जिद्दू कृष्णमूर्ति

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  • संसार विनाश की राह पर आ चुका है और इसका हल तथाकथित धार्मिक लोगों और राजनीतिज्ञों के पास नहीं है।
  • आपके भीतर कुछ भी नहीं होना चाहिए तब आप एक साफ और स्पष्ट आकाश देखने के लिए तैयार हो जाते हैं। आप धरती का हिस्सा नहीं, आप स्वयं आकाश हैं। यदि आप कुछ भी है तो फिर आप कुछ नहीं।
  • आपने जो कुछ भी परम्परा, देश और काल से जाना है उससे मुक्त होकर ही आप सच्चे अर्थों में मानव बन पाएंगे। जीवन का परिवर्तन सिर्फ इसी बोध में निहित है कि आप स्वतंत्र रूप से सोचते हैं कि नहीं और आप अपनी सोच पर ध्यान देते हैं कि नहीं।
  • अब से कृपा करके याद रखें कि मेरा कोई शिष्य नहीं हैं, क्योंकि गुरु तो सच को दबाते हैं। सच तो स्वयं तुम्हारे भीतर है। सच को ढूंढने के लिए मनुष्य को सभी बंधनों से स्वतंत्र होना आवश्यक है।
  • हम रूढ़ियों के दास हैं। भले ही हम खुद को आधुनिक समझ बैठें, मान लें कि बहुत स्वतंत्र हो गये हैं, परन्तु गहरे में देखें तो हैं हम रूढ़िवादी ही। इसमें कोई संशय नहीं है क्योंकि छवि-रचना के खेल को आपने स्वीकार किया है और परस्पर संबंधों को इन्हीं के आधार पर स्थापित करते हैं। यह बात उतनी ही पुरातन है जितनी कि ये पहाड़ियां। यह हमारी एक रीति बन गई है। हम इसे अपनाते हैं, इसी में जीते हैं, और इसी से एक दूसरे को यातनाएं देते हैं। तो क्या इस रीति को रोका जा सकता है ?
  • ध्यान का अर्थ है विचार का अन्त हो जाना और तभी एक भिन्न आयाम प्रकट होता है जो समय से परे है। ध्यानपूर्ण मन शांत होता है। यह मौन विचार की कल्पना और समझ से परे है। यह मौन किसी निस्तब्ध संध्या की नीरवता भी नहीं है। विचार जब अपने सारे अनुभवों, शब्दों और प्रतिमाओं सहित पूर्णत: विदा हो जाता है, तभी इस मौन का जन्म होता है। यह ध्यानपूर्ण मन ही धार्मिक मन है-धर्म, जिसे कोई मंदिर, गिरजाघर या भजन-कीर्तन छू भी नहीं पाता।
  • किसी चीज को सहज रूप से, जैसी वह है वैसी ही देखना, यह संसार में सर्वाधिक कठिन चीजों में से एक है क्योंकि हमारे दिल और दिमाग बहुत ही जटिल हैं और हमने सहजता का गुण खो दिया है।
  • धार्मिक मन प्रेम का विस्फोटक है। यह प्रेम किसी भी अलगाव को नहीं जानता। इसके लिए दूर निकट है। यह न एक है न अनेक, अपितु यह प्रेम की अवस्था है, जिसमें सारा विभाजन समाप्त हो चुका होता है। सौंदर्य की तरह उसे भी शब्दों के द्वारा नहीं मापा जा सकता। इस मौन से ही एक ध्यानपूर्ण मन का सारा क्रियाकलाप जन्म लेता है।
  • केवल स्वतंत्र मस्तिष्क जानता है कि प्रेम क्या है।
  • मानवीय बुद्धिमत्ता का सर्वोच्च स्वरूप है- तटस्थ होकर आत्मनिरिक्षण करना।
  • एकांत सुन्दर अनुभूति है। एकांत में होने का अर्थ अकेले होना नहीं है। इसका अर्थ है मस्तिष्क समाज द्वारा प्रभावित और प्रदूषित नहीं है।
  • जब आप किसी को पूरे ध्यान से सुन रहे होते हैं तो आप केवल शब्द नहीं सुन रह होते, आप उनके साथ व्यक्त की जा रही भावनाओं को महसूस कर रहे होते हैं, सम्पूर्ण भावनाओं को न कि उसके एक हिस्से के।
  • क्या आपने ध्यान दिया है कि प्रेम मौन है? ये किसी का हाथ हाथों में लेते वक्त होता है या किसी बच्चे को प्यार से निहारते समय होता है या किसी शाम की सुंदरता को महसूस करते समय होता है। प्रेम का कोई अतीत या भविष्य नहीं होता और इसीलिए यह असाधारण मौन की स्थिति है।
  • हम सब प्रसिद्ध होना चाहते हैं और जिस वक्त हम कुछ होने की चाहत पालते हैं उसी समय हम आजाद नहीं रह जाते।
  • धर्म इंसान के पत्थर बन चुके विचार हैं जिनसे लोग मंदिर बना लेते हैं।
  • जिस पल आप अपने हृदय में वो विलक्षण भाव महसूस करते हैं जिसे प्रेम कहते हैं, इसकी गहनता, इसके उल्लास, इसके परमानंद को महसूस करते हैं, आप पाते हैं कि आपके लिए दुनिया बदल चुकी है।
  • आदर सम्मान दुनिया की सबसे नकारा और बेकार चीज है। ये तमाम बुराइयों को छिपाता है। असली नैतिकता वहां होती है जहां प्रेम होता है। जहां प्यार हो, वहां कुछ भी करो। वो मोरली करेक्ट होगा।
  • अपने आसपास देखो। चिड़िया को देखो। क्या लगता है कि वो कभी मरने के बारे में कभी सोचती होगी? पेड़ से गिरती पीली पत्ती को देखो। क्या वो मरने से डरती है? नहीं डरती भाईसाब। वो जीने में व्यस्त होती है। चिड़िया अपना घोसला बनाने में, बच्चों को चुगाने में लगी रहती है। हमेशा उड़ती रहती है। उनको ये सोचने की फुरसत ही नहीं कि "आगे क्या होगा"।

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