महर्षि दयानन्द सरस्वती के वचन
महर्षी दयानन्द की विशेषताएँ कपिल, कणाद एवं गौतम जैसा पाण्डित्य, हनुमान और भीष्म जैसा चमकता हुआ ब्रह्मचर्य , गौतम बुद्ध तथा महावीर जैसा त्याग और वैराग्य, श्रीरामचन्द्र जैसी मर्यादा, श्रीक्रिष्ण जैसी नीतिमत्ता, पातंजलि व व्यास जैसी आध्यात्मिक्त्ता आदि गुणो से विभूषित नाम महर्षि दयानन्द है।
2. ऋषिवर! सत्य सनातन वैदिक धर्म के पुनरुद्धारक, प्रचारक तथा प्रसारक थे. वे सत्य के शोधक, सत्यवक्त्ता, सत्य प्रचारक एवं सत्य हेतु शहीद हुए ।
3. उस महामानव का व्यक्त्तित्व और क्रितित्व चुम्बकीय था । जो भी सम्पर्क में आया प्रभावित हुआ। उनमें अद्भुत चरित्र बल था ।
4. उस पुण्यात्मा ने अपने लिए न कुछ चाहा, न माँगा और न ही संग्रह किया। संपूर्ण जीवन मानवता के लिए समर्पित किया। वे प्रभु इच्छा के लिए जिये।
5. उनका कहना था- मेरा उद्येश्य कोई नया पंथ मजहब या सम्प्रदाय चलाने का नहीं है। मैं तो ब्रह्मा से लेकर जैमिनी ऋषि पर्यन्त जो सत्य सनातन वैदिक है उसी को प्रकाशित व प्रसारित करना चाहता हूँ ।
6 वेदों की और लौटो । वेदों की मानो । सम्प्र्दाय को छोड़ो । धर्म को समझो और उसका पालन करो । ऋषिवर ने वेदों का उद्धार किया । वोदों को ईश्वरीय ग्यान के पद पर प्रतिष्टित कराया और वेदों का यथार्थ स्वरूप जनता के सामने रखा ।
7. ऋषि दयानन्द ने जीवन और जगत में व्याप्त अग्यान, अन्धविश्वास,गुरुडम , ढोंग, मूर्तिपूजा, अवतार आदि का तर्क, प्रमाण विग्यान और युक्ति के आधार पर विरोध किया । उन्होंने वेद विरुद्ध और् असत्य बातों से कभी समझौता नहीं किया ।
8 . इतिहास में ऋषि दयानन्द की अपनी पहचान है । संसार के मह्ह्पुरुषों को तराजू के एक पलड़े पर रखा जाए और् ऋषि को दूसरे पर तो निश्चय ही ऋषि का पलड़ा भारी होगा । क्योंकि उनके जीवन में आद्यन्त किसी प्रकार का दोष, दुर्बलता व न्यूनता नहीं थी ।
'पूर्णपुरुष का विचित्र जीवन चरित्र' से उद्धरित
भक्त कबीर और ऋषि दयानन्द दोनो ही अजर अमर निराकार परमात्मा के पुजारी थे और अवतार वाद का खण्डन करके उसी एक ईश्वर की पूजा का प्रचार करते थे, जहां महर्षि जी ने वेद मन्त्रों से परमेश्वर को अजर , अमर, निराकार सिद्ध किया, और सारे देश में वेदों के आधार पर इसका प्रचार किया| और इसके संबन्ध में बड़े बड़े पण्डितों से शास्त्रार्थ करके अपने इस सिद्धान्त को स्थापित किया| वहां भक्त कबीर का निम्नलिखित दोहा भी इस सिद्धान्त का समर्थन करता है|
कबीरा सब मुर्दन के ग्राम| जो कोई आया रह न पाया किस किस का लीजे नाम| सूर्य मरेगा, चन्द्र मरेगा, मरेगा धरत आकासा| तेतींस करोड़ देवता मरेंगे, जिनकी झूठी आसा| राजा मरेंगे, रंक मरेंगे, मरेंगे वैद्य और रोगी| योगी मरेंगे जंगम मरेंगे, मरेंगे विरक्त और भोगी| नौ मरेंगे,ग्यारह मरेंगे, मरेंगे सिद्ध चौरासी| कहत कबीर हम उसको पूजें,जिसको काल न खासी|
फिर कहा कंकर पत्थर जोड़ के मस्जिद लई बनाए, इस पर मुलां बांग दे बहरा हुआ खुदाय|
और
ईश्वर के जिस स्वरूप की पूजा महर्षि खुद करते थे, और जिस स्वरूप की पूजा का जनता को उपदेश करते थे, उसका आर्यसमाज के दूसरे नियम में वर्णन है|
ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप, निराकार, सर्व शक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, अन्तर्यामी, अजर, अमर. अभय, नित्य पवित्र और सृष्टी कर्त्ता है| उसी की उपासना करनी योग्य है||
ऋषि ने बजाई भेरी, जाग उठा भारत ऋषि ने बजाई बीन, नाच उठा भारत ऋषि ने दिखाई राह, दौड़ रहा भारत ऋषि ने हुकाँरा तो, हुकाँर उठा भारत
ऋषि ने जगाई ज्योती, जगमग जहान किया वेदोँ की वाणी बोल,विस्मित जहान किया प्रभु असली से सबको, मिला गया ऋषिवर नकली प्रभु से छुट्टी, दिला गया ऋषिवर
सत्य का प्रकाश किया, दूर अन्धकार किया अविद्या का नाश कर, वेद का प्रकाष किया जात पात ढोँग और ढकोसले को दूर किया अन्ध विश्वास के, गढ़ पर प्रहार किया
आत्मघात आत्महीनता को जड़ से दूर किया आत्म विश्वास, प्रबल शक्ति मन्त्र फूँक दिया निर्जीव पड़े भारत को, शक्ति से पूर्ण किया सोते और लुटते भारतवासी को बेदार किया
बीज परिपक्व ऐसे बो गया ऋषिवर बञ्जर और बेजान धरती सीँच गया ऋषिवर आज जिसमेँ नए नए बाग और बगीचे हैँ महकते हुए फूल फल,लहलहाते व्रिक्ष हैँ
लताएँ वनौषध, जलप्रपात भी भरपूर हैँ
लहलहाते बागो मेँ, फूलोँ की सुबास है सत्य का उजाला प्रभु प्रेम की मिठास है
आओ इसे सीँचे सब खून पसीने से सत्य से परमार्थ से, प्रभु प्रेम व पुरुषार्थ से
सारे ही विश्व मेँ जिसकी न मिसाल हो अमरित हो, प्यार हो,ग्यान हो प्रकाश हो प्राणी मात्र के परम सुख का आधार हो आओ इसे सीँचें हम,आओ इसे सीँचें हम