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मूल

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  • सुखस्य मूलं धर्मः, धर्मस्य मूलं अर्थः, अर्थस्य मूलं राज्यं, राज्यस्य मूलं इन्द्रियजयः। -- चाणक्य
सुख का मूल (जड़) धर्म है। धर्म का मूल अर्थ (धन-सम्पत्ति, रुपया-पैसा, सोना-चाँदी आदि) है। अर्थ का मूल राज्य है। राज्य का मूल इन्द्रियों पर विजय है।
  • सामर्थ्यमूलं स्वातन्त्र्यं श्रममूलं च वैभवम् ।
न्यायमूलं सुराज्यं स्यात् संघमूलं महाबलम् ॥ -- (??)
स्वतंत्रता का मूल सामर्थ्य (शक्ति) है, वैभव का मूल परिश्रम है, सुराज्य का मूल न्याय है और तथा महाशक्ति का मूल संगठन है।
  • वेदोऽखिलो धर्ममूलम् । -- वेद सारे धर्म का मूल है।
  • निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल। -- भारतेन्दु हरिश्चन्द
  • एकै साधे सब सधै, सब साधै सब जाय।
रहिमन मूलहिं सींचिबो, फूलै फलै अघाय॥
रहीम कहते हैं कि पहले एक काम पूरा करने की ओर ध्यान देना चाहिए। बहुत से काम एक साथ शुरू करने से कोई भी काम ढंग से नहीं हो पता, वे सब अधूरे से रह जाते हैं। एक ही काम एक बार में किया जाना ठीक है। जैसे किसी पेड़ की जड़ को अच्छी तरह सींचा जाए तो उसका तना, शाखाएँ, पत्ते, फल-फूल सब हरे-भरे रहते हैं।
  • हिन्दुत्व ही वह मिट्टी है जिसमें भारतवर्ष का मूल गड़ा हुआ है। यदि यह मिट्टी दृढ हटा ली गयी तो भारतवासी वृक्ष सूख जायेगा। -- एनी बेसेन्ट
  • संयम संस्कृति का मूल है।
  • सत्संगति आनन्द और कल्याण की मूल है। -- रामचरितमानस
  • लोभः पापस्य कारणम् (लोभ पाप का कारण है) -- संस्कृत सूक्ति
  • लोभ पाप का मूल है।
  • यह मानना कि सत्य केवल एक है और वह मेरे पास ही है, मुझे संसार की सभी बुराइयों की जड़ प्रतीत होती है। -- मैक्स बॉर्न, Natural Philosophy of Cause and Chance (1964), पृष्ठ 230, तथा My Life and Views (1968), पृष्ठ 183 पर भी।
  • दया धर्म का मूल है, पाप मूल अभिमान।
तुलसी दया न छोड़िए , जा घट तन में प्राण ॥ -- तुलसीदास
दया धर्म की जड़ है और अभिमान पाप की जड़। इसलिये जब तक शरीर में प्राण हो तब तक दया को मत छोड़िये।
  • आधुनिक सम्पत्ति-शास्त्र (अर्थशास्त्र) अनर्भ का मूल है। -- श्रीराम शर्मा आचार्य