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पाणिनि

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'पाणिनि' (ईसापूर्व चौथी शताब्दी) संस्कृत के महान वैयाकरण थे जिन्होंने अष्टाध्यायी नामक व्याकरण ग्रन्थ की रचना की।

उक्तियाँ

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  • अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥ -- अष्टाध्यायी
अर्थवान् या सार्थक शब्द ही प्रातिपादिक (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं।
अर्थवान् या सार्थक शब्द ही *प्रातिपदिक* (मूल संज्ञाशब्द या प्राकृत) हैं।

पाणिनि पर उद्धरण

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  • "सिंहो व्याकरणस्य कर्तुरहरत्प्राणान् प्रियान् पणिनेः।" — पञ्चतन्त्र
सिंह ने व्याकरण के रचयिता पाणिनि के प्रिय प्राणों को हर लिया।
  • येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् ।
कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ॥
जिन्होंने भगवान शिव (महेश्वर) से वर्णमाला (अक्षर-ज्ञान) प्राप्त करके संपूर्ण व्याकरण शास्त्र का उपदेश दिया, उन (महर्षि) पाणिनि को नमस्कार है।
  • येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः ।
तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः ॥
जिन्होंने शब्दों रूपी निर्मल जल के द्वारा मनुष्यों की वाणी के दोषों को धो दिया और अज्ञान से उत्पन्न अंधकार को नष्ट कर दिया, उन पाणिनि को नमस्कार है।
  • वाक्यकारं वररुचिं भाष्यकारं पतञ्जलिम् ।
पाणिनिं सूत्रकारं च प्रणतोऽस्मि मुनित्रयम् ॥
वाक्यकार वररुचि (कात्यायन), भाष्यकार पतंजलि और सूत्रकार पाणिनि—इन तीनों मुनियों को मैं प्रणाम करता हूँ।
  • विचारवान् पाणिनिरेकसूत्रे श्वानं युवानं मघवानमाह ।
काचं मणिं काञ्चनमेकसूत्रे मुग्धा निबध्नन्ति किमत्र चित्रम् ॥
विचारवान पाणिनि ने अपने एक ही सूत्र में कुत्ते (श्वान), युवक (युवन) और इंद्र (मघवन) को एक साथ रख दिया है (यहाँ पाणिनीय सूत्र 'श्वयुवमघोनां तद्धिते' का संदर्भ है)। इसमें आश्चर्य कैसा? जैसे भोली-भाली स्त्रियाँ काँच, मणि और सोने को एक ही धागे में पिरो देती हैं, वैसे ही पाणिनि ने भी किया है।
  • "यद्यपि पाणिनीय व्याकरण की प्रसिद्धि बहुत कम है क्योंकि यह एक विशिष्ट प्रकृति का ग्रन्थ है, फिर भी इसमें कोई सन्देह नहीं है कि पाणिनि का व्याकरण किसी भी प्राचीन सभ्यता की सबसे महान बौद्धिक उपलब्धियों में से एक है और १९वीं शताब्दी के पहले विश्व के किसी भी भाग में निर्मित व्याकरणों में सबसे विस्तृत एवं वैज्ञानिक व्याकरण है।" — ए एल बाशम, *प्राचीन भारत: एक परिचय* (२०१३)
  • "पाणिनि का मस्तिष्क असाधारण था। उन्होंने एक ऐसी मशीन बनायी जो मानव इतिहास में अद्वितीय है। पाणिनि ने हमसे यह अपेक्षा नहीं की थी कि उनके नियमों में हम कुछ नये विचार जोड़ेंगे। पाणिनीय व्याकरण के साथ हम जितना अधिक खिलवाड़ करते हैं, उतना ही यह हमसे दूर होता जाता है।" — ऋषि राजपुरोहित, *कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, शोधपत्र (१५ दिसम्बर २०२२)*

बाहरी कड़ियाँ

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