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हनुमान

विकिसूक्ति से

हनुमान राम के परम भक्त एवं सहयोगी थे। हनुमान जी भक्ति, शक्ति, निष्ठा और साहस के प्रतीक हैं। उन्होंने समुद्र पार जाकर सीता का पता लगाया। लंका का दहन किया।

  • नूनं व्याकरणं क्रित्स्नं अनेन बहुधा श्रुतम्।
बहु व्याहरतानेन न किंचिदपभाषितम् ॥
अविस्तरं असन्दिग्धं अविलम्बितं अद्रुतम्।
उरस्थं कन्ठगं वाक्यं वर्तते मध्यमे स्वरे ॥
उच्चारयति कल्याणीं वाचं हृदयदारिणीम्।
कस्य नाराध्यते चित्त्तमुद्यतासेररेरपि ॥
एवं विधो यस्य दूतो न भवेत् पार्थिवस्य तु।
सिध्यन्ति ही कथं तस्य कार्याणां गतयोनघ ॥ -- हनुमान का परिचय कराते हुए राम, लक्ष्मण से, रामायण में
अवश्य ही इन्होने सम्पूर्ण व्याकरण सुन लिया लिया है क्योंकि बहुत कुछ बोलने के बाद भी इनके भाषण में कोई त्रुटि नहीं मिली। यह बहुत अधिक विस्तार से नहीं बोलते; असंदिग्ध बोलते हैं; न धीमी गति से बोलते हैं और न तेज गति से। इनके हृदय से निकलकर कंठ तक आने वाला वाक्य मध्यम स्वर में होता है। ये कल्याणमयी वाणी बोलते हैं जो दुःखी मन वाले और तलवार ताने हुए शत्रु के हृदय को छू जाती है। यदि ऐसा व्यक्ति किसी का दूत न हो तो उसके कार्य कैसे सिद्ध होंगे?
  • संकट से हनुमान छुड़ावै,
मन क्रम वचन ध्यान जो लावै॥ -- हनुमान चालीसा
जो हनुमान को मन, कर्म और वचन से स्मरण करते हैं उनको हनुमान संकट से बचा लेते हैं।
  • तुलसी रामहु तें अधिक, राम भगत जियें जान।
रिनिया राजा राम में, धनिक भए हनुमान॥ -- तुलसीदास
तुलसी कहते हैं कि श्री राम के भक्त को राम जी से भी अधिक समझो। राजराजेश्वर श्री रामचंद्र जी स्वयं ऋणी हो गए और उनके भक्त श्री हनुमान जी उनके साहूकार बन गए (श्री राम-जी ने यहाँ तक कह दिया कि मैं तुम्हारा ऋण कभी चुका ही नहीं सकता)।
  • कियो सुसेवक धरम कपि, प्रभु कृतग्य जियँ जानि।
जोरि हाथ ठाढ़े भए, बरदायक वरदानि॥ -- तुलसीदास
श्री हनुमान जी ने एक अच्छे सेवक का धर्म ही निभाया। परंतु यह जानकर वर देने वाले देवताओं के भी वरदाता महेश्वर श्री भगवान् हृदय से ऐसे कृतज्ञ हुए कि हाथ जोड़कर हनुमान जी के सामने खड़े हो गए (कहने लगे कि हे हनुमान्! मैं तुम्हारे बदले में उपकार तो क्या करूँ, तुम्हारे सामने नज़र उठाकर देख भी नहीं सकता)।
  • तुलसी राम सुदीठि तें, निबल होत बलवान।
बैर बालि सुग्रीव के, कहा कियो हनुमान॥ -- तुलसीदास
तुलसी कहते हैं कि श्री राम की शुभ दृष्टि से निर्बल भी बलवान् हो जाते हैं। सुग्रीव और बालि के वैर में हनुमान जी ने भला क्या किया? (परंतु वही श्री राम जी की कृपा से महान् वीर हो गए)।
  • रामदूत अतुलित बल धामा । अंजनिपुत्र पवनसुत नामा ॥
महाबीर बिक्रम बजरंगी । कुमति निवार सुमति के संगी ॥ -- हनुमान चालीसा
आप अतुलनीय शक्ति के धाम और भगवान श्री राम जी के दूत हैं। आप माता अंजनी के पुत्र व 'पवनपुत्र' के नाम से जाने जाते हैं। हे महावीर बजरंग बली, आप अनन्त पराक्रमी हैं। आप दुष्ट बुद्धि को दूर करते हैं तथा सुमति (उत्तम बुद्धि) वालों के मित्र हैं।
  • साधु सन्त के तुम रखवारे । असुर निकन्दन राम दुलारे ॥ -- हनुमान चालीसा
अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता । अस बर दीन जानकी माता ॥
आप साधु-सन्तों के रखवाले और असुरों का वध करने वाले हैं और प्रभु श्री राम जी के अत्यन्त प्रिय, दुलारे हैं। आपको माता जानकी से ऐसा वरदान प्राप्त है कि आप किसी को भी आठों सिद्धियाँ और नौ निधियाँ (संपत्तियाँ) दे सकते हैं।
  • जब किसी ने पूछा कि मेरी नजर में सबसे महान राजनयिक कौन हैं, तो उस समय मैंने कहा, भगवान कृष्ण और हनुमान। एक महाभारत के महान राजनयिक हैं, दूसरे रामायण के महान राजनयिक हैं। सूचना प्राप्त करने के लिए हनुमान को श्रीलंका भेजा गया थ।. वे सूचना लाने में सफल रहे। हनुमान माता सीता से मिलने गए और उनका मनोबल बढ़ाने में सफल रहे। -- एस० जयशंकर, भारत के विदेश मंत्री[]

इन्हें भी देखें

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