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फल

विकिसूक्ति से
  • संसारकटुवृक्षस्य द्वे फले अमृतोपमे।
सुभाषितरसास्वादः संगतिः सुजने जने॥ --
संसार रूपी कड़ुवे पेड़ से अमृत तुल्य दो ही फल उपलब्ध हो सकते हैं, एक है मीठे बोलों का रसास्वादन और दूसरा है सज्जनों की संगति।
  • कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ -- श्रीमद्भगवत्गीता
कर्तव्य-कर्म करने में ही तेरा अधिकार है, फलों में कभी नहीं। अतः तू कर्मफल का हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो।
  • यदाचरित कल्याणि शुभं वा यदि वाऽशुभम् ।
तदेव लभते भद्रे कर्त्ता कर्मजमात्मनः ॥ -- वाल्मीकि रामायण
मनुष्य जैसा भी अच्छा या बुरा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है। कर्त्ता को अपने कर्म का फल अवश्य भोगना पड़ता है।
  • सेवितव्यो महावृक्षः फलच्छायासमन्वितः।
यदि दैवात्फलं नास्ति छाया केन निवार्यते॥ --
फलों और छाया से युक्त बहुत बड़े पेड़ की सेवा करनी चाहिए। अगर दैव योग से फल ना भी मिले तो उस पेड़ की छाया को कौन हटाता है।
  • रिक्तपाणिर्नैव पश्येद् राजानं देवतां गुरुम् ।
नैमित्तिकं विशेषेण फलेन फलमादिशेत् ॥ -- सम्यकत्व कौमुदी[१]
राजा, देवता, गुरु और विशेष रूप से निमित्तज्ञानी का दर्शन खाली हाथ नहीं करना चाहिए क्योंकि फल की प्राप्ति फल से ही होती है ॥
  • रिक्तपाणीर्नपश्येत राजानं दैवतं गुरुम्।
दैवज्ञं पुत्रकं मित्रं फलेन फलमादिशेत्॥
खालिहाथ (रिक्तपाणी) राजा के, देवता के, गुरु के, ज्योतिषी के, पुत्र के, मित्र के पास नहीं जाना चाहिए। फल से ही फल की प्राप्ति होती है।
  • वृक्ष कबहुं नहिं फल भखै, नदी न संचै नीर।
परमार्थ के कारने, साधुन धरा शरीर॥ --
वृक्ष कभी भी अपने फल स्वयं नहीं खाते हैं। नदी अपना पानी स्वयं नहीं पीती। श्रेष्ठ पुरुष परमार्थ के लिए शरीर धारण करते हैं।

इन्हें भी देखें[सम्पादन]

सन्दर्भ[सम्पादन]