दूरदृष्टि

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  • मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत् ।
आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥
जो दूसरों की पत्नी को माता तथा दूसरे के धन को मिट्टी के ढेले की भांति समझता हो। जो संसार के सभी प्राणियों में अपने आत्मा का दर्शन करता हो अर्थात सबको अपना मानता हो वही पंडित है।
  • यः पश्यति स्वयं सर्वं यं न पश्यति कश्चन।
यश्चेतयति बद्ध्यादिं न तु यं चेतयत्ययम्॥ -- श्रीशङ्कराचार्य
जो स्वयं सब को देखता है, किन्तु उसको कोई नहीं देख सकता। जो बुद्धि आदि को प्रकाशित करता है, किन्तु उसे बुद्धि आदि प्रकाशित नहीं कर सकते। उसे तुम ‘आत्मा’ जानो।
  • समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥ -- भगवद्गीता
  • अदृष्य को देखने की कला ही दूरदृष्टि है। -- जोनाथन स्विफ्ट, Thoughts on various subjects में
  • बिना क्रिया के दूरदृष्टि दिवास्वप्न है, बिना दृष्टि के क्रिया दुःस्वप्न है। -- जापानी कहावत
  • दृष्टि बदलें, दृष्य स्वयं बदल जायेंगे।
  • जहाँ दूरदृष्टि नहीं होती, लोगों को कष्ट झेलना पड़ता है। -- बुक ऑफ प्रोबर्ब्स
  • देखो और दिखो। -- बेन जॉनसन, Epithalamion

इन्हें भी देखें[सम्पादन]