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वन्दे मातरम्

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वन्दे मातरम् (शाब्दिक अर्थ : माँ की वन्दना करता हूँं) बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित एक बांग्ला-मिश्रित संस्कृत गीत है। इसकी रचना उन्होने १८७० के दशक में की थी। इसे उन्होंने १८८२ में स्वरचित आनन्दमठ नामक बांग्ला उपन्यास में सम्मिलित किया।

वर्ष 2002 में बीबीसी के एक सर्वेक्षण के अनुसार ‘वंदे मातरम्’ विश्व का दूसरा सर्वाधिक लोकप्रिय गीत बना। सर्वेक्षण में उस समय तक के सबसे लोकप्रिय दस गीतों का चयन करने के लिए दुनिया भर से लगभग 7000 गीतों को चुना गया था और करीब 155 देशों के लोगों ने इसमें मतदान किया था। इस सर्वे में वंदे मातरम् शीर्ष 10 गीतों में दूसरे स्थान पर रहा था।[]

वन्दे मातरम् पर विचार

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  • आज लाखों लोग एकत्र होकर वंदे मातरम्‌ गाते हैं। मेरे विचार से इसने हमारे राष्ट्रीय गीत का दर्जा हासिल कर लिया है। मुझे यह पवित्र, भक्तिपरक और भावनात्मक गीत लगता है। कई अन्य राष्ट्रगीतों के विपरीत यह किसी अन्य राष्ट्र-राज्य की नकारात्मकताओं के बारे में शोर-शराबा नहीं करता। कवि ने हमारी मातृभूमि के लिए जो अनके सार्थक विशेषण प्रयुक्त किए हैं, वे एकदम अनुकूल हैं, इनका कोई सानी नहीं है। -- महात्मा गांधी, 1905 में
  • बंकिम चंद्र चटर्जी की अपने राष्ट्र के लिए सर्वोच्च सेवा यह थी कि उन्होंने हमें अपनी माता का दर्शन कराया ...। जब तक मातृभूमि मन की आंखों के सामने खुद को पृथ्वी के एक टुकड़े से अधिक के रूप में प्रकट नहीं करती है, जब तक वह सुंदरता के रूप में एक महान दैवीय और मातृ शक्ति के रूप में आकार नहीं लेती है, तब तक वह देशभक्ति पैदा नहीं होती जो चमत्कार करती है और एक विनष्ट राष्ट्र को बचा लेती है। बत्तीस साल पहले बंकिम ने अपना महान गीत लिखा और कुछ ने सुना। लंबे भ्रम से जागने के क्षण में बंगाल के लोग स्त्य की खोज में चारों ओर देख रहे थे। तभी किसी ने बंदे मातरम् गाया। इस प्रकार उन्हें वह मन्त्र मिल गया जिसने एक ही दिन में पूरे देश को देशभक्ति के रंग में रंग दिया। माँ ने स्वयं प्रकट किया था। -- महर्षि अरविन्द घोष, १६ अप्रैल १९०७
  • यह "भारत के पुनर्जन्म का मंत्र" है। -- महर्षि अरविन्द
  • हमारा ‘वंदे मातरम्’ मंत्र किसी प्रांत की मिट्टी की आराधना नहीं, बल्कि धरती माता का वंदन है। यदि हम इसे सही अर्थों में साध लें, तो भविष्यकाल में यह मंत्र केवल भारत में नहीं, संपूर्ण विश्व में अनुगूंजित होगा। -- रवींद्रनाथ ठाकुर, 28 अक्तूबर, 1916 को अपने पुत्र रथींद्रनाथ को लिखे पत्र में []
  • मैं समझता हूँ कि पूरा गाना किसी को ठेस पहुँचाने वाला नहीं है। लेकिन मैं ये भी सोचता हूँ कि ये गाना राष्ट्रगान के ‘लायक’ नहीं है। इसके कुछ शब्द लोगों को समझ में नहीं आएँगे। क्योंकि इसमें व्यक्त भावनाएँ आज के राष्ट्रवाद के अनुकूल नहीं है। हमें आसान शब्दों वाले दूसरे राष्ट्रगान की तलाश करनी चाहिए। -- जवाहर लाल नेहरू, १ सितम्बर १९३७ को अली सरदार जफरी को लिखे पत्र में
  • यह एक साम्राज्यवाद-विरोधी नारा था... मेरा मन वंदे मातरम् में लीन हो गया था, और जब मैंने इसे पहली बार गाते हुए सुना तो इसने मुझे मंत्रमुग्ध कर दिया। मैंने इसके साथ शुद्धतम राष्ट्रीय भावना को जोड़ा... इसके चुने हुए श्लोक पूरे देश को बंगाल की देन हैं। -- महात्मा गांधी, १९३९ में हरिजन में
  • 1937 में, जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता वाली एक समिति के मार्गदर्शन में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने कविता के उन हिस्सों को हटाने का फैसला किया, जिनमें खुले तौर पर मूर्ति पूजा वाले संदर्भ थे। इसी प्रारूप को बाद में संविधान सभा ने भी स्वीकार किया था। -- 'द बायोग्राफी ऑफ अ सॉन्ग' के रचयिता सब्यसाची भट्टाचार्य
  • 'जन-गण-मन' को राष्ट्रगान और 'वंदे मातरम्' को राष्ट्रीय गीत का स्थान दिया जाता है। वंदे मातरम् के पहले दो अन्तरे , जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में महान भूमिका निभाई, राष्ट्रगान के समान ही सम्मानित होंगी। -- डॉ राजेंद्र प्रसाद, 24 जनवरी, 1950 को (Constituent Assembly Debates, Vol. XII, pp. 404–406, 1950)
  • और बोस की त्रासदी, एक और संदर्भ में, इस धोखेबाज़ (नेहरू) के काम आई। उन्हें भारत का पवित्र राष्ट्रीय नारा, 'वंदे मातरम्', पसंद नहीं था। यह संस्कृत में था जिसे वह कभी समझ नहीं पाए और न ही कभी उसका सम्मान किया। लेकिन सबसे बुरी बात यह थी कि इससे मुसलमानों को ठेस पहुँचती थी, जिन्हें वह खुश करना चाहते थे और "हिंदू सांप्रदायिकता" के खिलाफ भड़काना चाहते थे। इसलिए, जब नेताजी का नाम अभी भी लोगों को जोश दिला रहा था, तो उन्होंने गुजारिश की कि वंदे मातरम् की जगह 'जय हिंद' कर दिया जाए, जो आज़ाद हिंद नेताओं ने आकस्मिकता की गर्मी में जल्दबाजी में बनाया था। मैंने खुद उन्हें (नेहरू) कई भीड़ भरी सभाओं में सुना, वे अपने दर्शकों से कह रहे थे कि वे जय हिंद और ज़ोर से चिल्लाएँ। उन्होंने खुद सबसे ऊँची आवाज़ में बोलकर इसकी शुरुआत की। मैंने उन्हें आज़ाद हिंद फौज का मार्चिंग गीत, कदम कदम बढ़ाए जा, गाते हुए भी सुना, और जब लोग सही धुन में दोहरा नहीं पाते थे तो वे नाराज़गी ज़ाहिर करते थे। उन्हें एक "फासीवादी" की शोहरत पर खुद को मोटा करने में कोई झिझक नहीं थी। -- सीताराम गोयल, GENESIS AND GROWTH OF NEHRUISM , भाग-१
  • हमारे देश के आजादी के आंदोलन में सैकड़ों महिलाओं ने नेतृत्व किया और अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। बारिसाल में वंदे मातरम् गाने पर सबसे अधिक जुर्माने लगाए गए थे। बारिसाल, आज भारत का हिस्सा नहीं रहा है, लेकिन उस समय बारिसाल में भारत की वीरांगनाओं ने वंदे मातरम् पर लगे प्रतिबंध के विरोध में बड़ा और लंबा प्रदर्शन किया। बारिसाल की एक वीरांगना, श्रीमती सरोजिनी बोस ने उस दौर में यह संकल्प लिया था कि जब तक वंदे मातरम् पर लगा प्रतिबंध नहीं हटता, तब तक वे अपनी चूड़ियां नहीं पहनेंगी। -- प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी, ८ दिसम्बर २०२५ को संसद में वन्दे मातरम् पर चर्चा के समय[]
  • चटगांव की स्वराज क्रांति में जिन युवाओं ने अंग्रेजों को चुनौती दी, वो भी इतिहास के चमकते हुए नाम थे। मास्टर सूर्यसेन को 1934 में जब फांसी दी गई तब उन्होंने अपने साथियों को एक पत्र लिखा और पत्र में एक ही शब्द की गूंज थी और वह शब्द था, वंदे मातरम्। -- प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी, ८ दिसम्बर २०२५ को संसद में वन्दे मातरम् पर चर्चा के समय
  • हमारे जांबाज सपूत बिना किसी डर के फांसी के तख्त पर चढ़ जाते थे और आखिरी सांस तक वंदे मातरम् कहते थे। खुदीराम बोस, अशफ़ाक उल्ला ख़ान, राम प्रसाद बिस्मिल, रोशन सिंह, राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी… हमारे अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों ने वंदे मातरम् कहते हुए फांसी को चूम लिया। यह अलग-अलग जेलों में होता था, लेकिन सबका एक ही मंत्र था, वंदे मातरम्। -- प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी, ८ दिसम्बर २०२५ को संसद में वन्दे मातरम् पर चर्चा के समय
  • पीएम मोदी ने कहा कि वंदे मातरम् की 150 वर्ष की यात्रा अनेक पड़ावों से गुजरी है, लेकिन जब वंदे मातरम् के 50 वर्ष हुए, तब देश गुलामी में जीने के लिए मजबूर था। जब वंदे मातरम् के 100 वर्ष हुए, तब देश आपातकाल की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, और जब वंदे मातरम् का अत्यंत उत्तम पर्व होना चाहिए था, तब भारत के संविधान का गला घोंट दिया गया था। जब वंदे मातरम् के 100 वर्ष हुए, तब देशभक्ति के लिए जीने-मरने वाले लोगों को जेल की सलाखों के पीछे बंद कर दिया गया था। जिस वंदे मातरम् के गीत ने देश को आजादी की ऊर्जा दी थी, उसके 100 वर्ष पूरे होने पर हमारे इतिहास का एक काला कालखंड दुर्भाग्य से उजागर हो गया। -- प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी, ८ दिसम्बर २०२५ को संसद में वन्दे मातरम् पर चर्चा के समय
  • पीएम मोदी ने कहा कि जिस मंत्र ने, जिस जयघोष ने देश के आज़ादी के आंदोलन को ऊर्जा और प्रेरणा दी थी, त्याग और तपस्या का मार्ग दिखाया था, उस वंदे मातरम् का पुण्य स्मरण करना इस सदन में हम सबका बहुत बड़ा सौभाग्य है। हमारे लिए यह गर्व की बात है कि वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूर्ण हो रहे हैं और हम सभी इस ऐतिहासिक अवसर के साक्षी बन रहे हैं। -- प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी, ८ दिसम्बर २०२५ को संसद में वन्दे मातरम् पर चर्चा के समय
  • वन्दे मातरम् भारत की आत्मा, उसकी आध्यात्मिक आस्था है। यह आध्यात्मिक आस्था धर्म या मजहब से जुड़ी नहीं है बल्कि राष्ट्र भक्ति से जुड़ी है और समावेशी है। इसे राजनीतिक या साम्प्रदायिक रंग तो कुछ कट्टरपंथियों ने दिया है।उन्होंने इसके गाने पर आपत्ति जताई। इन आपत्तियों के पीछे अंग्रेजी हुकूमत की ‘बांटों और राज करो’ की नीति थी। इसे दुर्भाग्य से उस समय की कांग्रेस की तुष्टिकरण की राजनीति का भी समर्थन मिला। आज हमें इस गलती को पूरी तरह से सुधारना है और मां भारती से जुड़े हर प्रतीक के प्रति जो राजनीतिक पूर्वाग्रह हैं, उनसे देश और समाज को मुक्ति दिलानी है। -- राजनाथ सिंह, भारत के रक्षामन्त्री, ८ दिसम्बर २०२५ को संसद में वन्दे मातरम् पर चर्चा के समय
  • वन्दे मातरम् हमारे गौरवशाली अतीत का स्मरण है, हमारे स्वर्णिम भविष्य का आह्वान है। यह मातृभक्ति का अनुपम भाव है, संस्कृति का शाश्वत प्रकाश है, सभ्यता का गौरव है, धर्म की रक्षा का संदेश है, कर्म की प्रेरणा है, शक्ति का आह्नान है, विजय का विश्वास है, अमरत्व का स्वर है और आस्था का आधार है। वंदे मातरम् हर उस सैनिक को हौसला देता है, जो आज भी अपनी मातृभूमि के लिए हर दुश्मन का सामना कर रहा है। वंदे मातरम् हमारी एकता का प्रतीक है, स्वाधीनता का संकल्प है, वीरता का जयघोष है, त्याग का महामंत्र है, बलिदान का अमर गान है। वंदे मातरम् स्वतंत्रता संग्राम के उन अज्ञात और अवर्णित सैनिकों की याद है, जिन्होंने अपनी मातृभूमि के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। यह उस पीड़ा को भावपूर्ण श्रद्धांजलि है जो असंख्य लोगों ने आजादी प्राप्त करने के लिए सही। वंदे मातरम् हमारा गौरव है। हमारी पहचान है और हमारे स्वाभिमान की सबसे ऊंची पुकार है। -- राजनाथ सिंह, भारत के रक्षामन्त्री, ८ दिसम्बर २०२५ को संसद में वन्दे मातरम् पर चर्चा के समय
  • आज हम आजाद हैं, हम दुनिया की एक बड़ी ताकत हैं और विकसित राष्ट्र बनने की राह पर हैं। मैं आज सदन को बताना चाहता हूं, 150 वर्ष पूर्व लिखे वंदे मातरम् गीत में, वर्तमान के भारत के उदय का मार्ग भी देखा जा सकता है। -- राजनाथ सिंह, भारत के रक्षामन्त्री, ८ दिसम्बर २०२५ को संसद में वन्दे मातरम् पर चर्चा के समय[]

इन्हें भी देखें

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