प्रेमचन्द

विकिसूक्ति से
(मुन्शी प्रेमचन्द से पुनर्निर्देशित)
Jump to navigation Jump to search
प्रेमचन्द

धनपत राय (३१ जुलाई १८८० - ८ अक्टूबर १९३६) एक भारतीय लेखक थे, जिन्होंने हिन्दी और उर्दू साहित्य में अपना योगदान दिया था। उन्हें उनके उपनाम मुन्शी प्रेमचन्द या प्रेमचन्द के नाम से ही अधिक जाना जाता है।

उद्धरण[सम्पादन]

  • एक गर्वित व्यक्ति ही सर्वाधिक संशई होता है।
  • सुन्दरता को आभूषणों की आवश्यकता नहीं होती। मृदुता आभूषणों का भार वहन नहीं कर सकती।
  • कायरता के समान ही साहस भी संक्रामक होता है।
  • जीवन में सफल होने के लिए आपको शिक्षा की आवश्यकता होती है, साक्षरता और उपाधियों की नहीं।
  • सत्यता, प्रेम की पहली सीढ़ी है।
  • विश्वास, विश्वास को उत्पन्न करता है और अविश्वास, अविश्वास को। यह स्वाभाविक है।
  • सौभाग्य उन्हीं को प्राप्त होता है, जो अपने कर्तव्य पथ पर अविचल रहते हैं।
  • कर्तव्य कभी आग और पानी की परवाह नहीं करता, कर्तव्य-पालन में ही चित्त की शांति है।
  • नमस्कार करने वाला व्यक्ति विनम्रता को ग्रहण करता है और समाज में सभी के प्रेम का पात्र बन जाता है।
  • विपत्ति से बढ़कर अनुभव सिखाने वाला कोई विद्यालय आज तक नहीं खुला।
  • आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन गरूर है।
  • सफलता में दोषों को मिटाने की विलक्षण शक्ति है।
  • अन्याय में सहयोग देना, अन्याय करने के ही समान है।
  • आत्म सम्मान की रक्षा, हमारा सबसे पहला धर्म है।
  • जीवन का वास्तविक सुख, दूसरों को सुख देने में हैं, उनका सुख लूटने में नहीं।

कर्मभूमि उपन्यास[सम्पादन]

  • सुखदा -- “कायरों को इसके सिवा और सूझ ही क्या सकता है ? धन कमाना आसान नहीं है। व्यवसायियों को जितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, वह अगर संन्यासियों को झेलनी पड़े, तो सारा संन्यास भूल जाएं। किसी भले आदमी के द्वार पर जाकर पड़े रहने के लिए बल, बुद्धि, विद्या, साहस किसी की भी जरूरत नहीं। धनोपार्जन के लिए खून जलाना पड़ता है। सहज काम नहीं है। धन कहीं पड़ा नहीं है कि जो चाहे बटोर लाए।”

बाह्य सूत्र[सम्पादन]

w
विकिपीडिया पर संबंधित पृष्ठ :