ब्याज

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अर्थतंत्र के सन्दर्भ में, जब कोई व्यक्ति या संस्था किसी से कोई पूँजी उधार लेती है तो चुकाते समय उसे मूल पूँजी के साथ कुछ अतिरिक्त धन भी देना पड़ता है जिसे ब्याज (interest) कहते हैं। अर्थात ब्याज, दूसरे की पूँजी का स्वतंत्र उपयोग करने के बदले में दिया जाने वाला धन है।

सुवचन[सम्पादन]

  • जैसे ही ब्याज समाप्त किया जाएगा, मुद्रास्फीति अनावश्यक हो जायेगी।... -- Margrit Kennedy Interest and Inflation Free Money (1995); Chapter Two, Creating an Interest and Inflation Free Money, पृष्ठ 41
  • किसी भी देश को बिना ऋण नहीं रहना चाहिये। राष्त्रीय ऋण, राष्ट्रीय प्रतिभूति (बॉण्ड) है। और जब ऋण पर कोई ब्याज न हो, तब तो कोई दुख की बात ही नहीं। -- Thomas Paine, Common Sense (1776), पृष्ठ 3.