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सार

विकिसूक्ति से
  • अनन्तशास्त्रं बहुलाश्च विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
यद्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्॥ -- चाणक्य
शास्त्र अनन्त हैं, विद्याएं ढेरी सारी, समय अल्प और विघ्न हजार। (ऐसे में) जो सारभूत है वही वरेण्य है, जैसे हंस दूध को पानी से अलग करके पी जाता है।
  • साधू ऐसा चाहिये जैसा सूप सुभाय ।
सार सार को गहि रहे थोथा देय उड़ाय ॥ -- कबीरदास