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ऋतु

विकिसूक्ति से

ऋतु या मौसम।

उक्तियाँ

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  • अन्नं जगतः प्राणः प्रावृट्कालस्य चान्त्रमायत्तम् ।
यस्मादतः परीक्ष्यः प्रावृट्कालः प्रयत्नेन ॥ -- बृहत्संहिता, २१.०१
जगत् के समस्त प्राणियों को ऊर्जा एवं जीवन देने वाला तत्व अन्न है, वृष्टिकाल ही अनोत्पादन का मूल स्रोत है। अतः प्रयत्नपूर्वक प्रावृट् काल को ज्ञात करना चाहिये ।
  • दैवविदविहितचित्तो द्युनिशं यो गर्भलक्षणे भवति ।
तस्य मुनेरिव वाणी न भवति मिथ्याम्बुनिर्देशे ॥ -- बृहद्संहिता २१.०३
दैव को जाननेवाला जो पुरुष रात-दिन गर्भलक्षण में चित्त को लगाये रहता है, मुनियों के समान उनकी वाणी मेघ-गणित में कभी मिथ्या नहीं होती।
  • किं वातः परमन्यछास्त्रं ज्यायोऽस्ति यद्विदित्वैव ।
प्रध्वंसिन्यपि काले त्रिकालदर्शी कलौ भवति ॥ -- बृहद्संहिता २१.०४
इससे कौन सा श्रेष्ठ शास्त्र है; कि जिस श्रेष्ठ शास्त्र को जानकर विध्वंसी कलिकाल में भी लोग त्रिकालदर्शी होते हैं ।

इन्हें भी देखें

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