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घर

विकिसूक्ति से
  • वनेऽपि दोषा प्रभवन्ति रागिणां
गृहेऽपि पञ्चेन्द्रिय निग्रह स्तपः ।
अकुत्सिते कर्मणि यः प्रवर्तते
निवृत्तरागस्य गृहं तपोवनम् ॥
आसक्त लोगों का वन में रहना भी दोष उत्पन्न करता है। घर में रहकर पंचेन्द्रियों का निग्रह करना हि तप है। जो दुष्कृत्य में प्रवृत्त होता नहीं, और आसक्तिरहित है, उसके लिए तो घर हि तपोवन है।

इन्हें भी देखें[सम्पादन]