रामविलास शर्मा
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डॉ॰ रामविलास शर्मा (१० अक्टूबर, १९१२- ३० मई, २०००) हिन्दी के प्रसिद्ध समालोचक थे।
विचार
[सम्पादित करें]- कला की विषयवस्तु न वेदान्तियों का ब्रह्म है, न हेगल का निरपेक्ष विचार। मनुष्य का इन्द्रियबोध, उसके भाव उसके विचार, उसका सौन्दर्यबोध कला की विषयवस्तु है।
- साहित्य के सभी तत्त्व समान रूप से परिवर्तनशील नहीं है, इन्द्रियबोध की अपेक्षा भाव और भावों की अपेक्षा विचार अधिक परिवर्तनशील है। युग बदलने पर यहाँ विचारों में अधिक परिवर्तन होता है, वहाँ इन्द्रियबोध और भाव-जगत् में अपेक्षाकृत स्थायित्व रहता है।
- साहित्य का शिल्प, उसके विभिन्न रूप, सामाजिक विकास से ही सम्भव हुए हैं। जनता तक साहित्य पहुँचाने के साधनों में जो परिवर्तन हुए, उनका प्रभाव उनके रूपों पर भी पड़ा।
- कला और विषयवस्तु दोनों ही समान रूप से साहित्य-रचना के लिए निर्णायक महत्त्व की नहीं हैं। निर्णायक भूमिका हमेशा विषयवस्तु की ही होती है।
- अँग्रेज़ी में कुछ सीखना एक बात है, अँग्रेज़ी को अपने सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों का माध्यम बना लेना दूसरी बात है। जापानियों, चीनियों आदि ने अँग्रेज़ी से सीखा है, लेकिन अपनी भाषाओं को अविकसित मानकर उन्होंने अँग्रेज़ी को राजभाषा नहीं बनाया।
- आजकल कुछ आलोचक साहित्य की विषयवस्तु की विवेचना से बचने के लिए भाषा की चर्चा करना यथेष्ट समझते हैं। वे तर्क भी देते हैं कि साहित्य में विषय-वस्तु को भाषा से अलग नहीं किया जा सकता इसलिए भाषा की चर्चा करना ही काफी है। इसके विरोध में कहा जा सकता है कि जब दोनों में इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है, तब विषय-वस्तु की चर्चा भी प्रयाप्त हो सकती है, चर्चा के लिए भाषा ही क्यों चुनी गई। कारण यह कि ऐसे लोगों के लिए भाषा और विषय-वस्तु का प्रगाढ़ सम्बन्ध, साहित्य की विषय-वस्तु उसकी भाव-विचार सम्पदा को नकारने के लिए है, वे यान्त्रिक दृष्टि से भाषा का रूपात्मक विवेचन करते हैं।
- साहित्य शुद्ध विचारधारा का रूप नहीं हैं, उसका भावों और इंद्रियबोध से घनिष्ठ सम्बन्ध है।
- यह आवश्यक नहीं कि शोषक वर्ग ने जिन नैतिक अथवा कलात्मक मूल्यों का निर्माण किया है वे सभी शोषण-मुक्त वर्ग के लिए अनुपयोगी हों — प्राचीन साहित्य के मूल्यांकन में हमें मार्क्सवाद से यह सहायता मिलती है कि हम उसकी विषयवस्तु और कलात्मक सौन्दर्य को ऐतिहासिक दृष्टि से देखकर उनका उचित मूल्यांकन कर सकते हैं।
- शुक्लजी की आलोचना गम्भीर है, इसलिए कि उसका आधार वस्तुवादी दृष्टिकोण है। शुक्लजी की गम्भीरता का दूसरा कारण उनकी तर्क और चिन्तन पद्धति है। इस पद्धति को हम द्वन्द्व नाम दें तो अनुचित न होगा। विरोधी लगने वाली वस्तुओं का सामंजस्य पहचानना, उन्हें गतिशील और विकासमान देखना, संसार के विभिन्न भौतिक और मानसिक व्यापारों का परस्पर सम्बन्ध स्थापित करके उनका अध्ययन करना इस पद्धति की विशेषताएँ हैं। -- रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना पद्धति की प्रशंसा करते हुए
- भारतेन्दु युग का साहित्य हिन्दी-भाषी जनता का जातीय साहित्य है, वह हमारे जातीय नवजागरण का साहित्य है। भारतेन्दु युग की जिन्दादिली, उसके व्यंग्य और हास्य, उसके सरल-सरस गद्य और लोक-संस्कृति से उसकी निकटता से सभी परिचित हैं। ये उसकी जातीय विशेषताएँ हैं। अंग्रेजी साम्राज्यवाद और अंग्रेजी साहित्य एक ही वस्तु नहीं है। भारतेन्दु युग के साहित्य ने न केवल अंग्रेजी साहित्य से वरन् बँगला साहित्य से भी प्रेरणा पायी है। लेकिन उसके साहित्य की जड़ें इसी धरती में हैं और ऊपर बताई हुई उसकी जातीय विशेषताएँ उसकी अपनी हैं, मौलिक हैं।
- हिन्दी में नवीन चेतना किन व्यक्तियों और संस्थानों के माध्यम से विकसित हो रही थी। कौन-सी परिस्थितियाँ उस चेतना के विकास का कारण थीं और विकास के दौरान, परिस्थितियाँ भी किस प्रकार प्रभावित होकर बदल रही थी। साहित्य इस विकास-प्रक्रिया की केवल तटस्थ झाँकी ही नहीं प्रस्तुत कर रहा था बल्कि सक्रिय सहयोग कर रहा था। यह भारतेन्दु-युग की बहुत बड़ी विशेषता थी।
- जो नवजागरण 1857 के स्वाधीनता संग्राम से आरम्भ हुआ, वह भारतेन्दु युग में और व्यापक बना, उसकी साम्राज्य-विरोधी, सामन्त-विरोधी प्रवृत्तियाँ द्विवेदी युग में और पुष्ट हुई। फिर निराला के साहित्य में कलात्मक स्तर पर तथा उनकी विचारधारा में ये प्रवृतियाँ क्रांतिकारी रूप में व्यक्त हुई। (1857 की क्रांति के महत्त्व को हिन्दी साहित्य से सम्बन्ध पर)
- साहित्य में जो रीति-विरोधी क्रान्ति शुरू हुई उसका पहला चरण है द्विवेदी युग और उसी का विकास छायावाद और प्रगतिवाद में होता है। ये तीनों युग एक दूसरे से भिन्न हैं, साथ ही एक दूसरे के पूरक भी हैं। द्विवेदी युग की भूमिका आधुनिक साहित्य का मार्ग प्रशस्त करने वाले अग्रदल की भूमिका है। ( द्विवेदी युग के बारे में )
- पूर्व तक हिन्दी में ऐसी हवा बह रही थी कि लोग पं. रामचन्द्र शुक्ल के विचारों का विरोध करना अपनी आलोचनात्मक प्रतिभा का परिचय देना समझते थे। इस दिशा में कई साहित्य सेवियों का उत्साह आवश्यकता से अधिक बढ़ गया था। दुर्भाग्यवश जो लोग अपने को शुक्लानुवर्ती कहते थे और शुक्लजी के विचारों का विरोध करने वालों का विरोध करते थे, वे शुक्लजी की साहित्य-सेवा की महत्ता को प्रकट करने में असमर्थ थे। (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना, से)
- हिन्दी साहित्य में शुक्लजी का वही महत्त्व है जो उपन्यासकार प्रेमचन्द या कवि निराला का। उन्होंने आलोचना के माध्यम से उसी सामन्ती संस्कृति का विरोध किया जिसका उपन्यास और कविता के माध्यम से प्रेमचन्द और निराला ने। शुक्लजी न तो भारत के रूढ़िवाद को स्वीकार किया, न पश्चिम के व्यक्तिवाद को। उन्होंने बाह्यजगत् और मानव जीवन की वास्तविकता के आधार पर नये साहित्य-सिद्धांतों की स्थापना की और उनके आधार पर सामन्ती साहित्य का विरोध किया और देशभक्ति और जनतन्त्र की साहित्यिक परम्परा का समर्थन किया। उनका यह कार्य हर देशप्रेमी और जनवादी लेखक तथा पाठक के लिए दिलचस्प होना चाहिए। शुक्लजी पर पुस्तक लिखने का यही कारण है। (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना, से)
- उन्होंने हिन्दी की सैद्धान्तिक आलोचना को ठोस दार्शनिक आधार दिया, रस की अलौकिकता का निषेध किया, जीवन और साहित्य के भावों में बुनियादी अन्तर स्वीकार नहीं किया, भावों को उनके आधार से अलग करके देखा, लोक-हृदय में लीन होने की दशा को रसदशा माना, रीति-ग्रंन्थों और उनकी सीमा में बंधे समीक्षकों का विरोध किया, ‘प्रेम’ की अपेक्षा ‘करुणा’ को अधिक महत्त्व दिया और लोक-रक्षा के विधान में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका को पहचाना, साम्राज्यवादी उत्पीड़न का विरोध किया, अंग्रेजी साहित्य की व्यक्तिवादी एवं प्रगतिविरोधी प्रवृत्तियों से हिन्दी लेखकों को सावधान किया, काव्य में करुणा-प्रेरित प्रचण्ड भावों (क्रोध आदि) के विधान में भी सौन्दर्य देखा, परोक्ष सत्ता के प्रति प्रेम की अभिव्यक्ति करने वाले साम्प्रदायिक रहस्यवाद का विरोध किया, वस्तुओं और विचारों की गतिशीलता पर बल देते हुए सौन्दर्य एवं मंगल के गत्यात्मक स्वरूप को सहारा और इतिहास के अध्ययन की एक व्यवस्थित पद्धति कायम की। (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना, से)
- उनकी शैली तार्किक विवेचन के लिए उपयुक्त होने के साथ आवश्यकतानुसार आवेशपूर्ण और आलंकारिक भी है और उसकी एक विशेषता जीवन का संचित अनुभव प्रकट करने वाली वाक्यावली है। शब्द चयन में उर्दू के प्रचलित शब्दों से उन्हें परहेज नहीं है। उनका व्यक्तित्व एक सहृदय और विनोदी साहित्य-प्रेमी और संसार प्रेमी मनुष्य का है, पुस्तक-सेवी सन्यासी का नहीं। उनकी निर्भीकता, दृढ़ता, गहन अध्यवसाय और आत्मविश्वास के गुण उनके काव्य-सिद्धान्तों और साहित्यलोचन की ही तरह हिन्दी-प्रेमियों के लिए शिक्षाप्रद और प्रेरणा दायक है। (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना, से)
- ब्रजनन्दन जी ने कुछ झूठ न लिखा था कि हिंदी-भाषी जनता ने प्रेमचंद जी से पूरा लाभ नहीं उठाया। बल्कि जनता ने तो लाभ उठाया है, हिन्दी-लेखकों ने लाभ नहीं उठाया। लाभ उठाने का प्रमाण यह होना चाहिए कि हमने प्रेमचन्द की स्वस्थ परम्परा का अनुसरण किया हो, उसे आगे बढ़ाया हो। लेकिन कितने लेखकों ने उस परम्परा को पहचाना है, उसे हिंदी-साहित्य की मूल्यवान विरासत समझा है। हिंदी के महान कथाकारों को चीरहरण से फुरसत न मिली, वह अंतस्तल की निगूढ़ भावनाओं का चित्रण करने में हिंदुस्तान की जनता का दुख-दर्द भूल गए। (‘प्रेमचंद और उनका युग’ के प्रथम संस्करण की भूमिका में)
- तुलसीदास के बाद हिंदी में यह पहला इतना बड़ा कलाकार पैदा हुआ था जिसकी रचनाएँ अपनी ही भाषा के क्षेत्र में नहीं, सुदूर दक्षिण के गाँवों में भी पहुँच गई थी। (‘प्रेमचंद और उनका युग’ से)
- प्रेमचन्द से जिस चीज़ को हिन्दी के इन दिग्गज आलोचकों और कलाकारों ने नहीं सीखा, वह यह कि जनता कला का स्रोत है और उससे अलग रहकर महान साहित्य की रचना नहीं की जा सकती। (‘प्रेमचंद और उनका युग’)
- ‘चन्द्रकान्ता’ और ‘तिलिस्म होशरुबा’ के पढ़नेवाले लाखों थे। प्रेमचन्द ने इन लाखों पाठकों को सेवासदन का पाठक बनाया, यह उनका युगान्तकारी काम था। इन पाठकों की संख्या का अंदाज किताबों की बिक्री और संस्करणों से नहीं लगाया जा सकता। शहर या कस्बे के किसी पुस्तकालय में जाकर प्रेमचंद की किताबों की हालत देखिए। तरकारी काटने वाली स्त्रियों के हाथों से लेकर लाठी को तेल पिलानेवाले दरबानों की उंगलियों तक उनके सफे पलटे जाने से वे किस खस्ता हालत में दिखाई देती है। प्रेमचंद ने ‘चंद्रकान्ता’ के पाठकों को अपनी तरफ ही नहीं खींचा, ‘चंद्रकांता’ में अरुचि भी पैदा की, जन-रूचि के लिए उन्होंने नए मापदंड कायम किए और साहित्य के नए पाठक और पाठिकाएँ भी पैदा किए। यह उनकी जबरदस्त सफलता थी। (‘प्रेमचंद और उनका युग’)
- कुछ आलोचक कहते हैं कि प्रेमचंद में मनोवैज्ञानिक गहराई नहीं है। मनोविज्ञान का अर्थ विकृत काम-विकार ही न हो तो यह भी बड़ा सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्रण है। बेटे की दुर्दशा देखकर बाप अपने को रोक नहीं पाता। तैश में आ कर सिपाहियों को धक्का देता है, लेकिन दूसरे ही क्षण अपनी बेबसी समझकर रोने लगता है। (‘प्रेमचंद और उनका युग’ , प्रसंग : प्रेमाश्रम में बलराज के पकड़े जाने का प्रसंग)
- सर्वतोन्मुखी क्रांति का यह समर्थक अमल में हमेशा समझौता करता है। सकीना के मामले में वह दोहरा विश्वासघात करता है- एक तरफ अपनी स्त्री से, जो माँ बन चुकी है, दूसरी तरफ सकीना से, जो उसकी प्रेमिका है। किसानों के मामले में भी वह दोहरी दग़ा करता है, एक तरफ़ आत्मानन्द से, जिन्हें फँसाने का निश्चय कर लेता है, दूसरी तरफ किसानों से जिनके सामने वह स्वच्छ देश-भक्त बना रहता है। (प्रेमचंद 'कर्मभूमि' के नायक अमरकांत पर डॉ. शर्मा की टिप्पणी)
- प्रेमचंद ने जब गोदान लिखा था, तब वह खुद भी कर्ज़ के बोझ से दबे हुए थे। ‘गोदान’ की मूल समस्या ऋण की समस्या है। इस उपन्यास में किसानों के साथ मानों वह आपबीती भी कह रहे थे। किसानों के जीवन के अलग-अलग पहलुओं पर वह उपन्यास लिख चुके थे- ‘प्रेमाश्रम’ में बेदखली और इज़ाफ़ा लगान पर, ‘कर्मभूमि’ में बढ़ते हुए आर्थिक संकट और किसानों की लगानबंदी की लड़ाई पर-लेकिन कर्ज़ की समस्या पर उन्होंने विस्तार से कोई उपन्यास न लिखा था। ‘गोदान’ लिखकर उन्होंने किसान की उस समस्या पर प्रकाश डाला जो आए दिन उनके जीवन को सबसे ज्यादा स्पर्श करती है। (गोदान में ऋण की समस्या को प्रेमचंद के स्वयं कर्ज़दार होने की बात से जोड़ते हुए)
- निराला की रचना-प्रक्रिया का स्रोत है उनका भावबोध। यह भावबोध उनकी विचारधारा से सम्बद्ध है किन्तु उसका प्रतिबिम्ब नहीं है। निराला का स्वाधीनता-प्रेम उनके साहित्य में अप्रत्याशित नये-नये रूपों में व्यक्त होता है। उनकी आस्था के प्रतीक अनेक हैं, उनका अधिष्ठान एक है। उनकी दार्शनिक मान्यताएँ अनेक अन्तर्विरोधों को पार करती हुई नारी और प्रकृति के मोहक चित्रों के साथ साहित्य में व्यक्त होती है। नये मानवतावाद के प्रतिष्ठापक निराला के साहित्य में मनुष्य वीर, क्रान्तिकारी योद्धा, कवि, निरन्तर संघर्षशील साथ ही अन्तर्द्वन्द्व, ग्लानि और पराजय से पीड़ित साधारण मनुष्य भी है। निराला सौन्दर्य और उल्लास के कवि है, दुःख और मृत्यु के भी। (‘निराला की साहित्य-साधना’ से)
- रत्नावली के शब्दों में तुलसीदास को नहीं, वरन् साहित्य और संस्कृति की समस्त रीतिकालीन परम्परा को धिक्कारा गया है। उसके योगिनी रूप में मध्यकालीन नारी का नायिका-भेद वाला रूप जलकर भस्म हो गया है। (निराला की कविता 'तुलसीदास' पर डॉ शर्मा के विचार)
- उनके आत्म-संघर्ष के अनेक स्तर हैं। एक स्तर हैं निम्न वर्ग की भूमि को छोड़कर सर्वहारा वर्ग से तादात्मय स्थापित करने का। दूसरा स्तर है मन के दुःस्वप्नों- पाप बोध, मृत्युचिन्तन, असमान्य स्थिति- से निकलकर स्वयं को और संसार को वस्तुगत रूप में देखने का। तीसरा स्तर है अपनी काव्यकला को निरन्तर विकसित करने का। मुक्तिबोध का साहित्य उस व्यक्ति का साहित्य है जो जीवन की अनिवार्य विवशताओं के बीच निरन्तर अपने विवेक के अनुसार व्यक्तित्व के निर्माण में प्रयत्नशील रहता है। (‘मुक्तिबोध’ के काव्य का मूल्यांकन करते हुए)
- शमशेर का काव्य रीतिवादी रूमानी सौर्न्यबोध और मार्क्सवादी विवेक के द्वन्द्व का काव्य है। शमशेर में यह द्वन्द्व शुरू से ही पाया जाता है और वे इस द्वन्द्व को सार्थक संगति नहीं दे पाये। (शमशेर के सम्बन्ध में डॉ.शर्मा का मत)
- मुक्तिबोध रहस्यवाद को लेकर बड़ी उलझन में पड़े थे। शमशेर में ऐसी कोई उलझन नहीं है। ‘मुक्तिबोध’ मनोविश्लेषण शास्त्र से प्रभावित होकर अन्तर्मन की गुफा में ज्ञान के मणि और रत्न ढूँढते थे और फिर इस आत्मप्रवंचना पर झुँझलाते थे। शमशेर सजीले जिस्म के गुणगाने पर ऐसा रीझते हैं कि अँधेरे कुएँ या बाबड़ी में उतरने की उन्हें फुर्सत नहीं मिलती। किन्तु शमशेर उतने आत्ममुग्ध नहीं जितने ‘मुक्तिबोध’ थे। मुक्तिबोध अस्तित्ववाद की ओर खिंचे और अपने-पराये अनेक पापों का मैल मन से धोते रहे। शमशेर नयी कविता के उन तमाम लेखकों से अलग है जो अस्तित्ववाद से प्रभावित हैं। उनका आत्म-संघर्ष है उत्तर छायावादी काव्यबोध को लेकर। ( ‘मुक्तिबोध’ और ‘शमशेर’ के आत्मसंघर्ष की तुलना करते हुए)
- जब समाजवादी दलों का बिखराव दूर होगा, जब हिन्दी प्रदेश की श्रमिक जनता एकजुट होकर नये समाज के निमार्ण की ओर बढ़ेगी, जब नयी कविता का अस्तित्वादी सैलाब सूख चुका होगाा, जब मध्यवर्ग और किसानों और मजदूरों में भी जन्म लेने वाले कवि दृढ़ता से अपना सम्बन्ध जन आन्दोलन से कायम करेंगे तब उनके सामने लोकप्रिय साहित्य और कलात्मक सौन्दर्य के सन्तुलन की समस्या फिर से पेश होगी और तब साहित्य और राजनीति में उनका सही मार्ग दर्शन करने वाले, अपनी रचनाओं के प्रत्यक्ष उदाहरण से उन्हें शिक्षित करने वाले, उनके प्रेरक और गुरू होंगे कवि नागार्जुन। (‘नयी कविता और अस्तित्वाद’ में नयी कविता के संदर्भ में नागार्जुन की काव्य-कला का मूल्यांकन)
- उसमें दृढ़ क्रान्ति-भावना विद्यमान है। वह लोक-संस्कृति के निकट है। उस में प्रखर राजनीतिक चेतना और गहरा व्यंग्य है। उसमें यथार्थ जीवन के वैविध्यपूर्ण मार्मिक चित्र है। उसमें रहस्यवाद और यथार्थवाद को लेकर किसी प्रकार का द्वन्द्व नहीं है— उसमें कथ्य के अनुकूल भाषा की सहज गति और लय को आधार बनाकर विविध प्रकार के प्रयोग किये गये हैं। (‘नयी कविता और अस्तित्वाद’ में नागार्जुन के बारे में)
- मेरी पुस्तक 'भाषा और समाज' में जिन सिद्धान्तों का प्रतिपादन है, उनका यहाँ संवर्धन और विस्तार है, उनमें कहीं मौलिक परिवर्तन करना आवश्कयक प्रतीत नहीं हुआ। कुछ शब्दों की व्युत्पत्ति में फेर-बदल संभव है। जहाँ उस पुरानी पुस्तक को देखते शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में यहाँ भिन्न मत प्रकट किया गया हो, वहाँ इस पुस्तक में व्यक्त मत को मेरी वर्तमान धारणा का सूचक मानना चाहिए। जिस विवेचन में अटल नियमों की अस्वीकृति हो, उसमें किसी भी स्थापना के लिए पूर्ण सत्य का दावा करना हास्यास्पद होगा। जो लोग अटल नियमों का प्रतिपादन करते हैं, उनके ग्रंथों में भी संभव है, ‘ऐसा हुआ होगा’, “शायद ऐसा हो”, “हो सकता है कि” इत्यादि की खपत काफी होती है। इस पुस्तक में कोई भी स्थापना चाहे जितने आत्मविश्वास से प्रस्तुत की गई हो, आप अपनी ओर से उसके आगे पीछे संभव और शायद जोड लें। मेरा प्रयत्न यह है कि प्रत्येक स्थापना के विरोध में जो तर्क दिया जा सके उस पर विचार करने के बाद अपनी स्थापना प्रस्तुत करुँ।” ( 'भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी' भाग-1 पृ.सं.24)
- व्यक्तिवादी विचारधारा क्षीण होकर निर्जीव, विकृत, अस्वस्थ, यथार्थ विरोधी रचनाओं की सृष्टि कर रही है। यथार्थवादी विचारधारा मनुष्य के सर्वांगीण विकास के उद्देश्य से ऐसी रचनाएँ करने की ओर प्रवृत्त है जिससे हमारी सामाजिक चेतना प्रखर हो। और हमारी सौंदर्य बोध की वृत्तियाँ भी संतुष्ट हों। आधुनिक हिन्दी साहित्य की मूल धारा भी हमें इसी ओर बढ़ने की प्ररणा देती है। ('आस्था और सौन्दर्य', पृ.सं. 25 लेख 'यथार्थ जगत और साहित्य' में)
- कविता में तरह-तरह के प्रयोग करने की बडी गुंजाईश है। अनेक प्रकार की शैलियों द्वारा कवि अपने भाव और विचार पाठकों तक पहुँचा सकता है। शैली की यह विविधता भावों की अभिव्यंजना में ही नहीं, भावानुभूति और संवेदना के प्रकारों में भी देखी जा सकती है। इस विविधता से हिन्दी कविता की मूल यथार्थवादी धारा समृद्ध होती है। नई कविता और आधुनिक हिन्दी कविता एक ही वस्तु नहीं है। हमें संकुचित अर्थ में ग्रहण की जानेवाली नई कविता के अलावा भी पिछले दस वर्षों में रची हुई आधुनिक हिन्दी कविता का विवेचन करना चाहिए। आलोचना का कोलाहल शांत होने पर नई कविता के कर्दम पर यथार्थवाद की निर्मल धारा बहती दिखाई देगी। ( 'आस्था और सौंदर्य' -पृ.सं. 174 ; लेख 'नई कविता और आधुनिक हिन्दी कविता')
- आज के अनेक प्रसिद्ध लेखक झकोले खा रहे हैं, आस्था-अनास्था की समस्याओं से व्यथित हो उठते हैं, प्रत्येक राजनीतिक पार्टी से विश्वास उठ जाने की बातें करते हैं। ये सब पार्टियाँ जनता से उत्पन्न होती हैँ, उसकी सेवा के बल पर जीती हैं, यदि वे जनता के लिए ऐतिहासिक रुप से अनावश्यक हो जाती हैं तो उनकी चमक-दमक, रोब-दाब अस्थायी ही सिद्ध होते हैं। यदि लेखक को इस जनता में आस्था हो, वह उसके साथ आगे बढ़ने को तैयार हो तो उसका झकोले खाना बंद हो जाए। कभी-कभी प्रेमचंद के मानवतावद का स्तर न समझकर अपने साथ हम उन्हें भी झकोले खाता हुआ देखने लगते हैं। हमें अपने से प्रश्न करना चाहिए, क्या हमने निर्धन और पीड़ित जनता के पक्ष को प्रेमचंद के समान दृढ़ता से अपनाया है? क्या हम उनके सामने धैर्य, लगन, निस्वार्थ भाव से यह सेवाव्रत निबाहने को तत्पर हैं? प्रेमचंद की परंपरा में अनेक लेखक हैं। लेकिन उन जैसा असंदिग्ध विवेक, अटूट, सहानुभति और अमोघ शब्द-शक्ति का लेखक दूसरा नहीं है। वे “आज भी हमारे गुरु हैं।” और शायद कल भी रहेंगे। (आस्था और सौंदर्य, पृ,सं.95 , राजनीति और साहित्य के संबंधों के बारे में)
- भाषाई विवेचन एक कौशल है, यह कौशल यंत्रवत निश्चित किया जा सकता है। जैसे उद्योग-धंधों की एक टेकनोलॉजी है, वैसे ही भाषा-वैज्ञानिक धंधे की एक टेकनोलॉजी है। टेकनोलाऑजी स्वयं विज्ञान नहीं है, वैसे ही भाषाई विवेचन का कौशल भाषा विज्ञान नहीं है। जब भाषाई टेकनोलॉजी में टेकनीकल शब्दावली की भरमार हो तो उसे विज्ञान समझने के भ्रम से बचना और भी जरुरी है। प्रत्येक विज्ञान में अनुसंधानकर्त्ता का संवेदनशील होना उस विज्ञान के विकास की पहली शर्त है। भाषा विज्ञान के विकास के लिए यह संवदेनशीलता और भी आवश्यक है। कारण यह कि भाषा निसर्गतः संवेदनाओं के निखार और उन्हें दूसरों तक पहुँचाने का माध्यम है। साहित्यिक बोध यहाँ सहायक होता है। कौशल की उपयोगिता असंदिग्ध है। भाषाओं के विवेचन के लिए जितना कौशल आवश्यक और उपयोगी है। उतना अवश्य स्वीकार करना चाहिए। किन्तु बहुत-सी भाषाई टेकनोलॉजी ऐसी है जिसकी उपयोगिता प्रमाणित नहीं हुई। कला के लिए कला, जैसे यह सिद्धान्त अमान्य है, वैसे ही कौशल के लिए कौशल-यह सिद्धान्त भी अमान्य है। (भाषा-विज्ञान के बारे में, 'भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी', भाग-1 पृ.स.22)
- कश्मीर से लेकर तमिलनाडु तक, बंगाल से लेकर गुजरात तक राष्ट्रीय स्वाधीनता आन्दोलन ने एक भावना-सूत्र में देश की सभी जातियों और भाषाओं को बाँध दिया था। बहुजातीय राष्ट्रीयता का पाठ हमें अंग्रेजों ने नहीं पढ़ाया। युनाइटेड किंगडम ऊर्फ ग्रेट ब्रिटेन में आइरिश, स्काट, वेल्स और अंग्रेज जातियों में काफी कशमकश रही है। इस युनाइटेड किंगडम की यूनिटी युद्धों और हिंसक दमन द्वारा प्राप्त की गयी थी। आयरलैंड-जैसे भिन्न देश का विभाजन करके उसके एक खण्ड को नकली ढंग से यूनाइटेड किंगडम का अंग बनाया गया है। स्काटलैंड अपेक्षाकृत पिछड़ा रहा है और उन्नसवीं सदी तक अंग्रेज उसे दूसरा देश (प्रदेश नहीं) समझते थे। वेल्स की भाषा अंग्रेजी से भिन्न परिवार की है लेकिन उसे निर्मूल करने में अंग्रेजों ने कुछ उठा नहीं रखा। हमारी राष्ट्रीयता जिस में तमिल, कश्मीरी, सिंधी आदि फलती-फूलती हैं। युनाइटेड किंगडम की राष्ट्रीयता से दूसरे ढंग की है। न हमने संयुक्त राष्ट्र अमरीका की तरह गृहयुद्ध द्वारा उत्तर-दक्षिण को संयुक्त किया है। हमारी बहुजातीय राष्ट्रीयता की नींव अंग्रेजी राज कायम होने से पहले डाली गई थी। (भारतीय इतिहास बोध पर डॉ शर्मा के विचार, 'आस्था और सौन्दर्य', पृ.सं.176-177)
- मानव जाति समस्त धरती पर फैली हुई है, समस्त काल में उसका प्रसार है। इस मानव समाज को आपस में बाँधनेवाला कौन है? वह कवि है। और कवि उसे बाँधता है भाव और ज्ञान के द्वारा। भाव और ज्ञान वर्ड्सवर्थ के लिए परस्पर विरोधी नहीं हैं। वे एक-दूसरे के पूरक हैं, एक साथ चलते हैं। कविता के लिए भावशक्ति और ज्ञानशक्ति का संयोग दरकार है। फ्रांसीसी राज्य क्रांति ने जो भाईचारे का नारा दिया था, उसे हम वर्ड्सवर्थ को अंग्रेजी कविता में लागू करते हुए देखते हैं। (साहित्येतिहास की पुर्नव्याख्या करते हुए , 'आस्था और सौन्दर्य', पृ.199)
- जिसे रोमांटिसिज्म (छायावाद, स्वच्छन्दतावाद) कहा जाता है, वह अनेक प्रकार का था। कभी-कभी एक ही कवि में कई तरह का रोमांटिसिज्म देखने को मिलता है। इंगलैंड के रोमांटिक कवियों में बायरन ने व्यंग्यपूर्ण कविताएँ सबसे अधिक लिखीं। उनसे पहले के युग में ड्राइडन और पोप बहुत शक्तिशाली व्यंगयकार हुए थे। बायरन ने इससे बहुत-सी बातें सीखीं किंतु अपने युग के अनुरुप उन्होंने व्यंग्य कविता को नई दिशा में मोड़ा।” ('आस्था और सौन्दर्य', पृ.सं.208)
- संसार का प्राचीनतम ग्रंथ हमारे देश का ऋग्वेद है। ऋग्वेद से पहले काव्य, दर्शन और इतिहास की एक सुदीर्घ परंपरा थी। इसके प्रमाण ऋग्वेद में ही मिल जाते हैं। रामायण और महाभारत - इन प्रसिद्ध महाकाव्यों का संबंध ऋग्वेद से है। उपनिषदों की विचारधारा ऋग्वेद की स्थापनाओं को आधार बनाकर ही आगे बढ़ती है। कालिदास और भवभूति जैसे महाकवि रामायण और महाभारत से सामग्री लेकर उसे नया रूप देते हैं। काव्य और दर्शन की इस सुदीर्घ परंपरा से रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सुब्रह्मण्य भारती, निराला जैसे समर्थ कवि जुड़े हुए हैं। कोई भी विद्वान इस प्राचीन संस्कृति की उपेक्षा करके इन महाकवियों का अध्ययन पूरा नहीं कर सकता। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, पहला खंड, पृष्ठ 5)
- ऋग्वेद का समाज आदिम साम्यवादी समाज नहीं है। वह इस व्यवस्था से बाहर निकाल आया है। व्यक्तिगत संपत्ति यहाँ दृढ़ता से स्थापित है। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- ये ‘गड़रियों के गीत’ नहीं हैं, जैसा कि कुछ पश्चिमी विद्वान इन्हें बहुत दंभ और हिकारत भरी दृष्टि से साबित करने की कोशिश करते हैं और अनेक भारतीय विज्ञान भी उनका अनुसरण करते हैं। इसके बजाय यहाँ काव्य का ऐसा सहज स्फुरण, पूर्णता और ऊँचाई है और उसके पीछे एक ऐसी नवनवोन्मेषशालिनी प्रतिभा है कि उन्हें पढ़ने के बाद आज हम स्वयं चकित होते हैं कि हजारों साल पहले लिखे गए इस काव्य में कैसी ताजगी है। उसमें अनूठी कल्पना और विचारों की समृद्धि है। इसके पीछे एक समुन्नत सभ्यता का होना सहज ही सिद्ध है, जिस कारण ऋग्वेद का प्रभाव हमारी सभ्यता पर इतनी दूर तक पड़ा कि आज भी वह कहीं न कहीं हमारे चिंतन और विचारों को प्रभावित और संयोजित करता नजर आता है। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- ऋग्वेदकालीन आर्य बहुत उन्नत सभ्यता के लोग थे। वे खेती करते थे, हलों के फाल बनाना जानते थे। बढ़िया कारीगर थे। विज्ञान और चिकित्सा के बारे में उनका ज्ञान अद्भुत था। वे पारिवारिक जीवन जीते थे। गृह-निर्माण कौशल की उन्हें अच्छी जानकारी थी और वे सुंदर, सुव्यवस्थित घरों में रहते थे। उनके जीवन और कल्पनाओं में एक तरह की ऊँचाई और पूर्णता है। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- ऋग्वेद में एक पूरा सूक्त शरीर के अंगों पर है और वह अथर्ववेद के कवियों को इतना प्रिय था कि उन्होंने थोड़े-से परिवर्तन के साथ उसे एक से अधिक बार दोहराया है। एक संहिता में शिष्य ने गुरु से पूछा—वैद्यों का वेद कौन-सा है? गुरु ने उत्तर दिया—हमारा वेद अथर्ववेद है। चिकित्सा विज्ञान की परंपरा अथर्ववेद से चली आ रही है। इस वेद के प्रति पुराने लोग सचेत थे। अथर्ववेद और चरकसंहिता में बहुत से अंगों के नाम, बहुत से रोगों के नाम, इनके साथ बहुत सी ओषधियों के नाम सामान्य है। इनमें अनेक नाम ऋग्वेद और अथर्ववेद में सामान्य हैं। रस, रक्त और ओज सब शरीर में प्रवहमान है। प्रवाह का माध्यम धमनी, स्रोत और सिरा हैं। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- यदि संसार मिथ्या है, तो शरीर मिथ्या है, उसके रोग मिथ्या हैं। रोगों के उपचार के लिए जिस धरती से जड़ी-बूटियाँ एकत्र की जाती हैं, वह धरती मिथ्या है और जड़ी-बूटियाँ भी मिथ्या हैं। ऐसा मिथ्यावाद ऋग्वेद और अथर्ववेद में नहीं है, यह निश्चित है। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- आर्य कहीं बाहर से नहीं आए थे, वे यहीं के मूल निवासी थे। उन्होंने किसी विकसित सभ्यता को नहीं उजाड़ा था। बल्कि मोएञ्जोदड़ो और हड़प्पा की जिस विकसित सभ्यता की बात की जाती है, वह मूलत: आर्य सभ्यता ही थी। वे अनेक प्रमाणों से यह साबित करते हैं कि मोएञ्जोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता ही मुख्य रूप से आर्य सभ्यता है। यह इसलिए कि ये दोनों बहुत ही उन्नत सभ्यताएँ हैं, एक ही कालखंड की हैं और उन्हें आपस में जोड़ने वाले तमाम संबंध-सूत्र अब प्रकट हो चुके हैं। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- ऋग्वेद के ऋषि घर बनाते हैं, पुर बसाते हैं, वे खेत नापते हैं और उनके देवता पृथ्वी और आकाश नापते हैं। नापने का काम ज्यामिति के प्रारंभिक विकास के बिना संभव नहीं है। जहाँ तक हड़प्पा और मोएञ्जोदड़ो के अवशेषों का संबंध है, इन नगरों का नपा-तुला परिमाण ज्यामिति के विकास का स्पष्ट प्रमाण है। दूर-दूर तक एक ही नाप की ईंटों का प्रयोग, दूर-दूर तक एक ही तौल के बाँटों का उपयोग, गणित और ज्यामिति के साथ हड़प्पावासियों की योजनाबद्ध विकासक्षमता का परिचायक है। महाभारत और रामायण में सभागारों और बड़े-बड़े भवनों का वर्णन है। वे हड़प्पा सभ्यता के अवशेषों में प्रत्यक्ष हैं। पाटलिपुत्र एक बड़े साम्राज्य की राजधानी बना। वहाँ के भवन चीनी यात्री फाहियान ने देखे तो उसने सोचा, ये मनुष्यों के नहीं, देवों के बनाए हुए होंगे। पाटलिपुत्र, काशी, मथुरा और उज्जयिनी, ये भारत के प्रचीन नगर हैं जिनका इतिहास अब तक अटूट चला आ रहा है। भारतीय संस्कृति का बहुत गहरा संबंध इन चार महानगरों से है। इन नगरों पर ध्यान देते ही यह प्रचलित धारणा खंडित हो जाती है कि भारत ग्राम-समाजों का देश है, यहाँ के लोग कला-कौशल में पिछड़े हुए थे और हमें उन्हीं ग्राम-समाजों की ओर लौट जाना चाहिए। ये चारों महानगर विभिन्न युगों से व्यापारिक संबंधों से परस्पर जुड़े रहे हैं।...इन नगरों के द्वारा हिंदी प्रदेश के जनपद प्राचीन काल से परस्पर संबद्ध हुए और दक्षिण भारत से उन्होंने अपना संबंध जोड़ा। इसलिए भारत राष्ट्र के निर्माण में और भारतीय संस्कृति के विकास में हिंदी प्रदेश की निर्णायक भूमिका स्वीकार करनी चाहिए। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- दामोदर धर्मानंद कोसांबी ने अपनी पुस्तक ‘इंट्रोडक्शन टु द स्टडी ऑव इंडियन हिस्ट्री’ में आर्यों को घुमंतू और बर्बर मानकर कल्पना की है कि भारत पर उनके आक्रमण से पहले हड़प्पा सभ्यता में लोग नदियों पर बाँध बनाकर खेती करते थे। तरीका उनकी समझ में यह था कि अस्थायी बाँध बना देने से नदियों में जल भर जाता था और किनारे की जमीन पर फैल जाता था। उस उपजाऊ जमीन पर वे बीज फैला देते थे और फसल काटते थे। आर्यों ने इस बाँध-व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया और इस तरह सारे प्रदेश की कृषि का नाश कर दिया। अब नगरों का आबाद बना रहना असंभव हो गया।...विडंबना यह है कि जो लोग उत्तर भारत में कृषि का विकास कर रहे थे, उन्हें कोसांबी ने उसका विनाशक मान लिया है। खेतों के जोतने, बोने, फसल काटने, देवों को जौ, पुए आदि की भेंट चढ़ाने की तरफ वे ध्यान देते तो खेती का महत्त्व आसानी से समझ आ जाता। खेती के जितने प्रमाण ऋग्वेद में हैं, उनको एक तरफ हटा दिया है। हड़प्पा सभ्यता ऋग्वेद से पहले है, आर्यों ने आकर उसका विनाश किया, यह आत्मगत कल्पना उन्होंने तथ्यों पर आरोपित कर दी है। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- ऋग्वेद में वैचारिक विविधता है। देवोपासक हैं, देवोपासना के विरोधी भी। आदि तत्त्व की खोज करने वाले हैं। असत् से सत् की उत्पत्ति मानने वाले भी हैं। इस विविधता में एक धारा अद्वैतवाद की है। उसे किसी नाम से पुकारें, परमसत्ता एक ही है। यह ऋग्वेद की श्रेष्ठ दार्शनिक उपलब्धि है। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- उपनिषदकारों में इस बात की जैसे होड़-सी लगी है या मानो वहाँ शताब्दियों लंबी एक बहस छिड़ी हुई है कि सृष्टि का मूल तत्त्व क्या है? कोई अग्नि को मूल तत्त्व बताता है, तो कोई वायु को। और कोई अन्न-जल आदि तत्त्वों को। इस बारे में छांदोग्य उपनिषद में आया श्वेतकेतु का किस्सा दिलचस्प है। श्वेतकेतु के पिता ने उन्हें पंद्रह दिन तक भूखे-प्यासे रहने के लिए कहा। उसके बाद कहा, “कुछ वेद-मंत्र सुनाओ।” श्वेतकेतु को कुछ भी याद नहीं आया। तब पिता ने कहा, “हे सौम्य, तेरी सोलह कलाओं में से एक कला बच रही है। अब खाकर आओ।” और आश्चर्य! भोजन करने के बाद उन्हें फिर से वेद स्मरण हो जाए। इससे मालूम पड़ता है कि उपनिषदकालीन सभ्यता कोई जड़ सभ्यता नहीं थी। वहाँ निरंतर प्रयोग और वैचारिक विकास हो रहा था तथा वे मूलत: तत्त्वदर्शी लोग हैं। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- उपनिषदों की और शंकर की यह परम उपलब्धि है कि वे मनुष्य में परमेश्वर को प्रतिष्ठित करते हैं, परमेश्वर और मनुष्य की भिन्नता समाप्त कर देते हैं। जहाँ इस भिन्नता का आभास होता है, उसे वे भ्रांति कहते हैं।...उपनिषद और उसके भाष्यकार शंकर मनुष्य को जैसी गरिमा प्रदान करते हैं, वैसी गरिमा संसार का कोई भी धर्म मनुष्य को प्रदान नहीं करता। संसार के धर्मों के आपसी लड़ाई-झगड़े परमसत्ता के स्वरूप को लेकर उतने नहीं होते, जितना नाम-रूप और उपाधिभेद के कारण होते हैं। इन धर्मों में नामरूप और उपाधिभेद मिटा दिए जाएँ तो जो बचेगा, वह परम सत्ता का स्वरूप होगा और उसके कारण मार-काट की नौबत न आएगी। इसलिए जब शंकर ने उपाधिभेद की आलोचना की, तब उन्होंने धार्मिक भेदभाव की जड़ पर प्रहार किया और यह उनके चिंतन का क्रांतिकारी पक्ष है। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- उपनिषदों का ब्रह्म जितना अलौकिक है, उतना ही लौकिक है। वह प्रकृति से इतनी गहराई से जुड़ा हुआ है कि दोनों को अलग करना प्रायः असंभव है। शंकर ब्रह्म को प्रकृति से, लोक से अलग करने के लिए जितना ही प्रयत्न करते हैं, उतना ही लोक उनका पीछा करता जाता है। कभी उपनिषदों के आधार पर और कभी सामान्य जीवन के अनुभवों के आधार पर वह इस लोकजीवन की बराबर चर्चा करते हैं। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- शंकर के बारे में प्रसिद्ध है, उन्होंने बौद्ध मत को निर्मूल किया। बौद्ध धर्म के साथ उन्होंने भारतीय दर्शन की यथार्थवादी धारा को भी निर्मूल करने का प्रयत्न किया। 500-600 सालों तक बौद्ध मतवादियों ने भी इस धारा का विरोध किया था, पर वे इसे निर्मूल नहीं कर पाए। बौद्धों का जितना विरोध आत्मवादियों से था, उससे अधिक विरोध उनका भौतिकवादियों से था। इसी तरह शंकर का जितना विरोध बौद्धों से था, उतना ही लोकायतवादियों, सांख्य, वैशेषिक आदि के अनुयायियों से था। वास्तव में नागार्जुन की शून्यवादी और शंकर की मायावादी धाराएँ सामान्य सामाजिक अंतर्विरोधों से उत्पन्न हई थीं। संपत्तिशाली वर्गों के हित में उन्होंने दार्शनिक स्तर पर जीवन की समस्याओं को हल करने का प्रयत्न किया था। बौद्धों के लिए संसार अनित्य था, दुख का काण था। वैसे ही शंकर के लिए संसार अनित्य था और दुख का कारण था। भारतीय दर्शन की यथार्थवादी धारा महाभारत के रचनाकाल में पूरी शक्ति से प्रवाहित थी। इसके अनेक प्रमाण उस ग्रंथ में हैं। शंकर के समय में भी वह धारा सूखी नहीं थी। उनके मायावाद को चुनौती देने के लिए वह विद्यमान थी। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- महाभारत में बड़े-बड़े कुशल वक्ता हैं, पर जैसा उदात्त, मार्मिक भाषण यहाँ द्रौपदी का है, वैसा इस महाकाव्य में अन्यत्र किसी दूसरे का नहीं है। जो कुछ द्रौपदी चाहती है, उसे कार्यरूप में परिणत करने वाले कृष्ण हैं। द्रौपदी महाभारत की विराट भावशक्ति है। कृष्ण महाभारत की अपराजेय कर्मशक्ति हैं। इन दोनों के देखते अर्जुन आदि वीर वास्तव में निमित्त मात्र हैं। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- गीता संन्यास पर नहीं, कर्म पर जोर देने वाला ग्रंथ है। गीता में योग और सांख्य को जितना महत्त्व मिला है, वह भी अकारण नहीं है। यह एक प्रकार से बुद्धि की ही प्रतिष्ठा है। यह बुद्धि जो नैतिक-अनैतिक तथा विवेक-अविवेक के बीच फर्क करती है। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- संसार को मिथ्या कहने वाली प्रवृत्ति पुराणों की मुख्यधारा नहीं है, परंतु वह भी पुराणों में है, इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वह शंकर के प्रभाव से उत्पन्न हुई हो, ऐसा प्रतीत नहीं होता। क्षीण धारा के रूप में वह गीता में है और उसका पूरा प्रवाह ब्रह्मसूत्रों में दिखाई देता है। संसार को मिथ्या कहने वाली विचारधारा के जन्मदाता शंकर नहीं थे, परंतु वह उसके पोषक अवश्य थे। उन्होंने और उनके अनुयायियों ने से अपने प्रचार से इसे व्यापक रूप दिया। महाभारत की तरह पुराणों का वेदांतीकरण हुआ। उनके आदि रूप में वेदांत बिल्कुल न रहा हो, यह बात नहीं है। वेदांत के एक विशेष रूप का उनमें प्रवेश कराया गया। यह रूप उपनिषदों की तरह ब्रहम को और प्रकति को परस्पर संबद्ध ने मानकर दोनों को अलग करता था और ब्रहम को प्रकृति से परे बताता था। महाभारत की तरह पुराणों का वैष्णवीकरण भी हुआ। महाभारत में वैष्णवीकरण की यह प्रकिया स्पष्ट देखी जा सकती है। कृष्ण का एक रूप वह है, जहाँ वे ईश्वर नहीं हैं, दूसरा वह है जहाँ वे ईश्वर के अवतार हैं। यह बहुत संभव है, राजवंशी काव्य की तरह पुराणों में वीरों के चरित्र का वर्णन किया गया हो, आगे चलकर इस वर्णन में अवतारों की कथा जोड़ी गई हो। राजवंशों का इतिहास लिखने की परंपरा, लौकिक घटनाओं का विवरण देने की परंपरा पुराणों में बराबर बनी रही। यही इनकी मूल विशेषता ज्ञात होती है। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- परंतु पुराण अपनी अति कल्पना के लिए बदनाम हैं। हजारों साल तक जीवित रहना, हजारों पुत्र उत्पन्न करना, हजारों साल तक तपस्या करना, ऐसी असंभव घटनों का वृत्तांत भी पुराणों में है। इस यथार्थविरोधी पौराणिकता का प्रवेश भी पुराणों में कराया गया। इतिहास-तत्व कम होता गया और अतिरंजित अतिमानवाय घटनाओं की बाढ़ आ गई। इससे पुराणों का मूल चरित्र ही बदल गया। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- चरकसंहिता में जो बातें नदियों के जल के बारे में कही गई हैं, वे बहुत रोचक हैं। उनसे पता चलता है कि देश का कौन-सा भाग, मुख्य रूप से चरक संहिता के निर्माता या निर्माताओं के सामने था। जो नदियाँ हिमालय से निकलती हैं, उनका जल पत्थरों से टकराकर आगे बढ़ता है। इन नदियों का जल सभी प्राणियों के लिए पथ्य होता है।
- मलयाचल से निकली नदी का जल स्वच्छ और अमृत के समान मीठा होता है।...यहाँ सिद्धांत यह मालूम होता है कि नदी तेजी से बहे तो उसका जल हितकारी होगा और धीमे बहे तो उसका जल भारी होगा, किंतु गंगा हरिद्वार तक एक ढंग से बहती है, हरिद्वार से प्रयाग तक दूसरे ढंग से और प्रयाग से बंगसागर तक तीसरे ढंग से। उसके समांतर बहने वाली और प्रयाग में उससे मिल जाने वाली यमुना का जल भारी होता है और उसकी तुलना में गंगा का जल बहुत ही लाभकारी है, ऐसा लोग कहते हैं। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- माया, अध्यात्म और संन्यास की प्रचुर चर्चा के बावजूद भारतीय संस्कृति की मूलधारा यथार्थवादी है, जिसमें जीवन का व्यापक स्वीकार है। इसीलिए चिकित्सा विज्ञान की हमारे यहाँ एक अत्यंत प्राचीन और समुन्नत परंपरा है, जहाँ शरीर के अवयवों का वस्तुपरक वर्णन नहीं हुआ, बल्कि वृक्षों और औषधियों के बारे में भी बहुत विस्तृत वर्णन मिलते हैं। यह चिकित्सा विज्ञान के प्रादुर्भाव का नहीं, बल्कि चिकित्सा विज्ञान के ‘विशेषीकरण’ का दौर था।
- बुद्ध की सबसे शानदार घोषणा यह है कि किसी ने कहा, इसलिए मान लिया, किसी पुस्तक में लिखा है, इसलिए मान लिया, श्रद्धावश मान लिया, ऐसा न करना चाहिए। अपने विवेक से काम लेना चाहिए और विवेक से बढ़कर अपने अनुभव से देखना चाहिए कि यह बात सही है या गलत। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- भारतीय संस्कृति का इतिहास लोकविरोधी रूढ़ियों और प्रगतिशील विचारधाराओं के सतत संघर्ष का इतिहास है। उस इतिहास का अध्ययन इसलिए आवश्यक है कि हम लोकविरोधी रूढ़ियों को भारतीय संस्कृति का सारतत्व न समझ लें, वरन् प्रगतिशील विचारधाराओं से कुछ सीखकर उनके आधार पर, नई संस्कृति का विकास करें। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
- भारतीय संस्कृति का विकास देशकाल की सीमों के भीतर हुआ है। इन सीमाओं को निर्धारित करने के लिए हमारे यहाँ मिस्र के मंदिरों और समाधिस्थानों जैसे प्राचीन स्मारक नहीं हैं। परंतु हमारे यहाँ एक अत्यंत प्राचीन प्राकृतिक स्मारक सरस्वती के रूप में है। इसी नदी के तट पर अधिकांश वेदों की रचना हुई। फिर यह नदी जलविहीन हो गई। कुरुक्षेत्र से पूर्वी पंजाब और राजस्थान की सीमाओं को छूता हुआ, सिंधु प्रदेश की पूर्वी सीमा निर्धारित करता हुआ, इसका मार्ग समुद तक पहुँचता है। कालनिर्धारण के लिए यही हमारा प्राकृतिक स्मारक है। ऋग्वेद में यही नदी जल से भरी हुई थी। यजुर्वेद में भी यह वैसे ही जल से भरी हुई थी। हड़प्पा सभ्यता के ह्रासकाल में, 1700 ईसा-पूर्व के आसपास वह जलहीन हो गई थी। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ऋग्वेद और यजुर्वेद की रचना हड़प्पा सभ्यता के ह्रासकाल से पहले हुई थी। उस सभ्यता के अवशेष सरस्वती के तटवर्ती प्रदेश में आज भी बने हुए हैं। हड़प्पा सभ्यता की घनी बस्तियाँ कुरुक्षेत्र में हैं, उस प्रदेश में हैं जहाँ भरतजन रहते थे।...इसलिए कुछ विद्वानों ने सरस्वती की तटवर्ती बस्तियों के विचार से हड़प्पा सभ्यता को सारस्वत सभ्यता कहा है। वास्तव में इस सभ्यता के विकास में जितना योगदान सिंधु नदी का है, उससे कहीं अधिक सरस्वती का है। (भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश)
डॉ रामविलास शर्मा के बारे में अन्य विद्वानों के विचार
[सम्पादित करें]- वे अत्यन्त तटस्थ रहते थे और हुड़दंग से विदुर की तरह अलग और अपने शोधकार्य में तल्लीन रहते। दूसरे हितैषियों के दबाव के कारण मैं आगरा आया, तब से मुझसे परिचय घनिष्ठ हुआ। किसी विद्याप्रसंग की बात होती तो वे बुलाते, किसी पुस्तक के संदर्भ की बात होती तो पत्र भेजते। उनसे बात करना बड़ा प्रीतिकर लगता था। वे निश्चल भाव से बात करते थे, इसलिए उनसे बहुत बेबाक होकर बात होती थी। जिनकी वह आलोचना करते थे उनके प्रति भी उनके मन में कोई द्वेषभाव नहीं होता था। हल्के प्रयास के बाद चुटीली-से चुटीली टिण्पणी भी दे जाते थे और उसका कसैलापन मालूम भी नहीं होने देते थे। मैंने दो-तीन बार उनसे अपनी संपादकीय पत्रिकाओं के लिए लेख मांगा या खुशी से लेख भी दिया और साक्षात्कार भी। उनका जाना एक ऐसे महान विचारक का जाना है जो हिन्दी का दुर्धर्ष समर्थक रहा। (डॉ. विद्यानिवास मिश्र ; 14 जून 2000, इंडिया टुडे में)
- 'आर्य' शब्द नस्ल का द्योतक नहीं है। यह अपने प्राचीन साहित्य में प्रयोग होता रहा है। इस स्थापना में वे मार्क्सवादी इतिहासकारों से गहरा मतभेद रखते थे। वे मार्क्सवाद के मूल सिद्धान्तों को स्वीकार करते हुए भी धरती की संस्कृति से अलग होने को तैयार नहीं थे। जड़ से उखड़ने में उनका विश्वास न था। इसलिए वे परिवार के दायित्व के प्रति भी बड़े गंभीर थे। दांपत्य जीवन में वे एकनिष्ठ थे। मैंने देखा है कि आगरा में उनकी पत्नी अस्वस्थ रहती थी लेकिन उनकी सेवा की व्यवस्था किए बिना वे घर से बाहर नहीं निकलते थे। अत्यन्त धीर, स्वाध्यायपरायण व्यक्ति होते हुए भी बडे पुत्र के निधन का शोक संभालते हुए वे कहीं न कहीं भीतर से टूट गए थे। उसके बाद ही उनका स्वास्थ्य गिरने लगा था।(शर्मा जी के निधन पर लिखते हुए डॉ. विद्यानिवास मिश्र, “इंडिया टुडे, 14 जून 2000)
- डॉ. राम विलास शर्मा को मैं पत्थरों में राह बनानेवाली और पत्थरों को रत्न का रुप देनेवाली झर-झर करती विशाल नदी के रुप में स्मरण करता हूँ और उन्हें अपनी विनम्र श्रद्धांजलि देता हूँ। (शर्मा जी के निधन पर लिखते हुए डॉ. विद्यानिवास मिश्र, इंडिया टुडे 14 जून 2000)
- हिन्दी समाज, हिंदी भाषा और हिन्दी साहित्य के आधुनिक काल से संबंधित रामविलास शर्मा के संपूर्ण चिंतन और लेखन के केन्द्र में है उनकी हिंदी नवजागरण की अवधारणा चाहे 1857 का स्वाधीनता संग्राम हो या हिंदी जाति की धारणा, चाहे हिंदी में आधुनिकता के उदय का सवाल हो या हिंदी-उर्दू के संबंध का, चाहे देश में राजनीतिक चेतना के जागरण का प्रश्न हो या समाज सुधार का, इन सभी प्रश्नों पर विचार करते हुए वे हिंदी नवजागरण संबंधी मान्यताओं को ध्यान में रखते हैं। (डॉ मैनेजर पाण्डेय)
- प्रेमचन्द की एक और विशेषता की ओर डॉ.शर्मा ने ध्यान दिया है- वह है, हिन्दू-मुसलमान दोनों के जीवन पर समान अधिकार से लिख सकने की शक्ति। हिन्दी और उर्दू, हिन्दी और मुसलमान दोनों धर्मावलम्बियों के बीच ऐसा दूसरा कोई साहित्यकार नहीं हुआ जिसने साम्प्रदायिक एकता स्थापित करने के लिए साहित्य में ऐसे मार्मिक चित्र प्रस्तुत किए हैं। ( डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी )
- डॉ. रामविलास शर्मा ने प्रेमचन्द को कबीर, तुलसी और भारतेन्दु की परम्परा से जोड़ा है। ऐसा करके डॉ. शर्मा ने केवल प्रेमचन्द को ही स्थापित नहीं किया है, प्रगतिवादी आलोचना पद्धति को भी हमारी जातीय परम्पराओं से जोड़ा है। उन्होंने प्रेमचन्द द्वारा चित्रित भारतीय जीवन की व्याख्या करके, उसका परीक्षण-निरीक्षण करके प्रेमचंद का मूल्यांकन किया है और प्रगतिवादी कसौटी को विश्वसनीय बनाया है। (डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, डॉ. रामविलास शर्मा के बारे में)
- रामविलास जी की मृत्यु के बाद जो हिन्दी अखबार प्रकाशित हुए, उन सबों ने मुख्य पृष्ठ पर उनकी मृत्यु के समाचार को प्रमुखता से जगह दी।…बड़ी-बड़ी सुर्खियाँ लगाईं। ऐसा कि 11 सितंबर को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर जो हमला हुआ था, उसकी भी सुर्खियां ऐसी न थी। हिन्दी के किसी अन्य साहित्यकार को यह यह सम्मान प्राप्त नहीं है। …मुझे नहीं लगता कि पूरे हिन्दी साहित्य में भारतेन्दु की मृत्यु के बाद किसी और की मृत्यु के समाचार को इतनी प्रमुखता मिली होगी जितनी रामविलास जी की। -- वीर भारत तलवार