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जुआ

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  • अक्षैर्मा दीव्यः ॥ -- ऋग्वेद १०/३४/१३)
जुआ मत खेलो।
  • मृगयाक्षो दिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः ।
तौर्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः ॥ -- मनुस्मृति
मृगया (शिकार खेलना), अक्ष (चोपड़ खेलना, जूआ खेलना आदि), दिन में सोना, काम कथा वा दूसरे की निन्दा किया करना, स्त्रियों का अति संग, मादक द्रव्य (अफीम, भांग, गांजा आदि) का सेवन, गाना-बजाना, नाचना व नाच कराना सुनना और देखना (ये तीन बातें), इधर-उधर घूमते रहना -- ये दश कामोत्मन्न व्यसन हैं।
  • कामजन्य व्यसनों में मद्यपान, जुआ, स्त्री-सहवास व शिकार यथाक्रम अत्यन्त दुखदायी है। -- मनुस्मृति 7.50
  • एहि असार संसार में, चार वस्तु है सार।
जूआ मदिरा माँस अरु, नारी संग बिहार ॥ -- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति)

इन्हें भी देखें[सम्पादन]