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रोग

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  • भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद्भयं
माने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम्।
शास्त्रे वादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भभयं
सर्वं वस्तु भयावहं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम् ॥ -- वैराग्यशतकम् 31
भोग में रोग का भय रहता है; पारिवारिक प्रतिष्ठा गिरने का भय रहता है; धन में राजाओं का भय रहता है; प्रतिष्ठा में अपमान का भय रहता है; सत्ता में शत्रु या विरोधी का भय रहता है; सुंदरता में बुढ़ापे का डर होता है; शास्त्र-विद्या में विद्वान् विरोधियों का भय रहता है; सदाचार में दुष्ट निंदा करने वाले व्यक्ति का भय रहता है; शरीर में मृत्यु का भय रहता है। मनुष्य के लिए, इस दुनिया में हर चीज़ भय से जुड़ी है। वैराग्य ही अभय प्रदान करता है।
  • भोग रोगसम भूषन भारू। जम जातना सरिस संसारू॥
प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं॥ -- रामचरितमानस
भोग रोग के समान हैं, गहने भार रूप हैं और संसार यम यातना (नरक की पीड़ा) के समान है। हे प्राणनाथ! आपके बिना जगत् में मुझे कहीं कुछ भी सुखदायी नहीं है॥
  • जो यह सोचते हैं कि उनके पास व्यायाम करने के समय नहीं है, उन्हें देर-सबेर बीमार पड़ने के लिए समय निकालना पड़ेगा। -- Edward Stanley
  • स्वस्थ के बिना जीवन, जीवन नहीं होता, बल्कि दुःख और आलस्य की अवस्था होती है। ~ अल्बर्ट आइंस्टीन

इन्हें भी देखें[सम्पादन]