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या ओ३म् एक पवित्र आध्यात्मिक प्रतीक है। यह एक रहस्यमय ध्वनि है जो सनातन धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म आदि में प्रयुक्त होती है। यह परम सत्ता, चेतना या आत्म को अभिव्यक्त करता है। ब्रह्मप्राप्ति के लिए निर्दिष्ट विभिन्न साधनों में प्रणवोपासना मुख्य है।

सनातन ग्रन्थों में ओ३म की बहुत महिमा कही गई है। मारकण्डेय पुराण में , योग ऋषि दत्तात्र्य जी ने बताया है कि मानव को ओम रूपी धनुष पर अपनी आत्मा रूपी बाण को अपने लक्ष्य, उस एक ईश्वर की ओर साध देना चाहिए।

उक्तियाँ

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  • प्रकर्षेणनूयते स्तूयते अनेन इति, नौति स्तौति इति वा प्रणवः।
वह ध्वनि या शब्द जिसके द्वारा परमात्मा की विशेष रूप से स्तुति की जाती है, या जो स्वयं परमात्मा की स्तुति करती है, उसे 'प्रणव' (ॐ) कहते हैं।
  • ओमिति ब्रह्म । ओमितीदँसर्वम् । ओमित्येतदनुकृतिर्हस्म वा अप्यो श्रावयेत्याश्रावयन्ति । ओमिति सामानि गायन्ति ।
ओँशोमिति शस्त्राणि शँसन्ति । ओमित्यध्वर्युः प्रतिगरं प्रतिगृणाति । ओमिति ब्रह्मा प्रसौति । ओमित्यग्निहोत्रमनुजानाति ।
ओमिति ब्राह्मणः प्रवक्ष्यन्नाह ब्रह्मोपाप्नवानीति ब्रह्मैवोपाप्नोति ॥ १ ॥ -- तैत्तिरीयोपनिषद, शिक्षावल्ली, अष्टमोऽनुवाकः
अर्थात् ॐ ही ब्रह्म है। ॐ ही यह प्रत्यक्ष जगत् है। ॐ ही इसकी (जगत की) अनुकृति है। हे आचार्य! ॐ के विषय में और भी सुनाएँ। आचार्य सुनाते हैं। ॐ से प्रारम्भ करके साम गायक सामगान करते हैं। ॐ-ॐ कहते हुए ही शस्त्र रूप मन्त्र पढ़े जाते हैं। ॐ से ही अध्वर्यु प्रतिगर मन्त्रों का उच्चारण करता है। ॐ कहकर ही अग्निहोत्र प्रारम्भ किया जाता है। अध्ययन के समय ब्राह्मण ॐ कहकर ही ब्रह्म को प्राप्त करने की बात करता है। ॐ के द्वारा ही वह ब्रह्म को प्राप्त करता है।
  • सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपाँसि सर्वाणि च यद्वदन्ति ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदँ संग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥ १५ ॥ --(कठोपनिषद, अध्याय १, वल्ली २),
अर्थातः- सारे वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, समस्त तपों को जिसकी प्राप्ति के साधक कहते हैं, जिसकी इक्षा से (मुमुक्षुजन) ब्रह्मचर्य का पालन करते है, उस पद को मैं तुमसे संक्षेप में कहता हूँ। ॐ यही वह पद है।
  • ऋग्भिरेतं यजुर्भिरन्तरिक्षं सामभिर्यत्तत्कवयो वेदयन्ते।
तमोंकारेणैवायतनेनान्वेति विद्वान् यत्तच्छान्तमजरममृतमभयं परं चेति॥ ७॥ -- ( प्रश्नोपनिषद प्रश्न ५, श्लोक ७),
अर्थातः- साधक ऋग्वेद द्वारा इस लोक को, यजुर्वेद द्वारा आन्तरिक्ष को और सामवेद द्वारा उस लोक को प्राप्त होता है जिसे विद्वजन जानते हैं। तथा उस ओंंकाररूप आलम्बन के द्वारा ही विद्वान् उस लोक को प्राप्त होता है जो शान्त, अजर, अमर, अभय एवं सबसे पर (श्रेष्ठ) है।
  • प्रणवो धनुः शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते।
अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत्॥ -- ( मुण्डकोपनिषद्, मुण्डक २, खण्ड २, श्लोक-४)
अर्थात प्रणव धनुष है, (सोपाधिक) आत्मा बाण है और ब्रह्म उसका लक्ष्य कहा जाता है। उसका सावधानी पूर्वक बेधन करना चाहिए और बाण के समान तन्मय हो जाना चाहिए।। ४।।
ओमित्येतदक्षरमिदंसर्व तस्योपव्याख्यानं भूत,
भवभ्दविष्यदिति सर्वमोंंकार एव।
यच्चान्यत्त्रिकालातीतं तदप्योंकार एव ॥ १॥ -- (माण्डूक्योपनिषद, गौ० का० श्लोक १)
अर्थात ॐ यह अक्षर ही सब कुछ है। यह जो कुछ भूत, भविष्यत् और वर्तमान है उसी की व्याख्या है; इसलिये यह सब ओंकार ही है। इसके सिवा जो अन्य त्रिकालातीत वस्तु है वह भी ओंकार ही है।
  • सोऽयमात्माध्यक्षरमोंकारोऽधिमात्रं पादा मात्रा मात्राश्च पादा अकार उकारो मकार इति।। ८।। -- (माण्डूक्योपनिषद् आ०प्र० गौ०का० श्लोक ८)
वह यह आत्मा ही अक्षर दृष्टि से ओंंकार है; वह मात्राओं का विषय करके स्थित है। पाद ही मात्रा है और मात्रा ही पाद है; वे मात्रा अकार, उकार और मकार हैं।
  • तस्य वाचकः प्रणवः -- पतंजलि, समाधिपाद के 27वें सूत्र में
उस ईश्वर का वाचक प्रणव 'ॐ' है।
  • ॐ इत्येतत् अक्षरः -- छान्दोग्योपनिषद्
अर्थात् ॐ अविनाशी, अव्यय एवं क्षरण रहित है।
  • सिद्धयन्ति अस्य अर्थाः सर्वकर्माणि च -- गोपथ ब्राह्मण
जो "कुश" के आसन पर पूर्व की ओर मुख कर एक हजार बार ॐ रूपी मंत्र का जाप करता है, उसके सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
  • ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥ -- श्रीमद्भगवद्गीता
भावार्थ : सृष्टि के आरम्भ से "ॐ" (परम-ब्रह्म), "तत्‌" (वह), "सत्‌" (शाश्वत) है। और इन तीन अक्षरों ( अ +उ +म ) के ब्रह्म को ब्राह्मण यज्ञ में मन्त्रों में स्मरण करते हैं ,और इसी का उच्चारण करते हैं।
  • जो ॐ अक्षर रूपी ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ शरीर त्याग करता है, वह परम गति प्राप्त करता है। -- श्रीमद्भगवद्गीता
  • ॐ मन्त्र की विशेषता यह है कि पवित्र या अपवित्र सभी स्थितियों में जो इसका जप करता है, उसे लक्ष्य की प्राप्ति अवश्य होती है। जिस तरह कमल-पत्र पर जल नहीं ठहरता है, ठीक उसी तरह जप-कर्ता पर कोई कलुष नहीं लगता। -- ध्यानबिन्दु उपनिषद्
  • 'ॐ' यह अक्षर ही उद्गीथ है, इसकी ही उपासना करनी चाहिए । 'ॐ' ऐसा ही उद्गान करता है । उस की ही व्याख्या की जाती है। -- छान्दोग्य उपनिषद
  • वाक् ही ऋक् है, प्राण साम है और ‘ॐ’ यह अक्षर उद्गीथ है । ये जो ऋक् और समरूप वाक् और प्राण हैं, परस्पर मिथुन हैं।
  • आत्मा को अधर अरणि और ओंकार को उत्तर अरणि बनाकर मंथन रूप अभ्यास करने से दिव्य ज्ञानरूप ज्योति का आविर्भाव होता है। -- कठोपनिषद्
  • एक ओंकार सतनाम कर्ता पुरुष निभौं निर्वेर अकालमूर्त -- गुरु नानक
अर्थ - ॐ सत्यनाम जपनेवाला पुरुष निर्भय, बैर-रहित एवं "अकाल-पुरुष" के सदृश हो जाता है।
  • ओ ओंकार आदि मैं जाना।
लिखि औ मेटें ताहि ना माना ॥
ओ ओंकार लिखे जो कोई।
सोई लिखि मेटणा न होई ॥ -- कबीरदास