सामग्री पर जाएँ

सुब्रमण्यम भारती

विकिसूक्ति से

सुब्रमण्यम भारती भारत के एक राष्ट्रवादी कवि थे। उनकी मातृभाषा तमिल थी। उन्होंने हिन्दी में भी काव्य रचना की है।

विचार[सम्पादन]

  • तुम स्वयं ज्योति हो मां,
शौर्य स्वरूपिणी हो तुम मां,
दुःख और कपट की संहारिका हो मां,
तुम्हारी अनुकम्पा का प्रार्थी हूं मैं मां। -- सुब्रह्मण्य भारती की कविता ‘मुक्ति का आह्वान’ से
  • एक होने में जीवन है। अगर हमारे बीच ऐक्य भाव नहीं रहा तो सबकी अवनति है। इसमें हम सबका सम्यक उद्घार होना चाहिए। उक्त ज्ञान को प्राप्त करने के बाद हमें और क्या चाहिए?
  • हम गुलामी रूपी धन्धे की शरण में पकड़कर बीते हुए दिनों के लिए मन में लिज्जत होकर द्वंद्वों एवं निंदाओं से निवृत्त होने के लिए इस गुलामी की स्थिति को (थू कहकर) धिक्कारने के लिए ‘वंदे मातरम्’ कहेंगे।
  • हम जितनी भी भाषाएँ जानते हैं, उनमें तमिल जितनी मधुर भाषा हमें कहीं नहीं दिखती।
  • जो कविता लिखता है वह कवि नहीं है; जिसकी कविता ही उसका जीवन बन गयी हो और जिसने अपने जीवन को ही अपनी कविता बना लिया हो वही कवि है।
  • कोई जाति नहीं है।
  • वर्तमान में जियो और भविष्य को आकार दो। दूर के अतीत की ओर लगातार मत देखो क्योंकि अतीत बीत चुका है, फिर कभी वापस नहीं आएगा।
  • यदि स्त्री और पुरुष दोनों को समान समझा जाए तो विश्व ज्ञान और बुद्धि में समृद्ध होगा।
  • सभी इस भूमि के राजा हैं।
  • हमारे हजारों संप्रदाय हो सकते हैं; हालाँकि, यह विदेशी आक्रमण को उचित नहीं ठहराता।