हजारी प्रसाद द्विवेदी
दिखावट
(हजारीप्रसाद द्विवेदी से अनुप्रेषित)
हजारी प्रसाद द्विवेदी आधुनिक युग के हिन्दी के प्रमुख साहित्यकार थे। उन्होंने हिंदी समीक्षा को सैद्धान्तिक एवं व्यवहारिक दोनों दृष्टियों से काफी समृद्ध बनाया है। उन्होंने अपने मानवतावादी दर्शन से मनुष्य की महत्ता प्रतिपादित करते हुए साहित्य की व्याख्या की। नए लेखकों को भी इस ओर प्रेरित किया । इतिहास के उन तत्वों को खोज निकाला जिनमें मानवता के विकास के सूत्र मिलते हैं और भारतवर्ष के विकास की कहानी मिलती है। इस तरह आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का हिंदी समीक्षा के विकास में बहुत बड़ा एवं अतुलनीय योगदान है।
उक्तियाँ
[सम्पादित करें]- साहित्य वस्तुतः मनुष्य का वह उच्छलित आनन्द है जो उसके अंतर में अँटाये नहीं अट सका था। -- (ज्ञान शिखा में)
- साहित्य मानव-जीवन से सीधा उत्पन्न होकर सीधे मानव-जीवन को प्रभावित करता है। साहित्य में उन सारी बातों का जीवन्त विवरण होता है, जिसे मनुष्य ने देखा है, अनुभव किया है, सोचा है और समझा है। -- (साहित्य सहचर में)
- साहित्य यदि जनता के भीतर आत्मविश्वास और अधिकार चेतना की संजीवनी शक्ति नहीं संचारित करता , तो परिणाम बड़े भयंकर होंगे।
- जो साहित्य मनुष्य समाज को रोग, शोक, दारिद्रय, अज्ञान तथा परामुखापेक्षिता से बचाकर उसमें आत्मबल का संचार करता है, वह निश्चय ही अक्षय निधि है।
- जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परामुखापेक्षिता से न बचा सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता हैं।
- कविता मानवता की उच्चतम अनुभूति की अभिव्यक्ति हैं।
- समूचे भारतीय साहित्य में अपने ढंग का अकेला साहित्य है । इसी का नाम भक्ति साहित्य है । यह एक नई दुनिया है। -- (भक्तिसाहित्य के बारे में)
- निराला से बढकर स्वच्छंदतावादी कवि हिन्दी में नहीं है ।
- महान संकल्प ही महान फल का जनक होता है।
- कर्मफल का सिद्धान्त भारतवर्ष की अपनी विशेषता है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त खोजने पर अन्यान्य देशों के मनीषियों में भी पाया जाता है।
- आध्यात्मिक ऊँचाई तक समाज के बहुत थोड़े लोग ही पहुँच सकते हैं। बाकी लोग छोटे-मोटे दुनियावी टंटों में उलझे रह जाते हैं। वे आध्यात्मिक आदर्श को विकृत कर देते हैं।
- आम्रमंजरी मदन देवता का अमोघ बाण है।
- आसमान में निरन्तर मुक्का मारने में कम परिश्रम नहीं है।
- कमजोरों में भावुकता ज्यादा होती होगी।
- कभी कभी शिष्य परम्परा में ऐसे भी शिष्य निकल आते हैं, जो मूल सम्प्रदाय प्रवर्त्तक से भी अधिक प्रतिभाशाली होते हैं। फिर भी सम्प्रदाय स्थापना का अभिशाप यह है कि उसके भीतर रहने वाले का स्वाधीन चिन्तन कम हो जाता है।
- कहते हैं, दुनिया बड़ी भुलक्कड़ है! केवल उतना ही याद रखती है, जितने से उसका स्वार्थ सधता है। बाकी को फेंक कर आगे बढ़ जाती है।
- घृणा और द्वेष से जो बढ़ता है, वह शीघ्र ही पतन के गह्वर में गिर पड़ता है।
- जब तक तुम पुरुष और स्त्री का भेद नहीं भूल जाते, तब तक तुम अधूरे हो, अपूर्ण हो, अशक्त हो।
- जब तक हमारे सामने उद्देश्य स्पष्ट नहीं हो जाता, तब तक कोई भी कार्य, कितनी ही व्यापक शुभेच्छा के साथ क्यों न आरम्भ किया जाय, वह फलदायक नहीं होगा।
- जितना कुछ इस जीवन शक्ति को समर्थ बनाता है उतना उसका अंग बन जाता है, बाकी फेंक दिया जाता हैं।
- जिन स्त्रियों को चंचल और कुलभ्रष्टा माना जाता है, उनमें एक दैवी शक्ति भी होती है।
- डेमोक्रेट हँसना और मुस्कराना जानता है पर डिक्टेटर हँसने की बात सोचते भी नहीं।
- धर्म मनुष्य से त्याग की आशा रखता है।
- पंडिताई भी एक बोझ है। जितनी ही भारी होती है, उतनी ही तेजी से डुबोती है। जब वह जीवन का अंग बन जाती है, तो सहज हो जाती है तब वह बोझ नहीं रहती।
- प्रवृतियों को दबाना नहीं चाहिए, उनसे दबना भी नहीं चाहिए।
- पावक को कभी कलंक स्पर्श नहीं करता, दीपशिखा को अंधकार की कालिमा नहीं लगती, चंद्रमंडल को आकाश की नीलिमा कलंकित नहीं करती और जाह्नवी की वारिधारा को धरती का कलुष स्पर्श भी नहीं करता।
- पुरुष का सत्य और है, नारी का और।
- पुरुष निःसंग है, स्त्री आसक्त, पुरुष निर्द्वव्द्व है, स्त्री द्वन्द्वोन्मुखी, पुरुष मुक्त है, स्त्री बद्ध।
- पुरुष स्त्री को शक्ति समझकर ही पूर्ण हो सकता है, पर स्त्री स्त्री को शक्ति समझकर अधूरी रह जाती है।
- प्रेम बड़ी वस्तु है, त्याग बड़ी वस्तु है और मनुष्य मात्र को वास्तविक मनुष्य बनाने वाला ज्ञान भी बड़ी वस्तु है।
- ब्राह्मण न भिखारी होता है, न महासंधिविग्रहिक, वह धर्म का व्यवस्थापक होता है।
- मनुष्य के भीतर नाखून बढ़ा लेने की जो सहजात वृत्ति है, वह उसके पशुत्व का प्रमाण है। उनके काटने की जो प्रवृत्ति है वह उसकी मनुष्यता की निशानी है।
- मनुष्य में जो मनुष्यता है, जो उसे पशु से अलग कर देती है, वही आराध्य है। क्या साहित्य और क्या राजनीति, सबका एक मात्र लक्ष्य इसी मनुष्यता की सर्वांगीण उन्नति है।
- माया का जाल छुड़ाए छूटता नहीं, यह इतिहास की चिरोद्धोषित वार्ता सब देशों और सब कालों में समान भाव से सत्य रही है।
- माया से छूटने के लिए माया के प्रपंच रचे गए , यह सत्य है।
- मैं स्त्री शरीर को देव मंदिर के समान पवित्र मानता हूँ।
- यदि आप संसार की सारी समस्याओं का विश्लेषण करें तो इनके मूल में एक ही बात पाएँगे-मनुष्य की तृष्णा।
- यह नहीं समझना चाहिए कि प्रत्येक व्यक्ति जो अनुभव करता है, वह सत्य ही है। शरीर और मन की शुद्धि आवश्यक है।
- राजनीति भुजंग से भी अधिक कुटिल है, असिधारा से भी अधिक दुर्गम है, विद्युत शिखा से भी अधिक चंचल है।
- राजनैतिक पराधीनता बड़ी बुरी वस्तु है। वह मनुष्य को जीवन यात्रा में अग्रसर होने वाली वस्तुओं से वंचित कर देती है।
- विनोद का प्रभाव कुछ रासायनिक सा होता है। आप दुर्दान्त डाकू के दिल में विनोदप्रियता भर दीजिए, वह लोकतन्त्र का लीडर हो जाएगा, आप समाज सुधार के उत्साही कार्य कर्त्ता के हृदय में किसी प्रकार विनोद का इंजेक्शन दे दीजिए, वह अखबारनवीस हो जाएगा।
- शंकाशील हृदयों में प्रेम की वाणी भी शंका उत्पन्न करती है।
- शुद्ध है केवल मनुष्य की दुर्दम जिजीविषा। वह गंगा सी अबाधित-अनाहत धारा के समान सब कुछ को हजम करने के बाद भी पवित्र है।
- सारा संसार स्वार्थ का अखाड़ा ही तो है।
- सीधी रेखा खींचना सबसे टेढ़ा काम है।
- स्त्री प्रकृति है। उसकी सफलता पुरुष को बाँधने में है, किन्तु सार्थकता पुरुष की मुक्ति में है।
- स्नेह बड़ी दारुण वस्तु है, ममता बड़ी प्रचंड शक्ति है।
- स्यारों के स्पर्श से सिंह किशोरी कलुषित नहीं होती। असुरों के गृह में जाने से लक्ष्मी घर्षित नहीं होती। चींटियों के स्पर्श से कामधेनु अपमानित नहीं होती। चरित्रहीनों के बीच वास करने से सरस्वती कलंकित नहीं होती।
- स्वर्गीय वस्तुएँ धरती से मिले बिना मनोहर नहीं होती।
- हमारी राजनीति, हमारी अर्थनीति और हमारी नवनिर्माण की योजनाएँ तभी सर्वमंगल विधायिनी बन सकेंगी जब हमारा हृदय उदार और संवेदनशील होगा, बुद्धि सूक्ष्म और सारग्रहिणी होगी और संकल्प महान और शुभ होगा।
- सुविधाओं को पा लेना ही बड़ी बात नहीं है, प्राप्त सुविधाओं को मनुष्य मात्र के मंगल के लिए नियोजित कर सकना भी बहुत बड़ी बात है।
- सत्य सार्वदेशिक होता है।
- सूचनात्मक संप्रेषण उतना प्रभावशाली नहीं होता जितना रचनात्मक संप्रेषण।
- भाषा के संदर्भ में आचार्य द्विवेदी ज्ञान को दो-मुँहा पदार्थ मानते हैं। उनके अनुसार एक ओर वैयक्तिक तथ्य जगत है, जो व्यक्तिसापेक्ष होता है, दूसरी तरफ अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत है जो समाजसापेक्ष होता है। इन दोनों के संबंधों की प्रकृति पर विचार करते हुए उनका यह मत है कि वैयक्तिक तथ्य जगत निरंतर दूसरे लोगों के उपलब्ध तथ्य जगत से टकराते रहने के कारण अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत के रूप में परिवर्तित होता रहता है। यह संसार दूसरों की उपलब्धि और स्मृति से बनी तथ्यात्मक ज्ञान राशि से टकरा-टकरा कर बना हुआ पदार्थ है। --डॉ० रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव, आचार्य द्विवेदी का भाषा विषयक चिंतन, १९९१
- हमारी भाषा सामान्य वैयक्तिक तथ्यात्मक अनुभूतियों को एक व्यक्ति के चित्त से दूसरे के चित्त तक ढोने का साधन भी है; और दीर्घकाल से अनेक अंतर्वैयक्तिक तथ्य-जगतों के संघर्ष से विकसित होनेवाली और संचित होती रहनेवाली ज्ञान-राशि का वाहन भी।
- शब्द इस उद्देश्य से बनाए गए हैं कि व्यक्ति की भावना (अर्थ) दूसरे के चित्त में आसानी से उतार दी जा सके। रुपए का यह कागजी नोट हमारी उलझी हुई सामाजिक व्यवस्था को प्रतीक-रूप में उपस्थित करता है। अति परिचयवश उसके इस रूप की हम उपेक्षा करते हैं। जिस प्रकार बाजार में हमारे श्रम और उत्पादन के जटिल संबंधों को रुपए का नोट प्रतीक-रूप में सामने ला देता है, ठीक उसी प्रकार शब्द हमारी सामाजिक भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
- मैथिली मातृभाषियों की तरह मैं भी अपनी मातृबोली भोजपुरी को देश की सर्वाधिक शक्तिशाली भाषा सिद्ध कर सकता हूँ। इसके लिए, कई तरह के तर्क हो सकते हैं। जैसे इतिहास से गवाही ढूँढ कर कहा जा सकता है कि भारतवर्ष का ज्ञात इतिहास भोजपुरियों से प्रारंभ होता है। जिन सैनिकों के नाम मात्र से सम्राट सिकंदर काँप उठे थे, वे भोजपुरी थे। जिन भिक्षुओं ने पर्वत और समुद्र लाँघकर चीन से जापान तक भारतीय संस्कृति की पताका फहराई थी, वे अधिकांश भोजपुरी थे। चंद्रगुप्त और कुमारजीव भोजपुर की संतान थे और मध्ययुग का सबसे बड़ा प्राणवान पुरुष भोजपुरी था : मेरा मतलब कबीर से है, आदि।
- नाना कारणों से इस देश में और बाहर यह बार-बार विज्ञापित किया जाता है कि इस महादेश में सैकड़ों भाषाएँ प्रचलित हैं और इसीलिए इसमें अखंडता या एकता की कल्पना नहीं की जा सकती। किन्तु मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि हमारे इस देश ने हजारों वर्ष पहले से भाषा की समस्या हल कर ली थी। हिमालय से सेतुबंध तक सारे भारतवर्ष के धर्म, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा आदि विषयों की भाषा कुछ सौ वर्ष पहले तक एक ही (संस्कृत) रही है।
- कुछ शताब्दियों तक भारतवर्ष एक विचित्र अवस्था में से गुजरा। उसके न्याय, राजनीति और व्यवहार की भाषा फारसी रही है, हृदय की भाषा तत्तत् प्रदेशों की प्रांतीय भाषाएँ रही हैं और मस्तिष्क की भाषा संस्कृत रही है।
- मैंने जैन-प्रबंधों की प्राकृतगन्धी संस्कृत देखी है और मैं साहसपूर्वक कह सकता हूँ कि संस्कृत को इतना सरल और प्रांजल बनाना एकदम नवीन और स्फूर्तिदायक प्रयास था। जैन मुनियों ने इसमें प्रांजलता ले आने में कमाल का काम किया है।
- सीधी लकीर खींचना टेढ़ा काम है। सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। जब तक आदमी सहज नहीं होता तब तक भाषा का सहज होना असंभव है।
- मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुःखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।
- इस युग का मुख्य उद्देश्य मनुष्य है। इस युग का सबसे बड़ा अभिशाप यह है कि विज्ञान की सहायता से जहाँ बाह्य भौगोलिक बंधन तड़ातड़ टूट गए हैं वहाँ मानसिक संकीर्णता दूर नहीं हुई है। हम एक-दूसरे को पहचानते नहीं। तीन दिन में सारे संसार की यात्रा करके लौटे हुए यात्रा-विलासी लोगों और नाना प्रकार के स्वार्थपरायणों की पुस्तकों ने संसार में घोर गलतफहमी फैला रखी है। इस देश में ही हम एक प्रदेश वाले दूसरे प्रदेश के लोगों को समझ नहीं रहे, एक संप्रदाय के लोग दूसरे संप्रदाय के लोगों को पहचान नहीं रहे। इसीलिए इतनी मारामारी काटाकाटी चल रही है।
हिन्दी के बारे में
[सम्पादित करें]- हिन्दी साधारण जनता की भाषा है। जनता के लिए ही उसका जन्म हुआ था और जब तक वह अपने को जनता के काम की चीज बनाए रहेगी, जन-चित्त में आत्मबल का संचार करती रहेगी, तब तक उसे किसी से डर नहीं है। वह अपने आपकी भीतरी अपराजेय शक्ति के बल पर बड़ी हुई है, लोक-सेवा के महान् व्रत के कारण बड़ी हुई है और यदि अपनी मूल-शक्ति के स्रोत को भूल नहीं गई तो निस्संदेह अधिकाधिक शक्तिशाली होती जाएगी।[१]
- उसका (हिन्दी का) कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। वह विरोधों और संघर्षों के बीच ही पली है। उसे जन्म के समय ही मार डालने की कोशिश की गई थी, पर वह मरी नहीं क्योंकि उसकी जीवन-शक्ति का अक्षय स्रोत जनचित्त है। वह किसी राजशक्ति की उँगली पकड़कर यात्रा तय करने वाली भाषा नहीं है, अपने-आपकी भीतरी शक्ति से महत्वपूर्ण आसन पर अधिकार करने वाली अद्वितीय भाषा है।
- हमें ठीक-ठीक समझना चाहिए कि हिंदी की शक्ति कहाँ है। हिंदी इसलिए बड़ी नहीं है कि हममें से कुछ लोग इस भाषा में कहानी या कविता लिख लेते हैं या सभा-मंचों पर बोल लेते हैं। नहीं, वह इसलिए बड़ी है क्योंकि कोटि-कोटि जनता के हृदय और मस्तिष्क की भूख मिटाने में यह भाषा इस देश में सबसे बड़ा साधन हो सकती है।
- यदि देश में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को हमें जन-साधारण तक पहुँचाना है तो इसी भाषा का सहारा लेकर हम यह काम कर सकते हैं। वास्तव में हिंदी इन्हीं संभावनाओं के कारण बड़ी है अन्यथा यदि वह यह कार्य नहीं कर सकती तो 'हिंदी-हिंदी' चिल्लाना व्यर्थ है।
- सिर्फ यही बात नहीं है कि इस देश में देशी भाषाओं में सदा काव्य लिखे जाते रहे, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि उनका भरपूर सम्मान भी बराबर होता रहा। अभिप्राय यह कि संस्कृत का कभी किसी भारतीय भाषा के साथ झगड़ा नहीं रहा। इसी प्रकार अब जब कि संस्कृत की भूमिका में हिंदी को अपनाया गया है तो उसका भी किसी भारतीय भाषा से द्वेष संभव नहीं है।
- हमें एक ऐसी भाषा चुन लेनी है जो हमारी हजारों वर्ष की परंपराओं से कम-से-कम विच्छिन्न हो और हमारी नूतन परिस्थिति का सामना अधिक-से-अधिक मुस्तैदी से कर सकती हो, संस्कृत न होकर भी संस्कृत-सी हो और साथ ही जो प्रत्येक नए विचार को, प्रत्येक नयी भावना को अपना लेने में एकदम हिचकिचाती न हो, जो प्राचीन परंपरा की उत्तराधिकारिणी भी हो और नवीन चिंता की वाहिका भी।
- वस्तुतः हिंदी और अन्यान्य भारतीय भाषाओं में चौदह आना साम्य ही है, दो आना ही हमें नए सिरे से गढ़ना है।
- हिंदी केंद्रीय भाषा है। बड़े परिश्रम से और बड़ी कठिनाइयों के भीतर से इसके उपासकों ने इसे सार्वदेशिक भाषा का रूप दिया है।
- हिंदी को किसी केंद्रीय राजशक्ति की अंगुली पकड़ाकर आगे नहीं बढ़ाया गया है। विरोधों, आघात-प्रतिघातों के भीतर से ही इसकी शानदार सवारी निकली है।
- वे सब बोलियाँ, जिनका मुख केंद्राभिमुख है, अर्थात् जिनके बोलनेवालों की नाड़ियों में मूल केंद्रीय भाषा से संबद्ध बने रहने के संस्कार दृढ़ निबद्ध हैं - हिंदी हैं। जो बोलियाँ केंद्राभिमुख न होकर अपने आप में ही केंद्रित हो जाती हैं, और तुलसी और सूर को अपना कवि नहीं मानना चाहतीं, वे टूटकर अलग हो जाती हैं।
- हिंदी मात्र व्याकरण नहीं और न ही वह केवल खड़ीबोली के रूप में एक विशिष्ट भाषिक संरचना है। भाषा के रूप में वह एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में भाषाई प्रतीक भी है, और साहित्य के रूप में वह एक जातीय परंपरा भी है।
- हिंदी भारत के केंद्रीय प्रदेशों की भाषा है, कई करोड़ आदमियों की ज्ञानपिपासा उसे शांत करनी है जिसके लिए उसे संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान के विकास का वाहन बनाना आवश्यक है।
- जिस हिंदी को आजकल हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं, वह उर्दू के पर से बनाई गई है तथा हिंदी, मुसलमानी भाषा है क्योंकि शुरू-शुरू में खड़ी बोली मुसलमानों की भाषा मानी जाती थी। उन्होंने उदारतापूर्वक इस तथ्य को रेखांकित किया है कि “पुराने हिंदी कवियों ने जब मुसलमान पात्रों से कोई कविनिषिद्ध प्रौढ़ोक्ति कहलाई है तो खड़ीबोली में बुलवाया है। जिस भाषा को हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं उसकी प्रथम भित्ति-प्रतिष्ठा मुसलमान भाइयों के हाथों हुई है।” वे बलपूर्वक कहते हैं कि यह नहीं कि वह भाषा ही कोई नई बनाई गई है बल्कि यह कि इसे साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का वाहन मुसलमानों ने बनाया।
- उर्दू अभी तक आत्मकेन्द्रित भाषा बनी रही है क्योंकि केंद्राभिमुख-भाषा होने में वह हिंदी के समान है, न कि उसकी जनपदीय बोलियों के। इसीलिए वह सूर, तुलसी, कबीर की परंपरा को अपनी परंपरा नहीं मानती और अन्य संतों और भक्तों के सात्विक साहित्य को अपना साहित्य मानने में कुंठा अनुभव करती रही। साथ ही उसने इस देश की पुरानी परंपरा से, अपभ्रंश, प्राकृत और संस्कृत के साहित्य से, घनिष्ठ और अविच्छेद्य संबंध स्थापित करने का प्रयत्न कभी नहीं किया।
संस्कृति और सभ्यता के बारे में
[सम्पादित करें]- मनुष्य की श्रेष्ठ साधनाएँ ही संस्कृति हैं।
- मानव जीवन की तीन स्थितियाँ मानी गई हैं- विकृति, प्रवृति और संस्कृति। विकृति अधोगामिनी स्थिति है तो संस्कृति ऊर्ध्वगामिनी।
- संस्कृति मनुष्य की विविध साधनाओं की चरम परिणति है। धर्म के समान वह भी अविरोधी वस्तु है। वह समस्त दृश्यमान विरोधों में सामंजस्य उत्पन्न करती है।
- भारतीय जनता की विविध साधनाओं की सबसे सुन्दर परिणति को ही भारतीय संस्कृति कहा जा सकता हैं।
- मनुष्य की जीवनी शक्ति बड़ी निर्मम है, वह सभ्यता और संस्कृति के वृथा मोहों को रौंदती चली आ रही है।
- सभ्यता की दृष्टि वर्तमान की सुविधा-असुविधा पर रहती है, संस्कृति की भविष्य या अतीत के आदर्श पर।
- सभ्यता बाह्य होने के कारण चंचल है, संस्कृति आंतरिक होने के कारण स्थायी।
- सभ्यता समाज की बाह्य व्यवस्थाओं का नाम है, संस्कृति व्यक्ति के अंतर के विकास का।
- नाना प्रकार की धार्मिक साधनाओं, कलात्मक प्रयत्नों और सेवा भक्ति तथा योग मूलक अनूभूतियों के भीतर से मनुष्य उस महान सत्य के व्यापक रूप को क्रमशः प्राप्त करता जा रहा है जिसे हम 'संस्कृति' शब्द द्वारा व्यक्त करते हैं।
कबीर के बारे में
[सम्पादित करें]- संयोग से वे ऐसे युग–संधि के समय उत्पन्न हुए थे, जिसे हम विविध धर्म–साधनाओं और मनोभावनाओं का चौराहा कह सकते हैं।
- वे मुसलमान होकर भी असल में मुसलमान नहीं थे। वे हिंदू होकर भी हिंदू नहीं थे। वे साधु होकर भी साधु (अगृहस्थ) नहीं थे।वे वैष्णव होकर भी वैष्णव नहीं थे। वे योगी होकर भी योगी नहीं थे। वे कुछ भगवान की ओर से ही सबसे न्यारे बनाकर भेजे गए थे। वे भगवान के नृसिंहावतार की मानो प्रतिमूर्ति थे।
- उन्हें सौभाग्यवश सुयोग भी अच्छा मिला था। जितने प्रकार के संस्कार पड़ने के रास्ते हैं, वे प्रायः सभी उनके लिए बन्द थे।
- हिंदी साहित्य के हजारों वर्षों के इतिहास में कबीर जैसा व्यक्तित्व लेकर कोई लेकर उत्पन्न नहीं हुआ।
- पन्द्रहवीं शताब्दी में कबीर सबसे शक्तिशाली और प्रभावोत्पादक व्यक्ति थे।
- कबीर अपने युग के सबसे बड़े क्रांतदर्शी थे।
- भाषा पर कबीर का जबरदस्त अधिकार था। वे वाणी के डिक्टेटर थे।
- कबीर में एक प्रकार घर फूंक मस्ती और पक्कड़ाना लापरवाही के भाव मिलते हैं। उनमें अपने–आपके ऊपर अखंड विश्वास था । उन्होंने कभी भी अपने ज्ञान को, अपने गुरू को, अपनी साधना को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा।
- कबीर ने ऐसी बहुत बातें कही है जिनसे समाज सुधार में सहायता मिलती है। पर, इसलिए उनको समाज सुधारक समझना गलती है।
- कबीर जब पंडित या शेख पर आक्रमण करने को उद्यत होते है तो उतने सावधान नहीं होते जितने अवधूत या योगी पर आक्रमण करते समय दिखते हैं।
- हमने देखा है कि वाह्याचार पर आक्रमण करने वाले संतों और योगियों की कमी नहीं है, पर इस कदर सहज और सरल सरल ढंग से चकनाचूर करने वाली भाषा कबीर के पहले बहुत कम दिखाई दी है।
- व्यंग्य वह है, जहां कहने वाला अधरोष्ठों में हँस रहा हो और सुननेवाला तिलमिला उठा हो और भी कहने वाले को जवाब देना अपने की ओर भी उपहासस्पद् बना लेना हो , कबीर ऐसे ही व्यंग्यकर्त्ता थे।
- ऐसे थे कबीर। सिर से पैर तक मस्त–मौला, स्वभाव में फक्कड़, आदत से अक्खड़, भक्त के सामने निरीह, भेषधारी के आगे प्रचण्ड, दिल के साफ, दिमाग के दुरुस्त, भीतर से कोमल, बाहर से कठोर, जन्म से अस्पृश्य, कर्म से वंदनीय। वे जो कुछ कहते थे अनुभव के आधार पर कहते थे इसलिए उनकी उक्तियॉ बंधने वाली और व्यंग्य चोट करने वाले होते थे।
सूरदास के बारे में
[सम्पादित करें]- वात्सल्य भाव के काव्य के लिए सूरदास की बड़ी ख्याति है।
- सूरदास ने यदि राधिका के प्रेम को लेकर गीतिकाव्य की रचना न करके प्रबंध काव्य की रचना की होती तो आज असफल हुए होते हैं।
- गीतिकाव्यात्मक मनोरागों पर आधारित विशाल महाकाव्य ही सूरसागर है।
- प्रेम के इस स्वच्छ और मार्जित रूप का चित्रण भारतीय साहित्य में किसी और कवि ने नहीं किया।
- सूरदास जब अपने प्रिय विषय का वर्णन शुरू करते हैं तो मानो अलंकार शास्त्र हाथ जोड़कर उनके पीछे–पीछे दौड़ा करता है। उपमाओं की बाढ़ आ जाती है, रूपको की वर्षा होने लगती है। संगीत के प्रवाह में कवि स्वयं बह जाता है।वह अपने को भूल जाता है।
नन्ददास के बारे में
[सम्पादित करें]- सूरदास की गोपियों में जिस प्रकार का अशिक्षित पटुत्व और सारल्यगर्भ माधुर्य पाया जाता है, वैसा नंददास की गोपियों में नहीं पाया जाता। भ्रमरगीत में उद्धव के तर्कों को सुनकर वे शिथिलवाक् होकर परास्त नहीं हो जाती बल्कि आगे बढ़कर उत्तर देती है और तर्क को तर्क से काटने का प्रयत्न करती है।
- निर्गुण भाव के प्रत्याख्यान सूरदास ने भी कराया है और नन्ददास ने भी, पर सूरदास का एकमात्र अस्त्र प्रेमातिरेक है जबकि नन्ददास का सबसे अस्त्र है युक्ति और तर्क, फिर भी नन्ददास की रचनाओं में अपना मोहक सौंदर्य है।
मीरा के बारे में
[सम्पादित करें]- माधुर्य भाव में अन्यान्य भक्त कवियों की भाँति मीरा का प्रेम निवेदन है और विरह व्याकुलता अभिमानाश्रित और अध्यंतरित नही है बल्कि सहज और साक्षात् संबंधित है।
- वह सहृदय को स्पंदित और चालित करती है और अपने रग में रंग डालती है।
रहीम के बारे में
[सम्पादित करें]- निस्संदेह इस कवि का हृदय मानवीय रस से परिपूर्ण और अनासक्त तथा अनाविल सौंदर्य दृष्टि से समृद्ध था।
- जीवन के अनेक घात प्रतिघात के भीतर से भी राजकीय षड्यंत्रों के चपेट में बार-बार आते रहने के बाद भी और हर प्रकार के उतार-चढ़ाव में उठते – गिरते रहने के बाद भी जिस कवि के हृदय का मानवीय रस निःशेष नही हुआ उसके हृदय की अद्भुत सरसता का अनुमान सहज किया जा सकता है।
तुलसीदास के बारे में
[सम्पादित करें]- तुलसीदास असाधारण शक्तिशाली कवि,लोकनायक और महात्मा थे।
- वे समन्वय की विशाल बुद्धि लेकर उत्पन्न हुए थे।
- भारतवर्ष का लोकनायक वही हो सकता है, जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो।
- तुलसी के काव्य की सफलता का एक और रहस्य उनकी अपूर्व समन्वय शक्ति में है।
- लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय कर सके।
अन्य कवियों के बारे में
[सम्पादित करें]- भगवान ने उन्हें रूप देने की बड़ी कंजूसी की थी किंतु शुद्ध निर्मल प्रेमपरायण हृदय देने में बड़ी उदारता से कम लिया था। (जायसी के बारे में )
- जायसी को रहस्यवादी कवि कहा जाता है।
- जिन भजनों में मधुर भाव बोलता दिखता हो उनके लेखक को रहस्र सुख के अधिकारी कहना ही उचित है। (सूरदास के संबंध में )
- कबीर के पूर्ववर्ती सिद्ध और योगी लोगों की आक्रमणात्मक उक्तियों में एक प्रकार की ‘हीन भावना की ग्रंथि’ या ‘इनफीरियारिटी कम्पलेक्स’ पाया जाता है। वे मानो लोमड़ी के खट्टे अंगूर की प्रतिध्वनि है, मानो चिलम न पा सकने वालों का आक्रोश है । उनमें तर्क है पर लापरवाही नहीं है, आक्रोश है पर मस्ती नहीं है, तीव्रता है पर मृदुता नहीं।