया है।
  • अंगाश्रितास्त्वलंकारा:। -- आचार्य हेमचन्द्र
अलंकार अंग आश्रित हैं।
  • शब्दार्थयोरस्थिरा ये धर्मा: शोभातिशयिन:। रसादीनुपकुर्वंतोऽलंकारास्तेऽङगदादिवत्। -- विश्वनाथ, सा.द्र.)
विश्वनाथ ने अलंकारों को अस्थिर धर्म बतकर काव्य में गुणों के समान आवश्यक नहीं माना है।
  • अर्थालंकाररहिता विधवेव सरस्वती। -- अग्निपुराण
अग्निपुराण ने अलंकारों को नितान्त अनावश्यक न मानकर उन्हें शोभातिशायी कारण माना है।
  • अंगीकरोति यः काव्यं शब्दार्थावनलंकृती। असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनलंकृती। -- जयदेव, चंद्रालोक में
जयदेव ने अलंकारों को काव्यधर्म के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए उन्हें अनिवार्य स्थान दिया है। जो व्यक्ति अग्नि में उष्णता न मानता हो, उसी की बुद्धिवाला व्यक्ति वह होगा जो काव्य में अलंकार न मानता हो। अलंकार काव्य के नित्यधर्म हैं।
  • सुकवि: विदग्धपुरंध्रीवत् भूषणं यद्यपि श्लिष्टं योजयति, तथापि शरीरतापत्तिरेवास्य कष्टसंपाद्या, कुंकुमपीतिकाया इव। बालक्रीडायामपि राजत्वमिवेत्थममुमर्थं मनसि कृत्वाह। -- अभिनवगुप्त, लोचन
जैसे खेलता हुआ बालक राजा का रूप बनाकर अपने को सचमुच राजा ही समझता है और उसके साथी भी उसे वैसा ही समझते हैं, वैसे ही रस के पोषक अलंकार भी प्रधान हो सकते हैं।

छन्द[सम्पादन]

  • यदक्षरं परिमाणं तच्छन्दः
अर्थात् जहाँ अक्षरों की गिनती की जाती है या परिंगणन किया जाता है, वह छन्द है।
  • छन्दः पादौ तु वेदस्य -- पाणिनीय शिक्षा
षड् वेदांगों में छन्दःशास्त्र को वेदों का पैर (पाद) माना गया है। इसके अभाव में वह पंगु हो जाता है।
  • गायत्रेण प्रति मिमीते अर्कमर्केण साम त्रैष्टुभेन वाकम् ।
वाकेन वाकं द्विपदा चतुष्पदाक्षरेण मिमते सप्त वाणीः ॥ -- ऋग्वेद १-१६४-२४
वह (२४ वर्णों के) गायत्री छन्द से प्रार्थना की रचना करता है, प्रार्थना से वह साम की रचना करता है ( ४४ वर्णों के) त्रिष्टुप् छन्द से वह दो (या तीन पदों ) की रचना करता है। दो पदों (या तीन पदों) से वह सूक्त की रचना करता है और अक्षरों से वह सात छन्दों की रचना करता है । (संभवत: साम, गीत या प्रार्थना है; वाक् सूक्त है और वाणी छन्द है; जो सात हैं - गायत्री ( 24 ), उष्णिक् ( 28 ), अनुष्टुभ्, ( 32 ), बृहती ( 36 ) पंक्ति (40), त्रिष्टुभ् ( 44 ) और जगती ( 48 ) )।

इन्हें भी देखें[सम्पादन]

बाहरी कड़ियाँ[सम्पादन]