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स्वामिनाथन गुरुमूर्ति

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स्वामिनाथन गुरुमूर्ति भारत के प्रसिद्ध लेखक एवं पत्रकार हैं। वे खोजी पत्रकारिता के लिये जाने जाते हैं। उन्होंने उच्च पदों पर व्याप्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष किया है। उन्होंने ही भारत के बोफोर्स शस्त्र खरीदी में भ्रष्टाचार को उजागर किया था जिसमें सरकार और कॉरपोरेट के बीच साँठगांथ को प्रकाशित किया गया था। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और स्वदेशी जागरण मंच से जुड़े रहे हैं।

आपातकाल पर
मैंने आपातकाल का अनुभव किया है. मैं भूमिगत था. मैं अपने पिता के श्राद्ध तक में शामिल नहीं हो सका था. मैं अपने घर में खाना नहीं खा सकता था. इस तरह की स्थिति उस समय बनी हुई थी. हर जगह घुप्प अंधेरा था. यह कहना कि अब अघोषित आपातकाल है, इसका मतलब यह है कि ये लोग आपातकाल के बारे में जानते ही नहीं हैं. आपातकाल का मतलब है सभी अधिकारों पर एक संवैधानिक रोक. ऐसा नहीं है कि एक मजबूत नेता मजबूत स्थिति में हो तो वह आपातकाल हो जाता है. एस गुरुमूर्ति ने कहा कि आप उन्हें (नरेंद्र मोदी को) निरंकुश (Autocrate) कहते हैं. एक निरंकुश तभी उभर सकता है, जब संविधान स्वयं उसे निरंकुशता का अधिकार दे. आपातकाल के दौरान यही हुआ था. हालांकि, ऐसी स्थिति इस देश में अब कभी उत्पन्न नहीं हो सकती, क्योंकि जनता पार्टी की सरकार ने संविधान में संशोधन कर दिया है. अब जब तक कहीं भी सशस्त्र विद्रोह न हो, तब तक आप आपातकाल की घोषणा नहीं कर सकते और तब भी आप केवल उसी क्षेत्र में आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं, जिसमें सशस्त्र विद्रोह हुआ हो।
मोदी न होते तो-
भारत बदल रहा है. मैं आपको बता सकता हूं कि यह बदलाव भारत के उदय के साथ-साथ मोदी के उदय का है. जो दुनिया उन्हें एक मिनी हिटलर के रूप में देखती थी, आज वह खुद को ग्लोबल लीडर साबित कर पाए हैं. आप सोच सकते हैं कि इसके लिए मोदी ने किस प्रकार की क्षमता और किस प्रकार का प्रयास किया होगा? उन्होंने खुद को बदला और भारत को बदल दिया. उनके लिए दो फैसलों से यह साबित होता है. पहला कि भारत वैक्सीन का उत्पादन करेगा. हर कोई हंसा. हम सब हंसे. हम हमेशा देखते रहे थे कि वैक्सीन का उत्पादन कौन करता है और कौन इसे हमें निर्यात करता है. हम सभी बीमारियों को झेलते रहते थे और फिर वैक्सीन लेते थे, लेकिन मोदी ने कहा कि मैं वैक्सीन का उत्पादन करूंगा और उन्होंने उत्पादन किया. एक नहीं बल्कि दो. उन्होंने हमें बचाया. नहीं तो हमें कभी वैक्सीन ही नहीं मिलता. कोई भी देश उतनी संख्या में वैक्सीन का उत्पादन नहीं कर सकता था, जितनी हमें जरूरत थी।
यदि 2016 में नोटबंदी नहीं की गई होती, तो अर्थव्यवस्था ढह जाती। नोटबंदी से 18 माह पहले 500 और 1,000 रुपये के नोट 4.8 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गए थे। रीयल एस्टेट और सोने की खरीद में इन नोटों का इस्तेमाल किया जाता था। अगर नोटबंदी नहीं होती तो हमारा हाल भी 2008 के सब प्राइम ऋण संकट जैसा हो जाता। -- विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन में व्याख्यान में
यूक्रेन पर उनका लिया गया निर्णय
निर्णय लेने के लिए उनके पास 10 दिन नहीं थे। उनके पास निर्णय लेने के लिए 10 घंटे नहीं थे। उनके पास निर्णय लेने के लिए शायद कुछ घंटे थे और उन्होंने तटस्थ रहने का निर्णय लिया, जिसका अर्थ था रूस का समर्थन करना. यह संयुक्त राज्य अमेरिका के लिए आपके द्वारा किया गया सबसे बड़ा अपमान था और उन्होंने जो किया, वह केवल एक राजनीतिक फैसला नहीं था. वह जानते थे कि यूक्रेन युद्ध का मतलब है कि तेल 200 डॉलर तक पहुंच जाएगा. उन्होंने रूस से रुपये में तेल खरीदने का फैसला किया. इसके चलते तेल की कीमतें कंट्रोल में रहीं, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था और भारतीय अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकती थीं. कोविड के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की अस्तित्व पर इससे संकट आ सकता था. मगर, हमारे दोनों हाथों में लड्डू थे. इसलिए मेरा मानना है कि भारत एक ऐसे खिलाड़ी के रूप में उभरा है, जो संभवतः भविष्य में दुनिया को शीत युद्ध से बच सकता है. इसलिए जब आप इस बार एक सरकार और एक नेता को चुन रहे हैं, तो आप भारत के लिए एक नेता नहीं चुन रहे हैं, आप भारत की धरती पर एक वैश्विक नेता चुन रहे हैं।
ऑपरेशन सिन्दूर पर
ऑपरेशन सिंदूर सिर्फ एक सैन्य रणनीति नहीं है, यह सैन्य, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से एक शक्ति के रूप में भारत के आगमन की घोषणा है।
भारत को अपनी प्राचीन संस्कृति और दार्शनिक योगदान के लिए लंबे समय से वैश्विक स्तर पर पहचाना जाता रहा है, लेकिन पिछले 14 वर्षों ने इसकी वैश्विक छवि को फिर से परिभाषित किया है। आध्यात्मिकता और सभ्यता में निहित एक नरम शक्ति से, भारत को अब एक उभरती हुई कठोर शक्ति के रूप में देखा जा रहा है। दो दशक पहले यह बदलाव अकल्पनीय था। ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की तैयारियों और रणनीतिक संकल्प को दिखाकर इस धारणा को फिर से आकार देने में मदद की है। यह 1947या 1999का भारत नहीं है। यह 2025 का भारत है, जो आत्मविश्वासी, सक्षम और आत्मनिर्भर है।
  • पाकिस्तान का राष्ट्रवाद और अस्तित्व पूरी तरह से भारत को हराने पर आधारित है। इसकी राष्ट्रीय पहचान सकारात्मक नहीं है, यह प्रतिक्रियावादी है।
नरेंद्र मोदी की 2017की इजरायल यात्रा पर
उस समय विपक्ष, मीडिया और यहां तक ​​कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत पर उंगलियां उठाई गई थीं। लेकिन अगर 2025 में इजरायल भारत के साथ खड़ा नहीं होता, तो चीजें बहुत अलग होतीं।
लचीली अर्थव्यवस्था पर
भारत की बढ़ती आर्थिक ताकत ने उसे अंतरराष्ट्रीय दबावों और प्रतिबंधों का सामना करने में सक्षम बनाया। कोई कमज़ोर अर्थव्यवस्था एक मज़बूत युद्ध का जोखिम नहीं उठा सकती। लेकिन हमारे पास संसाधन थे, और हमने उनका बुद्धिमानी से इस्तेमाल किया।
वैश्विक भारतीय प्रवासियों की शक्ति पर
भारतीय प्रवासी केवल एक समुदाय नहीं हैं; यह एक रणनीतिक संपत्ति है। मीडिया के प्रभाव से लेकर नीति निर्माण तक, उनका समर्थन बहुत ज़्यादा है।
आत्मनिर्भरता
मेक-इन-इंडिया केवल एक नारा नहीं है। यह एक रणनीतिक अनिवार्यता बन गई है- हमारे अपने हथियार, हमारी अपनी प्रणाली, हमारी अपनी रक्षा खुफिया जानकारी। यही आत्मनिर्भरता की कार्रवाई है।
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय पर
जेएनयू के गठन की पृष्ठभूमि भारत विरोधी रही है। यह देश की विरासत, परंपरा, आध्यात्मिकता और मूल्यों के विरोधियों को जन्म देती है। 1969 में जब कांग्रेस में विभाजन हुआ था तब वामपंथियों ने इंदिरा गांधी को समर्थन किया था। इसके लिए उसने शिक्षा विभाग देने की मांग रखी थी। नूर हसन को शिक्षा मंत्री बनाया गया। जेएनयू की स्थापना के पीछे उनका ही दिमाग था कि इसे किस प्रकार चलाया जाए और किस प्रकार की विचारधारा को स्थान दिया जाए?(१९१९ में)