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वर्षा

विकिसूक्ति से
  • नीलमेघाश्रिता विद्युत् स्फुरन्ती प्रतिभाति मे।
स्फुरन्ती रावणस्याङ्के वैदेहीव तपस्विनी ॥ -- वाल्मीकि रामायण
(राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि) काले बादलों का आश्रय लेकर चमचमाती हुई बिजली मुझे ऐसी प्रतीत हो रही है, जैसे रावण की गोद में छटपटाती हुई तपस्विनी सीता हो।
  • रजः प्रशान्तं सहिमोऽद्य वायुः निदाघदोषप्रसराः प्रशान्ताः।
स्थिता हि यात्रा वसुधाधिपानां प्रवासिनो यान्ति नराः स्वदेशान् ॥ -- रामायण
(राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि) आज धूल पूर्णतया शान्त हो गयी है। वायु बर्फ के कणों से युक्त अर्थात् अत्यन्त शीतल है। गर्मी के तेज धूप, लू आदि दोषों का विस्तार पूर्णतया शान्त हो गया है। राजाओं की (विजय) यात्राएँ रुक गयी हैं। प्रवासी अर्थात् जीविका के लिए दूसरे स्थानों में जाकर बसने वाले लोग अपने स्थानों को अर्थात् घरों को (लौटकर) जा रहे हैं।
  • रसाकुलं षट्पदसन्निकाशं प्रभुज्यते जम्बुफलं प्रकामम्।
अनेकवर्णं पवनावधूतं भूमौ पतत्याम्नफलं विपक्वम्॥ -- रामायण
(राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि) रस से पूर्णतया भरे हुए भौंरों के समान काले रंग के जामुन के फल अत्यधिक मात्रा में खाये जा रहे हैं। अनेक रंगों वाले, वायु के झोंकों के द्वारा हिलाये गये, विशेष रूप से पके हुए आम के फल जमीन पर गिर रहे हैं।
  • अङ्गारचूर्णोत्करसन्निकाशैः फलैः सुपर्याप्तरसैः समृद्धाः ।
जम्बुद्वमाणां प्रविभान्ति शाखाः निपीयमाना इव षट्पदीर्घः ॥ -- रामायण
व्याख्या राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि कोयलों के चूर्ण के ढेर के समान दीखने वाले; अर्थात् अत्यधिक काली कान्ति वाले, पर्याप्त रस से भरे हुए, फलों से लदी हुई जामुन के वृक्षों की शाखाएँ ऐसी लग रही हैं। मानो भौंरों के समूह जामुनों का रसपान कर रहे हों।
  • वर्षप्रवेगा विपुलाः पतन्ति प्रवान्ति वाताः समुदीर्णवेगाः।
प्रनष्टकूला प्रवहन्ति शीघ्रं नद्यो जलं विप्रतिपन्नमार्गाः ॥ -- रामायण
(श्री राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि) बहुत अधिक तेज वर्षा की धाराएँ गिर रही हैं। तेज गति वाली हवाएँ चल रही हैं। नदियों में वर्षा का अधिक जल भर जाने के कारण टूटे हुए किनारों वाली नदियों का जल मार्गों में चारों ओर फैलकर तेजी से बह रहा है।
  • महान्ति कुटानि महीधराणां धाराविधौतान्यधिकं विभान्ति।
महाप्रमाणैर्विपुलैः प्रपातैः मुक्ताकलापैरिव लम्बमानैः॥ -- रामायण
(राम लक्ष्मण से कह रहे हैं कि) वर्षा की जलधारा से पर्वत धुल गये हैं। पर्वतों के शिखरों से महान् आकार वाले झरने गिर रहे हैं। वे झरने मोती की लड़ियों के समान अत्यधिक शोभा को धारण कर रहे हैं।
  • घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।
दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं।। -- रामचरितमानस
आकाश में बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया (सीता) के बिना मेरा मन डर रहा है। बिजली की चमक बादलों में ठहरती नहीं, जैसे दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं रहती।
  • बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।
बूँद अघात सहहिं गिरि कैसें। खल के बचन संत सह जैसें।। -- रामचरितमानस
बादल पृथ्वी के समीप आकर (नीचे उतरकर) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान् नम्र हो जाते हैं। बूँदों की चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टों के वचन संत सहते हैं।
  • छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई।। -- रामचरितमानस
भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।।
छोटी नदियाँ भरकर (किनारों को) तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं (मर्यादा का त्याग कर देते हैं)। पृथ्वी पर पड़ते ही पानी गँदला हो गया है, जैसे शुद्ध जीव के माया लिपट गई हो।
  • समिटि समिटि जल भरहिं तलावा। जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा।।
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई। होइ अचल जिमि जिव हरि पाई।। -- रामचरितमानस
जल एकत्र हो-होकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण (एक-एककर) सज्जन के पास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव हरि को पाकर अचल (आवागमन से मुक्त) हो जाता है।
  • हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ।। -- रामचरितमानस
पृथ्वी घास से परिपूर्ण होकर हरी हो गई है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते। जैसे पाखंड-मत के प्रचार से सद्ग्रंथ गुप्त (लुप्त) हो जाते हैं।।
  • दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई। बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।।
नव पल्लव भए बिटप अनेका। साधक मन जस मिलें बिबेका।। -- रामचरितमानस
चारों दिशाओं में मेढकों की ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियों के समुदाय वेद पढ़ रहे हों। अनेकों वृक्षों में नए पत्ते आ गए हैं, जिससे वे ऐसे हरे-भरे एवं सुशोभित हो गए हैं जैसे साधक का मन विवेक (ज्ञान) प्राप्त होने पर हो जाता है।
  • अर्क जवास पात बिनु भयऊ। जस सुराज खल उद्यम गयऊ।।
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी। करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी।। -- रामचरितमानस
मदार और जवासा बिना पत्ते के हो गए (उनके पत्ते झड़ गए)। जैसे श्रेष्ठ राज्य में दुष्टों का उद्यम जाता रहा (उनकी एक भी नहीं चलती)। धूल कहीं खोजने पर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्म को दूर कर देता है (अर्थात क्रोध का आवेश होने पर धर्म का ज्ञान नहीं रह जाता)।
  • ससि संपन्न सोह महि कैसी। उपकारी कै संपति जैसी।।
निसि तम घन खद्योत बिराजा। जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा।। -- रामचरितमानस
अन्न से युक्त (लहलहाती हुई खेती से हरी-भरी) पृथ्वी कैसी सुशोभित हो रही है, जैसी उपकारी पुरुष की संपत्ति। रात के घने अंधकार में जुगनू शोभा पा रहे हैं, मानो दंभियों का समाज आ जुटा हो।
  • महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं। जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं।।
कृषी निरावहिं चतुर किसाना। जिमि बुध तजहिं मोह मद माना।। -- रामचरितमानस
भारी वर्षा से खेतों की क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतंत्र होने से स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतों को निरा रहे हैं (उनमें से घास आदि को निकालकर फेंक रहे हैं)। जैसे विद्वान लोग मोह, मद और मान का त्याग कर देते हैं।
  • देखिअत चक्रबाक खग नाहीं। कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं।।
ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा। जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा।। -- रामचरितमानस
चक्रवाक पक्षी दिखाई नहीं दे रहे हैं; जैसे कलियुग को पाकर धर्म भाग जाते हैं। ऊसर में वर्षा होती है, पर वहाँ घास तक नहीं उगती, जैसे हरिभक्त के ह्मदय में काम नहीं उत्पन्न होता।
  • बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा। प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा।।
जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना। जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना।। -- रामचरितमानस
पृथ्वी अनेक तरह के जीवों से भरी हुई उसी तरह शोभायमान है, जैसे सुराज्य पाकर प्रजा की वृद्धि होती है। जहाँ-तहाँ अनेक पथिक थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होने पर इंद्रियाँ (शिथिल होकर विषयों की ओर जाना छोड़ देती हैं)।
  • कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।। -- रामचरितमानस
कभी-कभी वायु बड़े जोर से चलने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं। जैसे कुपुत्र के उत्पन्न होने से कुल के उत्तम धर्म (श्रेष्ठ आचरण) नष्ट हो जाते हैं।।
  • कबहु दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।। -- रामचरितमानस
कभी (बादलों के कारण) दिन में घोर अंधकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं। जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है।।
  • सेनापति' नए गए जल्द सावन कै चारिह दिसनि घुमरत भरे तोई के।
सोभा सरसाने, न बखाने जात कहूँ भांति, आने हैं पहार मानो काजर कै ढोइ कै।
धन सों गगन छ्यों, तिमिर सघन भयो, देखि न् परत मानो रवि गयो खोई कै।
चारि मासि भरि स्याम निशा को भरम मानि, मेरी जान, याही ते रहत हरि सोई कै। -- सेनापति
  • दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम
घटा की घमक अति घोर घनघोर तै।
कोकिला, कलापी कल कूजत हैं जित-तित
सीतल है हीतल, समीर झकझोर तै।।
सेनापति आवन कह्रों हैं मनभावन, सु
लाग्यो तरसावन विरह-जुर ज़ोर तै।
आयो सखि सावन, मदन सरसावन
लग्यो है बरसावन सलिल चहुँ ओर तै।। -- सेनापति
  • मल्लिक न मंजुल मलिंद मतवारे मिले,
मंद-मंद मारुत मुहीम मनसा की है।
कहै "पदमाकर' त्यों नदन नदीन नित,
नागर नबेलिन की नजर नसा की है।
दौरत दरेर देत दादुर सु दुन्दै दीह,
दामिनी दमकंत दिसान में दसा की है।
बद्दलनि बुंदनि बिलोकी बगुलात बाग,
बंगलान बलिन बहार बरषा की है। -- पद्माकर
  • स्वनैर्घनानां प्लवगाः प्रबुद्धा विहाय निद्रां चिरसन्निरुद्धाम्।
अनेकरूपाकृतिवर्णनादाः नवाम्बुधाराभिहताः नदन्ति॥
अनेक रूप, आकृति, वर्ण और स्वर वाले, मेघों की गर्जना से बहुत समय तक रुकी हुई नींद को त्यागकर जागे हुए मेंढक नई जल की धारा से चोट खाकर बोल रहे हैं अर्थात् शब्द कर रहे हैं।
  • मत्ता गजेन्द्राः मुदिता गवेन्द्राः वनेषु विक्रान्ततरा मृगेन्द्राः।
रम्या नगेन्द्रा: निभृता नरेन्द्राः प्रक्रीडितो वारिधरैः सुरेन्द्रः॥
हाथी मस्त हो रहे हैं, साँड (आवारा पशु) प्रसन्न हो रहे हैं, वनों में शेर अधिक पराक्रमी हो रहे हैं, पर्वत सुन्दर हैं, राजगण शान्त हो गए हैं और इन्द्र मेघों से खेल रहे हैं।
  • घनोपगूढं गगनं न तारा न भास्करो दर्शनमभ्युपैति।
नवैर्जलौघैर्धरणी वितृप्ता तमोविलिप्ता न दिशः प्रकाशाः॥
नभ मेघों से ढका है, इस कारण न तारे और न सर्य दिखाई दे रहा है। धरा नई जल की बाढ़ से तृप्त हो गई है। अन्धकार सेलिपी दिशाएँ चमक नहीं रही हैं।


  • वर्षा! जिसके मुलायम रचनात्मक हाथों में पत्थर तक को काटने की शक्ति होती है, जिनके द्वारा यह बड़े, शानदार पर्वतों तक को आकार प्रदान करती है। -- हेनरी वार्ड बीचर
  • वर्षा के बाद का सूर्य वर्षा होने के पहले के सूर्य से कहीं अधिक सुन्दर होता है। -- महमत मूरत इडलां
  • बारिश के दिन घर में एक कप चाय और एक अच्छी पुस्तक के साथ व्यतीत करने चाहिए। -- बिल वाटर्स
  • बारिश का उत्सव मनाओ; इसका तात्पर्य यही है कि सूर्य पहले से कहीं अधिक बड़ा और चमकदार नज़र आएगा। -- अज्ञात
  • एक वर्षा का दिन पाठकों के लिए एक तोहफे के समान होता है। -- एमी माइल्स
  • बारिश की मासूम बूंदे , लगभग सभी घटनाओं को , प्राकृतिक बना देती हैं। -- विसार ज़िति
  • तुम्हारा इंतज़ार करना ठीक वैसा ही है जैसे किसी अकाल में वर्षा का इंतज़ार करना। व्यर्थ और निराश करने वाला। -- सैम (हिलेरी डफ़)
  • अकेले भीगना उदासीन होता है। अपने सबसे प्रिय मित्र के साथ भीगना किसी साहसिक कार्य के जैसा होता है। -- एमिली विंग स्मिथ
  • मैंने ये सीखा है कि आप एक व्यक्ति के बारे में बहुत कुछ बता सकते हैं, उसके इन तीन चीज़ों : एक वर्षा का दिन, खोये हुए सामान और उलझी हुई क्रिसमस के पेड़ की लड़ियो , के साथ किये गये बर्ताव को देखकर। -- माया एंजेलो
  • मेरे जीवन में उड़ते हुए बादल आ गए, वर्षा या तूफ़ान लाने के लिए नहीं, बल्कि मेरे सूर्यास्त के समय के आसमान में रंग भरने के लिए। -- रबिन्द्रनाथ टैगोर
  • बारिश मेरी आत्मा पर गिरती है और मेरी रूह तक को भिगो देती है। -- एमिली लोगन डिकेन्स
  • जीवन तूफ़ान के गुज़र जाने का इंतज़ार करना नही है। यह तो बारिश में नृत्य करना सीखने के समान है। -- विवियन ग्रीस
  • वर्षा का एक दिन समकारी होता है। आपको नही पता होता कि आगे क्या होगा। आप वो ले लेते हो, जो भी आपको मिल सकता है। चार्ली हार्वे
  • एक साफ़ चमकीले दिन में, आप अपने शरीर को सुधार सकते हो; एक वर्षा के दिन में, आप अपने मस्तिष्क को ठीक कर सकते हैं। -- महमत मूरत इडलां
  • हमे बारिश से अधिक जाग्रत कोई भी नही कर सकता। डेजन स्टोजनोविक
  • अपने पूरे दिन की परिस्थिति को सिर्फ सुबह की स्थिति से मत आंकिये। आप एक किताब को उसके कवर से नही परख सकते। ठीक उसी तरह एक बादल भरी सुबह यह नही पक्का करती कि यह एक वर्षा का दिन होगा। -- इसरैलमोर आईवोर
  • कुछ लोग बारिश के दिनों की तैयारियों में इतना व्यस्त रहते हैं कि वे आज की खिलखिलाती धूप को निहारना ही भूल जाते हैं। -- विलियम फेदर
  • यदि आप बारिश के लिए प्रार्थना करते हो, तो आपको कीचड़ से निपटने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। यह भी इसी का एक हिस्सा है। -- डेने वाशिंगटन
  • कई ऐसी चीज़ें हैं जो मैं अपने मनोरंजन के लिए करता हूँ, लेकिन अपनी ख़ुशी के लिए मैं अपनी यादों को इकट्ठा करता हूँ और बारिश में टहलने के लिए निकल जाता हूँ। -- रॉबर्ट ब्रॉल्ट
  • आँखें इतनी नई, दर्द से भरी हुईं। सर्दी वाली बारिश की दो बूँदें… और यह आँखें अब और आंसू नही झेल सकतीं, क्योंकि यह बहुत कुछ देख चुकी हैं। -- शॉन हिक
  • बारिश के दिन घर में एक कप चाय और एक अच्छी पुस्तक के साथ व्यतीत करने चाहिए। -- बिल वाटर्स
  • अपने जीवन में वर्षा को धन्यवाद दीजिये क्योंकि यह आपकी आत्मा के फूलों को पानी से भिगोती है। -- जोनाथन लॉकवुड हुए
  • वर्षा का एक दिन पाठकों के लिए एक तोहफे के समान होता है। -- एमी माइल्
  • कभी भी तालाब में नही जाइये, जब आपके जूते में छेद हो ( हमेशा अपने जूते पहले ही उतार लेने चाहिए)। -- जॉन डी. रोड्स
  • वर्षा! जिसके मुलायम रचनात्मक हाथों में पत्थर तक को काटने की शक्ति होती है, जिनके द्वारा यह बड़े, शानदार पर्वतों तक को आकार प्रदान करती है। -- हेनरी वार्ड बीचर
  • आलोचना, बारिश की तरह ही, सौम्य रूप से की जानी चाहिए, जो मनुष्य का पोषण उसकी जड़ों को तबाह किये बिना कर सकें। -- फ्रैंक ए. क्लार्क
  • बिजली के तूफ़ान भी हमारे उतने ही मित्र हैं जितनी की सूरज की धूप। -- क्रिस जैमी
  • सब जगह वर्षा हो रही है, यह पेड़ों और खेतों पर गिर रही है, यह छतरियों के ऊपर गिर रही है, और यह समुद्र में जहाजों पर भी गिर रही है। -- रोबर्ट लुइस स्टीवेन्सन
  • हर किसी की ज़िन्दगी में कुछ बारिशें ज़रूर होनी चाहिए, कुछ दिन गहरे और दुःख से भरे ज़रूर होने चाहिए। -- हेनरी वर्ड्सवर्थ
  • बारिश गिरती है क्योंकि बादल उसका वज़न और अधिक देर तक सहन नही कर सकता । आंसू गिरते हैं क्योंकि दिल और अधिक दर्द सहन नही कर सकता। -- अज्ञात
  • जीवन ख़ूबसूरती से भरा हुआ है। इस पर गौर करें। मधुमक्खियां, छोटे बच्चे, और मुस्कुराते हुए चेहरे इन्हें देखिये। बारिश की खुशबू सूंघिये और हवा को महसूस कीजिये। अपने जीवन को अपनी पूरी क्षमता तक जियें और अपने सपनों के लिए लड़िये। -- एश्ले स्मिथ
  • मैं तुम्हारे लिए सिर्फ बारिशें नही चाहती, मेरे प्रिय, मैं तुम्हारे लिए तूफ़ान की ख़ूबसूरती भी चाहती हूँ। -- जॉन गेडेस
  • ईश्वर एक बादल है, जिस पर से बारिश गिरती है। -- डेजन स्टोजनोविक
  • मुझे बारिश की सुगंध से प्रेम है और मुझे सागर की लहरों की ध्वनि से भी प्रेम है। -- एमी पुरडी
  • एकांत वह मिट्टी है जिस पर बुद्धिमान का जन्म होता है, उसकी रचना शक्ति बढ़ती है, और किवदंतियां खिलती हैं, अपने आप पर विश्वास रखना उस बारिश के जैसा है जो तूफ़ान से लड़ने के लिए एक नायक का निर्माण करती है, और एक नए संसार या नए वन की उत्पत्ति करती है। -- माइक नॉर्टन
  • बारिश के कारण आप किसी गलत शरण में ना चले जाएं; वह छाँव आपकी संरक्षक साबित हो सकती है या भक्षक भी साबित हो सकती है, और कभी कभी बारिश ही आपको बारिश से बचा सकती है। -- माइकल बस्सी जॉनसन
  • बारिश का उत्सव मनाइये; इसका अर्थ बस यह है कि सूर्य पहले से बड़ा और चमकदार दिखाई पड़ेगा। -- अज्ञात
  • बारिश आपकी उँगलियों से उतनी ही आसानी से फिसलती है, जितनी आसानी से शब्द हवा में घुल जाते हैं, और तब भी इसके पास आपके पूरे संसार को तबाह करने की शक्ति होती है। -- केरेन मैटलैंड
  • एक वर्षा का दिन समकारी होता है। आपको नही पता होता कि आगे क्या होगा। आप वो ले लेते हो, जो भी आपको मिल सकता है। -- चार्ली हार्वे
  • बारिश के बाद, सूर्य दोबारा नज़र आएगा। ज़िन्दगी रहेगी। दर्द के बाद, ख़ुशी फिर भी यहाँ आएगी। -- वाल्ट डिज्नी कम्पनी
  • ईश्वर सबके लिए अच्छा होता है। सूरज अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोगों के लिए चमकता है, और वर्षा भी दोनों तरह के लोगों पर होती है। ईश्वर ने वर्षा सिर्फ बुरे लोगों के लिए नही बनाई है। -- मारिनो रिवेरा
  • किसी दिन जब मेरा रोना बंद हो जाएगा मैं अपने चेहरे पर मुस्कान पहनकर सूरज की धूप में चलता जाऊंगा हो सकता है मैं एक मूर्ख हूँ लेकिन उस वक़्त तक तुम मुझे कभी शिकायत करते नही पाओगी मैं बारिश में रो लूँगा। -- हॉवर्ड ग्रीनफील्ड एंड कैरोल
  • बारिश को तुम्हे चूमने दो। बारिश की चमकीली तरल बूंदों को अपने सर पर पड़ने दो। बारिश को आपके लिए लोरी गाने दो। -- लंगस्टोन ह्यूजेस
  • सूर्य की रौशनी स्वादिष्ट होती है, बारिश ताज़गी से भर देती है, हवा हमे तैयार करती है, बर्फ प्राणपोषक होती है; ख़राब मौसम के जैसी कोई चीज़ होती ही नही, बल्कि सिर्फ अलग अलग प्रकार के अच्छे मौसम देखने को मिलते हैं। -- जॉन रस्किन
  • बारिश बहुत तेज़ गति से गिर रही है और मुझे सिर्फ पंडि की आवाज़ ही सुनाई पड़ रही है। मैं भीग गया हूँ, परंतु हिल नही पा रहा हूँ। -- पाउलो कोएल्हो
  • बिजली के तूफ़ान भी हमारे उतने ही मित्र हैं जितनी की सूरज की धूप। -- क्रिस जैमी
  • कई चीज़ें हैं जो मैं अपने आश्चर्य के लिए करता हूँ, लेकिन अपनी खुशी के लिए मैं अपनी यादों को इकट्ठा करता हूँ और बारिश में टहलने के लिए निकल जाता हूँ। -- रॉबर्ट ब्रॉल्ट