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सुकनासोपदेश

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शुकनासोपदेशः (शुकनास का उपदेश), वाणभट्ट द्वारा रचित कादम्बरी का एक अंश जिसमें राजा तारापीड का नीतिनिपुण एवं अनुभवी मन्त्री शुकनास, राजकुमामार चन्द्रापीड को राज्याभिषेक के पूर्व वात्सल्य भाव से उपदेश देते हैं और रूप, यौवन, प्रभुता तथा ऐश्वर्य से उद्भूत दोषों से सावधान रहने की शिक्षा देते हैं। यह प्रत्येक युवक के लिए उपादेय उपदेश है। शुकनास सर्वप्रथम लक्ष्मी के विषय में चन्द्रापीड को उपदिष्ट करते हैं।

शुकनासोपदेश का सारांश
मन्त्री शुकनास राजकुमार चन्द्रपीड को उपदेश देते हुए कहते हैं,
कुमार युवावस्था में उत्पन्न अन्धकार अत्यन्त गहन होता है। आप लक्ष्मी को ही देखें, यह मिलती नहीं और मिलने पर दुःख से रक्षा की जाती है। यह परिचय की परवाह नहीं करती, न कुल देखती है, न रूप, शील, त्याग, आचार, धर्म, सत्य आदि की परवाह करती। गुणवान को अपवित्र समझती है, सज्जन को अपशकुन, शूर को कण्टक ( कांटा ), विनीत को पापी, मनस्वी को पागल समझकर दूर से छोड़ देती है।
इस दुष्टा के द्वारा दैववश पकड़े गये राजा सारी अशिष्टता के आधार बन जाते हैं । झूठी प्रशंसा के गर्व से चूर देवता और ब्राह्मणों को प्रणाम नहीं करते । मान्य एवं पूज्य व्यक्तियों को सम्मान नहीं करते , गुरुजनों का आदर नहीं करते । वृद्धों के उपदेश को बकवास समझते हैं, उसी को पास में रखते हैं, उसी से मित्रता करते हैं, उसी का आदर करते हैं, उसी की बात सुनते हैं जो रात-दिन सब काम छोड़कर हाथ जोड़कर उनकी खुशामद करता है ।
इसलिए हे कुमार ! इस राजतन्त्र में और महामोहकारिणी युवावस्था में तुम्हें ऐसा व्यवहार करना चाहिए जिससे लोगों द्वारा हँसे न जाओ, गुरुजनों द्वारा धिक्कारे न जाओ, मित्र तुम्हें उलाहना न दे सकें, धूर्तों द्वारा ठगे न जा सको, स्त्रियाँ तुम्हें लुभा न सकें। यह विद्वान धैर्यशाली, कुलीन और प्रयत्नशील व्यक्ति को भी दुष्ट बना देती है। अतः तुम कुल क्रमागत राज्य का भोग करो, इतना कहकर मन्त्री चुप हो गये।

सूक्तियाँ

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  • अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमदः।
अर्थ - अन्य मद तो कालक्रम से स्वतः ही शान्त हो जाते हैं, किन्तु धन/लक्ष्मी का उन्माद तो मरते दम तक भी शान्त नहीं होता है। तिमिर नामक भयंकर नेत्र रोग भी अञ्जन आदि की चिकित्सा से दूर हो सकता है। किन्तु ऐश्वर्य का अविवेक रूपी गाढ़ अन्धत्व तो अञ्जनादि रूपी किसी भी उपदेशोपचार से दूर नहीं होता है। अन्य प्रकार के ज्वर का ताप तो सामान्य शीतोपचार से भी शान्त हो जाता है। किन्तु अहंकार रूपी ज्वर का ताप तो चन्दन आदि विशिष्ट शीतोपचार से भी शान्त नहीं होता है।
  • परस्परविरुद्धञचेन्द्रजालमिव दर्शयन्ती प्रकटयति जगति निजं चरितम्।
अर्थ- (इस तरह यह लक्ष्मी) इन्द्रजाल (जादू) के समान परस्पर विरोधी बातें दिखती हुयी जगत् में अपना चरित्र प्रकट करती है।
  • तथाहि, सततमूष्माणमुपजनयन्त्यपि जाड्यमुपजनयति।
अर्थ- (उदाहरण के लिए) निरन्तर ऊष्मा उत्पन्न करती हुई भी जड़ता (मूर्खता) उत्पन्न करती है।
  • उन्नतिमादधानापि नीचस्वभावतामाविष्करोति।
अर्थ- उन्नति को धारण करती हुई भी नीच स्वभावता को प्रकट करती है।
  • तयोराशिसंभवापि तृष्णां संवर्धयति।
अर्थ- समुद्र से उत्पन्न हुई भी तृष्णा को बढ़ाती है।
  • ईश्वरतां दधानाप्यशिवप्रकृतित्वमातनोति।
अर्थ- प्रभुता को धारण करती हुई भी अशिव स्वभाव (अमंगल) का विस्तार करती है।
  • बलोपचयमाहरन्त्यपि लघिमानमापादयति।
अर्थ- बल समूह को लाती हुयी भी लघुता को प्राप्त कराती है अर्थात् लाती है।
  • पुरुषोत्तमरतापि खलजनप्रिया। रेनूमयीव स्वच्छमपि कलुषीकरोति।
अर्थ- पुरुषोत्तम में आसक्त होते हुए भी दुष्टजनों से प्रेम करने वाली है। रेणुमयी यह लक्ष्मी स्वच्छ को भी कलुषित बना देती है।
  • विषमो विषयविषास्वादमोहः।
  • गुरूपदेशः पुरुषाणाम् अखिलमलप्रक्षालनक्षमम् अजलं स्नानम्।
  • राज्ञां विरला हि उपदेष्टारः।
  • अहङ्कार दाहज्वर मूर्च्छान्धकारिता विह्वला राजप्रकृतिः।
  • जन्मान्तरकृतम् हि कर्मफलमुपनयति पुरुषस्येह जन्मनि।
  • सुभाषितं हारि विशत्यधो गलान्न दुर्जनस्यार्करिपोरिवामृतम्।
  • तृष्णाविषमूर्च्छिताः कनकमयमिव सर्वं पश्यन्ति।
  • खलीकरोति लक्ष्मीरिति।
  • अतिगहनं तमो यौवनप्रभवम् ।
युवावस्था में उत्पन्न होने वाला (अज्ञानरूप) अन्धकार अत्यन्त दुर्दमनीय होता है।
  • अपरिणामोपशमो दारुणो लक्ष्मीमदः ।
धन-मद अन्तिम अवस्था में भी शान्त नहीं होता ।
  • चन्दनप्रभवो न दहति किमनलः?
क्या चन्दन से उत्पन्न अग्नि जलाती नहीं?
  • तरल हृदयमप्रतिबुद्धं च मदयन्ति धनानि ।
चञ्चल मन वाले तथा अजागरूक बुद्धि वाले व्यक्ति को धन मतवाला बना देता है।
  • दुरन्तेयमुपभोगतृष्णिका ।
उपभोगरूपी मृगतृष्णिका अत्यधिक दुःखदायी अन्तवाली है।
  • प्रतिशब्द इव राजवचनमनुगच्छति जनो भयात् ।
भय से मनुष्य प्रतिध्वनि की तरह राजा के वचन का अनुसरण करते हैं।
  • इयमनार्या (लक्ष्मीः) लब्धापि खलु दुःखेन परिपाल्यते ।
नीच स्वभाव वाली (लक्ष्मी) को पा लेने पर भी कष्ट से इसका पालन (रक्षा) होता है।
  • विह्वला हि राजप्रकृतिः ।
राज-स्वभाव निश्चय ही व्याकुल करने वाला है।
  • राज्यविषविकारतन्द्राप्रदा राजलक्ष्मीः ।
राजलक्ष्मी राज्यरूपी विष से उत्पन्न आलस्य (तन्द्रा) को देने वाली है।
  • सरस्वतीपरिगृहीतमीर्ष्ययेव नालिङ्गति लक्ष्मीः ।
सरस्वती द्वारा स्वीकृत व्यक्ति को लक्ष्मी ईर्ष्या के कारण आलिङ्गन नहीं करती।
  • युवावस्था के प्रभाव से उत्पन्न अन्धकार सूर्य से भेदा नहीं जा सकता तथा मणियों एवं दीपक के प्रकाश से दूर नहीं किया जा सकता।
  • लक्ष्मी से उत्पन्न मद दारुण होता है तथा वृद्धावस्था में भी शान्त नहीं होता।
  • ऐश्वर्य रूपी 'तिमिर' रोग अञ्जन की शलाका से भी ठीक नहीं होता।
  • राग (अनुराग) का मल स्नान एवं शौच आदि कार्यों से भी दूर नहीं होता।
  • राज्य-सुख की निद्रा रात बीत जाने पर भी नहीं टूटती ।
  • जन्म से प्राप्त ऐश्वर्य, नयी युवावस्था, अनुपम सौन्दर्य तथा अलौकिक शक्ति 'चारों' अनर्थ की परम्पराएं हैं।
  • 'युवावस्था' के आरम्भ में शास्त्रजल के प्रक्षालन के पश्चात् भी 'बुद्धि' कलुषता को प्राप्त करती है।
  • श्वेतता (स्वच्छता) को त्यागे बिना भी युवकों की दृष्टि लालिमा (राग) से युक्त रहती है।
  • जिस प्रकार वात्या ( बवंडर) सूखे पत्ते को उसी प्रकार रजोगुण से उत्पन्न भ्रान्ति पुरुष को अपनी इच्छा से घुमाती है।
  • उपभोगमृगतृष्णा इन्द्रिय-हरिणों को नष्ट कर देती है ।
  • जिस प्रकार जल के कारण कसैले पदार्थ मीठा स्वाद देते हैं उसी प्रकार युवावस्था के कारण विषय में अनुरक्ति मधुर प्रतीत होती है।
  • विषयों में आसक्ति दिग्भ्रमित व्यक्ति की तरह पुरुष को नष्ट करती है।
  • चन्द्रापीड जैसे व्यक्ति ही उपदेश के योग्य होते हैं।
  • जिस प्रकार स्फटिक मणि में चन्द्रमा की किरणें उसी प्रकार निर्मल हृदय में उपदेश सरलता से प्रविष्ट होता है।
  • जिस प्रकार थोड़ा सा पवित्र जल भी कान में पड़ने पर पीड़ा पहुँचाता है उसी प्रकार गुरु का पवित्र उपदेश भी अशिष्ट को कष्ट पहुँचाते हैं।
  • शिष्ट व्यक्ति की शोभा को गुरूपदेश हाथी के शंखाभूषण की तरह बढ़ा देते हैं।
  • प्रदोष के चन्द्रमा की तरह गुरु वचन दोषरूपी अन्धकार को दूर करता है।
  • काम के बाणों से जर्जर हृदय में उपदेश जल की तरह चू जाता है।
  • गुरु का उपदेश 'जलविहीन' स्नान है।
  • भय से लोग प्रतिध्वनि की तरह राजा के वचन का अनुसरण करते हैं।
  • भय से लोग प्रतिध्वनि की तरह राजा के वचन का अनुसरण करते हैं।
  • अभिमानरूपी सूजन से बन्द कान में गुरूपदेश नहीं सुनाई पड़ता।