सुभाष काक
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सुभाष काक (जन्म 26 मार्च 1947) एक भारतीय अमेरिकी दार्शनिक, कवि, और वैज्ञानिक हैं।
उक्तियाँ
[सम्पादित करें]- अन्य सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्मों की तरह विकिपीडिया भी एक 'प्रतिध्वनि कक्ष' बनकर रह गया है जहाँ उपयोगकर्ता को संतुलित वस्तुस्थिति दिखाने के बजाय केवल एक ही प्रकार की सामग्री प्रस्तुत की जाती है। यह गलत सूचना शक्तिशाली है क्योंकि लेख अकादमिक शैली में लिखे गए हैं और उपयोगकर्ता अन्य स्रोतों को नहीं देख पाते जो लेख में व्यक्त विचार से असहमत हैं... विकिपीडिया के कुछ संपादक राक्षसी ऊर्जा वाले असफल शिक्षाविद हैं जो गुमनाम रहते हुए वह सब हासिल करना चाहते हैं जो वे अपने सामान्य करीयर में नहीं कर पाए। वे अपने कामकाजी जीवन का अधिकांश समय विकिपीडिया लेखों को संपादित करने में बिताते हैं और कई गुमनाम हैंडलॉं के उपयोग के द्वारा उन्होंने प्रशासक का पद प्राप्त कर लिया है जो उन्हें विरोधी विचारों को ब्लॉक करने का अधिकार देता है। संपादकों के गुमनाम व्यक्तित्व और कम दांव ने विकिपीडिया की राजनीति को वास्तविक राजनीति से कहीं अधिक क्रूर बना दिया है। -- सुभाष काक, 9 अप्रैल, 2019 विकिपीडिया ऑर ट्रैशपेडिया?
- जब वैज्ञानिक और विद्वान अपने करियर के कुछ भाग को किसी प्रतिमान के समर्थन में निवेश करते हैं, तो उसे त्यागना एक तरह से आत्म-विश्वासघात जैसा हो जाता है। -- "मधुमक्खी नृत्य भाषा विवाद," द मैनकाइंड क्वार्टरली, 1991, 357-365।
- पुरुष और स्त्रियाँ अपने आपसी आकर्षण में उसी शून्यता की ओर चले जाते हैं जिससे वे बचने की कोशिश कर रहे होते हैं। -- Recursionism and Reality, 2002 (पुनरावृत्तिवाद और वास्तविकता, 2002)
- वेदों का सार यही है कि अनुभव करने वाला आत्मा है कौन? साधारण विज्ञान हमें वस्तुओं और उनके परिवर्तनों के बीच संबंध के बारे में बताता है। लेकिन वेद कहते हैं कि यह साधारण विज्ञान उस आत्मा को छोड़ देता है जो इन वस्तुओं का अवलोकन करता है। -- 'द हिंदू' के साथ साक्षात्कार में, 2014
- सुंदरता हमें एक ऐसे स्थान पर ले जाती है जो अवर्णनीय है, रहस्यों का स्थान है। -- 'द हिंदू' के साथ साक्षात्कार में, 2014
- कश्मीरी पंडितों का नरसंहार और उनको उनकी मातृभूमि से निकालने के प्रति भारतीय अंग्रेजीदाँ लोगों की उदासीनता हाल के इतिहास का एक शर्मनाक प्रकरण है। यजीदियों को देखें; उनके नरसंहार और यौन दासता को तर्कसंगत नहीं बनाया गया है। भारतीय एंग्लोस्फीयर आत्म-घृणा, आत्म-धोखे और बेशर्म झूठ के कोकून में रहता है। -- मार्च 2022
इशबार के रहस्य (1996)
[सम्पादित करें]- सबसे अच्छा स्वर्ग वह स्वर्ग है जिससे हमें निर्वासित किया जाता है।
- इसकी क्या प्रायिकता (संभावना) है कि कोई व्यक्ति आकाश को खाल की तरह लपेट सके?
- दुनिया सूचना और विरोधाभास का खेल है।
- मेरे पास इतनी इच्छाएँ हैं कि इच्छा ही मेरी पूर्ति है।
प्रज्ञा सूत्र (2007)
[सम्पादित करें]- लोग झूठे जादुई सिद्धांतों को इस उम्मीद में अपनाते हैं कि उनसे कुछ अच्छा निकलेगा। इनमें से सबसे चरम स्थिति यह है कि, अच्छाई केवल इस जीवन के अंत में ही निकलती है, स्वर्ग में।
- मनुष्य एक नकलची जानवर है, जो किसी भूमिका को निभाने में सबसे ज़्यादा खुश होता है, उसे सच बोलने के लिए एक मुखौटे की ज़रूरत होती है।
- देवताओं के कई चेहरे होते हैं।
- शरीर आत्मा की पत्नी की तरह है। दोनों को नई सृष्टि के लिए सहवास करना चाहिए, लेकिन उनके सुख शायद ही कभी मेल खाते हों।
- जब मन ब्रह्मांड को समझ लेता है, तो इंद्रियाँ पीछे हट जाती हैं।
द विशिंग ट्री (2015)
[सम्पादित करें]- इतिहास कल्पना के गोंद से जुड़े सबूतों के टुकड़े हैं।
- कर्मकाण्ड मुखौटे के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है, या तो इसे लगाने से असली चेहरा छिप जाता है, या सार्वजनिक चेहरा अपनाने से।
- आधुनिक जीवन हमें प्रकृति से, यहाँ तक कि खुद से भी दूर कर देता है।
द लूम ऑफ़ टाइम (2016)
[सम्पादित करें]- जब हृदय देह की पर दुखी होता है, तो आत्मा समझ की उम्मीद पर खुश होती है।
- यूरोप ने अपने पेगन (बुतपरस्त) देवताओं को पुनः जीवित कर दिया है।
- मोर का नृत्य न केवल मोरनी को बल्कि मनुष्य को भी आकर्षित करता है।
- सभ्यताओं का टकराव कुछ और नहीं बल्कि विभिन्न मिथकों का टकराव है।
- यद्यपि अलग-अलग अवतारों को एक साथ रखने वाला एक सूत्र अवश्य मौजूद है, फिर भी कोई भी व्यक्ति एकल आत्म नहीं है।
- यदि शतरंज का मतलब राजा के स्थान तक पहुँचकर, दुश्मन को हराकर, निर्णायक जीत हासिल करना है, तो वेइकी का मतलब अपने राज्याधिकार को मजबूत करना है।
द सर्किल ऑफ़ मेमोरी, एन ऑटोबायोग्राफी (2016)
[सम्पादित करें]- अगर सोशल मीडिया आज़ादी का एहसास दिला सकता है, तो यह लोगों को भ्रम से भरए पंथों में भी बाँध सकता है।
- चेतना के विचार के लिए न केवल चीज़ों के बारे में जागरूकता की आवश्यकता होती है, बल्कि यह जागरूकता भी आवश्यक होती है कि कोई जागरूक है।
- चूँकि भाषा रैखिक होती है, जबकि ब्रह्मांड का खुलासा कई आयामों में होता है, इसलिए भाषा वास्तविकता का वर्णन करने की अपनी क्षमता में सीमित है।
- उपनिषदों जितना उत्थानशील और प्रेरक कुछ भी नहीं है।
- संस्कृति एक लेंस की तरह होती है जिसके माध्यम से लोग अपनी दुनिया का निर्माण करते हैं।