ऋतु
दिखावट
ऋतु या मौसम।
उक्तियाँ
[सम्पादित करें]- अन्नं जगतः प्राणः प्रावृट्कालस्य चान्त्रमायत्तम् ।
- यस्मादतः परीक्ष्यः प्रावृट्कालः प्रयत्नेन ॥ -- बृहत्संहिता, २१.०१
- जगत् के समस्त प्राणियों को ऊर्जा एवं जीवन देने वाला तत्व अन्न है, वृष्टिकाल ही अनोत्पादन का मूल स्रोत है। अतः प्रयत्नपूर्वक प्रावृट् काल को ज्ञात करना चाहिये ।
- दैवविदविहितचित्तो द्युनिशं यो गर्भलक्षणे भवति ।
- तस्य मुनेरिव वाणी न भवति मिथ्याम्बुनिर्देशे ॥ -- बृहद्संहिता २१.०३
- दैव को जाननेवाला जो पुरुष रात-दिन गर्भलक्षण में चित्त को लगाये रहता है, मुनियों के समान उनकी वाणी मेघ-गणित में कभी मिथ्या नहीं होती।
- किं वातः परमन्यछास्त्रं ज्यायोऽस्ति यद्विदित्वैव ।
- प्रध्वंसिन्यपि काले त्रिकालदर्शी कलौ भवति ॥ -- बृहद्संहिता २१.०४
- इससे कौन सा श्रेष्ठ शास्त्र है; कि जिस श्रेष्ठ शास्त्र को जानकर विध्वंसी कलिकाल में भी लोग त्रिकालदर्शी होते हैं ।